Friday, July 24, 2026

Jantarmantar

 From the very beginning I have been maintaining that Dipke and Co. have been RSS sponsored and Wangchuk, who was released from NSA under some deal was added to the sponsored list by VK Saxena the former Lt Govenor of Delhi and presently employed on the same post in Laddhakh. But some times the inadvertent, different consequences become more substantial. The Jantar Mantar movement is no more a CJP movement but has become an independent, spontaneous peoples' movement expressing the long term popular discontent. It is expanding in different parts of the country reminding the similar expansion of Shaheenbag few years ago. The Laeft students organizations must be thanked for turning a sponsored movement to divert the massive popular discontent into national peoples' movement. I have been visiting Jantar Mantar everyday since 20 July. Gratitude to the spontaneous upsurge of the new generation. I wrote about it in SAMAYANTAR, July 2026


Answer to a question on a coment on a post regarding CJP

. There is reliable information that KJPwas planned in Boston in connivance with Rammadhav and co. to puncture the ongoing students' protests sipported by Cong and the left organizations in various cities. In normal cases one has to rum around for permission for the protest, Dipke, when after transforming his virtual meme movement into real party, came to India, he was received by, Delhi Police with advanced permission for protest. Wangchuk was released from draconian NSA, soposedly under some deal and broke his fast with saffron shawl and taking juice from ministers. These are readons for suspicios apprehensions. Dipke 's protest on 6 June took place under Police protection. Participation of AISA and other left organizations changed scene leading to spontaneous outpour of students from all over the country. At times inadvertent consequences are different and more substantial thsn the intended goals, as it hadhappened in case of Congress around 1and1/2 centuries ago. It was formed as safety volve but transformed into main platform of the anticolonial movement. Salutes to the new veneration of protesters. I have been going to the Jantarmantar almost everyday. Shall go tomorrow.As far as Wangchuk is concerned, he was introduced to Dipke by Amit Shah loyalist VK Saxena, Lt. Gov. Laddhakh and firmer LG Delhi.


Tuesday, July 14, 2026

राष्ट्रवाद

 राष्ट्रवाद विचारधारा है, अतः मिथ्याचतना

भारत में साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में उबरा था राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद की रक्षा करने के लिए
औपनिवेशिक सरकार की सेवा में लड़ते थे भारतीय सैनिक
धीरे धीरे जब उभरने लगा उपनिवेश विरोधी आंदोलन
बदलने लगी राष्ट्रवाद की परिभाषा
उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा का रूप लेने लगा राष्ट्रवाद
और इस तरह जन्मने लगा भारतीय राष्ट्रवाद
और टकराने लगे दो राष्ट्रवाद
साम्राज्यवादी औपनिवेशिक राष्ट्रवाद और साम्राज्यविरोधी भारतीय राष्ट्रवाद
पहले के पास भारतीयों की वर्दीधारी सेना थी
सैन्यविहीन भारतीय राष्ट्रवाद के पास थी निहत्थी जनता
निहत्थे भारतीय राष्ट्रवाद से आतंकित हो गया हथियारबंद औपनिवेशिक राष्ट्रवाद
और खंडित करने को भारतीय राष्ट्रवाद अपनाया बांटो राज करो की नीति
और खोज लिया हिंदू और मुसलमान वफादार दलाल
उभरते भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक ने नारा दिया हिंदू राष्ट्र का
और दूसरे ने निजामेइलाही के पाकिस्तान का
और साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद जीत गया भारतीय राष्ट्रवाद से
सांप्रदायिकता की विचारधारा बन गयी वैकल्पिक राष्ट्रवाद की विचारधारा
टुकड़े-टुकड़े हो गया भारतीय राष्ट्र और विखंडित हो गया भारतीय राष्ट्रवाद
1947व में ही बन गया मुस्लिम पाकिस्तान
हिंदू पाकिस्तान बनने में बहुत समय लग गया
और भारतीय राष्ट्र के अवशेष उसे चुनौती दे रहे हैं
वापस भारत राष्ट्र बनने में और भी बहुत समय लगेगा।

Friday, July 10, 2026

सियासत 2 (कांग्रेस में संघ का पांचवां कॉलम)

