Wednesday, July 31, 2019

लल्ला पुराण 245 (आज़म खान)

@Pradeep Sharma: आज़म खान ने माफी मांग ली, वैसे मैंने संसद की रिपो्र्टिंग का वह पूरा वीडियो देखा, उसमें ऐसा कुछ नहीं है जितना हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, हां यदि उसका नाम आजम की बजाय राधामोहन होता तो इतना हंगामा न होता। स्मृति इरानी एक बलात्कारी विधायक को महात्मा घोषित कर रही हैं तो कोई हंगामा नहीं? आजम एक शेर पढ़ते हैं, 'इधर-उधर की बात न कर....', पीठसीन अधिकारी रमा देवी हंसकर कहती हैं इधर-उधरनहीं संसद में स्पीकर को देखते हैं, आजम कहते हैं वे तो उन्ही को देखते रहते हैं, वेै कहती हैं वे छोटी बहन जो हैं, आजम भी उन्हें छोटी बहन कहते हैं, बात-चीत हल्के-फुल्के माहौल में हो रही है तभी, बलात्कारी को महात्मा घोषित करने वालों, राम-रहीम और आसाराम के भक्तों को आज़म खान को खलनायक बनाने का मौका मिल जाता है। मैं आजमखान और समाजवादी पार्टी का आलोचक ही नहीं निंदक हूं, लेकिन आलोचना तथ्यात्मक होनी चाहिए।

लल्ला पुराण 244 (हिंदू-मुसलमान)

मैं आपको नहीं कह रहा हूं, मुल्क में ऐसा ही नफरत का माहौल बन गया है। 15-16 साल के मुसलमान लड़के को जयश्रीराम न कहने पर जलाकर मार डाला जाता है, सेना के एर सेवानिवृत्त कैप्टन को भीड़ द्वारा घर में घुसकर मार डाला जाता है क्योंकि उसका नाम मुसलमानों सा है। अरे भाई जब सगे 2 भाई एक से नहीं होते तो लाखों-करोड़ों की एक कोटि कैसे बना सकते हैं? मोदी एक महिला सांसद को सूर्पनखा कहता है कोई हंगामा नहीं होता अगर उसका नाम मोहम्मद होता तो आसमान-जमीं एक हो जाते। देश में खतरनाक नफरत का माहौल बना हुआ है, इसे जल्द बदलने की जरूरत है।

उन्नाव बलात्कार पीड़िता

उन्नाव की एक नाबालिक राजपूत लड़की अपने परिवार के हितैषी, सजातीय, बाहुबली, भाजपा विधायक के घर आती-जाती थी। विधायक ने उसके साथ अपनी एक अन्य हितैषी सजातीय महिला शशि सिंह की सहायता से बलात्कार करना शुरू किया। शिकायत करने पर पुलिस की सहायता से विधायक ने गुर्गों के साथ उलका सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस केस दर्ज करने की बजाय लड़की के परिवार को धमकाना-डराना शुरू किया। लड़की ने परिवार के साथ लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री के घर के सामने आत्मदाह की कोशिस की। मामला मीडिया और सोसल मीडिया में प्रचारित होने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर विधायक को गिरफ्तार किया। विधायक के गुर्गे परिवार पर मामला वापस लेने का दबाव डालते रहे। लड़की का भयभीत पिता उसे लेकर दिल्ली में छुप कर रहने लगा। वह एक दिन चुपके से अपने घर वालों से मिलने आया, विधायक के भाई को खबर लग गयी तो वह आकर पुलिस के सामने उसेमार मार कर अधमरा कर दिया तथा पुलिस ने उसे पकड़कर हिरासत मे मार डाला और चश्मदीद गवाह लड़की के चाचा को फर्जी मुकदमों में जेल में डाल दिया। कोर्टके आदेश से लड़की को सुरक्षा गार्ड मिलते हैं जो उसके आवागमन की जानकारी विधायक को देते रहते हैं। लड़की अपने वकील, चाची, मौसी के साथ रायबरेली जेल में बंद अपने चाचा से मिलने जाती है, सुरक्षा गार्ड साथ नहीं जाते। अच्छी खासी चौड़ी सड़क पर जिस पर 4 वाहन एकससाथ गुजर सकते हैं, उल्टी दिशा से नंबर प्लेट पर कालिख पोते, एक ट्रक बलात्कार पीड़िता की गाड़ी में टक्कर मारता है और ड्राइवर भाग जाता है। मामले की चश्मदीद उसकी चाची और मौसी की मौके पर मौत हो जाती है, लड़की और उसके वकील गंभीर हालत में लखनऊ अस्पताल में भरती है। दिल्ली में प्रदर्शन होता है, दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष लड़की को एयर अंबुलेंस से दिल्ली भेजने का उप्र के मुख्यमंत्री से आग्रह करती हैं, जिसे दरकिनार कर मामले में लीपापोती के लिए वे मामला सीबीआई को सौंप देते हैं, लोगों को शंका है कि लड़की को मार कर मामला रफा-दफा करने की साजिश चल रही है। यह है योगी के रामराज की एक झलक।

