Sunday, February 19, 2017

नीरो

बड़े वसूक से लिखा था नीरो का मर्शिया
लेकिन अब तो अक्सर दिखाई देता है

हमेशा ही नीरो बजाता है बांसुरी
इतिहास का कोई भी रोम जब जलता है

नीरो का मर्शिया क्यों लिखता है शायर?
कौन था वह और कहां दिखाई देता है?

नीरो कौन था इसकी कहानी बताता हूं
कहां की बात क्या हर जगह दिखाई देता है

नीरो पहली शताब्दी में रोम का एक सम्राट था
शान-ओ-शौकत और क्रूरता का ऐतिहासिक नज़ीर

रहते थे नतमस्तक दरबारी, क़ाजी और सेनापति
वाह-वाही करते थे दानिशमंद आलिम और वजीर

बनाना चाहा उसने रोम में एक अभेद्य किला
सोचा उसने शहर खाली कराने का अचूक तरीका

वफादार कारिंदों ने कर दिया शहर आग के हवाले
खुद मना रहा था पिकनिक शहर से कुछ दूर

जलता रहा रोम छः दिन और सात रात
तमाम लोग और घर-बार जलकर खाक हो गए

धू-धू कर लजल रहा था जब रोम
कहते हैं नीरो तब चैन से बांसुरी बजा रहा था

हो गया जब शहर जल कर खाक़
नीरो चिग्घाड़ कर मातमी विलाप करने लगा

किया उसके विश्वस्त सूत्रों ने तुरंत उसको सूचित
इस जघन्य अपराध के दोषी अल्पसंख्यक ईशाई थे

किया नीरो ने सभी ईशाइयों की सजा-एमौत का ऐलान
मौत ऐसी कि फिर कोई विधर्मी ऐसे जुर्म की जुर्रत न करे

भर कर जानवर की खाल में फेंक दिया गया उन्हें कुत्तों के आगे
देखने को तमाशा-ए-मौत अपने उद्यान में उत्सव का आयोजन किया

मेहमानों में शामिल थे सारे हाकिम-हुकुम और जाने-माने लोग
सुरा-सुराही के परिवेश में वे नाच-गाने के साथ तमाशा देख रहे थे

घिरने लगा जब अंधेरा मौत के इस सर्कस में
जला कर बाकी ईशाइयों को रौशनी का इंतज़ाम किया

ज़ुल्म बढ़ता है तो बढ़ता ही जाता है
मगर मिट जाता है जब हद करता है

समझ के रोमवासी उसकी यह बर्बर चाल
आवाम ने मिलकर उसे सबक सिखाने का फैसला किया

ताकतवर हो कितना भी कोई भी तनाशाह
आवाम की एकता की ताकत अथाह होती है

देख उमड़ता जनसैलाब उड़ गए नीरो के होश
घबराकर अपने आप से उसने खुदकुशी कर लिया

लग रही होगी आपको यह परिचित कहानी
पैदा होते रहे हैं नीरो और करते रहे हैं खुदकुशी

बात नहीं है सिर्फ नीरो की
तमाशबीनों की भी कमीनगी कम नहीं होती
(कलम की लंबी आवारगी काफी वक़्त खा गई)
(ईमि: 20.02.2017)

Wednesday, February 15, 2017

मैं खुद अपना भाग्यविधाता हूं

मैं खुद अपना भाग्यविधाता हूं
और अपनी आत्मा का दिशा-निदेशक
आक्रोश और आंसुओं की इस दुनिया में
विभीषिकाओं के तांडव डरा नहीं पाए मुझे
निर्भय जीवन के संकल्प को तोड़ नहीं सकते
सत्ता की धमकियां और ज़िंदगी की गर्दिशें
तोड़ नहीं सकते आसमान में उड़ने की खाहिश
अरमान अगर अडानी की जहाज में उड़ने के नहीं
दुनिया बदलने के हों
(सुबह सुबह कलम की यूं ही आवारगी)
(ईमि: 16.02.2017)

जमाने से इश्क

ऐसे करते रहो जमाने से इश्क मिलकर साथ साथ
करते रहो तय मंजिल-दर-मंज़िल लिए हाथों में हाथ
(ईमि: 15.02.2017)

मेरी नतिनी

मेरी नतिनी कभी तो चहकती चिड़िया सी लगती है
तो कभी चिंगारी समेटे हुए दावानल की संभावनाएं
भिंची मुट्ठियां लहराते हुए जब किलकारती है
ध्वनियों में छलकती हैं जंग-ए-आज़ादी का भावनाएं
अस्पष्टता की सकारात्मक व्यख्या ही वांछनीय है
भविष्य की कल्पना होती मुक्त वर्तमान विकटताओं से
(ईमि: 15.0.2017)

वैलेंटाइन दिवस

कल सोचा था मैं भी वैलेंटाइन डे मनाऊं
और याद करूं प्यार के उन लम्हों को
जिसे हमने मिलकर जिया था
जिनमें हमने मिलकर किया था प्यार
पेड़-पौधों; काले-गोरे बच्चों
आसमान और जहान से
जब हमने मिलकर किया था
ऐसी दुनियां के संकल्प से प्यार
जिसमें महज प्यार हो
प्रवेश-द्वार पर लगी हो तख्ती
'नफरत का प्रवेश निषेध'
क्योंकि हम जानते हैं
कि प्यार से इंकिलाब निकलता है
और नफरत से फासीवाद.

