Monday, July 16, 2018

आजमगढ़

गर्व है मुझे आजमगढ़िया कहलाने में
जुमलेबाज को हूट किया
मेरे जिले के बहन-भाइयों ने
आजमगढ़ शहर है
सामासिक संस्कृति की मिशाल
हिंदू हैं जितने यहां
उतने ही मुसलमान
लंपट योगी के बावजूद
पूरे नहीं हुए
दंगाइयों के अरमान
आज़मगढ़ को
एक आजमगढ़िया का सलाम
(ईमि: 16.07.2018)

शिक्षा और ज्ञान 165 (पंजीरी खाकर भजन)

कुछ लोग मेरी किसी भी पोस्ट पर जोयनयू-देश-के टुकड़े, नक्सल, वामपंथ करने लगते हैं ऐसे ही एक सज्जन के इसी तरह के कमेंट का जवाब:

मैंने तो नहीं कहा राकेश सिन्हा ने कुल का नाम डुबोया या मैंने आगे बढ़ाया। मैंने तो तथ्य बताया। पंजीरी खाकर रटा-रटाया भजन गाते-गाते दिमाग के इस्तेमाल की आदत छूट जाती है। कितनी बार साबित हो गया कि जेनयू के नारे प्रायोजित थे संघी घुसपैठियों ने लगाए थे, उसी तरह जैसे युवा वाहिनी का दीक्षित दंगा फैलाने के लिए गाय काटते पकड़ा गया। एबीवीपी के सौरभ शर्मा को वीडियो में पाकिस्तान जिंदाबाद लगाते हुए पहचाने जाने के बाद उस पर प्रशासन ने 10000 का जुर्माना लगाया है। इसके कई वीडियो वायरल है। गाय काटते हुए पकड़े गया दीक्षित हिंदू युवा वाहिनी का था उसके किसी दफ्तर पर गोरक्षक हत्यारों ने हमला बोला? जलाया किन्ही ब्राह्मणों या दीक्षितों के गांव? न पकड़ा गया होता वह तो कितने मुसलमान गांव जलते? कितने मासूमों की हत्या होती? नफरत की राजनीति के लिए कितनी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार होता? आप द्वारा कही गई सभी बातें आपके अफवाहजन्य इतिहासबोध और ब्राह्मणीय श्रेष्ठतावादी पूर्वाग्रहों की उपज है। अपने से सवाल कीजिए कि क्या आप किसी बात पर तथ्यों के आधार पर सत्य बोलते हैं? मैं भी गधों को रगड़-रगड़ कर घोडा बनाने के चक्कर में पड़ा रहता हूं। अब यदि कुछ विवेक सम्मत ज्ञान देना हो या लेना हो तभी मेरी वाल या कमेंट पर कुछ कहें। गुजारिश है। मैं जब कहता हूं कि पढ़े-लिखे जाहिलों का अप्रतिशत अपने अपढ़ साथियों से अधिक है तो बहुत लोग नाराज हो जाते हैं। मेरे लिए पढ़े-लिखे जाहिलों की एक कोटि उन लोगों की है जो उच्च शिक्षा के बावजूद इतना नहीं जान पाते कि व्यक्तित्व का निर्माण सामाजीकरण से होता है, जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घटना के आधार पर नहीं, और कर्म-विचार के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन की बजाय जन्म के आधार पर करते हुए जन्मजात प्रवृत्तियों से ऊपर नहीं उठ पाते। Viren N Tiwari.

Sunday, July 15, 2018

फुटनोट 190 (प्रैक्सिस का सिद्धांत)

