Monday, April 27, 2020

लल्ला पुराण 312 (सनातन)

हर व्याख्या परिभाषा से ही शुरू होती है। होनी भी चाहिए। इसीलिए सनातन पर टिप्पणी परिभाषा से शुरू किया। राहुल सांकृत्यायन वैदिक सभ्यता के शौधजन्य समीक्षक है तथा ऋगवैदिक जीवन और संस्कृति की उनकी समीक्षा में प्रशंसा भाव दिखता है। उनकी पुस्तक की अनुशंसा आपके लिए नहीं है, उन लोगों के लिए है जिनकी वेदों की जानकारी कहासुनी आधारित है।यदि सनातन नूतन है तो सबकुछ सनातन ही है क्योंकि नवीन का भवन पुरातन के खंडहरों पर ही बनता है। मैं ज्ञानी तो हूं नहीं ज्ञान के निरंतर तलाश में हूं, आप जौसों से विमर्श से कुछ अर्जन होगा। भाग-2 (यदि और जब संभव हुआ) में उपनिषद, ब्राह्मण की लोकायत और बौद्ध समीक्षा की समीक्षा का प्रयास करूंगा।

No comments:

Post a Comment