 एक पोस्ट पर कमेंट


शशि थरूर के अलावा कांग्रेस में आरएसएस का एक मजबूत पांचवां कॉलम है, और हमेशा से रहा है जिसने राजीव गांधी की राजनैतिक नातजुर्बेकारी का फायदा उठाकर कांग्रेस को डुबाने की प्रक्रिया शुरू की थी। बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और मेरठ-मलियाना-हाशिमपुरा उसी की दुर्बुद्धि से रचे गए। इसने अपना काम 1948 वमें बाबरी मस्जिद में राम लला के प्रकटीकरण से ही शुरू कर दिया था, जिसे नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व ने हवा पकड़ने से रोक दिया था लेकिन वह जमीन में दबा रहा और 1992 में ज्वालामुखी बन फूटा। मनमोहन सरकार में भी बहुत सी जनविरोधी नीतियों को पीछे इसी का हाथ है। कांग्रेस में आमूल जीर्णोद्धार के लिए व्यापक सफाई अभियान की जरूरत है, शुरुआत थरूर से होनी चाहिए।

Saturday, July 4, 2026

जनअसंतोष और काक्रोची परिघटना

 

जन असंतोष और कॉक्रोची परिघटना :

 कुछ सवाल ?

ईश मिश्र

 

आसमान छूती मंहगाई, बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के पेपर लीक होने की परिघटनाओं की बारंबारता, खेती की समस्याओ, पश्चिम एशिया में अशांति से उत्पन्न तेल और गैस संकट से बढ़ी मंहगाई के चलते जनजीवन की बदहाली आदि कारणों से जनअसंतोष व्यापक होता जा रहा है और जनाक्रोश की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। काम के बेहतर हालात, काम के आटलघंटे तथा समुचित न्यूनतम मजदूरी की मांग के लिए नोएडा-गुड़गांव मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन आर्थिक मांगों तक सीमित है, फिर भी निर्मम दमन झेल रहा है। इस तरह के स्वस्फूर्त आंदोलन भविष्य के क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन की आशा की किरण तो दिखाते हैं, लेकिन इनसे. फिलहाल, किसी क्रांतिकारी राजनैतिक बदलाव की अपेक्षा करना अव्यवहारिक है। मौजूदा  नीट की परीक्षा में पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा की गड़बड़ियों के विरुद्ध  जन-असंतोष के प्रतिरोधों के प्रति सरकार लगातार दमनात्मक कदम उठा रही है। पेपर लीक, परीक्षा माफिया की धांधलियों तथा अन्य गड़बड़ियों के विरुद्ध आंदोलनों के संचालन के लिए, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने प्रतियोगी का गठन किया। कुछ दिन पहले, अखबारों की खबर के अनुसार, आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सांसद संजय सिंह इलाहाबाद सर्किट हाउस मेंप्रतियोगी छात्र संघर्ष समितिके कुछ छात्रों के साथ पेपर लीक के मुद्दे पर बातचीत कर रहे थे कि पुलिस और प्रशासन ने यह कह कर बातचीत में व्यवधान डाला कि उन्होंने पूर्व अनुमति नहीं ली थी, तब भी वे छात्रों के साथ बातचीत करते रहे तो पुलिस और प्रशासन ने सर्किट हाउस की बिजली कटवा दी। उप्र और राजस्थान की कई जगहों पर, बेरोजगारी तथा पेपर लीक के मुदेदों पर छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस दमन होता रहा।

 