हौसला-अफजाई का शुक्रिया। व्यक्तिगत जीवन में भी नास्तिक होने से आपका मतलब हो या नहीं, लेकिन मित्र मैं मार्क्सवादी हूं, नास्किकता उसका उपपरिणाम है। मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों में एक है प्रैक्सिस का सिद्धांत जिसका एक प्रमुख बिंदु है, कथनी-करनी के अंतर्विरोध से मुक्ति का निरंतर प्रयास। अगर मैं स्त्रीवाद का हिमायती हूं तो वह मेरे अपनी पत्नी और बेटियों के साथ व्यवहार में परिलक्षित होना चाहिए। मैंअपनी झोपड़ी (लाइब्रेरी) के बाहर बैठा हूं, अभी मेरी बेटी का मिसकॉल आने वाला है कि उठ गई है चाय बनाऊं। आप सही हैं वह तो ठीक है लेकिन आपका सही होना दिखना भी चाहिए। समता का सुख इतना अद्भुत है कि भौतिक कष्ट मायने ही नहीं रखते। मां-बापों और शिक्षकों की बडी आबादी, इस सुख के अनुभव से वंचित होने के कारण बच्चों और विद्यार्थियों से दोस्ती नहीं करते, खुद भी टेंसन सिंह बने रहते हैं और बच्चों को भी टेंसन देते हैं। धारा के विपरीत तैरना मुश्किल तो होता है, असंभव नहीं। कुछ भी मुफ्त ने नहीं मिलता, नतमस्तक समाज में सिर उठाकर चलने की भी कीमत चुकानी पड़ती है।

पुटनोट 189 (चार्वाक)

असल में चार्वाक पद्धति के बारे में हम जानते कम हैं और इस पर सामग्री भी कम है। चारवाक ब्राह्मणवादी कर्मकांडी पौराणिक ज्ञान के विपरीत वैज्ञानिक भौतिकवादी द4शनधारा के प्रतिनिधि है। वे अतीत की गौरवगाथा या भविष्य की सेवर्णिमता के नहीं वर्तमान यथार्थ के चिंतक थे। ब्राह्णवादी साहित्य में उनका वैसा ही मजाक उड़ाया गया है जैसा आज के 'देशभक्त' मुसलमानों और वामपंथियों का उड़ाते हैं। चार्वाक-लोकायत दर्शन को पौराणिक साहित्य में उनके शैतानीकरण को डिकॉन्स्ट्रक करके चित्रित किया।

जो समाज जितना संकीर्ण और अमानवीय आंतरिक अंतर्विरोधों का शिकार हो वह उतनी ही जल्दी छिन्न-भिन्न होता है, लेकिन पुनर्नििणाण बेहतर ही होता है। (कुल मिलाकर) बेहतरी के संघर्ष के लिए ही जीवन है। मैं अपनी बेटियों और छात्राओं को कहता हूं कि तुमलोग भाग्यशाली हो कि 1-2 पीढ़ी बाद पैदा हुए। मुझे 1982 में अपनी बहन के बाहर जाकर पढ़ने के अधिकार के लिए पूरे खानदान से घमासान करना पड़ा था। आज किसी बाप की औकात नहीं है कि कहे बेटा-बेटी में फर्क करता है। करे भले ही। दुनिया द्वंद्वात्मक है, यही द्वंद्व तो इतिहास का इंजन है। हम सब सारे पूर्वाग्रह-दुराग्रहों से ऊपर उठकर यह सोच लें कि हम सब मानवता की सेवा में सहयात्री हैं, दुनिया सुंदर होगी। कभी तो होगी, खुशफहमी ही सही जीने का तर्क तो है।

फुटनोट 188 (राकेश सिन्हा)

एक पोस्ट पर किसी ने सत्ता के लिए दल-बदल में राकेश सिन्हा की तुलना राम विलास पासवान की, उस पर।

इस मामले में पासवान से सिन्हा की तुलना नहीं की जा सकती। पासवान कुर्सी सूंघता रहता है। राकेश सिन्हा छात्र जीवन से ही अपनी विचारधारा पर अडिग रहा है उसकी विचारधारा की गुणवत्ता को खारिज किया जा सकता है, यह अलग बात है। और वह चंद संघियों में है जो लिखते-पढ़ते हैं। मेरी उससे मुलाकात तीनमूर्ति लाइब्ररी में भी होती है और आरटीयल में भी। उसके लेखन की गुणवत्ता पर बहस हो सकती है। वह एक बड़े कम्युनिस्ट नेता का पुत्र होकर छात्र जीवन से ही आरयसयस का समर्पित कार्यकर्त्ता रहा है। मैं कर्मकांडी ब्राह्मण परिवेश में पैदा होकर बरास्ता आरयसयस मार्क्सवादी हो गया। हम एक दूसरे के परस्पर स्वघोषित वैचारिक विरोधी हैं, दुआ-सलाम भी होता है क्योंकि हमारा खेत-मेड़ की लड़ाई तो है नहीं, विचारों की है और कोई अंतिम सत्य नहीं होता। यह इसलिए कह रहा हूं राम विलास पासवान की तरह वह हवा का रुख भांप कर नहीं समझौता करता। मुझे ताज्जुब इस बात का है कि उसके पिताजी, कॉमरेड बंगाली सिंह, बेगूसराय से सीपीआई सांसद और कई बार यमयलए रह चुके हैं। आज ही पेसबुक से ही पता चला।कम्युनिस्ट अपने विचार बच्चों पर संस्कार के नहीं थोपता, न ही वंशवाद चलाता है।

