Friday, September 17, 2021

बचपन 17 (मझुई)

 मेरा भी गांव मझुई के किनारे है। मैं बड़की बाढ़ (1955) में 1-2 महीने का था, मां-दादी बताती थीं कि बहुत ऊंचाई पर होने के नाते हमारे घर में तो पानी नहीं घुसा था लेकिन बाकियों के साथ हमारे घर वाले भी बाग में चले गए थे। बचपन में एक बार बाढ़ के पानी में डूबते डूबते बचा था। 1971 की बाढ़ में तिघरा नामक गांव के पास टौंस और मझुई मिलकर बह रही थीं, सड़क पर नाव चल रही थी। पहले जून में भी नहाने-तैरने भर का बहता पानी रहता था, अब तो अक्टूबर-नवंबर तक मझुई सूख जाती है।

दक्षिण अफ्रीका की मुक्ति के लिए (1985)

 34 साल पहले का एक लेख


दक्षिण अफ्रीका की मुक्ति के लिए
ईश मिश्र

न्याय की आड़ में दक्षिण अफ्रीका की अल्पमत और तानाशाह गोरी सरकार द्वारा की गई राजनैतिक हत्याओं की कड़ी में, 18 अक्तूबर, 1985 को क्रांतिकारी कवि बेजामिन मोलाइस का नाम भी जुड़ गया। सं. राष्ट्र संघ, अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनो तथा तमाम राष्ट्राध्यक्षों की, क्षमादान की अपील की अनसुनी करके मोलाइस को फाँसी दे देने का फैसला, बोथा सरकार की निरंकुशता, विश्व जनमत की अवहेलना और बौखलाहट का परिचायक है। फाँसी देने से पहले मोलाइस को अपनी माँ से भी नहीं मिलने दिया गया। अपने वकील के मार्फत, देशवासियोम के नाम, अपनी माँ को भेजे संदेश में मोलाइस के कहा था, “कल मैं उनके लिए खून बहाऊंगा, जो मेरे पीछे है, आजादी बहुत करीब है। संघर्श जारी रखा जाना चाहिए” मोलाइस ने अपनी जनता की लड़ाई और जीत में आस्था व्यक्त करते हुए मृत्यु से थोड़ी देर पहले यह भी कहा था कि “एक दिन आएगा जब अश्वेत राज करेंगे।
क्रांतिकारी कवि मोलाइस दक्षिण अफ्रीका के मुक्ति संगठन ‘अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस’ के छापामार दस्ते ‘उम्खोंती वी सिज्वे’ के सक्रिय सदस्य थे। रंगभेद और नस्लवादी सरकार की बर्बरता से पीड़ित जनता की व्यथा और आकांक्षा को अपनी कविताओं में पिरोकर वह संघर्ष में लगे जनमानस तक पहुँचाते थे। विचारों की यही अभिव्यक्ति अल्पमत तानाशाह सरकार को खलने लगी थी। लेकिन तानाशाह सरकार को खलने लगी थी। लेकिन तानाशाह यह भूल जाते हैं कि व्यक्ति की हत्या तो की जा सकती है, विचारों की नहीं।
23 वर्ष पूर्व 1962 में नेल्सन मेण्डेला ने अदालत में कहा था, “गोरे लोग सारे कानून बनाते हैं, वे हमें अपनी अदालतों में घसीट कर लाते हैं, हमारे ऊपर आरोप मढ़ते हैं और खुद वहीं अदालतों में जज की कुर्सी पर बैठकर फैसला भी दे देते है”। दक्षिण अफ्रिका ती अदालतों में न्याय के नाम पर जो नाटक होता है, उसने तानाशाही और न्यायिक दीवालियेपन की कलई खोल कर रख दी है?
12 सितम्बर 1977 को, नस्लवादी सरकार द्वारा की गऊ स्टीव बीको की हत्या की प्रतिक्रिया पूरे विश्व में हुई थी। उसके दो महीने बाद 18 वर्षीय स्कूली छात्र म्बूतो राकी जेम्स को “जेल से भागने की कोशिश” के आरोप में गोली मार दी गई। दिसम्बर 1977 में मजुकिसी नोभादुला ने पुलिस-यातना से दम तोड़ दिया।‘अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस’ के मुखपत्र के अनुसार मार्च 1978 तक पुलिस बर्बरता के शिकार होकर मरने वालों की संख्या 50 से ऊपर पहुँच चुकी थी।
