Saturday, September 19, 2026

knowledge

 Key to any knowledge is questionng; questioning

 anything and everything beginning with one's own 

minset.

Words

 Words acqiure meaning through 

tone/connotation/inntent and the context.

Friday, September 18, 2026

सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा
जब जनअदालत इतिहास पर फैसला देने बैठेगी

बजरंगी नाज़ियों के गुनाहों पर बहस होगी
और इन बजरंगी नाजियों के हर गुनाह की सजा मुर्रर होगी।

Friday, September 11, 2026

बेतरतीब 192 (बचपन)

 हमारे बचपन में हमारे गांव में पहला शहरी खेल वॉलीबॉल ही पहुंचा था, गांव के खेल (कबड्डी, झाबर, शुटुर्र या शुर्र, लखनी, गुल्ली डंडा आदि) तो थे ही। उस समय (1960-67) ब्लॉक में गांव स्तर पर युवक मंगल दल की खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिताएं होती थी। वॉलीबॉल में हमारे गांव की टीम ब्लॉक के अन्य गांवों में खेलने जाती थी और दूसरे गांवों की टीम हमारे गांव में आती थीं। ग्रामीण खेलों में टीमें बन जाने पर दोनों टीमों के कप्तानों (कुछ और कहा जाता था, भूल गया) के बीच गोंटी या पत्ता से लॉटरी से तय होता था कि मैं किस टीम में रहूं। एकाधबार ऐसा हुआ कि छुआ गया कि नहीं पर टीमों में झगड़ा हो जाता और खेल बंद होने की नौबत आ जाती। मुझे लगता कि खेल ही तो है चलता रहनी चाहिए और मेरा मामला होने पर, छूने या छुआ जाने के विरोधी टीम के दावे को मान लेता। इसलिए दोनों टीमों में मुझे बोझ ( Liability) समझा जाता था। 1967 में हाई स्कूल (कक्षा 9-10) की पढ़ाई करने जब शहर चला गया तब भा गांव आने पर अपने से जूनियर लड़कों के साथ खेलता, तब दोनों ही टीमें मुझे अपनी टीम में शामिल करने को तैयार रहतीं। अब तो गांव के काफी खेल खत्म से हो गए हैं, सभी आयु समूह के लड़के क्रिकेट ही खेलते हैं।

Thursday, September 10, 2026

जब भी हम सोचते हैं नए सिरे से शुरू करने को

 जब भी हम सोचते हैं शुरू करने को

 जब भी हम सोचते हैं शुरू करने को
नए सिरे से

तब तक जो भी हो चुका हो
नए सिरे से शुरू करना हमेशा नया होता है
पुरानी मंजिलें पुरातन हो चुकी होती हैं
और इंतजार कर रही होती हैं नई मंजिलें
किलकारी मारते बच्चे बड़े हो चुके होते हैं
नए नग्में लिख रहे होते हैं नई पीढ़ी के
और हम कहते हैं
हर अगली पीढ़ी हमेशा तेजतर होती है
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गवाह बनती है
इतिहास की अनवरत यात्रा की
पाषाणयुग से साइबर युग तक।
(ईमि: 09.09.2026)

Tuesday, September 8, 2026

सियासत 5 (1857 के बाद औपनिवेशिक नीति)

एक पोस्ट पर कमेंट

विद्रोही औपनिवेशिक भारतीय सेना के सैनिकों की पहल पर, आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में 1857 की सशस्त्र किसान क्रांति औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकती यदि ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम जैसे भारतीय रजवाड़ों ने अंग्रेजों की दलाली में भारतीय आवाम की आजादी के संग्राम के साथ गद्दारी न की होती। औपनिवेशिक काल में भारतीय सामंती शासक वर्ग चरित्र अपने किसानों की स्वतंत्रता की कीमत पर औपनिवेशिक गुलामी को तरजीह देने का रहा है। आरा के रणबांकुरे कुंवर सिंह, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई और अवध की बेगम हजरत महल जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सारे रजवाड़ों ने 1857 के आंदोलन में भारतीय आवाम के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया था। क्रांति के दौरान (1857-58) कार्ल मार्क्स, लंदन में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर, न्यू यॉर्क ट्रिब्युन में अपने डिस्पैचेज में औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध भारतीय आवाम के एकताबद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लगातार लिखते रहे। बाद में उनके लेखों का संकलन, 'प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम (The First Indian War of Independence)' शीर्षक से छपा। 1907 में क्रांति के पचासवें साल के उपलक्ष्य में वीडी सावरकर ने 'भारत का स्वतंत्रता संग्राम' (India's War of Independence)' शीर्षक से पुस्तक लिखी। यह सावरकर के जीवन का विप्लवी काल था। इसी अवधि की गतिविधियों के लिए औपनिवेशिक शाकों ने सावरकर को गिरफ्तार किया लेकिन सावरकर के क्रांतिकारी बुलबुले क्षणिक साबित हुए। औपनिवेशिक जेल की यातना से वे टूट गए और अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति के मुहरे ही नहीं, सक्रिय एजेंट बन गए। 1857 पर1907 की अपनी किताब में सावरर ने भारतीय आवाम की , खासकर हिंदू-मुसलमान की एकताबद्धता की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। बजरंगी इस किताब को नहीं प्रचारित करते।

