Friday, July 21, 2017

समाजवाद 6

रूसी क्रांति की शताब्दी वर्ष के अवसर पर
समाजवाद पर लेखमाला: (भाग 6 )
कामगर अंतर्राष्ट्रीयता के अंतर्विरोध
ईश मिश्र
पहले इंटरनेसनल की स्थापना को याद करते हुए मार्क्स ने बाद में (1871) में लिखा, “इंटरनेसनल की स्थापना तमाम समाजवादी और अर्धसमाजवादी पंथों और संप्रदायों की जगह संघर्षों के लिए मजदूर वर्ग के वास्तविक संगठन के मकसद से की गयी”। आज के हालात में भारत और दुनिया के संधर्म मार्क्स का यह विचार ज्यादा प्रासंगिक लगता है। मार्क्स के नेतृत्व में इंटरनेसनल ने ट्रेडयूनियन बनाने और हड़ताल के अधिकारों; 8 घंटे काम के दिन तथा अन्य जनपक्षीय प्रस्ताव तो पारित किया ही, मजदूरों के तत्कालीन आंदोलनों के साथ सक्रिय एकजुटता दिखाया – चाहे वह फ्रांस के पीतल उद्योग के मजदूरों का संघर्ष हो, जेनेवा के निर्माण मजदूरों का या बेलजियम में कोयला खदान मजदूरों का संघर्ष हो। जब एडिनबर्ग और लंदन के वस्त्र उद्योग के दर्जियों ने हड़ताल किया तो इंटरनेसनल के सक्रिय हस्तक्षेप के चलते मालिकों के जर्मनी और यूरोप के अन्य देशों से हड़ताल तोड़ने के लिए गुंडे और मजदूर ले आने के प्रयास विफल हो गये थे। संगठन के जुझारू तेवर के पीछे मार्क्स के नेतृत्व की भूमिका अहम थी। अंतरिम नियमावली के प्राक्कथन की शुरुआत में ही मार्क्स समाजवाद की क्रांतिकारी, जनतांत्रिक अंतरदृष्टि और समझ पेश करते हैं। “मजदूर वर्गों अपनी मुक्ति का मोर्चा खुद फतह करना होगा”। मदूर वर्गों की आत्म-मुक्ति पर जोर इंटरनेसनल में समाजवाद की संभ्रांततावादी दृष्टिकोण को खुली चुनौती थी। इनमें ग्लैडस्टोन की योजना के तहत सासंद बनने को तैयार, इंग्लैंड के सम्मानित ट्रेडयूनियन नेताओं से लेकर ब्लांकी के अतिक्रांतिकारी समर्थक तक थे, जो 1840 के दशक के मजदूरों के अनुभव से सीख ले नये चिंतन विकसित करने की बजाय, क्रांति के 1789 के जैकोबिनवादी रास्ते पक्षधर थे। लेकिन 1871 में पेरिस में सपल मजदूर विद्रोह और पेरिस कम्यून की स्थापना तक मजदूरों की आत्म मुक्ति की अवधारणा अमूर्त और अस्पष्ट थी। मजदूरों की यह क्रांति, पहले इंटरनेसनल के कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना थी। यद्यपि यह एक शहर के सर्वहारा का विद्रोह था और कम्यून शीघ्र ही अभूतपूर्व, बर्बर क्रूरता के साथ कुचल दिया गया, लेकिन इसने कामगरों के स्वशासन की क्षमता के बारे में प्रचलित तमाम भ्रांतियों को तोड़ दिया। मार्क्स फ्रांस में गृहयुद्ध में लिखते हैं, “पहली बार सर्वहारा ने राजनैतिक सत्ता संभाला,  ..... अंततोगत्वा राजनैतिक स्वरूप की खोज हो गयी जिसके तहत मजदूरों की आर्थिक मुक्ति के अभियान चलाए जा सकते हैं”। कम्यून के उदय, अस्त और इसमें इंटरनेसनल की भूमिका की संक्षिप्त चर्चा आगे की जाएगी।
      1848-51 की रक्तरंजित क्रांति-प्रतिक्रांतिकारी परिघटनाओं तथा 1852 में कम्युनिस्टलीग के बाद मार्क्स को क्रांतिकारी परिस्थितियों की परिपक्वता के अपने आकलन की गलती का आभास हुआ और काफी दिन मार्क्स की राजनैतिक सक्रियता लेखन-पठन तक सिमटी रही। 1864 में कामगरों के अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेसनल) के गठन से मार्क्स को दुनिया को ‘समझने’ के साथ ‘बदलने’ के अभियान के लिए तथा सिद्धांत को कार्यरूप देने के प्रयोग के लिए एक समुचित मंच मिल गया और संगठन को एक प्रतिभाशाली, सक्षम नेतृत्व। मार्क्स और एंगेल्स शुरू से ही विचारों के प्रसार और क्रियान्वयन के लिए संगठन आवश्यक मानते थे और मजदूरों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन के प्रयास में थे। कम्युनिस्ट लीग का भी चरित्र अंतर्राष्ट्रीय था, इंटरनेसनल उस दिशा में अगला कदम। 1848-49 के त्रासद परिणामों की सीख से 1859 में राजनैतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा में एक योगदान के प्राक्कथन में भौतिक उत्पादन के चरण के अनुरूप सामाजिक चेतना के स्वरूप पर जोर देते हैं और सामाजिक चेतना के जनवादीकरण यानि मजदूरों में वर्गचेतना के संचार की जरूरत को रेखांकित करते हैं। मार्क्स ने शुरू से ही सामाजिक चेतना के विकास के स्तर पर युगचेतना के प्रभाव की अहमियत को स्वीकारा है तथा उसके जनवादीकरण की जरूरत को रेखांकित किया, जिसकी संक्षिप्त चर्चा इस श्रृंखला के भाग 4 में की गयी है। सामाजिक चेतना की निर्णायक भूमिका के एहसास के चलते विभिन्न ‘मजदूर आंदोलनों की चेतना के अनुरूप’ इंटरनेसनल के उद्घाटन भाषण का तेवर नरम है और कार्यक्रम सामाजिक जनतांत्रिक।

