Thursday, October 22, 2026

Protest in India and Europe

 There are violent student protests in many European countries but instead of using Police repression, governments are addressing the students' demands. In India the students are peacefully protesting and the Indian government is using brutal Police repression and RSS goons.

Tuesday, October 20, 2026

मार्क्सवाद 359(युगचेतना)

 धनपशुओं को बनाना कुछ नहीं आता, बनाते तो हम मजदूर हैं, उत्पादन के साधनों पर धनपशु काबिज हैं, वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी उन्हीं का नियंत्रण होता है, जिनका आर्थिक उत्पादन के साधनों पर। इसलिए इस युग को धनपशुओं का युग या पूंजीवाद कहा जाता है। पूंजीवाद केवल माल का उत्पादन ही नहीं करता, विचारों का उत्पादन भी करता है। शासक वर्गों के विचार शासक विचार भी होते हैं, जिन्हें युग का विचार या विचारधारा कहा जाता है। विचारधारा शोषक (शासक) और शोषित (शासित) दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है।युग की विचारधारा युग की सामाजिक चेतना कोो भी प्रभावित करती है। शासक विचारधारा के प्रभाव न सिर्फ धनपशु और उसके बौद्धिक एजेंट ही यह सोचते हैं कि मजदूर धनपशु का कृपापात्र है बल्कि मजदूर भी यही सोचता है, जबकि हकीकत उल्टी है, मजदूर धनपशु का कृपापात्र नहीं होता, बल्कि धनपशु मजदूर का कृपापात्र होता है जिसका खून चूसकर वह तोंदिल हो जाता है। मर्दवादी सामाजिक चेेतना के प्रभाव में न सिर्फ पुरुष ही लड़की को बेटा कहकर शाबाशी देेतेेे हैं, बल्कि लड़की भी उसे शाबाशी ही समझती है। मर्दवादी सामाजिक चेतना से मुक्त लड़कियां बेटा कहने पर प्रतिरोधस के स्वर में जवाब देती हैं कि ' माफ कीजिए, मैं बेटा नहीं बेटी हूं'। जब मजदूर इस विचारधारात्मक फरेब से वाकिफ हो वर्गचेतनासं लैश संगठित हो उत्पादन के साधनों पर धनपशुओं का कब्जा उखाड़ फेंकेगा और उनपर उत्पादकों (मजदूरों ) का सामाजिक (सामूहिक) नियंत्रण स्थापित करेगा तब धनपशुओं को धरना नहीं देना होगा क्योंंकि उन्हें भी उत्पादक होने का समान गर्व प्रदान कर स्वतंत्र कर दिया जाएगा। जो स्वतंत्र होने से मना करेगा उसे स्वतंत्र होोने को बाध्य किया जाएगा क्योंकि परतंत्रता अमानवीय है और किसी का अधिकार नहीं होो सकता। एक मेरा सहपाठी ऊंची सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानृवृत्ति लेकर, गांव में पैतृक संपत्ति की खेती बंटाई पर देकर रहने लगा। एक बार बातचीत में मैंने उसे बताया कि उसका बंटाईदार उसके टुकड़ों पर नहीं बल्कि वह अपने बंटाईदार के टुकड़ों पर पलता है। मजदूर धनपशुओं केे टुकड़ों पर नहीं बल्कि धनपशु उसके टुकड़ों पर पलता है। मजदूर कौन है? जो भी भौतिक या बौद्धिक श्रमशक्ति बेंचकर रोजी कमाताा है, वह मजदूर होता है। धनपशुओं के कारिंदे मजदूरोंं को लंपट सर्वहारा कहा जाता है और अधिक मजदूरी पाकर खुद को शासकवर्ग (पूंजीपति वर्ग) का हिस्सा होने का भ्रम पालने वाले मजदूर को लंपट बुर्जुआ कहते हैं। फैज अहमद फैज ने लिखा है, 'हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेगे।'

