Saturday, September 26, 2026

मजदूरों के दमन की दास्तान

 मजदूरों के दमन की दास्तान


ईश मिश्र


आधुनिक राज्य पूंजीपति वर्ग के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी समिति है।  – कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स


सुविदित है कि अप्रैल, 2026 में नोएडा, गुड़गांव तथा अन्य औद्योगिक शहरों में मजदूरों ने काम की मानवीय स्थितियों और जिंदा रहने लायक मजदूरी के लिए शांतिपूर्ण हड़ताल की थी। 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट सेनिफेस्टो में लिखे उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि इतिहास के हर मोड़ पर होती रहती है। ताजा उदाहऱण, अप्रैल, 2026 के मजदूर आंदोलन का दमन है। जब भी मजदूर पूंजीपतियों से काम की न्यूनतम मानवीय स्थितियों और जीने की न्यूनतम जरूरतों भर की मजदूरी की मांग करता है तो पूंजीपतियों के हितों की रक्षा और मजदूरों के दमन और प्रताड़ना में राज्य मशीनरी उनसे आगे रहती है। 11 अप्रैल को मनेसर (गुड़गांव) के बाद जब मजदूरी में बढ़ोत्तरी और काम की स्थितियों की बेहतरी की मांग के साथ मजबूरन हड़ताल शुरू किया तो राज्य मशीनरी पूंजीपतियों की सेवा में, आंदोलनकारी मजदूरों और उनके समर्थन में उठी आवाजों के दमन में कर्तव्यपरायणबोध के साथ सक्रिय हो गयी।  मजदूरों के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करके दमन की परिस्थितियां तैयार करने के उद्देश्य से पूंजी पतियों के कारिंदों और पुलिसिया घुसपैठियों ने हिसा भड़काने की कोशिश की। (समयांतर, क्रमशः मई और जून, 2026) नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेसन से गिरफ्तार, आंदोलन के पक्ष में आवाज उठाने वाली, युवा कलाकार, श्रृष्टि के घर में फर्जी सबूत गढ़ने के पुलिस के प्रयास सीसीटीवी कैमरा में के फुटेज में आ गया। कैमरा देख पुलिस वालों ने फर्जीबाड़ा बंद कर दिया और कैमरा तोड़ने की कोशिश की। आंदोलन की शुरुआत के दिन, 11 अप्रैल को ही नोएडा की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि आंदोलन के ‘मास्टर माइंड्स’ को दबोचने का उनके पास पर्याप्त मसाला है तथा घरों और कारखानों से मजदूरों तथा मेट्रो स्टेसनों, सार्वजविक स्थलों एवं दफ्तरों से मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने वाले एक्टिविस्टों की गिरफ्तारियां होती रहीं। यह अलग बात है कि वे अभी तक  अदालत में कोई सबूत पेश नहीं कर पाईं। वैसे, भारत और उ.प्र. की नशासक पार्टी, भाजपा से इनके करीबी संबंध भी चर्चा में हैं। इनके पति, भाजपा के विधायक हैं और नोएडा की जिलाधीश मेधा रूपम बहुचर्चित केंद्रीय चुनाव आयुक्त, श्री ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं। 


सिद्धांतः स्वायत्त और स्वतंत्र समझी जाने वाली न्यायव्यवस्था का भी, व्यवहार में वही चरित्र होता है जो राज्य, यानि सरकार का। अपवाद स्वरूप. कभी कभी कुछ न्यायाधीश सिद्धांत को व्यवहार में भी लागू करते हैं और जगे जमीर की मिसाल पेश करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को 11 अप्रैल को मजदूरों के आंदोलन के सिलसिले में नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार किया और जमानत की संभावनाओं को निरस्त करने के लिए 13 मई को उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं थोप दी हैं। यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक, सत्यम वर्मा को 17 अप्रैल को, जनचेतना के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया। सत्यम वर्मा ‘मजदूर बिगुल’ अखबार में मजदूरों के पक्ष में लिखते रहे हैं। उन पर भी रासुका की धाराएं थोप दी गयी हैं, उनका मामला अभी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। गौर तलब है कि सत्यम दशकों से नोएडा गए ही नहीं हैं। 2 सितंबर, 2026 को इलाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव ने नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में अद्भुत और अभूतपूर्व फैसला सुनाया। इन जजों ने आकृति पर फर्जी, मनगढ़ंत आरोप लगाने और दुर्भावना से मजदूरों को प्रताड़ित करने के लिए उप्र पुलिस तथा नोएडा प्रशासन को तगड़ी फटकार लगाते हुए, रासुका के तहत आकृति की हिरासत को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया तथा उसे अवैध रूप से जेल रखने के 5 लाख मुआवजे का फैसला सुनाया। फैसले में जिलाधीश महोदया को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की पद के सपथ के उल्लंघन दोशी बताया गया और मुआवजे की रकम की वसूली उनके वेतन से करने का अभूतपूर्व निर्देश दिया। 