मंहगाई और काम की दयनीय हालात से तंग आकर न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने के अधिकार के लिए नोएडा और गुड़गांव तथा पानीपत, बरौनी समेत अन्य जगहों के ठेका मजदूरों का, अप्रैल के पहले हफ्ते  से जारी स्वस्फूर्त विरोध प्रदर्शन इस बढ़ते जनाक्रोश की एक स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मजदूरों के स्वस्फूर्त आंदोलन का नियोजित निर्मम दमन सुविदित है। कई मजदूर नेता  और उनके समर्थक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, कलाकार तथा छात्र, अभी भी अमानवीय परिस्थितियों में जेल की यातना झेल रहे हैं। दिल्ली के मानवाधिकार संगठन, जनहस्तक्षेप की रिपोर्ट के अनुसार, तमाम जद्दो जहद के बाद कई मजदूर नेता और आंदोलन के समर्थक जमानत पर छूट गए हैं लेकिन कई अभी भी मनगढ़ंत आरोपों में जेलों में बंद हैं। पत्रकार-लेखक सत्यम् वर्मा को लकनऊ से उठाकर गौत्बुद्धनगर केंद्रीय कारावास में बंद कर उनपर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनयम जैसे काले कानून की धाराएं मढ़ दी गयी हैं।  गौरतलब है कि अन्य जगहों के साथ, मजदूर बिगुल में जनपक्षीय लेखन करने वाले सत्यम वर्मा पर नोएडा में मजदूरों को उकसाने के आरोप लगाए गए हैं जबकि वे दशकों से नोएडा गए ही नहीं  हैं। सर्वविदित है कि सरकारें आंदोलनों पर दमन करने के लिए आंदोलनकारियो पर कभी आंदोलन के मुद्दों के आरोप नहीं लगाती बल्कि कानून-व्यलस्था के गढ़े हुए आरोप लगाती हैं। नोएडा और गुड़गांव में पुलिस द्वारा पकड़े गए सभी मजदूरों और उनके समर्थकों पर हत्या के प्रयास सहित एक से मनगढ़ंत आरोपों में एफआईआर दर्ज हैं। 

यहां मकसद मजदूर और छात्र आंदोलनों पर जारी दमन की व्यख्या या विश्लेषण नहीं है, वे अलग गंभीर व्याख्या तथा विश्लेषण के विषय हैं। इनकी चर्चा का मकसद जनअसंतोष के स्वघोषित प्रहरी, अमेरिका में ऑनलाइन गठित काक्रोच जनता पार्टी के भारत में आंदोलन की स्वस्फूर्तता पर सवाल खड़ा करना है। विरोध के प्रति बेहद असहिष्णु सरकार, अपने दमनतंत्र के प्रतीक, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को, प्रतिरोध-प्रदर्शन की अग्रिम अनुमति के साथ, काक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक के अमेरिका से भारत आगमन पर हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए भेजती है। इससे सहजबोध (कॉमनसेन्स) के किसी भी व्यक्ति के दिमाग में व्यापक जनअसंतोष के काक्रोची अभिव्यक्ति की स्वस्फूर्तता के प्रायोजित होने का संदेह स्वाभाविक है।

 

 जब छात्रों, युवाओं और मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों को देश में आम आदमी की बदहाली, शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, बेरोजगारी आदि ज्वलंत मुद्दों के चलते फैले जनअसंतोष और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति मानी जा रही है तभी भारत के स्वनामधन्य मुख्य न्यायाधीश की बेरोजगार युवाओं के लिए काक्रोच (तिलचट्टा) की उपाधि के वक्तव्य से फैले विवाद को लेकर सोसल मीडिया पर मीमों की भरमार हो गयी। मुख्य न्यायाधीश का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है तथा उनके पद की गरिमा के विपरीत। ऐसे हास्यास्पद बयान की ठिठोली या प्रहसन स्वाभाविक है। काक्रोचों के मीम का संक्रमण आभासी दुनिया से भौतिक दुनिया में हो गया। अतीत में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे और अमेरिका में रह रहे अभिजीत दिपके नामक युवक ने कुछ साथियों के साथ मिलकर काक्रोच जनता पार्टी का गठन कर दिया। जिस तरह पिछली शताब्दी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, उसी तरह देश में बढ़ते  जन असंतोष कोदिशा देनेकाक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिषेक दिपके, 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा के साथ अमेरिका से भारत के लिए निकल पड़े। लेकिन जैसा कि कहा गया कि इतिहास अगर खुद को दुहराता है तो पहली बार ट्रेजडी बन जाता है और दूसरी बार तमाशा। वैसे इतिहास कभी खुद को दुहराता नहीं, कभी कभी प्रतिध्वनित होता प्रतीत होता है और प्रतिध्वनि मौलिक आवाज नहीं होती। उल्लेखनीय है कि 6 जून, 2026 को अन्य लोगों के साथ काक्रोचों का हौसला बढ़ाने या काक्रोच जनता पार्टी के जमावड़े में जनवादीकरण की मशाल जलाने भाकपा (माले-लिबरेसन) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी दल-बल के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। हम सब जानते हैं कि विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने के लिए आम आदमी को खासकर मजदूरों और मजदूर संगठनों को एड़ी-चोटी का बल लगाना पड़ता है और यदि अनुमति मिलती भी है तो एक निश्चित अंतराल के लिए। अंतराल का उल्लंघन होने पर पुलिस सक्रिय हो जाती है। लेकिन प्रदर्शन के लिए आगमन की खबर सुनकर पुलिस के प्रतिनिधि प्रदर्शन की अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर दिपके के स्वागत में खड़े थे। पूरे प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा घेरा बनाकर पुलिस प्रदर्शनकारी नेताओं के साथ खड़ी रही।  कहा जा रहा है कि यह कॉक्रोची परिघटना भारत में जेन-जी का नमूना तथा व्यापक जनअसंतोष की स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मुझे लगता है काक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित स्वस्फूर्तता है, जिसका उद्देश्य जनअसंतोष को भटकाना तथा उसमें विचलन पैदा करना है।