Saturday, October 10, 2026

जंतरमंतर 3

 कॉक्रोच जनता पार्टी के नेताओं के अमेरिका से दिल्ली आगमन पर पुलिस प्रोटेस्ट की अग्रिम अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर उन्हें लेने गयी और जंतरमंतर पर मंच बनाने की सुविधा दी। जब अपेक्षा से अधिक छात्रों का जमावड़ा हो गया और आंदोलन जनवादी करवट लेने लगा तब पुलिस बर्बरता पर उतारू हो गयी। कॉक्रोच नेता मंत्री नड्डा के घर जब वार्तालाप कर रहे थे, छात्रों पर दमन बढ़ गया। अबकी बार कॉक्रोच नेताओं के मुंबई से दिल्ली आगमन पर पुलिस ने उन्हें हवाई जहाज में ही अपनी हिरासत/हिफाजत में ले लिया और जंतर-मंतर इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। दिल्ली पुलिस के अलावा सीमा की सुरक्षा करने वाली बीएसएफ और सीआरपीएफ समेत तमाम एजेंसियों के 40 हजार से अधिक जवानों को तैनात कर दिया। नेहा बोरा समेत तमाम युवाओं को हिरासत में ले लिया। आपातकाल में भय का माहौल था लेकिन इतना नहीं तब केवल जाने माने नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी लेकिन आज के अघोषित आपातकाल में पुलिसिया दमन की गाज आमजन पर गिर रही है।

Thursday, October 8, 2026

जनादेश (रूसो)

 एक पोस्ट पर कमेंट


गुलामी बल पूर्वक लादी गयी है इसलिए बलपूर्वक उसे उखाड़ फेंकना न केवल लाजिमी है, बल्कि वांछनीय भी।

रूसो अपनी कालजयी कृति , ' Social Contract (सामाजिक अनुबंध)' की शुरुआत इन पंक्तियों के साथ करता है, 'मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और हर तरफ बेड़ियों में जकड़ा है'। ये बेड़िया धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी होती हैं। पैदा होते ही उस पर हिंदू-मुसलमान; बाभन-अहिर; गरीब अमीर; अभिजन-आमजन;.......... की तख्तियां चस्पा हो जाती हैं। इसी लिए वह एक ऐसा राज्य बनाना चाहता है जिसमें लोग पहले की तरह ( प्राकृतिक अवस्था जैसे) स्वतंत्र हो सकें।

पहले जैसी स्वतंत्रता के लिए वह एक अनुबंध की अनुशंसा करता है जो सार्वजनिक हित में कानूनों का जनादेश (General Will) निर्मित जिसके अनुसार आचरण सभी नागरिकों का अनिवार्य कर्तव्य होगा। 'किसी को भी जनादेश के उल्लंघन की अवुमति नहीं होगी, दूसरे शब्दों में हर किसी को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जाएगा'। गुलामी अधिकार नहीं हो सकता। 'स्वतंत्र होने की बाध्यता', दर असल सार्वजनिक हित में स्वयं के बनाए नियमों की बाध्यता, बाध्यता नहीं, स्वतंत्रता ही है।

Monday, October 5, 2026

हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं

 हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं

 हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं
भारत माता उसी तरह की संकटमोचक हैं जैसे विक्टोरिया युग में मजर ब्रिटानिका थी

यह गंगा स्नान जैसा है जिससे कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं
जिस तरह हनुमान चालिसा पढ़ने से भूत का डर खत्म हो जाता है
उसी तरह भारत माता की जय बोलकर किया गया हर अपराध
देश भक्ति हो जाता है और हर पाप पुण्य।

Saturday, September 26, 2026

मजदूरों के दमन की दास्तान

 मजदूरों के दमन की दास्तान


ईश मिश्र


आधुनिक राज्य पूंजीपति वर्ग के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी समिति है।  – कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स