भारतीय रजवाड़ों और कुछ धनपशुओं की मदद से औपनिवेशिक शासक क्रांते का दमन करने में कामयाब तो रहे लेकिन भारी धन-जन की क्षति हुई। जिसका प्रतिशोध उन्होंने पकड़े गए क्रांतिकारियों के यातनापूर्ण दमन से लिया। आवाम में खौफ फैलाने के लिए, अवध के गांवों में सड़कों के किनारे पेड़ों में लटकाई गए विद्रोहियों के सिर की कहानियां हमारे बचपन तक जनश्रुति का हिस्सा थीं। औपनिविशक शासकों ने1857 की सशस्त्र क्रांति को कुचल तो दिया लेकिन भविष्य की ऐसी संभावनाओं ने उन्हें आतंकित कर दिया।

इन संभावनाओं को नाकाम करने के लिए उन्होंने, एक तरफ, बांटो-राज करो की नीति के तहत सांप्रदायिक विचारधारा की अवधारणा गढ़ी। औपनिवेशिक बुद्धिजीवियो/इतिहासकारों ने हिंदुस्तानियों के लिए हिंदू नस्ल और मुस्लिम नस्ल संबोधन इस्तेमाल शुरू किया। जिसका शोधपूर्ण विवरण जिसका शोधपूर्ण विवरण 1990 के दशक की शुरुआत में छपी ,जानेमाने इतिहासकार, ज्ञान पांडे की पुस्तक, Construction of Communalism in Colonial North India में देखा जा सकता है। सांप्रदायिकता की विचारधारा गढ़ने का मुख्य मकसद उपनिवेश विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करना था। इसके लिए दोनों ही प्रमुख समुदायों से उन्हें नामी-गिरामी दलाल मिल गए। सांप्रदायिकता यानि धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अनैतिहासिक अवधारणा ऐतिहासिक रूप से विकसित हो रहे राष्टवाद की अवधारणा के विरुद्ध साजिश के तौर पर गढ़ी गयी और इतिहास की विडंबना है कि उसे राष्ट्रवाद के पर्याय के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अवधारणा यदि ऐतिहासिक होती तो पाकिस्तान से टूट कर बांगलादेश क्यों बनता?

दूसरी तरफ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध बढ़ रहे जमअसंतोष को शांत करने के लिए शेफ्टी वॉल्व के तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ जिसे असंतोष को सुविधाओं के मांगपत्र के माध्यम से भटकाया जा सके। इतिहास में कईन बार अनचाहे (Inadvrtent) परिणाम नियोजित उद्देश्य से अलग और ज्यादा अहम हो जाते हैं। कालांतर में कांग्रेस शेफ्टी वॉल्व की बजाय उपनिवेश विरोधी आंदोलन का मुख्य मंच बन गया।

जारी.....

Friday, September 4, 2026

हत्यारों के ग्लोबल सरगना

 हत्यारों के ग्लोबल सरगना के स्वागत के

विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम में मैं भी शामिल था
और सुना था उसकी प्रशंसा में आपकी यह कविता
और खुश हो रहा था कि
हत्यारा नहीं समझ पाया था प्रशंसा में छिपा व्यंग्य
और बच गया था
आपका नाम उसकी हिटलिस्ट में आने से
और सुन पा रहा हूं आज भी
प्रशंसा में लिप्त व्यंग्य की
आप की कविता
और करता हूं व्यक्त आभार
हत्यारों के ग्लोबल सरगना की नासमझी का

(ईमि: 04. 09.2026)