Thursday, May 14, 2026

बेतरतीब 188(स्टीमर)

 मैं पहली बार स्टीमर (पानी का जहाज ) में विंध्याचल जाने के लिए मिर्जापुर में गंगा पार करने के लिए बैठा। 1960 के आस-पास की बात होगी। उसके पहले, सुने थे कि हमारे गांव और आसपास के गांवों से लोग जौनपुर-भदोही होते हुए बैलगाड़ी से गंगा तट पहुंचते थे और नाव से गंगा पार कर विंध्याचल जाते थे। मैं 5 साल से ज्यादा उम्र का था यह बात निश्चितता से इसलिए कह सकता हूं कि मेरे सिर पर बड़े बाल नहीं थे और पांचवे साल में मेरी मुंडन हो चुकी थी। उस समय रेल से विंध्याचल जाने के दो रास्ते थे, बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय जाकर और वहां से गाड़ी बदलकर विंध्याचल जाना और दूसरा बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय की गाड़ी से जाकर बनारस में उतर जाना और वहां से इलाहाबाद (रामबाग) की छोटी लाइन (अब बड़ी लाइन हो गयी है) से माधो सिंह उतर कर नाव से गंगा पार कर मिर्जापुर/विंध्याचल जाना। यह बात मैं स्थितिजन्य आकलन से कह रहा हूं। अब उस यात्रा की और बाते तो हमें याद नहीं हैं लेकिन माधो सिंह स्टेसन याद है क्योंकि वहां मैं खो गया था और स्टीमर (पानी का जहाज) याद है। स्टीमर को मुझे जहाज कहते सुन किसी ने समझाया कि जहाज उससे 100 गुना बड़ा होता है। 2019 में कार से विंध्याचल से लौटते समय माधो सिंह स्टेसन देखने का मन हुआ । ब्रिटिशकालीन वह स्टेसन जस-का-तस बना हुआ है जाैसा कि हमने उसे बचपन में देखा था। वहां मेरी मां (माई) और दादी (अइया) समेत गांव के बहुत से स्त्री-पुरुष तथा बच्चों का मेला था। पैलेंजर से बनारस जाकर माधो सिंह आए होंगे। स्टेसन पर मैं मेले में से निकल कर घूमने चला गया तथा खीरा खाते हुए गांव के मेले में पहुंचा तो पता चला कि लोगों ने समझा कि मैं खो गया। खैर यह बात फिर कभी। उसके कई साल बाद मैं जब हाई स्कूल में जौनपुर पढ़ता था तो कभी कभी बनारस घूमने चला जाता था। उस समय अस्सी और रामनगर के बीच स्टीमर चलता था, मैं कई बार स्टीमर में चढ़ने के लिए अस्सी से रामनगर चला जाता था। अंडमान में जब वाकई जहाज देखा तब बचपन की बात याद आई कि जहाज स्टीमर सो 100 गुना बड़ा होता है, वास्तव में उससे भी बहुत बड़ा।

Monday, May 4, 2026

शिक्षा और ज्ञान 391 (राम रहीम)

 एक पोस्ट पर कमेंट:


राम रहीम ने बलात्कार तो अपनी भक्तिनों का ही किया और भक्तिन का बलात्कार करना भगवान को अपराधी नहीं बना सकता अदालत ने विदेशी कानून के प्रभाव में उसे सजा सुना दिया ऐसे में हिंदुत्व सरकार द्वारा उसे पेरोल देना और प्रवचन करवाना पाप नहीं, पुण्य है। जहां तक उमर खालिद का सवाल है वह मुसलमान नाम वाला तो है ही ऊपर से मार्क्सवादी और नास्तिक भी है, पीएचडी भी उसने बस्तर के आदिवासियों पर किया है जिनकी जमीनेें और जंगल राष्ट्रीय धनपशु अडानी जी को चाहिए। ऐसे पापी को देशभक्त सरकार जमानत कैसे दे सकती है?

