Monday, August 29, 2022

शिक्षा और ज्ञान 376 (महाबली)

 कल सुबह की सैर से लौटते हुए ज्ञान की उत्कंठा से ओतप्रोत मित्र Raj K Mishra से टेलीफोन पर बातचीत में असगर वजाहत के व्यास समामान से पुरस्कृत नाटक 'महाबली' पर चर्चा के दौरान कबीर और तुलसी की तपलनात्मक क्रांतिकारिता पर बात हुई जिसके आधार पर उन्होंने एक लेख पोस्ट किया। उस पर कमेंट में एक अन्य युवा मित्र DS Mani Tripathi ने मेरे द्वारा तुलसी को क्रांतिकारी कहने पर आश्चर्य व्यक्त किया, उस पर :


तुलसीदास की क्रांति समझने के लिए उन्हें उनके ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर पढ़ना होगा। भाषा ज्ञान की कुंजी है, ज्ञान पर वर्स्व के लिए उसे अभिजन की भाषा में कैद रखा जाता था, तुलसी ने उसे आमजन की भाषा में लिखकर रामकथा को जन जन तक पहुंचाया। यह सर्वविदित है कि अवधी में राम कथा लिखने के लिए तुलसी को यथास्थितिवादी ज्ञानियों के उग्र विरोध के चलते ही उन्होंने लिखा "मांग के खैबो, मसीत को सोइबो, लेबो को एक नू, दोबो को दोऊ"।

नाटक (महाबली) का एक पात्र पं. चंद्रकांत तुलसी को फटकारते हुए कहता है, "कुतर्क न करो तुलसी.. तुम अपने को रामभक्त कहते हो और राम को घूरे पर पहुंचाना चाहते हो.... हम जानते हैं अवधी में न वह शब्द भंडार है, न वह प्रतीक और बिंब, न वह छंद और अलंकार है, न वहलगरिमा और गंभीरता है. न सुंदरता और आकर्षण है, जो संस्कृत में है ..... अवधी में राम का अपमान और अनर्थ हो जाएगा"

इसी लिए पोस्ट में कहा गया है कि तुलसी की क्रांति व्यवस्था को तोड़ने या चुनौती देने की नहीं बल्कि उसकेके अंदर से ( from within the paradigm without quashing it) । कबीर की क्रांति व्यवस्था को चुनौती देती है और उसे तोड़ती है। challenges and quashes he paradigm) ज्ञान की उत्कंठा से ओतप्रोत, युवा मित्र Raj K Mishra को साधुवाद कि टेलीफोन पर छोटे से वार्तालाप को इतने सुंदर ढंग से लिपिबद्ध किया तथा थॉमस कुन की puzzle solving and revolutionary invention से तुलना कर समझाया कि आइंस्टाइन के पहले के वैज्ञानिक अन्वेषण within Newtonian paradigm थे आइंस्टाइन ने Newtonian paradigm को quash करके नए paradigm की स्थापना की। यही फर्क तुलसी और कबीर में है।

Saturday, August 20, 2022

मार्क्सवाद 274 (बहुजन विमर्श 2)

 