Sunday, July 28, 2019

लल्ला पुराण 243 ( भगत सिंह)

मैंने कहां कहा कि नास्तिकता समाजवादी होने का पैमाना है? जिन्ना और सावरकर जैसे फिरकापरस्त भी नास्तिक थे। भगत सिंह की समाजवादी निष्ठा उनके अन्य लेखों से पता चलती है। तर्क-तथ्यों से प्रमाणित सत्य की खोज करने वाला एक मार्क्सवादी नास्तिक भी होता है। हर नास्तिक मार्क्सवादी नहीं होता न हर क्रांतिकारी नास्तिक। कई अन्य पुराने क्रांतिकारियों की तरह शचींद्र सान्याल नास्तिक नहीं थे। 'भगत सिंह और साथियों के दस्तावेज' (चमनलाल और जगमोहन सिंह द्वारा संपादित) पुस्तक में क्रांतिकारियों पर भगत सिंह का लेख संग्रहित है, जिसमें उन्होंने पुराने क्रांतिकारियों की धार्मिकता का उल्लेख किया है। शचींद्र सान्याल धार्मिक थे, मनुवादी नहीं। उसी लेख में उन्होंने लिखा है कि उनकी विचारधारा इतनी मजबूत है कि उन्हें धर्म की बैशाखी की जरूरत नहीं है। यह पुस्तक इलाहाबाद में शबद पर उपलब्ध है। वैसे भगत सिंह के ज्यादातर लेख ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

लल्ला पुराण 242 (आरयसयस)

जी, बाल स्वयंसेवक ही था, बड़ा होता तो फंसता ही नहीं। ये बहुत समझदार होते हैं, बच्चों को ही पकड़ते हैं। प्लेटो को पढ़े बिना उसका अनुशरण करते हैं। वह कहता है बच्चों को पैदा होते ही पढ़ाना शुरू कर दो। बच्चे मोम की तरह होते हैं जो आकार चाहो दे सकते हो। मेरा विद्रोही तेवर देख प्रत्यक्ष जोशी कृत्य की किसी की हिम्मत नहीं हुई अप्रत्यक्ष प्रयासों को प्रोत्साहित नहीं किया।इलाहाबाद में मैं बाल से ऊपर उठकर तरुण हो चुका था। एक प्रचारक बौद्धिक के बाद कमरे तक आ गया और ज्यादा 'दुलार' की कोशिस किया, बटुक प्रदेश पर लात के बाद स्नेह को गलत समझने का तर्क देने लगा। आजकल वह विहिप का नेसनल सेक्रेटरी है। तब वीरेश्वर जी था, अब वीरेश्वर द्विवेदी है।

लल्लापुराण 241 (आरयसयस)

Shailesh Dwivedi दिमगवा शाखा की ड्रिल से कुंद बना रहता तो आज भाजपा का बड़ा नेता होता, लेकिन विज्ञान के वैज्ञानिक अध्ययन ने सवाल करने और प्रमाणित को ही सत्य मानने की प्रवृत्ति पैदा कर दी। वैसे भी मैं तब तक नास्तिक हो चुका था, जिन्ना और सावरकर की ही तरह मैं धार्मिक नहीं था, सांप्रदायिक था।

लल्ला पुराण 240 (आरयसयस)

मैं आरययसयस को बहुत नजदीक से जानता हूं, मुरली म जोशी से लेकर रज्जू भैया, सुंदर सिंह भंडारी, कॉरपोरेटी फिक्सर अरुणजेटली आदि निजी रूप से जानते थे। ओटीसी कर चुका हूं। एबीवीपी के स्टेट कमेटी में था जब इसकी देशद्रोही और अनैतिक हरकतों को अच्छी तरह जान लिया तो इस गंदी नाली से निकल सका। इसके शिविरों में ज्यादातर अधिकारी (संघमें कार्यकर्ता नहीं अधिकरी होते हैं) प्रदीपजोशी कृत्य में संलग्न रहते हैं जिसे ऊपर से नीचे तक सब जानते हैं। जिसने भी बालस्वयंसेवक से कैरियर शुरू किया अगर वह कहता है उसके साथ जोशी कृत्य का प्रयास नहीं हुआ तो वह झूठ बोलता है। झंडा उनका गुरू होता है और डंडा हथियार। अवैज्ञानिक समझ के विज्ञान के छात्र इसमें ज्यादा फंसते हैं। शाखामृग दिनों में मैं भी विज्ञान का छात्र था।

