Monday, August 31, 2026

हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी

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कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी-उर्दू विभाग एक ही हैं क्योंकि दोनों भाषाओं में केवल लिपि का अंतर है, जिसे हिंदुस्तानी कहा जहा जा सकता है। 1919 के कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में प्रस्तावित किया था, जिसे गैरहिंदी भाषी प्रतिनिधियों का समर्थन भी प्राप्त था। हिंदुस्तानी से गांधी का आशय उत्दीतर भारत में बोली जाने वाली भाषा से था जिसे कुछ लोग फारसी लिपि में लिखते थे और कुछ नागरी में।-शुद्धतावादियों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की वकालत की।

1949 में राष्ट्रीय संपर्क भाषा के प्रश्न पर सविधान सभा हिंदी-हिंदुस्तानी पर तीखी बहस के बाद मतदान हुआ और दोनों पक्षों में समान मत पड़े, अंततः राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी को स्वीकृति मिली।

फारसी लिपि में छपी हिंदी रचनाएं पाकिस्तानी उर्दू भाषियों के लिए उसी तरह सुगम हैं जैसे नागरी में छपी मंटो की कहानियां या हबीब जालिब के नज्में हिंदी भाषी हिंदुस्तानियों के लिए। प्रेमचंद पहले उर्दू में ही लिखते थे। उर्दू के कुछ बड़े उपन्यासकार- कहानी कार हैं, कृष्ण चंदर, 'शिकस्त' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है;राजेंद्र सिंह बेदी: विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर लिखने वाले महान कहानीकार; 'एक चादर मैली सी' उनका मास्टरपीस है।रतन नाथ धर 'सरशार': उर्दू के शुरुआती उपन्यासकारों में से एक। उनका उपन्यास 'फ़साना-ए-आज़ाद' मील का पत्थर माना जाता है। हमारे मित्र हैं, प्रोफेसर आसिफ नक्वी, म्युजिऑलॉजी के प्रोफेसर थे, उर्दू में अफसाने लिखते हैं और शायरी करते हैं, नागरी पढ़ लेते हैं , लेकिन मंद गति से। मैं उनकी कविताएं उसी तरह अच्छी करह समझ लेता हूं जिस तरह हबीब जालिब, इब्ने इंशां या फैज की।

Saturday, August 29, 2026

सियासत 3 (भौगोलिक सीमाएं)

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दुनिया की सभी भौगोलिक सीमाएं ऐतिहासिक रूप से खींची गयी नकली सीमाएं हैं। हिंद-पाक की सीमा तो अनैतिहासिक है जो उपनिवेश-विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के कृत्रिम शगूफे छोड़े, फैलाए और हिंदू-मुस्लिम नाम पर खून खराबे करवाए और पूर्व (बंगाल) और पश्चिम ( पंजाब) में मनमानी लकीरें खींच दी। औपनिवेशिक शासक अपने हिंदू-मुस्लिम दलालों की मदद से भारत राष्ट्र के टुकड़े करने में सफल रहे और बंटवारे का घाव अभी तक नासूर बन टपक रहे हैं। फैज़ के शब्दों में, "खून के धब्बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद"। यदि धर्म राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक आधार हो सकता तो भाषा के नाम पर पाकिस्तान के दो टुकड़े क्यों होते? मुझे एक बार (बहुत पहले) कहीं एक सिंधी, पाकिस्तानी स्त्री से परिचय हुआ। उसने सवाल किया कि मैं उससे उर्दू की बजाय अंग्रेजी में क्यों बात कर रहा था, मेरे कहने पर कि मुझे उर्दू नहीं आती तो हंसने लगी, बोली कि इतनी अच्छी उर्दू तो बोलता हूं, मेरे यह कहने पर कि यह तो हिंदी है, वह बोली एक ही बात हुई। उसने शिकायत की हिंदुस्तानी मुजाहिरों ने उर्दू थोपकर उनकी भाषा (सिंधी) को दोयम बना दिया।