न्याय की आड़ लेकर, फाँसी द्वारा, दक्षिण अफ्रीका में राजनैतिक हत्याओं के सिलसिले की शुरूआत 6 अप्रैल 1979 को सोलोमन माहलेंगू की फाँसी से हुई। 9 जून 1983 को विश्व जनमत की परवाह न करते हुए, मोलाइस के तीन क्रांतिकारी साथियों, थेले साइमन मोगोने (23 वर्ष), जेरी सोमानी नौसोलोती (25 वर्ष) और मारबुस थावो मोतांग (27 वर्ष) को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। और अब उसी कड़ी ने मोलाइस का नास भी जुड़ गया है। मोलाइस की फाँसी के बाद अश्वेत चेतना ने भी अक्रमण रूख अख्तियार किया है तथा सरकारी ठिकानों पर हमलों और सरकार-विरोधी दंगों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उससे बोथा की नस्लवादी तानाशाह सरकार हिल उठी है। बोथा सरकार तानाशाही बर्बरता के खिलाफ उमड़ पड़े जनसमूह के ज्वार को दबाने के हर संभव प्रयास कर रही है। पिछले दिनों अश्वेतों, भारतीय और मिश्रित नस्ल के लोगों को आपस में लड़ने की कोशिशें हुई। भारतीय और मिश्रित नस्ल के लोगों को रियायतों के टुकड़े फेंके गए। ये रियायतें कहीं से भी बराबरी का दर्जा देने के निकट नहीं थीय़ फूट डालकर शासन करने की नीति में कुछ हद तक सफलता भी। मिली लेकिन बोथा की नस्लवादी सरकार को शायद पता नहीं है कि फूट डालकर राज करने की साजिश लंबे समय तक नही चल सकती।
उल्लेखनीय है, मोलाइस ने, ‘मोराकाथ्री’ नाम से जाने जाने वाले अपने उक्त तीनों साथियों मोगोनें, मोसोलोली और मोतांग के खिलाफ, तमाम यातनाओं के बावजूद, अदालत में बयान देने से इंकार कर दिया था। फिर भी तीनों को फाँसी दे दी गई थी। मोलाइस के ऊपर कोई भी आरोप ने होने से उन्हें, उस समय रिहा कर दिया गया था। अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेश के बयान के बावजूद, बौखलाहट में बदले की भावना के मोलाइस को दुबारा गिरफ्तार कर लिया गया और न्याय का नाटक रचकर 18 अक्तूबर 1985 को मोलाइस को भी फाँसी दे दी गई। लेखकों-कवियों तथा अन्य सर्जनात्मक रचनाकारों के दमन और उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगाने का दौर द. अफ्रीका में 1960 में शार्पविले हत्याकांड से शुरू होकर, 1976 के सोवेरो विद्रोह के दौर से गुजरात हुआ, आज अपने चरम-उत्कर्ष पर पहुँच गया है। रचनाओं पर प्रतिबंध लगाने, और रचनाकारों को निवार्सित करने से शुरू होकर दमन चक्र रचनाकोरों की हत्या तक पहुँच चुका है।