Saturday, July 27, 2019

मार्क्सवाद 176 (जनाधार)

साथी जितेंद्र ,मैंने कब कहा कि जनाधार से क्रांति होती है? फिर तो बोर्नापार्ट, हिटलर या इंदिरा गांधी.... क्रांति कर चुकी होते, क्रांति के लिए सैद्धांतिक स्पष्टता अनिवार्य है लेकिन सिदधांतो से ही क्रांति होती तो मार्क्स के नेतृत्व में फर्स्ट इंटरनेसनल के तत्वाधान में 19वीं सदी में कम्युनिस्ट क्रांति हो गयी होती. मार्क्स ने सामाजिक चेतना के स्वरूप को देखते हुए इंटरनेसनल के उद्बोधन की भाषा को मेनिफेस्टों की तुलना में लचीली बनाया। लेकिन बिना जनाधार के क्रांति फिलहाल असंभव है। क्रांति के लिए बगावत जज्बात जरूरी है लेकिन जज्बात क्रांति नहीं होती जैसा भगत सिंह ने कहा है उस पर क्रांतिकारी विचारेों की शान चढ़ानी पड़ती है औj क्रांतिकारी विचारों से भी क्रांति नहीं होती उन्हें जनता में प्रसारित करने से होती है। इसलिए क्रांति के लिए जनाधार जरूरी है और क्रांतिकारी विचार भी। दोनों के द्वंद्वात्मक योग से ही क्रांति होती है। इसी लिए मैं बार बार मौजूदा सड़ांध मारती सामाजिक चेतना के जनवादीकरण पर जोर देता हूं।
28.07.2017

Tuesday, July 23, 2019

क्या करना है?

क्या करना है? इस पर बिंदुवार बहस के लिए जरूरी है कि हम पहले रेखांकित करें कि क्या समस्याएं हैं? पहली समस्या जो कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से ही है वह है राष्ट्रवाद की। पूंजी का कोई राष्ट्र नहीं होता या यों कहें कि अपने उद्भव से ही पूंजी का चरित्र अंतर्राष्ट्रीय रहा है, आज की शब्दावली में भूमंडलीय रहा है। इसलिए मजदूर का भी कोई राष्ट्र नहीं होता, लेकिन दमन राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय औजारों से होता है इसलिए प्रतिरोध भी राष्ट्र-राज्य की सीमाओं में होना पड़ेगा। 2019 का चुनाव पुलवामा और बालाकोट के प्रायोजन से आरयसयस प्रतिष्ठान ने राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा-जीता। राष्ट्रवाद की स्पष्ट परिभाषा के अभाव में कुछ भी राष्ट्रवाद हो जाता है। जनवरी 2018 का समयांतर राष्ट्रवाद पर है जिसमें इसके विभिन्न पहलुओं पर 14 लेख हैं। मैं नीचे अपने लेख का लिंक दे रहा हूं। एक संवैधानिक लोकतंत्र में संविधान में निष्ठा ही राष्ट्रवाद है, लेकिन सरकार तथा संघ के अनुषांगिक संगठन संविधान की ऐसी-तैसी करते हुए जय श्रीराम राष्ट्रवाद फैला रहे हैं। हमारे सामने एक विकट समस्या है किस तरह लोगों में मिथ्या राष्ट्रवाद की भावना को खत्म कर उन्हें सही राष्ट्रवाद में शिक्षित किया जा सके। इसीसे जुड़ी दूसरी, तीसरी समस्याएं सांप्रदायिकता और जातिवाद की हैं, जिन पर बाद में लिखूंगा।

मोदी विमर्श 107 (भ्रष्टाचार)