आकृति पर रासुका की संस्तुति करते समय नोएडा की जिलाधीश ने चिंता जताया था कि आंदोलन से औद्योगिक क्षेत्र की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और निवेश बाधित होगा। जिलाधीश महोदया को जिले की जनता और मजदूरों की नहीं पूंजीपतियों के हितों की चिंता है। 


 जिलाधीश के विरुद्ध न्यायलय   इस फैसले पर निजी चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार, मित्र ने कहा कि वह (मेधा रूपम) इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाएंगी और उसके पिता की ही तरह सरकार के हितैषी मुख्य न्यायाधीश, सूर्यकांत उन्हे राहत दिलाने का कुछ जुगाड़ जरूर करेंगे। उनकी बात सही निकली। मुख्य न्याधीश ने शीघ्रता दिखाते हुए उनके मामले को बारी के पहले ही सूचीबद्ध कर लिया और रोस्टर का उल्लंघन करते हुए, चुनाव आयोग के वकील रह चुके, न्यायाधीश महेश चंद्र शर्मा की पीठ में भेज दिया, जिसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  फैसले की प्रतिकूल टिप्फणियों और जुर्माने पर अंतरिम स्थगन का आदेश दिया। वायर   में छपी एक खबर के अनुसार वकीलों के संगठन  “लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सीजेआई सूर्यकांत को पत्र लिखकर नोएडा डीएम मेधा रूपम की याचिका को मौजूदा रोस्टर से अलग पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने पर सवाल उठाए हैं. संगठन ने मामले की विशेष तौर पर सूचीबद्ध करने, सुनवाई की ऑडियो-वीडियो फीड सीमित किए जाने को लेकर चिंता जताई है. याचिका छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की रासुका के तहत हिरासत से जुड़े मामले से संबंधित है.”  देश में, खासकर देश के युवाओं और मजदूरों में, मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध भी जनमत बन रहा है, जो कभी भी जनअसंतोष और जनाक्रोश में तब्दील हो सकता है। यहां भारत की प्रशासनिक या न्याय व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की न गुंजाइश है, न जरूरत, वे तो अलग-अलग  व्यापक विमर्श के विषय हैं। मकसद यह बताना है कि आधुनिक यानि पूंजीवादी राज्य अपने विभिन्न अंगो के माध्यम से   में पूंजीपतियों के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी संस्था है। 


गौरतलब बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आ पायी है, क्योंकि रासुका की गिरफ्तारी निरस्त हुई है और भी कई मामले हैं, कुछ में जमानत हो गयी है, कुछ में बाकी है। आधुनिक राज्य का दोगलापन है कि वह कभी भी राजनैतिक आरोप नहीं लगाता बल्कि आंदोलन का राजनीति का अपराधीकरण करता है। नोएडा और गुड़गांव में फैक्ट फाइंडिंग के दौरान जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों की गिरफ्तारियों और एफआईआर में दर्ज आरोपों में अद्भुत समानता देखने को मिली। ज्यादातर आरोपपत्रों में एक आरोप हत्या का प्रयास था। सभी पर कई कई मामले दर्ज हैं। हर मामले की अलग अलग जमानत की कोशिश करनी पड़ती है। 500-600 रु. की दिहाड़ी करने वाले मजदूर के लिए 50 हजार की जमानत का प्रबंध मुश्किल होता है। 25000 की जमानत की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान थी, 50000 की जमानत में सत्यापन की प्रक्रिया में बहुत समय लग जाता है। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता  ने बताया कि बहुत से मजदूर जमानत के बावजूद, जमानती के सत्यापन प्रक्रिया की झंझटों के चलते अभी जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं।