सांगठनिक अंतर्विरोध और वैचारिक टकराव
      जैसा कि पिछले लेख में बताया गया है, इंटरनेसनल अपने गठन के समय से ही मतभेदों और  वैचारिक टकराव से ग्रस्त रहा है। पहले जेनेवा, 1866 सम्मेलन में सशस्त्र तख्ता पलट के हिमायती, ब्लांकी के अनुयायी, पूंजीवाद में सुधार के पैरोकार प्रूदोंवादियों का बोनापार्ट के दलाल कह कर विरोध किया था। सम्मेलन ने जनरल कौंसिल से पारित कार्यक्रम और सांगठनिक ठांचे को मंजूरी दी तथा सम्मेलन के दौरान काम के 8 घंट्टे का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। इस सम्मेलन में 5 देशों के 46 प्रतिनिधियों तथा मैत्रीपूर्ण संगठनों के 14 पर्यवेक्षकों ने शिरकत की थी। इंटरनेसनल का दूसरा सम्मेलन 2-8 सितंबर, 1867 में लुसाने (स्विटजरलैंड) में हुआ। पूंजी के अंतिम रूप देने की व्यस्तता के चलते सम्मेलन में नहीं शरीक हो सके थे। प्रूंदोवादी नेतृत्व पर कब्जा कर पाने में नाकाम रहे और सम्मेलन ने दुबारा उन्ही सदस्यों को चुना। क्रांतिकारी संगठनों में गुटबाजी एक ऐतिहासिक विरासत है जिसे उसके दावेदार बरकरार रखते आए हैं। जनरल कौंसिल के सभी प्रयासों के बावजूद प्रूदोंवादी प्रतिनिधि सहकारिता और ऋण से संबंधित अपने प्रस्ताव पारित कराने में सफल रहे, लेकिन सम्मेलन ने आर्थिक संघर्षों और हड़तालों के जेनेवा सम्मेलन के प्रस्तावों पर फिर से मुहर लगा दिया। सम्मेलन ने सामाजिक मुक्ति के लिए राजनैतिक मुक्ति की अपरिहार्यता को रेखांकित करते हुए, धर्मनिरपेक्षता को संगठन के सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया। विनिमय और यातायात के राष्ट्रीयकरण के साथ पहली बार संगठन ने पूंजीवादी कंपनियों की लूट के उन्मूलन के लिए सामूहिक स्वामित्व के सिद्धांत को औपचारिक मान्यता प्रदान की। इसमें जनरल कौंसिल के शांति और स्वतंत्रता की लीग (लीग ऑफ पीस एंड फ्रीडम) से असंबद्धता के प्रस्ताव के विपरीत अगले दिन से जेनेवा में होने वाले इसके सम्मेलन में शिरकत का प्रस्ताव पारित हो गया और बहुत से संगठन के कई सदस्यों ने नजी हैसियत में इसमें शिरकत की। यहां इस लीग पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन दो शब्द जरूरी है।    
शासक वर्ग समाज के मूलभूत, आर्थिक अंतर्विरोध की धार कुंद करने के लिए या विषयांतर के लिए कृतिम, वायवी अंतर्विरोधों को पूरी ताकत से उछालता है। यूरोप के बौद्धिक हलकों में मजदूरों के नेतृत्व में क्रांति की अवधारणा नई थी जिसे पचाना उनके लिए मुश्किल था। इतने कम समय में, यूरोप और अमेरिका के मजदूरों में इंटरनेसनल की लोकप्रियता देख शासक वर्गों की पार्टियों और उनके बुद्धिजीवियों के कान खड़े हो गये। मजदूरों का उदारवादी विचारों से मोह भंग हो रहा था। इंग्लैंड के काफी मजदूर नेता शासकवर्ग के दलों की गिरफ्त से निकलकर इंटरनेसनल की तरफ आकर्षित हो रहे थे और कई देशों में इंटरनेसनल की इकाइयां स्थापित हो गयी थीं। शासकवर्ग सर्वसंसाधन संपन्न होता है और शाम-दाम-भेद-दंड सब तरीके अपनाता है। ऐतिहासिक संदर्भ में लीग की विवेचना करने पर हम पाते हैं कि स सम्मेलन का आयोजन इंटरनेसनल के प्रभाव को कम करने; फूट डालने और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दों से विषयांतर के लिए एक समानांतर संगठन के लिए खड़ा किया गया। आयोजकों ने इंटरनेसनल की सभी शाखाओं तथा मार्क्स जनरल कौंसिल सभी सदस्यों को आमंत्रण भेजा। इसके आयोजन में जाने-माने उदारवादी चिंतक जॉन स्टुअर्ट मिल, जिन्हें कुछ लोग गलती से उदार समाजवादी कहते हैं; गिसेप्प गैरीबाल्डी; लुई ब्लांक; एड्गर क्विनेट; अलेक्जेंडर हर्जन समेत बहुत सी जानी-मानी हस्तियां शरीक थीं। गैरीबाल्डी की अध्यक्षता वाले इस सम्मेलन में सर्वाधिक लोकप्रिय वक्ता थे। वैसे जरूरी तो नहीं है, फिर भी दो शब्द जॉन स्टुअर्ट मिल के बारे में।
मिल को पहला स्पष्ट जनतांत्रिक उदारवादी चिंतक माना जाता है। वे जनतांत्रिक राज्य को व्यक्ति और समाज के नैतिक विकास के लिए आवश्यक मानते थे तथा स्त्रियों समेत सार्वभौमिक मताधिकार के सशर्त समर्थक थे, लेकिन सबके समान मत के नहीं। काबिल लोगों के मत का मूल्य आमजन के मत से अधिक होना चाहिए। ये काबिल लोग ‘संयोग से’ संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा के भी स्वामी होते हैं। गौरतलब है कि 1867 में इंगलैंड में समान सार्वभौमिक पुरुष अधिकार का कानून बन चुका था। सभी समुदाय जनतंत्र के पात्र नहीं होते केवल प्रबुद्ध समुदाय। यह भी गौरतलब है कि मिल ईस्टइंडिया कंपनी की लंबी मुलाजमत (1823-58) कर चुके थे और सांसद (1865-68) थे तो उपनिवेशों में जनतंत्र की  बात कैसे करते? वे ‘बर्बर’ पर ‘सभ्य’ के वर्चस्व के नस्लवादी कुतर्क से ‘सभ्यता के बोझ’ के सिद्धांत के सहारे उपनिवेशवाद का औचित्य साबित करते हैं। सभी प्रमुख आयोजकों की चर्चा की यहां गुंजिश नहीं है। लुई ब्लांक और हर्जन की चर्चा पिछले लेखों में की गयी है। मिल की इतनी चर्चा महज आयोजकों की नीयत स्पष्ट करने के लिए कर दिया। सम्मेलन में इसमें शिरकत को लेकर मार्क्स के वक्तव्य के हवाले से कई वक्ताओं ने उनका मजाक उड़ाने की कोशिस की। मार्क्स ने लिखा था, इंटरनेसनल के सदस्य निजी हैसियत से सम्मेलन में शरीक हो सकते हैं, संगठन के सदस्य की हैसियत से नहीं। “अंतर राष्ट्रीय कामगरों का सम्मेलन (इंटरनेसनल) अपने-आप में एत शांति सम्मेलन है। विभिन्न देशों के कामगर वर्गों को अंततः अंतर-राष्ट्रीय युद्धों को असंभव बना देना होगा। यदि जेनेवा सम्मेलन के आयोजक इसे सही मानते हैं तो उन्हें टरनेसनल में शरीक हो जाना चाहिए था”। 1868 के ब्रुसेल्स सम्मेलन ने लीग से न जुड़ने के मार्क्स की रणनीति को मंजूरी दे दी और एक सशक्त युद्ध विरोधी मोर्चा बनाने के लिए दुनिया के मजदूर वर्गों का आह्वान किया। इस सम्मेलन में मिखाइल बकूनिन के इंटरनेनल एलायंस ऑफ सोसलिस्ट डेमोक्रेसी (समाजवादी जनतंत्र का अंर्राष्ट्रीय गठबंधन) ने इंटरनेसनल से संबद्धता का आवेदन किया, इसके कार्यक्रमों से असहमति के बावजूद मार्क्स ने जनरल कौंसिल की तरफ से इसे संगठन की एक शाखा के रूप में जुड़ने की अनुमति दे दी। 1869 में ब्रुसेल्स (बेल्जियम) में आयोजित चौथे सम्मेलन की खास बात प्रूदों के पारस्परिकतावादी अनुयायियों और सामूहिकतावादियों के बीच टकराव था। मार्क्स के प्रतिनिधि और बकूनिन सामूहिकता के पक्ष में साथ थे और बेलजियम से समाजवादी नेता पायपे के समर्थन से प्रूदोंवादी अलग-थलग पड़ गए। 1970 में जर्मनी-फ्रांस युद्ध में इंटरनेसनल के सदस्य युद्धविरोधी अभियान में लगे थे। मार्क्स लगातार जर्नल कौंसिल की तरफ से वक्तव्य जारी कर रहे थे जो बाद में इंटरनेसनल की तरफ से फ्रांस में गृहयुद्ध शीर्षक से जारी किया गया। मार्क्स ने लिखा कि जब जर्मनी और फ्रांस की सेनाएं आमने-सामने थीं तब दोनों देशों के मजदूर एक दूसरे को शुभकामनाएं भेज रहे थे।
1869-72 के दौरान इंटरनेसनल में बकूनिन के अराजकतावादी समर्थकों और मार्क्स के समर्थकों में मतभेद गहराते गए। मार्क्स राज्य पर सर्वहारा के अधिकार के हिमायती थे और बकूनिन राजनीति से दूरी के। दर-असल मार्क्स को संगठन के अंदर दो वैचारिक मोर्चों पर संघर्ष करना था। एक तरफ पूंजीवादी उदारवाद से समझौते को उद्यत अवसरवादी ट्रेडयूनियन नेताओं के सुधारवादी विचार थे तो दूसरी तरफ बकूनिन और ब्लांकी के चरमपंथी विचार। पेरिस कम्यून के त्रासद अंत के बाद ब्लांकी के ज्यादातर समर्थक मार्क्स के साथ आ गये। आज भी किसी सही मार्क्सवादी संगठन के सामने वही समस्याएं और शत्रु हैं, नाम बदल गये हैं। प्रूदों और बकूनिन दोनों राजनैतिक संघर्षों के विरुद्ध थे। प्रूदों प्रगतिशील ऋणप्रणाली और छोटे उत्पादकों की सहकारिता से समाजवाद लाना चाहते थे और बकूनिनका मानना था कि आतंकवादी और छोटी-मोटी, छिटपुट सशस्त्र कार्वाइयां आम सामाजिक क्रांति का पथ प्रशस्त करेंगी। मार्क्स और बकूनिन के समर्थकों में टकराव का प्रमुख मुद्दा सांगठनिक संरचना था। बकूनिन ने जनरल कौंसिल पर अधिनायकवादी ढंग से काम करने का आरोप लगाया लेकिन इंटरनेसनल पर पिरामिडीय पदानुक्रम में गठित भूमिगत संगठन के संरक्षण के हिमायती थे, जिसके मुखिया वे खुद हों। राज्यों के दमन के बाहरी संकट और अराजकतावादियों के विरोध के आंतरिक संकट के चलते मार्क्स और एंगेल्स ने जनरल कौंसिल के अधिकारों में बढ़ोत्तरी की दलील दी। बकूनिन को स्विटजरलैंड, स्पेन और इटली से पर्याप्त समर्थन मिला। बकूनिन के काफी समर्थक, मार्क्स की शब्दावली में लंपट सर्वहारा थे। पेरिस कम्यून के बाद इंटरनेसनल की हर इकाई पर राजकीय दमन बढ़ता गया। पेरिस कम्यून की संक्षिप्त चर्चा आगे की जाएगी। बकूनिन और मार्क्स की इसकी अलग-अलग व्याख्याएं थी। मार्क्स समेत टरनेसनल के तमाम सदस्य कम्यून के पतन के बाद शरणार्थियों के राहत काम में लग गए। 1972 के द हेग सम्मेलन में दोनों पक्ष आमने-सामने थे। संगठन के अंदर एक भूमिगत संगठन के गठन और संगठनिक अनुशासन के उल्लंघन के आरोप में बकूनिन को ब्लांकी के अनुयायियों के समर्थन से गइंटरनेसनल से निष्कासित कर दिया गया। इसमें मार्क्स को ब्लांकी के अनुयायियों का समर्थन मिला। इसी सम्मेलन में बहुत हल्के बहुमत से संगठन का मुख्यालय न्यूयॉर्क स्थांतरित करने का भी प्रस्ताव पारित किया. यह दर-असल इंटरनेसनल के अंत की घंटी थी जिसकी औपचारिक घोषणा 1976 में फिलाडेल्फिया में की गयी। बकूनिन के समर्थकों ने अलग सम्मेलन कर निष्कान को अमान्य कर खुद को संगठन का असली वारिस बताया। ‘अधिनायकवाद विरोधी’ यह इंटरनेसनल शुरू से अराजकता का शिकार रहा, 1877 तक आते-आते बिखरने की प्रक्रिया शुरू हुई और 1881 में पूरी हो गयी और मजदूरों की अंतरराष्ट्रीयता का पहला चरण ‘बीरगति’ को प्राप्त हो गया।
इस तरह हम देखते हैं कि पहला इंटरनेसनल मार्क्सवादी बल्कि मजदूरों के हितों की हिमायत करने वाले विभिन्न संगठनों और विचारों का व्यापक मंच था। समाज, इतिहास और क्रांति की समझ तथा रणनीतियों के मतभेद न सुलझने वाले सबित हुए और संगठन के अंत के कारण। आज जब दुनिया में मानवता और मानवीय मूल्यों पर फासीवाद के नवोदय या पुनरुत्थान से एक अभूतपूर्व खतरा पैदा हो गया है और हर देश में, व्यापक संयुक्त मोर्चों की जरूरत है लेकिन इंटरनेसनल के अनुभव से सीख लेते हुए प्रतिरोध की ताकतों के बीच मूलभूत सैद्धांतिक सहमति और असहमतियों पर सहिष्णु संवाद अनिवार्य है। सामाज के भौतिक उत्पादन के उस चरण और तदनुरूप युगचेतना से प्रभावित सामाजिक चेतना से स्वरूप के संदर्भ में तत्कालीन परिस्थितियों में अपनी यथासंभव ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बाद कामगरों का पहला इंटरनेसनल तो बिखर गया लेकिन मानव मुक्ति के लिए दुनिया के मजदूरों के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की जरूरत का सवाल छोड़ गया और जवाब खोजने की प्रक्रिया में 1889 में दूसरे अंर्राष्ट्रीय की स्थापना हुई।