सुविदित है कि अप्रैल, 2026 में नोएडा, गुड़गांव तथा अन्य औद्योगिक शहरों में मजदूरों ने काम की मानवीय स्थितियों और जिंदा रहने लायक मजदूरी के लिए शांतिपूर्ण हड़ताल की थी। 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट सेनिफेस्टो में लिखे उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि इतिहास के हर मोड़ पर होती रहती है। ताजा उदाहऱण, अप्रैल, 2026 के मजदूर आंदोलन का दमन है। जब भी मजदूर पूंजीपतियों से काम की न्यूनतम मानवीय स्थितियों और जीने की न्यूनतम जरूरतों भर की मजदूरी की मांग करता है तो पूंजीपतियों के हितों की रक्षा और मजदूरों के दमन और प्रताड़ना में राज्य मशीनरी उनसे आगे रहती है। 11 अप्रैल को मनेसर (गुड़गांव) के बाद जब मजदूरी में बढ़ोत्तरी और काम की स्थितियों की बेहतरी की मांग के साथ मजबूरन हड़ताल शुरू किया तो राज्य मशीनरी पूंजीपतियों की सेवा में, आंदोलनकारी मजदूरों और उनके समर्थन में उठी आवाजों के दमन में कर्तव्यपरायणबोध के साथ सक्रिय हो गयी।  मजदूरों के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करके दमन की परिस्थितियां तैयार करने के उद्देश्य से पूंजी पतियों के कारिंदों और पुलिसिया घुसपैठियों ने हिसा भड़काने की कोशिश की। (समयांतर, क्रमशः मई और जून, 2026) नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेसन से गिरफ्तार, आंदोलन के पक्ष में आवाज उठाने वाली, युवा कलाकार, श्रृष्टि के घर में फर्जी सबूत गढ़ने के पुलिस के प्रयास सीसीटीवी कैमरा में के फुटेज में आ गया। कैमरा देख पुलिस वालों ने फर्जीबाड़ा बंद कर दिया और कैमरा तोड़ने की कोशिश की। आंदोलन की शुरुआत के दिन, 11 अप्रैल को ही नोएडा की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि आंदोलन के ‘मास्टर माइंड्स’ को दबोचने का उनके पास पर्याप्त मसाला है तथा घरों और कारखानों से मजदूरों तथा मेट्रो स्टेसनों, सार्वजविक स्थलों एवं दफ्तरों से मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने वाले एक्टिविस्टों की गिरफ्तारियां होती रहीं। यह अलग बात है कि वे अभी तक  अदालत में कोई सबूत पेश नहीं कर पाईं। वैसे, भारत और उ.प्र. की नशासक पार्टी, भाजपा से इनके करीबी संबंध भी चर्चा में हैं। इनके पति, भाजपा के विधायक हैं और नोएडा की जिलाधीश मेधा रूपम बहुचर्चित केंद्रीय चुनाव आयुक्त, श्री ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं। 


सिद्धांतः स्वायत्त और स्वतंत्र समझी जाने वाली न्यायव्यवस्था का भी, व्यवहार में वही चरित्र होता है जो राज्य, यानि सरकार का। अपवाद स्वरूप. कभी कभी कुछ न्यायाधीश सिद्धांत को व्यवहार में भी लागू करते हैं और जगे जमीर की मिसाल पेश करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को 11 अप्रैल को मजदूरों के आंदोलन के सिलसिले में नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार किया और जमानत की संभावनाओं को निरस्त करने के लिए 13 मई को उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं थोप दी हैं। यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक, सत्यम वर्मा को 17 अप्रैल को, जनचेतना के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया। सत्यम वर्मा ‘मजदूर बिगुल’ अखबार में मजदूरों के पक्ष में लिखते रहे हैं। उन पर भी रासुका की धाराएं थोप दी गयी हैं, उनका मामला अभी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। गौर तलब है कि सत्यम दशकों से नोएडा गए ही नहीं हैं। 2 सितंबर, 2026 को इलाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव ने नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में अद्भुत और अभूतपूर्व फैसला सुनाया। इन जजों ने आकृति पर फर्जी, मनगढ़ंत आरोप लगाने और दुर्भावना से मजदूरों को प्रताड़ित करने के लिए उप्र पुलिस तथा नोएडा प्रशासन को तगड़ी फटकार लगाते हुए, रासुका के तहत आकृति की हिरासत को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया तथा उसे अवैध रूप से जेल रखने के 5 लाख मुआवजे का फैसला सुनाया। फैसले में जिलाधीश महोदया को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की पद के सपथ के उल्लंघन दोशी बताया गया और मुआवजे की रकम की वसूली उनके वेतन से करने का अभूतपूर्व निर्देश दिया। 


आकृति पर रासुका की संस्तुति करते समय नोएडा की जिलाधीश ने चिंता जताया था कि आंदोलन से औद्योगिक क्षेत्र की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और निवेश बाधित होगा। जिलाधीश महोदया को जिले की जनता और मजदूरों की नहीं पूंजीपतियों के हितों की चिंता है। 