मार्क्सवाद 145 (सामाजिक चेतना)

जी, मेरे पिता जी कर्मकांडी ब्राह्मण थे दादा जी उनसे भी बड़े। लेकिन दोनों ही कट्टर नहीं थे। मेरी नास्तिकता को पागलपन समझकर नजरअंदाज कर देते थे। दादाजी मुझे प्यार भी बहुत करते थे। मैंने न्यूटन पर उनसे संवाद पर एक लेख भी लिखा है। गूगल पर 'का रे पगला न्यूटनवा भगवान से भी बड़ा है' कलिक करें मिल जाएगा। घर में ठाकुर का भोग लगे बिना मुख्य रसोई से किसी को कुछ नहीं मिल सकता था। बच्चों के लिए दादी ने एक अलग छोटा चूल्हा बनाया था। 13-14 साल में हॉस्टल में रहते हुए जनेऊ पहने रहने की व्यर्थता समझ तोड़ दिया। हर बार घर आता था दादाजी मंत्र पढ़कर पहना देते। गांव से बाहर निकलकर मैं निकालकर किसी पेड़ पर टांग देता। फिर उन्होंने हाथ से गया समझ बंद कर दिया। मेरी नास्तिकता पसंद तो किसी को नहीं थी लेकिन उसके चलते मुझसे किसी के प्यार में कोई कमी नहीं थी। एक बार (1985-86) तो मेरी दादी और मां मुझे यहकर कि मैं उन्हें विंध्याचल देवी के दर्शन कराऊंगा तो ही करेंगी, वहां ले गयीं। मैंने एक जीप रिजर्वकर अपनी पत्नी और 2 साल की बेटी के साथ उन्हें विंध्याचल ले गया। मेरी नास्तिकता अगर इतनी कमजोर है कि एक मूर्ति के दर्शन से टूट जाए, तो टूटने दो। मेरी पत्नी बहुत धार्मिक हैं। विकास के हर चरण के अनुरूप सामाजिक चेतना का स्वरूप होता है। मनुष्य के चैतन्य प्रयास से विकास का चरण प्रभावित होता है जो सामाजिक चेतना के स्वरूप को बदलता है। मेरा सतत प्रयास सामाजिक चेतना के जनवादीकरण है, जिसके लिए जाति-धर्म की मिथ्या चेतना से मुक्ति आवश्यक शर्त है।

फुटनोट 187 (ब्राह्मणवाद)

Laxmishankar Mishra पहली बात मैं विद्वान नहीं हूं, ज्ञान की खोज में रहता हूं और हर विरासत पर सवाल करता हूं। मैं जेयनयू का स्टूडेंट रहा हूं और मैं जो भी हूं, अच्छा या बुरा, उसमें जेयनयू का काफी योगदान है। शशि थरूर एक बड़बोला कांग्रेसी है जिससे मेरी कोई सहानुभूति नहीं है। लेकिन हिंदू पाकिस्तान से शायद उनका आशय पाकिस्तान की तर्ज पर हिंदू राष्ट्र है। ब्राह्मण राजा शुंग ने बौद्ध-विनाश शुरू किया तथा ब्राह्मणों ने बौद्ध बौद्धिक क्रांति को पराजित करने के लिए पुराण लिखे तथा राजा चेलों की मदद से बौद्ध साहित्य और शैक्षणिक संस्थाओं का विनाश किया। यदि मेरी जानकारी गलत हो तो सुधार के सुझाव दीजिए। जब मैं ब्राह्मणवाद की बात करता हूं तो किसी खास ब्राह्मण की नहीं जन्म के आधार पर व्यक्ति के मूल्यांकन करने वाली विचारधारा की, जिसमें मेरा बचपन में प्रशिक्षण हुआ।