पेरिस कम्यून  
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इतिहास की पहली सफल सर्वहारा क्रांति के बाद, पूंजीवादी राज्य मशीनरी को ध्वस्त कर स्थापित पहले सर्वहारा राज्य की मिशाल, पेरिस कम्यून पर क्रांति के भागीदारों और समकालीनों से लेकर आज तक  बहुत लिखा जा चुका है। मार्क्स ने  इंटरनेसनल की जनरल कौंसिल की तरफ से जारी फ्रांस में गृहयुद्ध (सिविल वार न फ्रांस ) इसकी वैज्ञानिक व्याख्या और समीक्षा है। फिर भी कम्यून की संक्षिप्त चर्चा के बिना, बात अधूरी रह जाएगी। कुछ इतिहासकारों ने इसे रूसो के सामूहिक इच्छा (जनरल विल) के सिद्धांत के औद्योगिक युग में रूपांतरण बताया तो कुछ ने वास्तविक सहभागी जनतंत्र की मिशाल। बकूनिन और अनके अराजक अनुयायियों ने इसे राज्यविहीन अराजक समाज के अभियान के कदम के रूप में देखा और एंगेल्स ने सर्वहारा की तानाशाही की जीवंत मिशाल के। कम्यून के ज्यादातर नेता इंटरनेसनल के सदस्य थे, जिनमें ब्लांकी और प्रूदों के अनुयायियों की संख्या काफी थी। जो भी हो पेरिस कम्यून मजदूरों की की पीढ़ियों के लिए मजदूर क्रांति का संदर्भ-बिंदु और प्रेरणा श्रोत बना हुआ है।
 क्रांति पर मार्क्स के विचारों को समझने के दो प्रमुख श्रोत हैं – कम्यनिस्ट घोषणा पश्र और फ्रांस में गृह युद्धघोषणा पत्र 1848 की क्रांति के पहले लिखा गया था और भविष्य के अनुमानित वर्गसंघर्ष की रूपरेखा पेश करता है। घोषणापत्र के आक्रामक तेवर की जगह फ्रांस में गृह युद्ध में दो क्रांतियों के अनुभव की परिपक्ता है। यह तब लिखा गया जब वर्ग-संघर्ष का विकास इस स्तर हो चुका था कि इसने कम्यून की एक नई अवधारणा को जन्म दिया। न तो किसी यूटोपियन समाजवादी ने, न ही भौतिकवादी मार्क्स और एंगेल्स ने ही इसकी कल्पना की थी। र्मार्क्स और एंगेल्स 1872 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के नए संस्करण की भूमिका में इस बात का संज्ञान लेते हुए स्वीकार करते हैं, “1848 के बाद पूंजीवाद के विकास की विराटता और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग के बेहतर और विस्तारित संगठनों के परिदृश्य तथा फरवरी क्रांति और खासकर पेरिस कम्यून के अनुभवों को देखते हुए जिसमें सर्वहारा पूरे दो महीने सत्ता पर अधिकार बरकरार रहा; कुछ मायनों में यह (घोषणापत्र का) पुरातन पड़ गया है। कम्यून ने एक बात खास तौर पर साबित किया कि मजदूर वर्ग पहले से मौजूद राज्यतंत्र पर कब्जा करके उसका उपयोग अपने उद्देश्य नहीं कर सकता”। राज्यतंत्र को विघटित करना ही पड़ेगा। इस बात को 1971 मे जनरल कौंसिल के अपने दो संबोधनों तथा फ्रांस में गृहयुद्ध में मार्क्स ने और भी स्पष्ट किया है। इसीलिए मार्क्सवाद कोई स्थिर विचारधारा नहीं, दुनिया को समझने-बदलने का गतिमान विज्ञान है। 20 साल बाद 1891 में फ्रांस में गृह युद्ध के नए संस्करण की भूमिका में एंगेल्स लिखते हैं, “हाल के दिनों में कई टुटपुजिया सामाजिक जनतंत्रवादी, सर्वहारा की तानाशाही जैसे शब्दों का हौव्वा खड़ा करने में लगे हैं। ठीक है आप जानना चाहते हैं कि सर्वहारा की तानाशाही कैसी होती है? पेरिस कम्यून देखिए, वह सर्वहारा की तानाशाही थी”।
कम्यून के इतिहास, मार्क्स और एंगेल्स तथा अराजकतावादी एवं उदारवादी बुद्धिजीवियों की इसकी व्याख्याओं की व्यापक समीक्षा की यहां गुंजाइश नहीं है, लेकिन कम्यून के उदय की पृष्ठभूमि; मजदूरों की सशस्त्र क्रांति; मार्क्स के कम्यून नेताओं के नाम संदेश; कम्यून की गलतियों और अमानवीय बर्बरता से दमन पर एक सरसरी निगाह डालना लाजमी है। सोवियत संघ के प्रोग्रेस प्रकाशन से प्रकाशित पेरिस कम्यून (1971) में संकलित  1870 में फ्रांस-जर्मनी (प्रैंको-प्रसियन) युद्ध पर इंटरनेसनल में मार्क्स के संबोधन; जनरल कौंसिल द्वारा जारी फ्रांस में गृहयुद्ध; और इसकी तैयारी के प्रारूपों;  मार्क्स एंगेल्स के तत्कालीन लेखों, पत्रों, पूंजीवादी प्रेस तथा संगठनों के दुष्प्रचार के जवाब, कम्यून के उदय-पतन की प्रामाणिक कहानी बयान करते हैं और क्रांतिकारियों की गलतियों की समीक्षा। मार्क्स युद्ध पर अपने पहले संबोधन की शुरुआत इंटरनेसनल में अपने उद्घाटन संबोधन के उद्धरण से करते हैं कि किस तरह शासक वर्ग राजनैतिक सत्ता पर आए संकट से निपटने के लिए युद्धोंमादी राष्ट्रवाद का माहौल बनाकर रक्तपात में समाज की संपदा नष्ट करते हैं। यह आज भी उतनी सही है, जितनी तब थी। “इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि विभिन्न वर्गों के संघर्षों का फायदा उठाकर सत्त्ता हड़पने और समय-समय पर विदेशी युद्धों द्वारा उसे बरकरार रखने वाला नैपोलियन बोर्नापार्ट शुरू से ही इंटरनेसनल को अपना सबसे खतरनाक दुश्मन मानता है। जनमत संग्रह की पूर्वसंध्या पर उसने फ्रांस में अंतर्राष्ट्रीय कामगर संघ (इंटरनेसनल) को उसकी हत्या की साजिश रचने वाला गुप्त संगठन संगठन बताकर, देश भर में इसके पदाधिकारियों की धर-पकड़ का आदेश जारी कर दिया। ........... ........ दरअसल वे फ्रांसीसी जनता से खुलेआम जोर-शोर से मतदान के बहिष्कार की जोर-शोर से अपील कर रहे थे क्योंकि मतदान का मतलब है देश में तानाशाही और दूसरे देशों से युद्ध का समर्थन है”।
बोनापार्ट के कुशासन और उसके सैनिकों के अनाचार तथा बैंकरों, कारखानेदारों और व्यापारियों की लूट से जनअसंतोष चरम पर था। इंटरनेसनल के कार्यक्रम और प्रचार मजदूर असंतोष को दिशा दे रहे थे। बोर्नापार्ट युद्ध का माहौल बना रहा था और इंटरनेसनल के नेता और कार्यकर्ता युद्धोंमाद के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे थे। फ्रांस की गरिमा के तथा ‘शत्रु’ जर्मनी से अपनी जमीन वापस लेने के नाम पर जब 15 जुलाई 1870 को बोर्नापार्ट ने युद्ध की घोषणा की तो इसकी चारों तरफ निंदा हुई। इंटरनेसनल की फ्रांसीसी इकाई ने “सभी देशों के कामगरों” के नाम 12 जुलाई को घोषणापत्र जारी किया। “राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए, राष्टीय सम्मान के यूरोपीय संतुलन के नाम पर एक बार फिर दुनिया के अमन-चैन पर खतरे घने बादल मड़राने लगे हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन के कामगर साथियों! आइए हम एकजुट होकर युद्ध के विरुद्ध आवाज बुलंद करें। …….. यह युद्ध वर्चस्व या सल्तनत का युद्ध है। कामगरों की टृष्टि से यह एक आपराधिक बेहूदगी है। ....” कई शहरों में मजदूरों ने शांति मार्च आयोजित किया। इंटरनेसनल की जर्मन इकाई के कार्यकर्ताओं ने भी युद्ध का विरोध किया। नतीजतन जब दोनों ही देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं तब वहां के मजदूर एक दूसरे को शांति-संदेश भेज रहे थे। युद्ध और युद्ध विरोधी अभियानों की विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इसका बोनापर्ट की पराजय से शर्मनाक अंत हुआ। 2 सितंबर 1870 को देश की पूर्वी सीमा, सेडान में बोनापार्ट की सेना की पराजय के बाद बिस्मार्क की सेना ने ‘सम्राट’ को उनके 100,000 सैनिकों के साथ बंदी बना लिया। पेरिस की सड़कों पर नारे लगाते, नाचते-गाते कामगरों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह जनसैलाब राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की मांग कर रहा था।