दिपके और साथी काक्रोच जनता पार्टी के परचम तले 6 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद लखनऊ और पुणे में भी कार्यक्रम कर आए। जिस तरह केजरीवाल को मंच पर किसी ने चांटा मारा था उसी करह  दिपके को भी किसी ने चांटा मार दिया। लखनऊ-पुणे से दिपके फिर जंतर-मंतर पहुंचे और बोले अब तब तक नहीं हटेंगे जब तक शिक्षामंत्री इस्तीफा नहीं देते और उन्हें पुलिस ने अभी तक नहीं हटाया। जरा सोचिए यौन शोषण के विरुद्ध धरने पर बैठी कुश्ती की खिलाड़ियों को पुलिस ने घसीट घसीट कर हटाया और बंद किया था। आंदोलित किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने कंटीले बाड़ लगाने और सड़क पर कीलें गाड़ने का काम किया था। 70 से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने शहादत दी थी। लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी ने कहा कि वे तब तक नहीं हटेंगें जब तक उनकी मांगे नहीं मान ली जातीं और आज (27 जून, 2026) पांचवे दिन तक पुलिस संरक्षण में वे जंतर-मंतर पर बदस्तूर मौजूद हैं।  कॉक्रोच नेता प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों तथा किसानों का भी आह्वान कर रहे हैं। 

 

अन्ना-रामदेव-केजरीवाल ने भी समाज के सब तपकों का आह्वान किया था और उनका आह्वान अनसुना नहीं गया था।कॉक्रोचों के समर्थन में जुटी भीड़ देखकर 16 साल पहले अन्ना हजारे, किरण बेदी, रामदेव, केजरीवालों के नेतृत्व में  ‘इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी)आंदोलन में में जुट रही भीड़ याद आती है, जिसने केंद्र में कांग्रेस सरकार को हटाकर भाजपा सरकार और दिल्ली में कांग्रेस सरकार को हटाकर केजरी सरकार को स्थापित करने का काम किया था। उस समय किसी अखबार/पत्रिका या स्थापित पोर्टल में  सेना के भगोड़े अन्ना के अनशन की आलोचना छपने की गुंजाइश नहीं थी, तो फेसबुक पर उसे आरएसएस-कॉरपोरेट प्रायोजित आंदोलन लिख दिया था, तो बहुत गालियां मिलीं थी। जिस तरह आज कई वामपंथी कॉक्रोचों को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे हैं उसी तरह उस समय भी बहुत से वामपंथी भी अन्ना को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे थे। भ्रष्टाचार के आरोप कोई साबित नहीं हुए अन्ना अपने आश्रम में चले गए, किरन बेदी गवर्नर बन गयी, रामदेव व्यापार बढ़ाने में लग गए और केजरीवाल जय श्रीराम के समानांतर जय हनुमान के नारे पर सवार हो मुख्य मंत्री बन गए।   