कांग्रेस सरकार में भ्रष्टाचार बहुत था, 2008 में उसने फ्रांस की एक कंपनी से लड़ाकू विमान का सौदा किया था जिसमें भ्रष्टाचार की सुगबुगाट हुई और सौदा रद्द कर दिया गया। मोदी की ईमानदार सरकार ने वही सौदा 3 गुने दाम पर किया। भ्रष्ट कांग्रेस की सौदेबाजी में तकनीकी जानकारियों का हस्तांतरण भी शामिल था, ईमानदार सरकार दरियादिल भी होती है, माल जनता का हो तो कहना ही क्या? 4 साल से अधिक हो गया सरकार ने अभी तक किसी भ्रष्टाचारी को हाथ नहीं लगाया, बल्कि कांग्रेस सरकार ने जिन्हें बंद किया था वे छूट गए। मार्क्स ने लिखा है कि राज्य पूंजीपतियों के सामान्य हितों के प्रबंधन की इक्जीक्यटिव कमेटी है। यहां उनकी बात बिल्कुल सही नहीं साबित होती। इक्जीक्यूटिव कमेटी थोड़ा सम्मानजनक शब्द माना जाता है। यह ईमानदार सरकार तो पूंजीपतियों के बंधुआ मजदूर का आचरण कर रही है। खैर अपवाद नियम की पुष्टि ही करते हैं। इस ईमानदार सरकार ने रख-रखाव की जिम्मेदारी प्रतिष्ठित सरकारी कंपनी 'हाल' को देने की बजाय अंबानी की शुरू होने वाली कंपनी को 45,000 करोड़ के ठेके पर देगी, उसी तरह जैसे अंबानी के खुलने वाले विश्वविद्यालय को उत्कृष्टता का तमगा। हमारा नमक-हलालों का समाज है ।

भ्रष्टाचार पूंजीवाद की (सभी वर्ग समाजों की) अंतर्निहित प्रवृत्ति है, नीतिगत दोष नहीं। इसका समूल उन्मूलन, पूंजीवाद के अंत के साथ ही होगा। लेकिन इतनी ढिठाई और बेशर्मी से भ्रष्टाचार की यह अभूतपूर्व मिशाल हैं। भारत माता की जय।
23.07.2018

Sunday, July 21, 2019

एके रॉय

एके रॉय को श्रद्धांजलि
ईश मिश्र

मार्क्सवादी चिंतक तथा धनबाद से 3 बार सांसद रहे एके रॉय का निधन भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के एक युग के अंत का द्योतक है। 1989 में संसद में सांसदों के वेतन-भत्ते में बढ़ोत्ती के विधेयक का उन्होंने विरोध किया था। 1991 में चुनाव हारने के बाद से वे सांसद की पंसन नहीं लेते थे तता उनकी पेंसन राष्ट्रपति को, में जमा होती थी। उन्होंने हमेशा ज़ीरो बैलेंस की जिंदगी जी।

1980में जेयनयू में एसएफआई (सीपीयम के छात्र संगठन) से निकलकर हम लोगों ने आर(रिबेल) एसएफआई बनाया था। हम (मैं और कॉमरेड दिलीप उपाध्याय [दिवंगत]) आरएसएफआई की पहली पब्लिक मीटिंग के लिए, 1970 के दशक में सीपीयम से निकलकर मार्क्सवादी कोआर्डिनेसन कमेटी के संस्थापक एके रॉय को आमंत्रित उनके सांसद निवास पर गए। वे खाना बना रहे थे। चटाई पर बैठकर भोजन करते हुए घंटों हम लोगों से बात की लेकिन जेयनयू आने से मना कर दिया। इतनी सादगी से शायद ही कोई सांसद रहता हो। रॉय दादा के नाम से जाने जाने वाले अविवाहित कॉ़मरेड रॉय पिचले 10 सालों से अधिक समय से धनबाद से 15-16 किमी दूर एक गांव में एक पार्टी कॉमरेड के घर रह रहे थे। 13 जुलाई को वे बीसीसीयल के केंद्रीय अस्पताल में में भर्ती हुए थे तथा आज (21 जुलाई 20190)को उन्होंने अंतिम सांस ली।

1835 में पूर्वी बंगाल (बांगलादेश) में जन्में अरुण कुमार (एके) रॉय ने 1959 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से रसायनशास्त्र में एमएस्सी करने के बाद कुछ दिन एक प्राइवेट फर्म में काम किया तथा 1961 में पीडीआईएल (प्रोजेक्ट एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड) सिंद्री में नौकरी कर ली। 1966 में सरकार विरोधी 'बिहार बंद' आंदोलन में भाग लेने पर उन्हों गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और पीडीआईएल प्रबंधन ने नौकरी से निकाल दिया। 1967 और फिर 1969 में वे सीपीयम के टिकट से सिंद्री से विधायक चुने गए। 1971 में उन्होंने सीपीयम छोड़कर एमसीसी (मार्क्सिस्ट कोआर्डीनेसन कमेटी का गठन किया) और 1972 में फिर विधायक चुने गए। झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन के साथ उन्होंने झारखंड आंदोलन की भी अगुआई किया था। बिहार छात्र आंदोलन के समर्थन के चलते 1975 में आपातकाल में उन्हें जेल में डाल दिया गया तथा 1977 मे जेल से ही धनबाद से संसद का चुनाव लड़े और विजयी रहे। उसके बाद वे 1980, 1984 तथा 1989 में भी धनबाद से सांसद चुने गए लेकिन 1991 में वे चुनाव हार गए। 10 साल पहले धनबाद से पथालडीह गांव में पार्टी सदस्य के घर रहने से पहले वे पार्टी दफ्तर में रहते थे।