तथाकथित गणतंत्रवादी विपक्ष कामगरों के इस आंदोलन से सकते में आ गया लेकिन जनमत के दबाव में उसे मजबूरन गणतंत्र और अंतरिम राष्ट्रीय सुरक्षा की की सरकार की घोषणा करनी ही पड़ी। इस सरकार के प्रमुख पदों पर पूंजीवाद समर्थक गणतंत्रवादी थे। मार्क्स फ्रांस का गृहयुद्ध में लिखते हैं, “जब पेरिस के मजदूरों ने गणतंत्र की घोषणा की तो तुरंत ही पूरे फ्रांस में ऐसी निर्विरोध घोषणाएं हुईं। मौके की ताक में बैठे कुछ बैरिस्टर होटल द विल्ले (संसद) पर काबिज हो गए, थियर उनका नेता था और थ्रोचू जनरल। .............. हड़पी हुई अपनी सत्ता की वैधता के लिए पेरिस के प्रतिनिधित्व का अप्रासंगिक हो चुका जनादेश ही काफी समझा”। मार्क्स ने उपरोक्त लेख में सरकार के मंत्रियों के वक्तव्यों के हवाले से बताया है कि सरकार तो समझौता करना चाहती थी लेकिन लोगों और नेसनल गार्ड की देशभक्ति के बुलंद जज्बे को देखते हुए, हिम्मत न कर सकी उल्टे शगूफा छोड़ दिया, “न तो एक इंच जमीन छोड़ेंगे, न ही जर्मनों को किले की एक ईंट ले जाने देंगे”, और जर्मन सेना ने पेरिस पर  घेरा डाल दिया। आश्चर्यजनक हलचलों के बीच, जबकि मजदूरों के असली नेता अब भी बोनापार्ट की जेलों में थे, जर्मन सेना पहले ही पेरिस की तरफ कूच कर चुकी थी, पेरिस ने इस शर्त के साथ बागडोर संभाला कि उसका द्देश्य महज राष्ट्रीय सुरक्षा था। लेकिन पेरिस की सुरक्षा मजदूर वर्ग को हथियारबंद कर प्रभावशाली बल में संगठित किए बगैर नहीं हो सकती, युद्ध अपने आप उन्हें प्रशिक्षण दे देगा। लेकिन हथियारबंद पेरिस का मतलब था क्रांति को हथियारबंद करना”। पूंजीवाद के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस सरकार को जर्मनों से ज्यादा खतरा हथियारबंद मजदूरों से था। उनसे निपटने की तैयारी का उसे समय चाहिए था। उसे लगता था कि लंबी घेराबंदी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव से मजदूरों का क्रांतिकारी जज्बा ठंडा पड़ जाएगा। सरकार एक तरफ राष्ट्रोंमादी लफ्फाजी कर रही थी दूसरी तरफ बिस्मार्क से गुप्त वार्ता। लेकिन नेसनल गार्ड के  रूप में संगठित पेरिस के 200,000 हथियारबंद मजदूरों की जनसेना ने पेरिस की सुरक्षा का दायित्व अपने हाथों मेंले लिया। नगर की सुरक्षा सुनिश्चित कर, हथियार डालने से इंकार कर, अपने ही शासकों पर तान दिया और धरती पर पहले सर्वहारा राज्य को जन्म दिया। तबसे कहीं भी किसी भी शासकवर्ग ने मजदूर वर्ग को हथियारबंद करने की गलती नहीं की।
युद्ध अक्सर, खासकर, पराजय की स्थिति में, क्रांतिकारी परिस्थितियां पैदा करता है। युद्ध से लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या तहस-नहस हो जाती है। सरकार के कर्त्ता-धर्ताओं; परजीवी राज्य मशीनरी; सेना; मीडिया तथा सत्ता के अन्य स्तंभों के क्रियाकलापों का परीक्षण में लोगों की निगाहों का पैनापन कई गुना बढ़ जाता है। संसद में बहुमत पूंजीवादी गणतंत्रवादियों और बोनापार्टवादियों यानि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों का था। लोगों ने कुछ दिन राष्ट्रीय एकता के नाम पर सरकार का समर्थन किया लेकिन धीरे-धीरे असंतोष फिर फैलने लगा। मजदूर वर्ग जब क्रांति की तैयारी कर रहा था तब यह गिरोह प्रतिक्रांति की।
प्रतिक्रियावादियों की यह सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों से पेरिसवासियों, खासकर मजदूरों और नेसनल गार्ड के सदस्यों को लगातार उकसाती रही। कुछ नेसनल गार्डों के का भत्ता  रोक दिया  गया और उन्हें “काम में क्षमता” प्रमाणित करने को कह गया। शहर के घेरे से बहुत लोग बेरोजगार हो गए थे। भुखमरी तो नहीं भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए थे। सभी बकाया किराया और कर्ज 48 घंटे में जमा करने का फरमान जारी हो गया, जिससे छोटे-मोटे व्यापारियों पर दिवाएपन का खतरा मड़राने लगा। फ्रांस की राधानी पेरिस से वर्साय स्थांतरित कर दी गयी। इन और इन सी अन्य जनविरोधी नीतियों ने गरीबों को दरिद्र बना दिया लेकिन इन्ही की प्रतिक्रिया स्वरूप मध्यवर्ग की सामाजिक चेतना का जनवादीकरण हुआ। थियर की प्रतिक्रियावादी सरकार को उखाड़ फांकना ही पेरिस की मुक्ति का रास्ता था। जुझारू प्रदर्शन शुरू हो गए और मजदूर वर्ग ने विद्रोह का ऐलान कर दिया -- थियर जैसे तथाकथित गणतंत्रवादी और राजशाही समर्थक गद्दारों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई। प्रसियन सरकार के समक्ष समर्पण और राजशाही के पुनरुद्धार के खतरों ने आग में घी का काम किया। नेसनल गार्ड क्रांति के अग्रदूत बन गए। 215 बटलियनों के प्रतिनिधियों ने ‘नेसनल गार्डों के महासंघ की केंद्रीय कमेटी’ का चुनाव हुआ। केंद्रीय कमेटी की सत्ता तुरंत सर्वमान्य हो गयी और थियर सरकार द्वारा नियुक्त कमांडर को इस्तीफा देना पड़ा। जर्मन सेना शहर के एक कोने में 2 दिन डेरा डालकर वापस चली गयी। थियर सरकार की फौरी चिंता पेरिस के हथियारबंद मजदूर थे। मजदूरों के अधिकार में तोपों का होना पूंजीवाद के लिए “कानून-व्यवस्था” की समस्या थी। दुनिया के सभी प्रतिक्रियावदियों की आंख की किरकिरी बन गया हथियारबंद पेरिस। थियर ने नियमित सेना के 20 हजार सैनिक भेजा तोपों पर कब्जा करने जो उन्होंने आसानी से कर लिया लेकिन उनके पास उन्हें ले जाने का इंतजाम करते, धीरे-धीरे वे मजदूरों की भीड़ से घिरते गये। नेसनल गार्ड्स भी पहुंच गए। भीड़, सैनिक, नेसनल गार्ड सब गड्ड-मड्ड हो रहे थे। सेना के कमांडर ने भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दिया लेकिन सैनिकों ने गोली चलाने से इंकार कर दिया। कई सैनिक नेसनल गार्ड्स को गले लगा रहे थे। क्या अद्भुत दृश्य रहा होगा। कमांडतर लॉकमते और नेसनल गार्ड के पूर्व कमांडर क्लेमांत थॉमस को गिरफ्तार कर लिया गया जिन्हें क्रुद्ध सैनिकों ने मार दिया। थॉमस ने 1848 की क्रांति में मजदूरों पर गोली चलवाई थी। इस परिघटना में केंद्रीय कमेटी की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन परिस्थिति ने उसे सरकार की स्थिति में बैठा दिया। थियर और उसके मंत्रियों की हालत खराब हो गयी। सैनिक हुक्म मानने की बजाय सोचने लगे यानि विद्रोह कर दे, यह बात उन्होने सपने भी नहीं सोचा था। भयभीत हो आनन-फानन में पेरिस से वरसाय भाग गया और सेना तथा प्रशासनिक कर्मियों को शहर खाली कर देने का हुक्म दे दिया। थियर का पीछा कर उसकी बची-खुची सेना को भी नष्ट करने के प्रस्ताव को केंद्रीय कमेटी ने नहीं माना। बाद में देखने पर लगता है कि यह एक ऐतिहासिक गलती थी। दरअसल केंद्रीय कमेटी ज्यादातर सदस्यों में सैद्धांतिक परिपक्वता का अभाव था और वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका लिए तैयार नहीं थे। पेरिस में अब नेसनल गार्ड सरकार की स्थिति में था तथा केंद्रीय कमेटी ने सारे सामरिक स्थानों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। मजदूरों के निहत्था करने की सरकार की नाकाम कोशिस के बाद पेरिस के मजदूरों और वारसाय में छिपी सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। “18 मार्च की भोर कम्यून जिंदाबाद के नारों की गर्जना से हुई। केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी घोषणापत्र में कहा गया, “शासक वर्गों की नाकामियों और गद्दारियों को देखते हुए, पेरिस का सर्वहारा समझ गया है कि वक्त आ गया है कि सार्वजनिक मसलों को संचालन वह अपने हाथ में ले ले। ……….. वह समझ गया है कि यह उसका परम कर्तव्य और असंदिग्ध अधिकार है कि वह सरकारी सत्ता पर काबिज हो अपनी भाग्य का विधाता वह स्वयं बने”।