Friday, May 1, 2026

शिक्षा और ज्ञान 390 (साप्रदायिकता)

 एक पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब


सांप्रदायिकता का निर्माण अंग्रेजों ने बांटो-राज करो की नीति के तहत उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए इस्लामी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व राष्ट्रवाद की विचारधाराएं उछालकर किया और उसके लिए उसे मुस्लिम लीग-जमातेइस्लामी तथा हिंदू महासभा -आरएसएस के रूप में दोनों समुदायों से दलाल भी मिल गए, अपने इन्ही दलीालों की मदद से औपनिवेशिक शासक देश का विभाजन करने में सफल रहे। यदि देश का विभाजन न होता तो देश के किसी हिस्से में साप्रदायिक ताकतें सत्ता पर काबिज न हो पोतीं। मुस्लिम पाकिस्तान तो 1947 में ही बन गया, हिंदू पाकिस्तान अब बन रहा है।

Monday, March 23, 2026

बेतरतीब 187(अटारी)

 एक पोस्ट पर कमेंट :


1983 में मुझे अटारी में समझौता एक्सप्रेस में सहायक गार्ड की नौकरी करने वाला एक मेरा हमउम्र पाकिस्तानी मिला, जियाउल हक का जमाना था, पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी थी उसे समझौता एकप्रेस की ड्यूटी इसलिए ज्यादा पसंद थी कि वह अमृतसर जाकर खुलेआम बीयर पी सकता था। उसके दादा आजमगढ़ के थे और रेलवे में नौकरी करते थे, बंटवारे के समय उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी और वे वहीं रह गए। वह खुद को आजमगढ़ का समझता था मुझसे मिलकर वह इतना गद गद हुआ जैसे वह अपने गांव-देश के किसी से मिला हो, वह कभी आजमगढ़ गया नहीं लेकिन अपने दादा-परदादा के घर और बाग का ऐसा सजीव चित्रण करता था जैसे कि उसका बचपन वहीं बीता हो।

महामानव

 महाबली ने कहा, हमारे नॉनबायलोडिकल महामानव की नकेल उसके हाथ में है, महामानव उसके सामने नतमस्तक हो गए, शायद उसके पास एप्स्टीन फाइल की गुप्त जानकारियां हों, यदि मामला हरदीप पुरी तक सीमित होता तो महामानव ने उनसे छुटकारा पा लिया होता। पुरी इस अंदाज में अकड़ रहा है कि हम यदि डूबे सनम तो आपको भी ले डूबेंगे। महामानव महाबली के दर्शन को तो आतुर रहते ही हैं, तेलअवीव की तीर्थयात्रा में छोटे महाबली, इज्रायली नाजी नेता के भी दर्शन करके सनद ले आए। जब महाबली और छोटे महाबलियो ने बौराकर इरान पर ताबड़तोड़ हमला किया तो महामानव और उनके अंधभक्त सुर-असुर भजन गाने लगे। अब जब इरान ने जवाबी हमले में महाबली और उनके नायब को धूल चटादी तो महामानव ने इरानी राष्ट्रपति से शिकायत किया कि उन्हें अरब राजशाहियों में अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना चाहिए था, परमाणु हमले से इरान को तबाह करने वाले इज्रायली नाजियों की धमकी पर महामानव मतमस्तक हैं। महाबली ने कहा ईरान से तेल मत लो. महामानव ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने कहा रूस से तल लोगे तो दंडित करूंगा तो महामान ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने तरस खाकर कुछ समय तक रूस से तेल खरीदने पर छूट दे दी, महामानव कृपा पर गद गद हो गए। रूस ने धमकी दी कि यदि इज्रायल ने ईरान पर परमाणु हमला किया तो वह इज्रायल को नेस्तनाबूद कर देगा, महाबली और उनके नायब युद्ध रोकने का बहाना ढूंढ़ रहे हैं, इरान कह रहा है, फतह या शहादत।


गरीब आदमी गैस का सिलिंडर लेकर उसी तरह लंबी लाइनों में खड़ा टूल्हा जलने के इंतजाम का इंतजार कर रहा है जैसे वह नोटबंदी की सनक की मार से बैंको के आगे लंबी लाइन में खड़ा था। मध्यवर्ग तो अभी तक पेट पर भी लात खाकर भजन गा रहा है, लेकिन शीघ्र ही उसे भी पेट पर भी लात के लाले पड़ने वाले हैं। अयोध्या के रामलला महामानव को सद्बुद्धि दें कि वे देश को प्रलय की आग में झोंकने से बाज आएं।

Tuesday, March 17, 2026

बेतरतीब 186(तीरे के खेत)