टैचर और रीगन प्रशासन, दक्षिण अफ्रीका को जनता की व्यथा पर घड़ियाती आँसू बहाते रहे हैं, पर बोथा सरकार पर कोई भी प्रभावशाली प्रतिबंध लगाने को तैयार नहीं दिखते। रंगभेद और नस्लवाद को ‘अमानवीय’ मानने के बावजूद. रीगन-प्रशासन द. अफ्रिका गौरी सरकार का ही पक्ष लेता रहा है। दक्षिण अफ्रीका की समस्या के ‘शातिपूर्ण’ समाधान के प्रति अपना सरोकार जताते हुए, रीगन ने तो यहाँ तक घोषित कर दिया कि प्रीटोशिया में गोरे-काले का भेदभाव ‘खत्म’ हो गया है। अमेरिकी राजनीति में दक्षिण अफ्रीकी मसले के फिर से तूल पकड़ने से रीगन प्रशासन को समस्या पर पुनर्विचार के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। रंग-भेद और नस्लवाद के विरोधियों को पहली बार विजय निकट दिखने लगी है। अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष ओलिवर ताम्बो ने एक बयान में कहा है, “दस साल से भी कम समय में वह दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत बहुमत शासन की उम्मीद करते हैं”।
इंग्लैड में टैचर, अपने मानसिक और राजनैतिक दिवालिएपन का परिचय देते हुए दुनिया को यह मनवाने पर तुली हुई हैं, कि दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी अल्पमत सरकार पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने से अश्वेतों को नुकसान पहुँचेगा। टैचर की इसी हठधर्मिता और नस्लवादी मानसिकता के कारण, राष्ट्रकुल में, दक्षिण अफ्रीका की सरकार के पूर्ण प्रतिबंध का प्रस्ताव नहीं पारित हो सका। जो प्रस्ताव पारित हुआ वह बहुत लचर और प्रभावहीन है।
दक्षिण अफ्रीका की आजादी की लड़ाई में, ‘जंगे-जमीर’ के अश्वेतों के भी शामिल होने से एक नया आयाम जुड़ गया है। नस्लवाद और तानाशाह के खिलाफ अश्वेतों के संग्राम में बहुमत की जीत का गजब का विश्वास पैदा हुआ है। अश्वेत क्रांतिकारी दुमिशानी ने एक वक्तव्य में कहा – “हम बहुमत में हैं और बहुमत की अपनी ताकत को मनवा कर रहेंगे”
नई पीढी जीत के लिए आखिरी दम तक लड़ने को तैयार दिखती है। आज की लड़ाई में 12 और 13 साल के बच्चे भी शरीक है। भविष्य उन्हीं का है। दमन चक्र की कोई भी बर्बरता उन्हें आजादी के लक्ष्य के लिए लड़ने से विचलित करने में असफल हो रही है।
1960 में, शार्पजिले में 67 प्रदर्शनकारियों की पुलिस द्वारा हत्या के बाद दक्षिण अफ्रीका में जिस सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत, नेल्सन मेण्डेला द्वारा छापामार दस्ते ‘उमखोंती वीसिज्वें’ की स्थापना से हुई थी, आज वह निर्णायक दौर में है। हथियारों के अभाव में, आधुनिकतम हथियारों से लैस पुलिस और सेना भी सशक्त हथियार बन जाते हैं।
संघर्ष में जुटे इन युवाओं के सामने आजादी के बाद समता वाले समाज की स्थापना का लक्ष्य है। ‘न्यूज वीक’ को दिए एक वक्तवय में ‘उमखोंती वी सिज्वे’ के एक युवा सदस्य ने बताया है कि उनका उद्देश्य “समान नागरिकता, समान शिक्षा और रंगभेद कानून स रहित” शासन की स्थापना है। अश्वेत बहुमत वाली सरकार का उद्देश्य “पूंजीवाद का खात्मा और समाजवाद की स्थापना” होगा। बहरहाल अब यह विश्वास पुष्ट होता दिखाई दे रहा है कि दक्षिण अफ्रीका की मुक्ति के लिए कुर्बानी देने वाले महान योध्दाओं का खुन जल्दी ही अपना रंग दिखाने वाला है और बोथा की रंगभेदी –नस्लवादी सरकार के दिन जल्दी ही लदने वाले हैं।
ईश मिश्र
युवक धारा 16 नवंबर 1985