केंदीय कमेटी, क्रांति के जज्बे के प्रसार के बजाय अपने लिए पहला काम तय किया कम्यून का चुनाव कराना। क्रांति की निरंतरता की बजाय कीमती समय चुनाव के प्रबंधों में लगा दिया और थियर बिस्मार्क से मिलकर प्रतिक्रांति की तैयारी करता रहा और सैन्यशक्ति और मनोबल बढ़ाता रहा। केंद्रीय कमेटी को लगा कि उनके पास शासन का वैध जनमत नहीं था। 90 सदस्यीय, निर्वाचित कम्यून में अधिकतर क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े लोग थे और ब्लांकी के अनयायियों मार्क्सवादियों को मिलाकर लगभग एक-चौथाई इंटरनेसनल के सदस्य। जोशो-खरोश  से ओत-प्रोत, कार्रवाई को सदा उद्यत ब्लांकी के अनुयायियों के पास स्पष्ट सैद्धांतिक समझ का अभाव था, कम्यून के पतन के बाद, बचे-खुचे ब्लांकीवादी मार्क्सवाद की तरफ उद्यत हो गये थे। ब्लांकी स्वयं एक प्रांतीय जेल में थे। वरसाय में थियर सरकार से वार्त्ता में कम्यून ने तमाम अपनी कैद से तमाम पादरियों की रिहाई के बदले सिर्फ ब्लांकी माना था लेकिन पूंजी का दलाल थियर तो वार्त्ता में विषयांतर के लिए उलझा रहा था जिससे कम्यून के खिलाफ सारे प्रतिक्रियावादियों को लामबंद कर सके। निर्वाचित चंद दक्षिणपंथियों किसी-न-किसी बहाने इस्तीफा दे दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया जब पता चला कि वे पुलिस के मुखबिर या जासूस थे। मार्क्स ने एटींथ ब्रुमेयर में लिखा था कि पूर्ववर्ती क्रांतियों ने राज्य-मशीनरी को नष्ट करने की बजाय उन्हें मजबूत किया और फ्रांस में गृहयुद्ध में लिखते हैं, “मजदूर वर्ग पहले से ही मौजूद राज्य मशीनरी पर मात्र कब्जा करके उसे अपने वर्गीय हितों के निये प्रयोग नहीं कर सकता। चूँकि उसकी राजनैतिक गुलामी का हथियार कभी उसकी मूक्ति का यंत्र नहीं बन सकता"
सत्ता संभालते ही कम्यून ने राज्य मशीनरी के सारे विशेषाधिकार खत्म कर दिए; किराया और कर्ज की अदायगी पर अप्रैल तक के लिए रोक लगा दी; बंद कारखाने कामगरों के नियंत्रण में शुरू किए गये; रात्रिकालीन काम को न्यूवतम करने तथा गरीब और बीमार के भरण-पोषण सुनिश्चित करने के प्रावधान बनाए। कम्यून ने घोषित किया कि उसका उद्देश्य समाजवादी आदर्श का प्रसार और “पूंजीपतियों के फायदे के लिए मजदूरों का आपसी अराजक प्रतिस्पर्धा का अंत करना है”।  नेसनल गार्ड में भर्ती शारीरिक रूप से सक्षम हर व्यक्ति के लिए खुली थी और जैसा ऊपर बताया गया है, उसकी संरचना पारदर्शी तौर पर जनतांत्रिक थी। खुद को लोगों से अलग-थलग और ऊपर समझने वाली सेना तथा पुलिस को अवैधानिक करार कर, भंग कर दिया गया। चर्च को राज्य से अलग कर धर्म को निजी मामला घोषित किया गया और चर्चों की बेशुमार संपत्ति जब्त कर ली गयी। प्रशासनिक अधिकारी, आम मजदूर के समान वेतन पर काम करने वाले कम्यून द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि थे, जिन्हें वापस बुलाया जा सकता था। बेघरों के लिए सार्वजनिक भवनों और भगोड़ों के अधिगृहित घर अधिगृहित किए गए। शिक्षा, प्रेक्षागृह और ज्ञान तथा संस्कृति के सारे केंद्र सार्वजनिक रूप से सभी को सुलभ करा दिए गये। विदेशी कामगरों को तुरंत ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूरों के सार्वभौमिक गणतंत्र’ के सदस्य के रूप में मान्यता दी गयी। गौरतलब है कि कम्यून के निर्वाचित सदस्यों में भी कई प्रवासी थे। सामाजिक जीवन के तमाम पहलुओं को ‘साझे हित’ में व्यवस्थित करने के लिए दिन-रात हजारों लोगों की सभाएं लिए होने लगीं। कम्यून और नेसनल गार्ड की छत्र-छाया में विकसित हो रही व्यवस्था का चरित्र निस्संदेह समाजवादी था। कम्यून की भयानकतम गलतियों में वार्साय की जवाबी हमलों को नजर अंदाज करना और केंद्रीय बैंक पर कब्जा करने की मार्क्स की सलाह को न मानना था जो थियर को कम्यून को कुचलने की तैयारी के लिए लाखों फ्रैंक मुहैया कराता रहा। लेनिन के नेतृत्व में 1917 में यह गलती बॉल्सेविकों ने नहीं दुहराया, सबसे पहले उन्होने ने बैंकों और प्रसारण संस्थानों को कब्जे में लिया था।
1848 में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा था कि यूरोप के सिर पर कम्युनिज्म का भूत मड़राता रहता है और 1871 में पेरिस कम्यून के रूप में वह भूत उन्हें साक्षात दिख गया। यूरोप के प्रतिक्रियावादी खेमें में बौखलाहट मच गयी। मार्क्स ने कम्यून को अपने संदेश में स्पष्ट किया था कि पेरिस के बाहर अड्डा जमाए प्रशियन सैनिक या तो थियर की मदद करेंगे या खुद कम्यून पर हमला कर देंगे। मार्क्स यह स्पष्ट समझ रहे थे कि सर्वहारा की इस क्रांति को पुख़्ता करने के लिए ज़रूरी है कि पेरिस की कामगारों की सेना पेरिस में प्रतिक्रान्ति की हर कोशिश को कुचलकर, बिना रुके वर्साय की ओर कूच कर जाना चाहिए था। वर्साय में ही थियेर सरकार के साथ ही पेरिस के सभी धनपशुओं ने शरण ले रखी थी। उस समय थियर की कमान में मात्र 27 हजार हतोत्साहित सानिक थे और सर्वहारा की फौज में एक लाख नेशनल गार्डस। पेरिस की नकल पर कई और कम्यून बने थे। वार्साय पर झंडा गाड़ने के बाद क्रांति को देशव्यापी बनाया जा सकता था। लेकिन किसी ऐतिहासिक मिशाल; सैद्धांतिक परिपक्वता; ठोस, संगठित नेतृत्व; ठोस स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव और घेराबंदी की अफरा-तफरी में, पेरिस का मजदूर जमीनी हकीकतों के संदर्भ में, सर्वहारा के हित में नये समाज के गठन की प्रक्रिया में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा था। इसीलिए, लगता है, कम्यून क्रांति को पुख्ता किए बिना क्रांति के बाद के समाज के ताने-बाने में फंस गया। छोटी मोटी झड़पों में वारसाय सेना द्वारा कुछ कम्युनार्डों को पकड़कर कत्ल कर देने की घटना के बाद, नेसनल गार्ड के दबाव में कम्यून ने वरसाय पर 3 मोर्चों से हमला करने का फैसला लिया। अपनी सामरिक कमजोरी को जानते हुए, थियर कम्यून से वर्तालाप का नाटक कर रहा था, और जैसा कि मार्क्स को पूर्वाभास था, कम्यून को कुचलने के लिए बिश्मार्क से गुप-चुप सौदे बाजी। और अंततः जब पुनर्गठित सेना के साथ पेरिस पर भारी तोपों के साथ हमला बोला तो राजनैतिक और सामरिक अनुभव और अंतर्दृष्टि की कमी के चलते, सर्वहारा की फौज को लड़ते हुए पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह तक पेरिस पर बमबारी होती रही, इसे इतिहास में काला सप्ताह नाम से याद किया जाता है। सेना का चरित्र वैतनिक हत्यारों सा होता है, थियर की सेना किसी विदेशी सेना का नहीं, अपनी विद्रोही जनता का। इसके बाद प्रतिक्रियावादियों ने सड़कों पर दमन का जो तांडव किया वह बेमिशाल है। पेरिस लाशों से पट गया। लगभग 30 हजार क्रांतिकारियों ने शहादत दी, जिसमें बच्चे-बूढ़े-महिलाएं सब थे। कम्युनार्ड लड़े तो भूतपूर्व बहादुरी से लेकिन सामरिक योजना में अपरिपक्वता के चलते 28 मई को 2 महीने का कम्यून पराजित हो गया। सशस्त्र दस्ते जून में पेरिस की सड़कों पर गस्त करते रहे और किसी को भी कम्यून के सहयोगी के संदेह में गोली मार देते थे। कम्यून के पतन के बाद सभी देशों में इंटरनेसनल के सदस्यों और शाखाओं पर दमन बढ़ता रहा और संगठन में टकराव, जैसा ऊपर कहा गया है, जिसके नतीजतन संगठन दो फाड़ हो गया और अंततः विगठित।