प्रिय प्रमोद जी,

सिद्धांततः “बहुजन” नामकरण से मुझे कोई विरोध नहीं है, दरअसल मार्क्सवाद दुनिया के कामगरों (बहुजन) के हित का ही विमर्श है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से दुनिया में व्यापक बहुमत श्रमजीवियों (मजदूरों) यानि बहुजन का ही रहा है तथा परजीवी शासक वर्ग हमेशा ही सूक्ष्म अल्पसंख्यक रहे हैं। इसीलिए मार्क्सवाद सर्वहारा की मुक्ति को मानव-मुक्ति मानता है। सही है कि मार्क्स-एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो की रचना, यूरोप की 1848 की क्रांतिकारी लहर में की लेकिन सभी रचनाएं समकालिक होती हैं और महान, कालजयी रचनाएं सर्वकालिक हो जाती हैं। सही कह रहे हैं कि मार्क्स-एंगेल्स की रचनाएं वेद की तरह ब्रह्मवाक्य के रूप में नहीं ली जा सकतीं, ऐसा करना अमार्क्सवादी कृत्य होगा क्योंकि मार्क्सवाद दुनिया की अनेकरूपों में व्याख्या करने का नहीं बल्कि उसे समझने और बदलने का विज्ञान तथा दर्शन है। रूढ़िवादी मार्क्सवादियों को लक्षित कर ही मार्क्स ने परिहास किया था, “शुक्र है खुदा का कि मैं मार्क्वादी नहीं हूं। एंगेल्स ने 1891 के आस-पास टिप्पणी की थी कि मार्क्सवादी वह नहीं जो मार्क्स के या उनके लेखन से उद्धरण दे बल्कि वह है जो किसी विशिष्ट परिस्थिति में वैसा ही करे जैसा मार्क्स करते। वर्गचेतना से लैश, संगठित सर्वहारा द्वारा मानव-मुक्ति की मूल प्रस्थापना तो मानव-मुक्ति तक अपरिवर्तित रहेगी लेकिन विशिष्ट संदर्भ में संघर्ष की प्रक्रिया वहां की विशिष्ट परिस्थियों के अनुसार बदलती रहेंगी। मार्क्स ने खुद अपने जीवनकाल में ही अपनी प्रस्थापनाओं में कई परिवर्तन किए। 1848 के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो और 1867 के फर्स्ट इंटरनेसनल के उद्बोधन के तेवर और जोर में फर्क देखा जा सकता है। भारत के बारे में 1853 के और 1857-58 के लेखों में उनकी राय में परिवर्तन देखा जा सकता है।

 

जैसाकि मैं निरंतर कहता आया हूं कि हमारे यहां, ऐतिहासिक कारणों से, जन्मगत सामाजिक विभाजन के उन्मूलन की नवजागरण तथा प्रबोधन जैसी क्रांतियां नहीं हुईं, जिसकी जिम्मेदारी भी मार्क्सवाद को अपना वैचारिक आधार मानने वालों पर थी। इसीलिए भारत के विशिष्ट संदर्भ में बहुजन विमर्श मार्क्सवाद के ही एक आयाम की तरह है। इस पर विस्तार से फिर लिखूंगा, अभी इतना ही कहना चाहूंगा कि शब्द और अवधारणाएं संदर्भ और प्रयोग से अर्थ ग्रहण करते हैं तथा ‘बहुजन’ शब्द हिंदी क्षेत्र में अस्मितावादी अर्थ ग्रहण कर चुका है तथा सामाजिक न्याय के संघर्ष का पर्याय बन चुका है, जो कि सही है। लेकिन अब सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय के संघर्ष के बाद आर्थिक न्याय के संघर्ष का वक्त बीत चुका है तथा जरूरत दोनों संघर्षों की द्वद्वात्मक एकता की है। जिसके लिए जरूरी है सामाजिक चेतना का जनवादीकरण क्योंकि जाति के विनाश के बिना क्रांति नहीं और क्रांति के बिना जाति का विनाश नहीं।
सादर

जय भीम – लाल सलाम।

पुनश्च
शीघ्र ही पूरा लेख पढ़ूंगा।
   

 

 

Wednesday, August 17, 2022

मार्क्सवाद 273 (बहुजन विमर्श 1)