Thursday, August 27, 2026

नास्तिकता

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मैं वृद्धावस्था में नहीं, किशोरावस्था (17 साल) में ही नास्तिक हो गया था औग 18-19 साल में भगत सिंह का नास्तिकता पर लेख ने नैतिक समर्थन प्रदान किया तथा उसके एकाध साल बाद भगवान के अस्तित्व पर वोल्नटेयर द्वारा लगाए प्रशनचिन्ह ने बौद्धिक औचित्य। मैं कर्मकांडी पुरोहित नहीं था, न ही पुरोहिती परिवार में पैदा हुआ था, कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ पला। मेरा कहने का आशय केवल इतना है कि एक कर्मकांडी परिवेश के बालक की प्रामाणिक नास्तिकता की यात्रा कठिन, आत्मान्वेषी आत्म संघर्ष की यात्रा थी। भगवान के भय का आतंक भीषण था। नास्तिकता की मंजिल पर पहुंच कर भगवान के भय से मुक्ति के आत्मसुख की अनुभूति अद्भुत थी। लोग कहते थे बुढ़ापे में भगवान ही याद आते हैं, अब तो लगभग 72 का हो गया अभी तक तो नहीं बाद आए। यदि व्यक्ति भूत और भगवान के भय से मुक्त हो जाए तो वह निर्भय हो जाता है।

Tuesday, August 25, 2026

जंतरमंतर 2

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जंतरमंतर आंदोलन में AISA के अलावा एसएफआई, एआईएसएफ तथा कई अन्य वाम छात्र संगठन भी थे, पहली जरूरत इन वाम संगठनों में एकता की है जो 10 साल पहले जेएनयू आंदोलन के समय बन रही थी किंतु इनके मातृ संगठनों के चलते वह बन नहीं पाई, अब समय है कि बनाएं। काक्रोच पार्टी यदि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के रास्ते पर भी चलना चाहे तो pressure from below के चलते चल नहीं पाएगी। मुझे शुरू में यह प्रायोजित लगा था और अब भी लग रहा है लेकिन मैंने समयांतर में एक लेख में लिखा था कि कई बार inadvertent consequences are different and more substantial than intended ones. अब जंतरमंतर आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो चुका है और राहुल गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है। फासीवाद से लड़ने के लिए आपसी मतभेदों को भूलकर एकजुट होने की जरूरत है तथा वाम सगटनों को सीजेपी और कांग्रेस के साथ मिलकर नई शिक्षा नीति एवं एनटीए के विरुद्ध एक व्यापक मोर्चा बनाना चाहिए जो विस्तृत होकर राष्ट्रव्यापी राजनैतिक आंदोलन का स्वरूप ग्रहण करे। इंकिलाब जिंदाबाद। जय भीम लाल सलाम।

Saturday, August 22, 2026

जंतरमंतर 1

 मैं तो हमेशा भविष्य की पीढ़ियों के प्रति यह सोचकर आशावान रहता था कि इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता इसलिए इतिहास के यूटर्न्स को अस्थाई मानता था, इताहास के यू टर्न से उपजी हताशा पर रोहित बेमुला से निकले जय भीम लाल सलाम के नारे ने पानी फेरना शुरू किया और जेएनयू आंदोलन ने उसे पानी में डुबो दिया था। अब जंतरमंतर आंदोलन ने आशा की नई किरणें दिखाई हैं। इंकिलाब जिंदाबाद।