कम्यून की विसंगतियों और कार्यक्रमों की सैद्धांतिक अस्पष्टता, प्राथमिकताओं के गलत चुनाव के कारण समय और ऊर्जा की बर्बादी आदि कमियों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, उपरोक्त पेरिस कम्यून इसकी समीक्षा का तत्कालीन, प्रामाणिक और वैज्ञानिक समीक्षा है। मजदूरों के पहले अल्पजीवी राज्य के उत्थान-पतन और पतन की एक संक्षिप्त समीक्षा के साथ इस चर्चा को समाप्त करते हैं। मार्क्स ने 18 मार्च के पहले ही कहा था कि तत्कालीन, प्रतिकूल परिस्थियों में सत्ता पर कब्जा करना एक “दुस्साहसिक भूल होगी”। लेकिन इतिहास में स्वफूर्तता की अपनी भूमिका होती है। पेरिस के मजदूर महज अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि शोषण, वर्गविभाजन, सैन्यवाद और राष्ट्रोंमाद से मुक्त “एक सार्वभौमिक गणतंत्र” की। 1871 की तुलना में आज गहराते पूंजीवादी संकट के संदर्भ में विकसित और विकासशील औद्योगिक देशों में क्रांति की परिस्थियां ज्यादा अनुकूल हैं, लेकिन पहले इंटरनेसनल जैसे क्रांतिकारी संगठन की नामौजूदगी से शासकवर्ग संकट से विषयांतर के लिए नस्लोंमाद; धर्मोंमाद; राष्ट्रोंमाद का सहारा ले रहा है। आज जरूरत ऐसे समाज की ठोस बुनियाद तैयार करने की है जिसके लिए पेरिस के सर्हारा स्त्री-पुरुषों ने कुर्बानियां दीं। कम्यून, अल्पजीविता के बावजूद एक समाजवादी समाज बनाने का ईमानदार प्रयास था और क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर बन गया तथा भविष्य की क्रांतियों का संदर्भविंदु। 