 नदी के किनारे एक बगीचा है।हमारे बचपन में थोड़ा ऊंचाई पर 7-8 बड़े इमली के पेड़ थे और कोने में एक विशाल जामुन, थोड़ा नीचे महुआ, जामुन, आम और ढाख के पेड़ थे नीचे कोने में नदी के किनारे एक बंसवार। आम, जाम जामुन,महुआ, ढाख के पेड़ भूतपूर्व हो गए लेकिन इमली के पेड़ अभी भी जस-के तस हैं और घनी बंसवार में कुछ बांस अभी भी बचे हैं। अबकी घर गया तो एक सुबह तीरे के खेत (घर से पूरब , नदी के किनारे) देखने का मन हुआ, जो कई दशक परती रहने के बाद नदी उस पार के गांव कादीपुर (लोनियाना) का एक व्यक्ति इस शर्त पर बुआई को राजी हुआ कि पहली साल वह कुछ नहीं देगा उसके बाद से बंटाईदारी करेगा। गेंहू और सरसों की फसल बहुत अच्छी तैयार है। हमारे लड़कपन में इन खेतो में जब भी गन्ना बोया जाता तो अगले तीन-चार सालों बिन बोए उपज देता. कटने के बाद पेड़ा के रूप में उगकर। कुछ साल मूंगफली की खेती हुई थी। लोनियाने के ही किसी ने अधिया पर बोया था, मूंगफली की रखवाली कठिन काम था। शाही का बहुत डर होता था। उसके बाद कभी शाही नहीं देखा, शाही चलता तो कांटे छम छम बोलते आदमियों की आहट पर कांटे खड़े कर लेता अन्यथा पीठ प चिपकाए रखता। खैर तीरे के खेत देखने के रास्ते में बगैचा में से गया सोचा कोई दिखता तो इमलियों के बीच फोटो खिंचवाता, लेकिन सेल्फी एक ही पेड़ के साथ ले पाया, वह भी ऐसा कि पता ही ही नहीं चल रहा है कि किस चीज का पेड़ है. इस बगैचे के दक्षिण वन विभाग की जमीन में एक बड़ा मंदिर परिसर बन गया है जो सौ साल से अधिक समय में हमारे गांव की सबसे उल्लेखनीय परिघटना है। मंदिर निर्माण की कहानी फिर कभी।

Thursday, March 12, 2026

बेतरतीब 185 (जनेऊ)

 एक पोस्ट पर कमेंटः


जो भी साहित्यिक, ऐतिहासिक, कंवदंतीय साक्ष्य उपलब्ध हैं उनसे कहीं यह नहीं लगता कि कबीर की मृत्यु सिकंदर लोदी के आदेश से हाथी के कुचलने से हुई, यह तो निश्चित है कि कबीर ईश्वर-अल्लाह समेत सभी सत्ताओं को चुनौती देेते रहते थे। बाकी साधु-संतों द्वारा सत्ताओं को चुनौती देने या उनसे असहज सवाल करने की पौराणिक मिसालें ऐतिहासिक नहीं हैं, पुराण किसी विशिष्ट नैतिक मूल्यों को महिमामंडित और स्थापित करने के लिए गढ़े जाते हैं। यह जरूर लगता है कि प्रचीन काल के शासक आज की तुलना में ज्यादा सहिष्णु लगते हैं वरना वेद रचयिताओं की भर्त्सना करके चारवाक जैसे दार्शनिक जिंदा रहे थे। पहले के धार्मिक लोग भी आज से असहिष्णु नहीं थे। मेरे दादा जी पचांग के कट्टर अनुयायी और अबाध, अगाध आस्तिक थे। घर में ठाकुर का भोग लगने के पहले रसोई से किसी को भोजन नहीं मिल सकता था। हमारी दादी (अइया) ने छोटे बच्चों के लिए रसोई के बरामदे के एक कोने में छोटा सा चूल्हा बना रखा था। चुटिया (चुर्की) से मेरे छुटकारा पाने का किसी ने संज्ञान ही नहीं लिया और जनेऊ से मुक्ति पाने पर शुरू मेरे बाबा मंत्र पढ़कर जनेऊ पहना देते थे घर से वापस जाते समय गांव के बाहर निकते ही मैं फिर निकाल देता। जब उन्हें लगा कि उनके प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं तो मेरे तर्कों का सम्मान करते हुए प्रयास बंद कर दिए । वैसे उन्हें मेरी नास्तिकता या जनेऊ न पहनना उन्हें पसंद नहीं था लेकिन उसके लिए मुझे न तो कभीन दंडित किया गया न ही अपमानित, वैसे कुछ घटनाओं के चलते उन्होंने पहले ही मेरा नाम पागल रख दिया था, लेकिन मुझे प्यार करना नहीं छोड़ा।