 

पेपर लीक को मुख्य मुद्दा बनाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू कॉक्रोची प्रतिरोध की स्वस्फूर्तता मुझे प्रायोजित स्वस्फूर्तता लगती है। कई वामपंथी मित्र मेरी राय को लेनिन के हवाले से बचकाना विकार कह रहे हैं। एक स्वनामधन्य वामपंथी पत्रकार तो बहुत ही आक्रामक अंदाज में नवीनता को बर्दाश्त न कर पाने वाला दकियानूस कह दिया। ऐसी ही प्रतिक्रिया अनना हजारे के आंदोलन की आलोचना पर मिली थी। बचपन में अपने गांव में कहावत सुनी थी कि बरसात के पानी की कई धाराएं जब मिलकर  किसी बड़े जलाशय की तरफ जाने लगें तो उसके रास्ते में विचलन पैदा कर उसे कई हिस्सों में बांटकर जलाशय तक पहुंचने से रोक देना चाहिए। मुझे लगता है कॉक्रोची भटकाव जन असंतोष की धाराओं के मिलकर जलाशय बनने से रोकने के रास्ते का भटकाव है। कांग्रेस का हाल का जो भी इतिहास रहीा हो फिलहाल राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिरोध की धुरी बन रही है, दिपके के पहले  भाषण में सरकार से अधिक कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला किया गया। लगता है वाम पार्टियां और कुछ वाम बुद्धिजीवी विभ्रम की दशा में हैं। व्यापक जनअसंतोष को जनवादी दिशा देने की रणनीति उनकी समझ में नहीं आ रही है और उन्हें कॉक्रोच आंदोलन असंतोष को जनवादी दिशा देने स्वस्फूर्त एजेंट लगता है लेकिन मुझे कॉक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित लगती है। मुझे लगता है कि मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन भारत के बहुजन (कागार वर्ग) की सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का पथ प्रशस्त  करेगा और साझे संघर्षों से निकली एकता उन्हें अपने आप में वर्ग से अपने लिए वर्ग बनने में मददगार साबित होगा। 

 26.06.2026

Wednesday, June 17, 2026

मजदूर आंदोलन: दमन की दास्तान

                                                     मजदूर आंदोलन: दमन की दास्तान

 