ईश्वर विमर्श 42

ये देवी-देवता इतने कमजोर क्यों होते हैं की उनकी रक्षा में बेचारे भक्तों को लंपटता पर उतारू होना पड़ता है? किसी भी तरह की धर्मांधता की बात करो तो सब धमकी देंगे कि किसी दूसरे धर्म के बारे मे बात करके देखो! धर्मांधता की बेहूदगी पर ब्राह्मणवाद (क्यों कि हिंदू तो कोई पैदा नहीं होता कोई बाभन पैदा होता है कोई दलित) का एकाधिकार नहीं है। सब धर्मों की यही हाल है। सुकरात को जहर पीना पड़ा था, दार्शनिक-वैज्ञानिक ब्रूनो को चर्च के फैसले से चौराहे पर जिंदा जला दिया गया था और आस्थवान जाहिल तमाशा देख रहे थे जिस तरह गोमांस खाने के संदेह में 200 सोहदे एक 16 साल के लड़के की हत्या का तमाशा देख रहे थे, उसी तरह जैसे नस्लोंमादी जर्मन नरभक्षी यहूदियों की प्रताड़ना का तमाशा देख रहे थे । यही हाल गैलेलियो की धर्म के ठेकेदारों द्वारा हत्या की थी। इन इतिहास पुरुषों के जाहिल हत्यारों का नाम कोई जानता है?पढ़े-लिखों की जहालत देखकर शिक्षक होने पर शर्म आती है कि हम बच्चों को कैसी 'वैज्ञानिक शिक्षा' दे रहे हैं कि वे जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घना की अस्मिता से उबर नहीं पाते? हिंदू-मुसलमान से चिंतनशील इंसान नहीं बन पाते?