Wednesday, September 15, 2021

बेतरतीब 112 (1971)

मैं तो न कभी घर में मार खाया न स्कूल में। होमवर्क इसलिए कर लेता था कि टीचर क्लास में खड़ा न कर दे। 12वीं मे केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल का एक टुच्चा टीचर था, काफी रौब-दाब वाला। शहर के सारे गुंडे (11वीं-12वी क्लास के, जैसे भी होते हैं) उसके चेले थे। किसी और बात की हुक्मनाफरमानी का बदला लेने के लिए वह प्रैक्टिकल में कुछ गलती निकालकर मुझे पीटना चाहा। उसका आतंक यह था कि जैसे ही किसी लड़के के पास खड़ा होकर आवाज लगाता, 'खदेरू (लैब असिस्टेंट) बेंत लाओ तो', रूपक में कहें तो उसके पैंट गीले हो जाते। जैसे ही उसने खदेरू की गुहार लगाई, मेरे मन में आया, मार नहीं खाऊंगा। जैसे ही उसने मारने के लिए हाथ उठाया, उसने सोचा मैं मार खाने के लिए हाथ बढ़ा रहा था, लेकिन मैं छड़ी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा रहा था। मैं 16 साल से कम उम्र का दुबला-पतला बालक था, भैस सा मोटा वह मेरे ऊपर गिर पड़ता तो मैं दबकर ही मर जाता। लेकिन भौतिक चोट तो महज लक्षण है, चोट तो कहीं और लगाई जाती है और लगती है। उसके आतंक का साम्राज्य टूट गया पूरे कैंपस में चर्चा यही थी कि एक मरियल से लड़के ने गंगा गुरू की छड़ी पकड़ ली। वह सही मायने में शिक्षक होता तो मेरे निडर साहस की प्रशंसा करता। उसने मुझे प्रैक्टिकल में फेल कराकर बदला लिया। पास होता तो पहले 10 में यूपीबोर्ड की परीक्षा में होता और 30 में 9 की बजाय 27 मिलते तो टॉप करता, अच्छा हुआ। गम के कुछ दिन तो थे लेकिन ज्यादा दिन नहीं। प्रिंसिपल ने अगले साल से उसे परीक्षा-ड्यूटी से मुक्त कर दिया। मेरा क्या लंबी जिंदगी में एक साल से क्या फर्क पड़ता है, उसी के 2 साल बाद वह मर गया, मेरे शाप से नहीं, टीबी से। बाद में ग्लानि हुई कि किसी की मौत से खुश नहीं होना चाहिए। लेकिन 17-18 साल के लड़के में इतनी नैतिक संवेदनशीलता नहीं होती।

घटना स्थल -- टीडीयस इंटर कॉलेज, जौनपुर (उप्र)
वर्ष -- 1971

16.09.2017

बेतरतीब 111 (प्राइमरी)

 

अंकगणित संबंधी एक पोस्ट पर कमेंट:

4 साल बाद यह पोस्ट दुबारा उतरा गई (यह शब्द बहुत दिन बाद ध्यान में आया बचपन में नदी या तालाब में डूबती चीज ऊपर आ जाती तो उसे उतराना कहते थे)। स्कूल में गणित में किसी के फेस होने की बात पर ताज्जुब होता था कि गणित जैसे 'सीधे-सादे' विषय में कोई कैसे फेल हो सकता है? हमारे बचपन में हमारा गांव शैक्षणिक रूप से इतना पिछड़ा था कि सभी सवर्ण पुरुष भी साक्षर नहीं थे। हम जब (1960) स्कूल जाना शुरू किए तो ज्यादातर सवर्ण लड़के स्कूल जाने लगे थे और कुछ (बहुत कम) लड़कियां भी। स्कूल जाने वाले दलित और पिछड़ी जातियों के लड़कों की संख्या नगण्य थी, लड़कियों की बात ही छोड़िए। मेरा मुंडन पांचवी साल में हुआ था। इसलिए उसके [ 5 साल का होने (26 जून 1960) के] पहले यानि 1959-60 सत्र में मैं कुछ दिन बड़े भाई के साथ कभी कभी स्कूल जाता तो था लेकिन लड़के लड़की कह कर चिढ़ाते थे, इसलिए अक्सर बीच में ही वापस चला जाता था। औपचारिक रूप से 1960-61 सत्र में स्कूल की गदहिया गोल (प्री प्राइमरी) में भर्ती हुआ। उस समय वहां प्राइमरी में दो ही विषय पढ़ाए जाते थे -- भाषा और गणित (अंक गणित)। 3 क्लास रूम थे और 3 शिक्षक। कनिष्ठतम शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा एक, उसके बाद वाले कक्षा 2 और 3 तथा हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को पढ़ाते थे। माफ कीजिएगा गिनती ज्ञान पर बात करना चाहता था लेकिन लंबी भूमिका हो गयी। दोपहर बाद गदहिया गोल और कक्षा 1 के विद्यार्थी बाहर गर्मी जाड़े के हिसाब से क्रमशः पेड़ के नीचे या धूप में गिनती और पहाड़ा याद करते थे। एक लड़का सामने खड़ा होकर बोलता था बाकी दुहराते थे। 10 के बाद दहाई -इकाई में रटाया जाता। 10 एक ग्यारह एक दहाई एक काई (इकाई) ---- दस नौ उन्नीस एक दहाई नौ काई .......... नब्बे नौ निन्यानबे न दहाई नौ काई। इसलिए कभी कन्फूजन नहीं हुआ। शुरू में उनासी और नवासी में होता था लेकिन जल्दी खत्म हो गया। 20 तक पहाड़ा याद करने में मुझे समझ आ गया कि 10 तक का पहाड़ा याद हो जाए और किसी भी संख्या में 1 से 9 का जोड़ आ जाए तो किसी भी संख्या का पहाड़ा जाना जा सकता है। जैसे 43 का पहाड़ा जानना हो तो 40 (4 के दस गुने) के पहाड़े में 1 से 9 का पहाड़ा जोड़ते जाइए। 43 सत्ते (40 सत्ते 280 में 3 सत्ते 21 जोड़ दीजिए) 301 होगा। 5 साल के बच्चे में गिनती के ज्ञान से हमारे शिक्षक (पंडित जी) ने क्या देखा कि बीच सत्र में गदहिया गोल से कक्षा 1 में प्रोमोट कर दिया। कक्षा 2 और 3 में बाबू साहब ने पढ़ाया। उस समय एक मुंशी जी हेड मास्टर थे जो कक्षा 4 और 5 को पढ़ाते थे। ब्राह्मण शिक्षक पंडित जी कहलाते थे, ठाकुर (राजपूत) बाबू साहब, भूमिहार राय साहब तथा अन्य जातियों के मुंशी जी और मुसलमान शिक्षक मौलवी साहब। हम जब (1963 में) कक्षा 4 में पहुंचे तो मुंशीजी रिटार हो गए तथा कक्षा 4 और 5 में भी बाबू साहब ने