लेकिन डर से नहीं मनाया कल वैलेंटाइन डे
कहीं जब हम खोए हों साझे सपनों में
जिसमें न हिंदू-मुसलमान होना
निखालिश इंसान होने की इत्तफान पहचान हों
उसी तरह जैसे स्त्री-पुरुष होना
हमारे निखालिश इंसान होने की इत्फाकन पहचान है
कहीं आ न जाए करने कलंकित यह पावन दिन
गौरवशाली संस्कृति के सिपाहियों का युद्धोंमादी झुंड
जो नफरत से उतना ही बेतहाशा प्यार करते हैं
जितना हम मुहब्बत से
ये प्यार के इज़हार को आयातित संस्कार मानते हैं
प्यार करने वालों को सांस्कृतिक गद्दार मानते हैं
नहीं जानते यह ऐतिहासिक सत्य
कि प्रेम अपने आप में एक संस्कृति है
इंसानियत के सारे संस्कारों की जननी
ईशा मशीह की तरह पश्चाताप करते हैं
प्यार के पापियों के लिए
प्यार के इज़हार के इस दिन को
वे मातृ-पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाते हैं
नज़ीर देते हैं किसी पौराणिक श्रवण कुमार की
जो ढोता रहा तहे-ज़िंदगी मां-बाप की जिंदा लाशें
दिशाहीन यहां-से-वहां
भगवान राम तो बाप की बात मान चले गए बनवास
एक आज्ञाकारी सिपाही की तरह
जो सोचने को सैनिक-धर्म विरुद्ध मानता है
और मानता हुक्म चुपचाप
चाहे वह जान देने का ही क्यों न हो
वे नहीं जानते सोचने से ही इंसान ने
अलग किया था खुद को पशुकुल से

खैर फुट नोट अनायास लंबा हो गया
मैं बता रहा था क्यों नहीं मैंने किया तुम्हें याद
कल प्यार के इज़हार के त्योहार पर?
क्या था डर का लब्बोलबाब?
कहता हूं वैसे तो पूरे वशूक से
इतिहास की गाड़ी में बैक गीयर न होने की बात
और देता हूं भूत-ओ-भगवान के भय से मुक्ति को
भय-मुक्ति की मिशाल
लेकिन इतिहास की गाड़ी कभी यू-टर्न ले सकती है
ये लोग जो प्यार करते हैं नफरत से
जोड़ते हैं प्यार महज परिवार से
इस दिन ये प्यार के विरोध में
प्रेमियों पर हमला बोल देते हैं
प्यार की अलौकिक अनुभूति को
भाई-बहन; पति-पत्नी के
संकीर्ण पारिवारिक रिश्तों में जकड़ने की धमकी देते हैं
ये अकेले नहीं झुंड में रहते हैं
और झुंड में तो कुत्ते भी शेर हो जाते हैं
मेरा क्या हर दिन प्यार का होता है
वैलाइंटाइन दिवस के बिहान में इजहार कर लेता हूं.
(ईम: 15.02.2017)

Tuesday, February 14, 2017

Marxism 29 (Crisis)

Sorry, for incorrectly reading your comment. I just got absentmindedly carried away by the prevalent wont of talking on behalf of 'nation'. I re-read it and am in total agreement with you. True, this is not the new crisis. The crisis of capitalism and absence of alternative progressive forces, i.e. class conscious organized working class, creates the objective situation of the emergence of regressive, chauvinistic regimes. But they have to and will go but the main question remains of radicalization of social consciousness and the biggest hurdle is false consciousness of the better-paid working class, harboring the illusion of being part of the ruling class.

Marxism 28 (Hannah Ardent)

I was just re-reading the chain smoking political theorist of the 2nd world war era Hanna Ardent's "The Origins of Totalitarianism" published in 1951 and finding it explaining so well the ascendance of Donald Trump in 1916 (US) and Narendra Modi (India) to the helm of political power. But I feel the radical left must not get into the internal war of ruling class parties over their internal (mostly superfluous) contradictions, notwithstanding the (would be) feeling of sense of relief at the political demise of the extreme right, racist leadership, must expend its energy on sharpening of the major and real contradictions by discoursing over the crisis of theory in Socialism. The ruling classes overplay/project their minor (not so minor sometimes, as now) internal contradictions to blunt the edge major class contradictions. The traditional left, i.e. the traditional CPs are seeking immediate, and almost stupid answers to highly complex situations, while the international Communist movement witnessed many tragic situations and history is overtaking us with an unimaginable pace. Re-reading Marx in the context of the contemporary neo-liberalism and democratically debating in order to get theoretical clarity about "What is to be done"?

Sorry began to write small comment on Trump and liberal/democratic opposition with reference to Hannah Ardent, digressed like an absentminded professor. Written 66 years ago it reads more like a contemporary analysis of this election cycles’s post-fact landscape—the ones driven by Donald Trump’s candidacy in the US and Modi's in India. Though as yet there are not the horrors of the magnitude of the Holocaust or the concentration camps, the political propagandizing and systematic organizing behind the genocidal totalitarian regimes it describes, seems to be headlines in elections in India in 2014 and US in 2016. I'll conclude my (inadvertently long) comment by couple of quotes from the 'Origin'.

"The answer to the fateful question: why did the European comity of nations allow this evil to spread until everything was destroyed, the good as well as the bad, is that all governments knew very well that their countries were secretly disintegrating, that the body politic was being destroyed from within, and that they lived on borrowed time."

"Demonizing immigrants and refugees is easier than acknowledging that national policies created an immigration crisis. Every attempt by international conferences to establish some legal status for stateless people failed because no agreement could possibly replace the territory to which an alien, within the framework of existing law, must be deportable. All discussions about the refugee problems revolved around this one question: How can the refugee be made deportable again?"