 जिलाधीश के विरुद्ध न्यायलय   इस फैसले पर निजी चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार, मित्र ने कहा कि वह (मेधा रूपम) इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाएंगी और उसके पिता की ही तरह सरकार के हितैषी मुख्य न्यायाधीश, सूर्यकांत उन्हे राहत दिलाने का कुछ जुगाड़ जरूर करेंगे। उनकी बात सही निकली। मुख्य न्याधीश ने शीघ्रता दिखाते हुए उनके मामले को बारी के पहले ही सूचीबद्ध कर लिया और रोस्टर का उल्लंघन करते हुए, चुनाव आयोग के वकील रह चुके, न्यायाधीश महेश चंद्र शर्मा की पीठ में भेज दिया, जिसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  फैसले की प्रतिकूल टिप्फणियों और जुर्माने पर अंतरिम स्थगन का आदेश दिया। वायर   में छपी एक खबर के अनुसार वकीलों के संगठन  “लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सीजेआई सूर्यकांत को पत्र लिखकर नोएडा डीएम मेधा रूपम की याचिका को मौजूदा रोस्टर से अलग पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने पर सवाल उठाए हैं. संगठन ने मामले की विशेष तौर पर सूचीबद्ध करने, सुनवाई की ऑडियो-वीडियो फीड सीमित किए जाने को लेकर चिंता जताई है. याचिका छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की रासुका के तहत हिरासत से जुड़े मामले से संबंधित है.”  देश में, खासकर देश के युवाओं और मजदूरों में, मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध भी जनमत बन रहा है, जो कभी भी जनअसंतोष और जनाक्रोश में तब्दील हो सकता है। यहां भारत की प्रशासनिक या न्याय व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की न गुंजाइश है, न जरूरत, वे तो अलग-अलग  व्यापक विमर्श के विषय हैं। मकसद यह बताना है कि आधुनिक यानि पूंजीवादी राज्य अपने विभिन्न अंगो के माध्यम से   में पूंजीपतियों के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी संस्था है। 


गौरतलब बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आ पायी है, क्योंकि रासुका की गिरफ्तारी निरस्त हुई है और भी कई मामले हैं, कुछ में जमानत हो गयी है, कुछ में बाकी है। आधुनिक राज्य का दोगलापन है कि वह कभी भी राजनैतिक आरोप नहीं लगाता बल्कि आंदोलन का राजनीति का अपराधीकरण करता है। नोएडा और गुड़गांव में फैक्ट फाइंडिंग के दौरान जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों की गिरफ्तारियों और एफआईआर में दर्ज आरोपों में अद्भुत समानता देखने को मिली। ज्यादातर आरोपपत्रों में एक आरोप हत्या का प्रयास था। सभी पर कई कई मामले दर्ज हैं। हर मामले की अलग अलग जमानत की कोशिश करनी पड़ती है। 500-600 रु. की दिहाड़ी करने वाले मजदूर के लिए 50 हजार की जमानत का प्रबंध मुश्किल होता है। 25000 की जमानत की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान थी, 50000 की जमानत में सत्यापन की प्रक्रिया में बहुत समय लग जाता है। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता  ने बताया कि बहुत से मजदूर जमानत के बावजूद, जमानती के सत्यापन प्रक्रिया की झंझटों के चलते अभी जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं।

आंदोलन से मजदूरों को बहुत ठोस फायदा नहीं मिला, जो भी नाममात्र की वेतन वृद्धि हुई वह मंहगाई में बढ़ोत्तरी की तुलना में बहुत कम है। इस आंदोलन से जो ठोस फायदा हुआ है वह है भविष्य में ज्यादा संगठित संघर्ष की उम्मीद बनी है। मुर्दा माहौल में ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों का आंदोलित होना आशा की एक किरण है कि इन संघर्षों मजदूरों के भविष्य के संघर्षों की प्रेरणा मिलेगी और संघर्षों के दौरान साझे हितों की चेतना विकसित होगी और मजदूर संगठित हो ‘अपने आप में’  वर्ग से ‘अपने लिए’ वर्ग बनेगा। उम्मीद करते हैं कि मजदूरों के संघर्ष के इतिहास की गाड़ी आगे बढ़ेगी।     


जंतर मंतर 3

 ज्ञानेश तो प्यादा है, लगता है, कॉक्रोचों को प्रतिरोध की राजनीति पर राहुल गांधी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाया गया है।


प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, वास्तविक मांग तो शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की होनी चाहिए थी, प्रधान की जगह ज्यादा दकियानूस, स्त्रीविरोधी बलात्कार समर्थक प्रहलाद जोशी आ गया है। ज्ञानेश जाएगा कोई इससे भी बड़ा खिलाड़ी आजाएगा। "सिर्फ हगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, ......... हमारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। इंकिलाब जिंदाबाद।