एक धर्म की अधोगामी प्रवृत्ति दूसरे धर्म की अधोगामी प्रवृत्ति की वैधता नहीं है। सभी धर्म आस्था की वेदी पर विवेक की बलि देने के चलते अधोगामी है, ब्राह्मण(हिंदू) धर्म सर्वाधिक अधोगामी है क्यों कि अन्य धर्मों में समानता की सैद्धांतिक संभावना है, हिंदू पैदा ही असमान होता है चूंकि इसके सर्जक ब्रह्मा हैं और ईश्वर की कृति अपरिवर्तनीय होती है। जिस धर्म का सर्जक ही अन्याय का सर्जक है उस धर्म को न्यायपूर्ण कैसे साबित किया जा सकता है। वैसे धर्म की सियासत करने वाले सारे एक जैसे जनद्रोही हैं चाहे मुहम्मद को मशीहा मानने वाले हों चाहे ब्रह्मा को सर्जक या राम को अवतार मानने वाले।

Wednesday, July 19, 2017

शिक्षा और ज्ञान 113 (भक्तिभाव)

Sandeep Yadav तुम्हारी सोच जड़मति भक्तों सी है. साल भर में मानसिक गुलामी से थोड़ा-बहुत मुक्त हुए हो। भक्त वही होता है जो दिमाग बंद कर आस्था करता हो। साल भर तुम्हें पढ़ा-पढ़-सुन कर यही निष्कर्ष निकला है कि तुम्हारी दिमागी जड़ता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें समूल नष्ट करने के लिए तुम्हें उसमें मट्ठा डालना पड़ेगा लेकिन भक्त डरपोक होता है, उसमें आत्मावलोकन का साहस नहीं होता। सोचने का साहस करो, भक्त से इंसान बनने की संभावनाएं सभी में रहती हैं।

शिक्षा और ज्ञान 112 (भक्तिभाव)

Sandeep Yadavजिसके पास भी सोचने समझने की शक्ति नहीं होती वह भक्त होता है और दिमाग बंद कर किसी का समर्थन करता है, उसे मालुम नहीं क्यों? सिर्फ तुम्हारी मोदी भक्ति से ही नहीं यह निष्कर्ष निकला है, तुम्हारी सभी बातों से। तुम मेरे स्टूडेंट रहे हो (तकनीकी तौर पर, क्लास तो तुमने 10% भी शायद किया हो) इसलिए तुम्हारी मानसिक जड़ता का ऑब्जरवेसन तुमसे शेयर कर लेता हूं, नहीं तो तुम्हारी तरह लाखों जड़मति भक्त पड़े हैं। तुमने भक्तिभाव का मानसिक दिवालियापन आत्मसात कर लिया है तो किसी संवाद की गुंजाइश नहीं है, और नष्ट करने के लिए मेरे पास समय नहीं है।

Tuesday, July 18, 2017

इतिहास की रवायत

यह आज की ही बात नहीं
इतिहास की रवायत है
करता है जो जितना भीषण रक्तपात
पहनता है उतना ही भारी ताज
बन जाता फिर देवदूत या कल्कि अवतार
हो जाती आराधना में भक्तों की भरमार
करते जो चमत्कार की प्रतीक्षा तब तक
लेता नहीं प्रभु जब तक अगला अवतार
(बहुत दिनों बाद कलम की आवारगी)
(ईमि: 19.07.2017)

Friday, July 14, 2017

मार्क्सवाद 61 (सेना)

मैं किसी सैनिक की नहीं, सैनिकतंत्र और सेना के नाम पर राष्ट्रोंमाद की बात कर रहा हूं। सभी राष्ट्रों का शासक वर्ग यही करता है। जंग कभी विदेशी कारणों से नहीं होती अंदरूनी सियासत का मामला होता है। अब तो मरणासन्न सीआई एजेंट ने भी,उस समय के अपने राष्ट्रवादी राष्टोंमाद पर अफसोस जताते हुए, वर्ल्डटॉवर विस्फोट को सीआईए प्रायोजित बताया है जिस बहाने अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और अमरीकी गरीब सैनिकों ने राष्टधर्म निभाते हुए, बच्चों-बूढ़ों समेत लाखों अफगानियों को मौत के घाट उतार दिया, जिनसे उनमें से किसी की किसी से कोई अदावत नहीं थी। जंग चाहता जंगखोर ताकि राज कर सके हरामखोर। हबीब जालिब ने लिखा है, "न तेरा घर है खतरे में, न मेरा घर है खतरे में/वतन को कुछ नहीं खतरा, निज़ाम-ए-ज़र है खतरे में." जरूरत जंगखोरी के खिलाफ जनमत बनाने की है, क्योंकि पूंजी का कोई राष्ट्र नहीं है इसलिए मजदूर का कोई राष्ट्र नहीं होता, वह अधिकारों के प्रति सचेत हो, संघर्ष न शुरू कर दे इसी लिए उसे धर्म और राष्ट्रवाद की अफीम खिलाई जाती है जिससे वह भूखे पेट राष्ट्रोंमाद और धर्मोंमाद के नशे में पड़ा रहे। लेकिन कोई भी नशा साश्वत नहीं होता, टूटता ही है और जब टूटेगा तो उसकी गूंज से ही शरमाएदारों और महंगे में श्रम बेचने वाले, शासक वर्ग की खुशफहमी में जीने वाले मध्यवर्ग में बौखलाहट मच जाएगी और मध्यवर्ग का एक तपका मजदूर होने का एहसास कर पाला बदल देगा। वह दिन कभी तो आएगा, इस नही तो अगली, नहीं तो उससे अगली ... पीढ़ी। इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होती, कभी भी आज की तरह यू टर्न ले लेती है।

Marxism 34 (Freedom)

This is a comment on a comment on my one poem on individual v/s collective freedom. I thought to share it here.

The existing liberal "freedom", which we also call the bourgeois freedom, is freedom not in association with others but in separation from others. The institution of private property creates inequalities that leads to relative freedom and unfreedom. One is sole owner of of ones' possessions and can dispose of as he/she wills without consideration to others. A is not slave and master as natural individual but in and through a society under certain social relations which he/she has entered in the process of historical development independent of his/her conscious will. One sees not realization of his/her freedom in others' freedom but its limitation.

I'll explain it with an example: A, B and C are 3 individuals. A is, let us say, a university professor like me or Dhirendra bhai. He/she has modestly very good income from public money. He has quite congenial atmosphere around him a 'happy' family; has reasonably good friends and followers, people take him seriously on fb. Though would not mind a palatial accumulation on Pandit Pant Marg and also won't mind owning a helicopter but is happy in his British period modest bunglow in the University and a Hundayi i10. Would not mind having his own holiday home in Mussoorie but is quite happy to find a place to holiday in LBS Academy or Advanced Srtudies (Shimla). He is free to write or not to; to speak or not to on any6thing; on capitalism/Communalism/communism/gender... . as long as it does not become dangerous for the system. If you ask A, is he free? Instant answer is, "of course. Is there any doubt?"

B, is let us say is a CHHOTU or BAHADUR working on a grocery shop or a Dhaba. His morning begins at 5-6 AM and day ends at 9-10 PM. He has a shelter in the shop to spend the night and something to eat. His knowledge is his acquired moralities like sex unpalliated marriage is sin; obedience to master and eldersd is virtue. His only source of entertainment and education is TV in the shop. He has no time to think aboput freedom or unfreedom. His only worry is that the Master might get angree on his some word/act and kick him out and he would be on roads again.

C is an honest, educated, unemployed man/woman with a PhD degree in his/her 30s. He/she is free to do anything. He can write/speak on communism/capital;ism/disasters in Uttarakhand/deteriorating academic level in AU and so on... But we al know he/she does not do any of these things. He feels angry with family who think he is good for nothing. He feels bitter against better off friends. .... And one evening he hangs himself from the ceiling fan for which he is absolutely free.

If you ask A that if he is free then are B&C also free? His answer would be no. Then are unfreedoms of B&C unrelated to the freedom of A? How can they be made free? By raising them to the level of A and that needs nothing less than a revolution which we seek. If B&C are unfree, is the society free? Can an individual be free in an unfree society? My answer is no. To be free, society has to be freed. Freedom in an unfree society is an illusion.
(15.07.2013)