ईश मिश्र 

कल (23 मर्ई, 2026) के अखबार में हिंदू नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गुडगांव  से जुड़ी दो  सुर्खियों पर निगाह गयी। पहली है मजदूरों के आंदोलन के दौरान नोएडा की एक फैक्ट्री मेंमजदूरों को आंदोलन के लिए उकसाने; नारेबाजी करने और हिंसा फैलाने के आरोप में, नरेश कुमार नाम के एक मदूर की गिरफ्तारी थथा दूसरी है नोएडा के एसईजे़ड ( विशेष आर्थिक जोन) की कंटीली चारदीवारी वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में 16 घंटे काम करने के बाद आइसक्रीम खाने की खाहिस रोकती एक मजदूर की कहानी। पिछले महीने मजदूरों के आंदोलन के बाद उप्र सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 13, 690 रु. प्रति माह कर दिया, जिससेे  मजदूर मुश्किल से अकेले का पेट भर पाता है, परिवार पालने की बात तो बहुत दूर है। गौर तलब है कि उप्र में पिछले 12 सालों में न्यूनतम वेतन में कोई संशोधन नहीं हुआ जबकि मंहगाई दिन-दूना, रात चौगुना की रफ्तार से बढ़ती जा रही है। 13690 रु. के बढ़े हुए न्यूनतम वेतन में भी मजदूर कैसे परिवार चलाते हैं, चिंता का विषय है।   पश्चिम एसिया में समाम्राज्यवादी यद्ध के चलते रसोई गैस के संकट ने जीना और भी मुश्किल कर दिया। नोएडा-ग्रेटर नोएडा; गुड़गांव-मनेसर के औद्योगिक इलाकों में देश के अलग अलग हिस्सों से मजदूर जीवन सवारने आए तथा नवउदारवादी पूंजीवाद के काम की अमानवीय परिस्थितियों तथा शोषण और मजदूर विरोधी नीतियों के तहत दिन रात खून-पसीना एक करके किसी तरह भरण-पोषण में लगे रहे। सरकारें जिस आकलन से न्यूनतम मजदूरी तय करती हैं, उसमें गुजारा करना मुश्किल होता है और मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के लिए भी लड़ना पड़ता है। 8 घंटे काम के दिन, ओवरटाइम का समुचित भुगतान तथा समुचित मजदूरी की मांग को लेकरै 2-3 अप्रैल, 2026 से गुड़गांव-मानेसर से शुरू मजदूरों का आंदोलन 10-11 अप्रैल तक व्यापक रूप लेता गया तथा नोएडा-ग्रेटर नोएडा तक फैलता गया लेकिन आंदोलन शांतिपूर्ण ही बना रहा। 13 अप्रैल तक हजारों मजदूर शांतिपूर्ण आंदोलन में शरीक हो गए तथा 13 अप्रैल से पुलिस ने लाठीचार्ज तथा आंसूगैस के इस्तेमाल समेत बलप्रयोग शुरू किया तथा घुसपैठियों के जरिए आंदोलन को हिंसक रूप देने का प्रयास किया जिससे आंदोलन को निर्ममता से कुचला जा सके। आंदोलन वाले औद्योगिक क्षेत्रों से लौटी फैक्ट फाइंडिंग टीमों ने हजारों मजदूरों के गायब होने की कहानियां बताई। 24 अप्रैल, 2026 को नोएडा-ग्रेटर नोएडा तथा  17 मई 2026 को गुड़गांव गयी जनहस्तक्षेप की फैक्ट फाइंडिंग टीम को भी यही जानकारी मिली। कुछ मजदूर प्रतिनिधियों और गिरफ्तार मजदूरों के परिजनों ने बताया कि  पुलिस ने मजदूरों की बस्तियों में घरों में घुस कर, बिना कोई अरेस्ट वारंट दिखाए जबरन गिरफ्तारियां की। गिरफ्तार लोगों में बेलसोनिका ऑटोकंपोनेंट कंपनी मजदूर यूमियन मानेसर के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह भी थे जिन पर अन्य आरोपों के साथ हत्या के प्रयास का आरोप भी लगा है। गिरफ्तार मजदूरों के परिजनों और साथियों ने बताया कि सभी मजदूरों पर एक से आरोप हैं। मावाधिकार कार्यकर्ता तथा जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद जैसे लड़कों को बिना मुकदमे के, जमानत नियम और हिरासत अपवाद के न्यायिक सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते हुए, पांच साल से अधिक समय से बंद किया हुआ है, इस लिहाज से, लगता है मजदूरों के साथ नरमी बरती जा रही है। अजीत को एक महीने की ही हिरासत के बाद  ही गुडगांव की जिला अदालत ने जमानत दे दी। पुलिस द्वारा  अजीत के खिलाफ गिनाए आरोपों में ये नारे भी हैं, ‘ अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’, तथा इंकिलाब जिंदाबाद। गौरतलब है कि भगत सिंह और साथी इंकलाब जिंदाबाद नारा लगाते हुए फांसी का फंदा चूमे थे। अजीत के साथ ही पुलिस द्वारा पकड़े गए मजदूर श्यामबीर और हरीश की जमानत की खबर अभी तक नहीं है। 