 प्रिय प्रमोद जी, 

बहुत दिनों से बौद्धिक जड़ता में जकड़े होने के चलते आपसे भी संपर्क कटा रहा। अभिजन के विपरीत बहुजन विमर्श की अवधारणा प्रशंसनीय है तथा दलित विमर्श को व्यापक फलक देती है। आपने सही कहा है कि ऐतिहासिक रूप  ब्राह्मणवादी बौद्धिक विमर्श के समानांतर लोकायत और बौद्ध आदि बौद्धिक धाराएं प्रगतिशील, वैज्ञानिक, भौतिकवादी धाराएं रही हैं जो ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की पौराणिक बौद्धिक धारा के वर्चस्व में दब गई थीं। शिक्षा की सैद्धांतिक सार्वभौमिक सुलभता औपनिवेशिक शिक्षा नीति का सकारात्मक उपपरिणाम रहा है जिससे 'ज्ञान' पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी और जिसके संरक्षण के लिए उसने हिंदुत्व का चोला धारण कर लिया। मैंने फारवर्ड प्रेस के एक लेख में लिखा था कि हिंदुत्व ब्राह्मणवाद की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। खैर मुख्य मुद्दे पर आते हैं। वह यह है कि मार्क्सवाद के जन की अवधारणा की अनिश्चितता और अस्पष्टता भारत के संदर्भ में उसके व्याख्याताओं की नासमझी के चलते रही है जिन्होंने मार्क्सवाद को यहां की विशिष्ट परिस्थियों में यहां के समाज को समझने-बदलने के विज्ञान के रूप में न अपनाकर मॉडल के रूप में अपना लिया। विज्ञान जड़ नहीं गतिशील होता है। 1853-54 में सामग्री की सीमित उपलब्धता के बावजूद मार्क्स ने जब भारत पर लिखना शुरू किया तो पाया कि यहां का ऐतिहासिक विकास क्रम यूरोप के ऐतिहासिक विकास क्रम के अध्ययन के आधार पर प्रतिपादित ऐतिहासिक भौतिकवाद के सैद्धांतिक खांचे में पूर्णतः फिट नहीं होता तथा इसके लिए एशियाटिक उत्पादन प्रणाली (मोड ऑफ प्रोडक्सन) की अवधारणा प्रतिपादित किया, जिस पर मुझे याद नहीं है कि यहां की कम्युनिस्ट पार्टियों या उनके बुद्धिजीवियों ने कभी कोई गंभीर विमर्श चलाया हो। यूरोप में नवजागरण और प्रबोधन (एनलाइटनमेंट)  क्रांतियों ने जन्माधारित सामाजिक विभाजन समाप्त कर दिया था लेकिन भारत में उसके समतुल्य कोई क्रांति नहीं हुई तथा अपूर्ण सामाजिक क्रांति का मुद्दा भी कम्युनिस्ट पार्टियों का प्रमुख एजेंडा होना चाहिए था जो उन्होंने नहीं किया। भारत के ऐतिहासिक संदर्भ में अस्मितावादियों और मार्क्सवादियों दोनों को समझना चाहिए/होगा कि आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण के चलते शासक जातियां ही शासक वर्ग रहे हैं।  मुझे लगता है कि 19वीं-20वीं शताब्दी की क्रांतियों का युग समाप्त हो चुका है तथा जातीय अस्मितावादी राजनीति अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुकी है। दोनों की धाराओं को पुनर्विचार की जरूरत है जिससे वे सामाजिक चेतना के जनवादीकरण में सार्थक साझी भूमिका निभा सकें, जय भीम लाल सलाम का नारा जिसकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। मकसद प्रतिस्पर्धी जातिवाद नहीं, जातिवाद का उन्मूलन है। 

जय भीम -- लाल सलाम
ईश मिश्र

Saturday, August 13, 2022

शिक्षा और ज्ञान 375 (कपिल मुनि और पाइथागोरस)

 पाइथागोरस की जीवनी और दर्शन जुड़े हुए हैं कपिल मुनि के सांख्यशास्त्र और पाइथागोरस के संख्याशास्त्र में कोई संबंध नहीं है। कपिल मुनि का सांख्यशास्त्र श्रृष्टि का उद्भव विकासवादी प्रक्रिया में स्थापित करता है। वे एक अनीश्वरवादी तथा भौतिकवादी थे। पाइथागोरस ईश्वरवादी था तथा अंधविश्वासों में विश्वास रखता था। कपिल मुनि को पहला विकासवादी माना जाता है, उनके जन्म के स्थान तथा समय के बारे में कई कहानियां हैं, उनका संभावित समय 700 ईशापूर्व यानि पाइथागोरस से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले का माना जाता है।

14.08.2020