ही पढ़ाया। एक ही कमरे में कक्षा 5 की टाट जहां खत्म होती थी कक्षा 4 की वहीं से शुरू होती थी तथा मैं कक्षा 4 की टाट पर सबसे आगे बैठता था। साल में एक-दो बार डिप्टी साहब (एसडीआई) स्कूल में मुआयना करने आते थे। डिप्टी साहब का मुआयने पर आना स्कूल और गांव के लिए खास परिघटना होती थी। मुआयने में डिप्टी साहब ने कक्षा 5 वालों से गणित (अंकगणित) का कोई सवाल पूछा सब (7-8 लड़के) एक एक कर खड़े होते गए और मेरा नंबर आ गया। मैंने तुरंत सही जवाब बता दिया। डिप्टी साहब ने खुश होकर साबाशी दी तो बाबू साहब ने उत्साहित होकर बताया कि मैं कक्षा 4 का विद्यार्थी था। डिप्टी साहब बोले 'इसे कक्षा 5 मे कीजिए'। अगले दिन मैं कक्षा 5 की किताबें (भाषा और गणित) और कॉपियां (2 गोपाल छाप नोटबुक) लेकर आया और कक्षा 5 की टाट पर बैठा। कक्षा 5 वाले कुपित नजरों से देख ही रहे थे कि बाबू साहब आ गए और चकित भाव से मुझसे वहां बैठने का कारण पूछा और मैंने तपाक से कह दिया, 'अब मैं कक्षा 5 में पढ़ूंगा'। उन्होंने तंज करते हुए (अवधी में) कहा कि लग्गूपुर (7-8 किमी दूर नजदीकी मिडिल स्कूल) पढ़ै जाब्य तो सलारपुर के बहवा में बहि जाब्य (पढ़ने जाओगे तो सलारपुर [रास्ते का एक गांव] के बाहे में बह जाओगे) (खेतों से बरसात के पानी के निकासी के नाले को बाहा कहा जाता था)। मैंने कहा, 'अब चाहे बहि जाई या बिलाइ जाई, डिप्टी साहब कहि देहेन त अब हम पांचै में पढ़ब' और इस तरह मैं कक्षा 4 से 5 में प्रोमोट हो गया। अंकगणित पर टिप्पणी के बहाने इतना आत्मकथात्मक विवरण हो गया तो थोड़ा और सही। पांचवी की परीक्षा ब्लॉक स्तरीय बोर्ड की परीक्षा होती थी। परीक्षा के कुछ दिन पहले माता माई (चेचक) की चपेट में आ गया। सब लोग परीक्षा देने से मना करने लगे लेकिन मैं परीक्षा देने की जिद पर अड़ा रहा। रात में अइया (दादीजी) ने जल छुआया (माता माई की विदाई का कर्मकांड)। सुबह 7 बजे घर से 4-5 किमी दूर परीक्षाकेंद्र पहुंचने के लिए सूर्योदय से पहले बड़े भाई के साथ निकल पड़ा। दोपहर तक लिखित परीक्षाएं देने बाद परीक्षकों को मेरे चेचक की जानकारी हो गयी और शिल्प आदि की परीक्षाओं के लिए अलग बैठा दिया गया। परीक्षाफल अच्छा रहा लेकिन चेचक के कई दाने पक कर फोड़े बन गए, कुछ के निशान अभी भी हैं। 1964 में 9 साल से कम उम्र में प्राइमरी पास कर लिया। उस समय हाईस्कूल (कक्षा 10) बोर्ड की परीक्षा की न्यूनतम आयु 15 साल थी। टीसी बनाते समय 1969 की 1 मार्च को 15 साल का करने के लिए 1954 की फरवरी की जो भी तारीख (03) बाबू साहब के दिमाग में आई उसे मेरी जन्मतिथि दर्ज कर दिया। मेरे पिताजी फैल गए कि लोग 2-3 साल कम आयु लिखाते हैं और वे मेरी ज्यादा लिख रहे हैं। परीक्षा की बात समझाने पर वे मान गए। इस तरह जून 2020 की बजाय एक साल 4 महीने पहले मैं फरवरी 2019 में रिटायर हो गया। लेकिन कोई बात नहीं, बस पढ़ाने का सुख थोड़ा ओर कम हो गया।