जेल में बंदी मजदूरों से उनके परिजनों और मित्रों के मिलने-जुलने पर काफी पाबंदियां है, कैदियों को बाहर से खाने-पीने या टूथ पेस्ट जैसी दैनिक उपयोग की चीजें नहीं पहुंचायी जा सकतीं, कैदियों को उन्हें जेल की कैंटीन से मंहगे दामों पर खरीदना होता है। पूंजीवाद दोगली व्यवस्था है, यह जो कहती है कभी नहीं करती और जो करती है कभी नहीं कहती। आंदोलनों में गिरफ्तारियों में पुलिस कभी आंदोलन के मुद्दों के या राजनैतिक प्रतिरोध के आरोप नहीं लगाती बल्कि आंदोलन के मुद्दों को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर तोड़-फोड तथा हिंसा फैलाने के मनगढ़ंत आरोप लगाती है। नोएडा में मजदूरों के आंदोलन के लिवलिले में कुछ बहुत ही हास्यास्पद राजनैतिक गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें से एक ऐसी गिरफ्तारी यूएनआई के पूर्व पत्रकार तथा लेखक सत्यम वर्मा की है। सत्यम वर्मा लखनऊ स्थित जनचेतना पुस्तक आंदोलन से जुड़े हैं तथा मजदूर बिगुल पत्रिका में कभी कभी लिखते हैं। सत्यम को नोएडा गए कमटसेटकम 2 दशक तो हुए ही होंगे। लखनऊ में जनचेतना परिसर की तलाशी लेने के बाद वहां से पुलिस ने जानी-मानी कवि कात्यायनी और सत्यम को पूछ-ताछ के नाम पर पुलिस ने उठा लिया तथा इनके लैपटॉप और फोन जब्त कर लिए। कात्यायनी को तो छोड़ दिया गया लेकिन सत्य को गिफ्तार कर नोएड़ा जेल ले आया गया तथा उन्हें एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) की धाराओं में बंद कर दिया गया। श्रृष्टि गुप्ता नामक दिल्ली की एक कलाकार को नोएड़ा के बोटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टोसन से गिरफ्तार कर लिया गया। श्रृष्टि ने आंदोलन के समर्थन में एक प्रदर्शन में भाग लिया था तथा एक नुक्कड़ नाटक में। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को भी नोएडा आंदोलन में हिंसा भड़काने के आरोप में 13अप्रैल से बंद कर रखा है। आकृति की जमानत सिप्रीमकोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि उसे जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट  जाना चाहिए। 


इस पूरे कांड में पुलिस और राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उट रहे हैं तथा उनके तर्क संदेहास्पद हैं। मजदूरों का आंदोलन शांतिपूर्ण था, वे शांतिपूर्ण तरीके से न्यूनतम मानवीय गरिमा के साथ जीने भर की मजदूरी के लिए आंदोलित थे, पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसूगैस के प्रहार से आंदोलन को बलपूर्वक  तोड़ना शुरू किया। नोएडा-ग्रेटर नोएडा तथा गुड़गांव में कई उद्य़ोगों के मजदूरों ने बताया कि कंपनियों के रातकी शिफ्ट के मजदूरों को प्रबंधन और पुलिस ने इस तर्क पर बाहर नहीं निकलने दिया कि वे बाहर जाकर आंदोलन में  शामिल हो जाएंगे तथा इसी मानसिकता से प्रबंधन और पुलिस ने दिन की पारी के मजदूरों को अंदर जाने से रोका। अंदर के मजदूर अंदर से और बाहर के मजदूर बाहर से धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए। पुलिस ने बलपूर्वक आंदोलन तोड़ना शुरू कर दिया। पुलिस ने सड़क पर बैरीकेड लगा दिया , ट्रैफिक रुकने से अपरा-तफरी मच गयी और भीड़ में से कुछ लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दिया। अपरातफरी में पता ही नहीं चला कि पत्थरबाजों में कितने आंदोलनकारी थे, कितने पुलिस एजेंट और कितने आम जन तथा पुलिस को बल प्रयोग तथा आंदोलन के समर्थकों और सरकार के आलोचकों के दमन का अतिरिक्त बहाना मिल गया। दो दिन पहले गुड़गांव की अदालत से जमानत पाए अजीत समेत गिरफ्तार आंदोलनकारियों तथा समर्थकों पर हत्या का प्रयास समेत गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। अप्रैल में जब हम गौतमबुद्ध नगर जेल के जेल अधिकारियों से मिले तो उन्होंने बताया कि ज्यादातर आंदोलनकारी मजदूरों को छोड़ दिया गया था कुछ को छोड़कर जिनपर गंभीर आरोप थे और यह समधना मुश्किल नहीं कि गंभीर आरोप हत्या के प्रयास और आगजनी जैसे होते हैं, जैसा कि गुड़गांव के मजदूरों ने बताया था। जैसा कि समयांतर के पिछले अंक के  मजदूर आंदोलन के लेख में रेखांकित किया गयीा है कि आदित्य आनंद जैसे  तथाकथित मास्टर माइंड सोसल  मीडिया पर मजदूरों से शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील कर रहे थे। इस आंदोलन में एक अच्छी बात यह देखने को मिली कि आंदोलित मजदूर किसान आंदोलनों से भी संपर्क बना रहे हैं। 