Sunday, August 16, 2026

महामानव और 15 अगस्त

 मैंने भी कई सालों से लाल किले का भाषण सुनना बंद कर दिया, वैसे भी महामानव की शकल बहुत रिपल्सिव लगती है। जंतरमंतर के मीमों और गीतों ने उसे और भी रिपल्सिव बना दिया है।15 अगस्त 1947 को, भारत के प्रथम और अभी तक के एकमात्र युगद्रष्टा प्रधानमंत्री, नेहरू ने, अपने सुविदित'नियति से मुठभेड़' भाषण में रेंगते भारत के स्ववलंबी, जागृत और वैज्ञानिक तेवर केशि क्षित भारत में तब्दीली के सपने की बात की थी और एक दशक से कम समय में नेहरू का सपना सच होता दिखा। देश में शिक्षा संस्थानों का जाल बिछना शुरू हो गया, जिसका मैं भी पहली पीढ़ी का लाभार्थी हूं। आईआईटी, एम्स, परमाणु शोधकेंद्र खुलने लगे, नेहरू ने उद्योगों को मंदिर कहा लेकिन भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए नहीं देश के पूंजीवादीकरण के लिए संसाधन चाहिए थे। अफीमयुद्ध के दौरान अफीम तस्करी से कई निजी राष्ट्रीय पूंजीपतियों का उद्भव तो हो चुका था लेकिन कोई बड़े औद्योगिक आधारभूत संरचनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर्स) में निवेश करने में न तो सक्षम थे न ही उद्यत। नेहरू सरकार ने सीमित राजस्व और सोवियत सहायता से भेल, सेल, बरौनी रिफाइनरी तथा ओएनजीसी जैसे सार्वजनिक औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया, कल्याणकारी राज्य जिसका उपपरिणाम था और जिन्हें मोदी सरकार ने एक-एक कर अपने कृपापात्र धनपशुओं को औने-पौने दामों में बेच दिया और बेच रहे हैं। युवाओं में अपनी अप्रियता देख-समझ कर महामानव के अंदर के फासीवादी कीड़े ज्यादा कुलबुलाने लगे हैं और भजन न गाकर विद्रोह के गीत गाने वाले युवकों तथा असहमति के स्वर वाले विवेकसम्मत लोगों को दिमागी नक्सल कह कर उन्हें पहचानने और दंडित करने की धमकी दे डाली। नेहरू ने नियति से दो हाथ करने की शुरुआत की महामानव ने स्वाधीनता दिवस के शताब्दी वर्ष तक विसित भारत का वायदा किया, वैसे विकसित भारत की बजाय विक्षिप्त भारत बनने लगा है। वैसे भी कौन जीता है, तेरे जुल्फ के सर होने तक। यदि युवा उमंगों की उड़ान जारी रही और उसे राजनैतिक दिशा मिली तो गुजराती युगल का राज बहुत दिन नहीं कायम रह पाएगा।

दिमागी नक्सल

 महामानव अपनी एंटयर पोलिटिकल साइंस की पढ़ाई को सार्थक करते हुए, महामानव नए नए शगूफे छोड़ते रहते हैं और उनके बजरंगी अनुयायी उन्हें रटकर उनका भजन गाते रहते हैं। जेएनयू आंदोलन के बाद उन्होंने सवाल-जवाब करने वाले स्टूडेंट्स के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग का शगूफा छोड़ा। यह अलग बात है कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने अंग्रेजी राज की बांटों-राज करो नीति के प्यादे बनकर भारतीय राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और भारत राष्ट्र के टुकड़े टुकड़े कर दिए। जिसके घाव नासूर बन न जाने कब तक रिसते रहेंगे।उनका बजरंगी गिरोह अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारत की सामासिक संस्कृति के टुकड़े टुकड़े करने की करतूत की निरंतरता बनाए हुए है। फिर उन्होने खान मार्केट गिरोह का सगूफा छोड़ा. यह भी अलग बात है कि खानमार्केट जाने वालों में भक्तों का प्रतिशत ज्यादा रहता है। बुद्धिजीवियों के लिए इन्होंने अर्बन नक्सल का शगूफा छोड़ा। और अब दिमागी नक्सल का। हर फासीवादी की तरह ये अवधारणाओं को कभी परिभाषित नहीं करते । आज ही सोसल मीडिया पर देखने को मिला कि दिमागी नक्सल जनता पार्टी बन गयी है। महामानव की जय हो।