धनबाद में रॉय की छवि एक संत राजनीतिज्ञ की थी। संत राजनीतिज्ञ मार्क्सवादी चिंतक तथा क्रांतिकारी मजदूर नेता को हार्दिक श्रद्धांजलि।

Friday, July 19, 2019

लल्ला पुराण 239 (बाभन-चमार)

@ Raj K Mishra ये आप लोग और हम लोग कौन हैं? इंसानियत को बांटने और अमानवीय बर्बरता का जहर फैलाने का घृणित काम तो फिरकापरस्त बजरंगी कर रहे हैं। कितने बाभन कर्मणा शूद्र और शूद्र बाभन हुए? एक शूद्र शंबूक तपस्या कर रहे थे ब्रह्मांड हिल गया, भरत, लक्ष्मण, हनुमान जैसे कारिंदों को उनकी हत्या करने भेजने की बजाय राजा राम को खुद उनका हत्यारा बनना पड़ा? बाभन से इंसान बन जाइए वही बहुत है।

Thursday, July 18, 2019

Adhocism

I am posting this comment on the anxieties of a colleague regardinmg the loss of job by some adhoc colleagues, having served for many years through interviews for the permanent appointment in a DU teachers group:
Once he has become jobless, he/she is no more a teacher, unless he/she is not temperamentally also a teacher. These are the ironies and lacuna of the system of the set of autonomies including the duly constituted selection committees; "convention" of favoritism, nepotism, patronization among the so-called custodians of the higher academics, so called because in my understanding of a teacher, 2 of the definitional preconditions are: transcendence of personal considerations and ability and will to teach by example. I have full sympathies with some one losing job after being on adhoc for 9 years are even less in the interview of permanent selection. Had interviews been bit postponed, that the college could have easily managed if wished so, they would not have been deprived of their summer salaries. The university/college had enough time to judge his/her ability. I do not know the protagonists (taken in and ousted) of case/cases therefore, am in no position of discussing the relative merit but 9 years adhoc is as surprising as few other past/present cases that I know of longer periods of adhoc, as the interviews have been stalled since3 last 4-5 years? Its the tricky issue to a clear stand on. In principles I am against natural right of the adhoc to be permanent. Their experience must have helped them improve their articulation/communication/expression/abilities and competence in the subject. This itself gives an edge over others to compete at par, so that the unfortunate non-adhocs in the race also get fair treatment but there is no way to authenticate the fairness of the fair treatment. I never got an adhoc job in this or any other university during my around one and half a decade visits to the campuses of various universities and colleges of Delhi and outside before not unexpectedly but unbelievably getting one permanent ( and a year temp 5 years before that).( I will write an anthology of my select interviews and their aftermaths, some time if time permits). Very honestly speaking I don't lament about getting the job very late but still feel as surprised on the rarest of the rare concurrence of circumstantial coincidences as I feel on around 2 decades of adhoc experience of a colleague, who finished his PhD around 1990 and to my understanding is a good and committed teacher.
In the present context of the existing objective realities, I stand with the long serving adhoc teachers as for them, as I have said before, for them, it is not the question of getting but losing the job, also we the permanents are no Socrates either, with an appeal to adhocs (with additional appeal to not taking it personally) to focus on work and not on pleasing one or the various groups of seniors. Some mechanism must be evolved to stop the system of prolonged adhocism.
14.07.2014

Footnote 14 (Jingoism)

Raj K Mishra Where do you get this barbaric jingoism and anti-scientific mindset? I am sure you must have been a science student. Where is Arabian expansion? Your Islamophobia puts you in the category of Hitler's followers. I wish if you could think like a rational human being rather than a brutal communal. Did you plan to be born as a Brahmin and hence a Hindu? Or your being born in a particular caste/sex is consequence of a biological coincidence like that of anyone? I am sorry to be so blunt. I had thought you to be a rational human being.