आंदोलन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली यानि गुडगांव-हरयाणा की हदों सै निकल अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में फैल रहा है, दमन भी बढ़ रहा है और उसका प्रतिरोध भी, उम्मीद है स्वस्फूर्त आंदोलन की चेतना संगठित सर्वहारा चेतना में तब्दील हो राष्ट्रीय सर्वहारा आंदोलन का पथ प्रशस्त करेगा। 



Tuesday, June 16, 2026

सियासत 1 (राहुल का भाषण)

 इंडिया ब्लॉक की बैठक में राहुल गांधी के भाषण पर एक पोस्ट पर कमेंट:


राहुल की राजनैतिक अर्थशास्त्र की समझ थोड़ा कमजोर है वरना वे प्रमुख और गौड़ अंतर्विरोध का अंतर समझते और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में ऐसा बयान न देते। वैसे उनके वक्तव्य का मुख्य संदेश कि फासीवाद से निपटने के लिए चुनाव नहीं आंदोलन ही विकल्प है। चुनाव आयोग समेत सारी संवैधानिक संस्थाओं पर आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। और आज के हालात में कांग्रेस की धुरी के गिर्द संयुक्त मोर्चा ही विकल्प है। इससे इतर मेरा मानना है कि आज के हालात के जिम्मेदार हम वामपंथी ही हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां क्रांति की तैयारी के कार्यक्रमों को तिलांजलि देकर पूर्णतः चुनावी पार्टियां बन गयीं। चुनाव का इस्तेमाल, संख्याबल को जनबल में तब्दील करने के लिए सामाजिक चेतना के जनवादीकरण के साधन के रूप में करना था लेकिन जब साधन ही साध्य बन जाए तो हार निश्चित है। पश्चिम बंगाल में 32 साल शासन में रहने के दौरान सीपीएम ने सामाजिक चेतना के जनवादीकरण के कार्यक्रम चलाने की बजाय अन्य पार्टियों की तरह शासन ही करती रही और इसका संख्यीबल पहले टीएमसी में चला गया और फिर बीजेपी में। हम वामपंथियों को गहन आत्मावलोकन, आत्ममंथन और आत्मालोचना की जरूरत है। उम्मीद है पुरातन पड़ गई संरचनाओं की जगह नई संरचनाएं पनपेंगीं, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में एक नए वामपंथी नवजागरण की जरूरत है -- एक नए इंटरनेसनल की, जिसके लिए, भारत जैसे देश में, जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसी मिथ्या चेतनाओं से मुक्ति पूर्व शर्त है।

Saturday, June 13, 2026

 Satyendra Kumar "छलावा है पूरा भाषण,केरल की कम्युनिस्ट पार्टी से इनका विरोध है,सब यह भूल जा रहे हैं कि साम्राज्यवाद,नवउदारवाद की लड़ाई कांग्रेस नहीं लड़ सकती,बीजेपी को स्पेस कांग्रेस ने दिया,सारे गैरलोकतांत्रिक तरीके से राज्य का संचालन इसने किया,कम्युनिस्ट फिर भी बीजेपी के खिलाफ अपना वैचारिक और राजनीतिक आंदोलन चला रहे हैं"


आपकी बात पर मेरी राय यह है कि सही है कि लड़ाई साम्राज्यवाद, नवउदारवाद की नहीं उनके विरुद्ध है और वह लड़ाई कांग्रेस, ही नहीं कोई चुनावी पार्टी नहीं लड़ सकती बीजेपी को स्पेस कांग्रेस ने नहीं दिया, वह आरएसएस की संसदीय शाखा है। आरएसएस का निर्माण स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को तोड़ने को लिए औपनिवेशिक शह पर हुआ।