Thursday, September 9, 2021

नारी निमर्श 21

 सांस्कृतिक वर्चस्व अदृश्य बाध्यकारी ताकत है जो अधीनस्थ से स्वेच्छथा पूर्वक अधीनता स्वीकार करवाती है, शोषक शोषित का शोषण शोषित की सहमति से करता है, शासक शासित पर उसकी सहमति से शासन करता है। सांस्कृतिक वर्चस्व के चलते मर्दवादी समाज में स्त्रियां ''स्वेच्छा'' से अधीनस्थता स्वीकार करती हैं। मर्दवादी सांस्कृतिक वर्चस्व या मर्दवादी वैचारिक मिथ्या चेतना को रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों, नित्यप्रति के क्रिया कलापों तथा विमर्श से निर्मित, पुनर्निर्मितल तथा पोषित किया जाता है। मर्दवाद (Gender) जीववैज्ञानिक प्रवृत्ति नहीं बल्कि विचारधारा (मिथ्या चेतना) है जिसके मूल्यों को पलने-बढ़ने में समाजीकरण के जरिए हम स्वाभाविक प्रवृत्ति समझकर अंतिम सत्य के रूप में आत्मसात कर लेते हैं जिससे मुक्ति के लिए साहसिक सामाजिक और आत्मसंघर्ष की नजरूरत होती है। विचारधारा शोषक या उत्पीड़क को ही नहीं शोषित या पीड़ित को भी प्रभावित करती है। किसी लड़की को पुरुष ही नहीं, स्त्रियां भी बेटा कहकर साबाशी देती हैं और लड़कियचां भी इसे साबाशी मानकर खुश हो जाती हैं। मर्दवाद चूंकि विचारधारा है इससे लड़ाई भी मूलतः वैचारिक है। हमें अपने रोजमर्रा के जीवन तथी विमर्शों में हर कृत्य और हर शब्द में इसे नकारना होगा। इसे (लैंगिक भेदभाव की विचारधारा) नकारने या लैंगिक समानता की स्थापना की वैचारिक लड़ाई ही विचारधारा के रूप में स्त्रीवाद का मूल है। जरूरत सामाजिक उत्सवों को विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों से मुक्त कर स्वरूप बदलने की है, उन्हें नया जनतांत्रिक अर्थ देने की है।

शिक्षा और ज्ञान 331 (शिक्षक बनने की प्राथमिकता)

 शिक्षक बनना बिरले लोगों की ही प्रथम प्राथमिकता होती थी/है। बीएससी करते हुए, मैंने जब प्रतिस्पर्धी परीक्षाएं न देने का फैसला किया तो सभी प्रोफेसन्स पर विचार करने के बाद मुझे लगा अध्यापन ही मेरे लिए उपयुक्त है। उसके बाद नौकरी की मेरी दूसरी प्रथमिकता कोई रही ही नहीं। बीएससी में पिताजी से पैसा लेना बंद करने के बाद गणित का ट्यूसन पढ़ाकर रोजी कमाना शुरू किया और महसूस किया कि गणित जानने वाला किसी शहर में भूखों नहीं मर सकता। 1980 से जेएनयू में राजनीति में शोध करते हुए डीपीएस में गणित पढ़ाता था। 1985 में डीपीएस छोड़ने के बाद गणित से रोजी न कमाने का निर्णय किया। विवि में नौकरी मिलने तक कलम की मजदूरी से घर चलाता रहा।

फुटनोट 260 (नरसिंह राव)

 एक कांग्रेसी मित्र ने लिखा कि भारत के समाजवादी अर्थतंत्र को पूंजीवाद में बदलने वाले नरसिंह राव ने 1996 में कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़कर कांग्रेस की पराजय का पथ प्रशस्त किया। उस पर --


पहली बात तो नरसिंह राव के पहले भारत समाजवादी नहीं, सामंतवाद से लड़ता हुआ, अर्धसामंती, अर्धपूंजीवादी देश था, भूमंडलीकरण के बाद साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी ने सांप्रदायिक रूप ले चुके भारतीय सामंतवाद से गठजोड़ कर भारतीय कल्याणकारी अर्थतंत्र को तबाह कर अधीनस्थ बनाना शुरू कर दिया। भूमंडलीकरण की शुरुआत में मैंने एक लेख लिखा था कि आरएसएस का आर्थिक एजेंडा कांग्रेस लागू कर रही थी। कांग्रेस के पतन का कारण नरसिंह राव की नासमझी नहीं थी, इसकी जड़ें 1980 के दशक में कॉमर्शियल पाइलट से राजनेता बने राजीव गांधी की कमनिगाही में खोजी जा सकती हैं, 1984 के प्रायोजित सिख नरसंहार के बाद मिली संसदीय सफलता के नशे में जिन्होंने प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिक राजनीति का सहारा लिया। दुश्मन के मैदान में उसी के हथियार से लड़ाई में हार अवश्यंभावी थी।