आंदोलन से मजदूरों को बहुत ठोस फायदा नहीं मिला, जो भी नाममात्र की वेतन वृद्धि हुई वह मंहगाई में बढ़ोत्तरी की तुलना में बहुत कम है। इस आंदोलन से जो ठोस फायदा हुआ है वह है भविष्य में ज्यादा संगठित संघर्ष की उम्मीद बनी है। मुर्दा माहौल में ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों का आंदोलित होना आशा की एक किरण है कि इन संघर्षों मजदूरों के भविष्य के संघर्षों की प्रेरणा मिलेगी और संघर्षों के दौरान साझे हितों की चेतना विकसित होगी और मजदूर संगठित हो ‘अपने आप में’  वर्ग से ‘अपने लिए’ वर्ग बनेगा। उम्मीद करते हैं कि मजदूरों के संघर्ष के इतिहास की गाड़ी आगे बढ़ेगी।     


जंतर मंतर 3

 ज्ञानेश तो प्यादा है, लगता है, कॉक्रोचों को प्रतिरोध की राजनीति पर राहुल गांधी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाया गया है।


प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, वास्तविक मांग तो शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की होनी चाहिए थी, प्रधान की जगह ज्यादा दकियानूस, स्त्रीविरोधी बलात्कार समर्थक प्रहलाद जोशी आ गया है। ज्ञानेश जाएगा कोई इससे भी बड़ा खिलाड़ी आजाएगा। "सिर्फ हगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, ......... हमारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। इंकिलाब जिंदाबाद।

Tuesday, September 22, 2026

जंगलराज

 


यूपी में अपराधियों की बोलती तूती है
सत्ता में बैठे सबसे बड़े अपराधी हैं
कानून व्यवस्था जिनके पैरों की जूती है
जैसा देखा सबने जंतरमंतर पर
कुछ अपराधी सादे कपड़ों में होते हैं
कुछ खाकी वर्दी में सितारे टांके रहते हैं
कुछ शूट-बूट में रहते हैं
और कुछ गेरुआधारी हैं
बिहार तो नाम का जंगलराज
यूपी में जंगलराज का नाम है रामराज
दिल्ली दोश का राजधानी है
जंगलराज की रानी है
23.09.2026

Saturday, September 19, 2026

knowledge

 Key to any knowledge is questionng; questioning

 anything and everything beginning with one's own 

minset.

Words

 Words acqiure meaning through 

tone/connotation/inntent and the context.

Friday, September 18, 2026

सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा
जब जनअदालत इतिहास पर फैसला देने बैठेगी

बजरंगी नाज़ियों के गुनाहों पर बहस होगी
और इन बजरंगी नाजियों के हर गुनाह की सजा मुर्रर होगी।

Friday, September 11, 2026

बेतरतीब 192 (बचपन)

 हमारे बचपन में हमारे गांव में पहला शहरी खेल वॉलीबॉल ही पहुंचा था, गांव के खेल (कबड्डी, झाबर, शुटुर्र या शुर्र, लखनी, गुल्ली डंडा आदि) तो थे ही। उस समय (1960-67) ब्लॉक में गांव स्तर पर युवक मंगल दल की खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिताएं होती थी। वॉलीबॉल में हमारे गांव की टीम ब्लॉक के अन्य गांवों में खेलने जाती थी और दूसरे गांवों की टीम हमारे गांव में आती थीं। ग्रामीण खेलों में टीमें बन जाने पर दोनों टीमों के कप्तानों (कुछ और कहा जाता था, भूल गया) के बीच गोंटी या पत्ता से लॉटरी से तय होता था कि मैं किस टीम में रहूं। एकाधबार ऐसा हुआ कि छुआ गया कि नहीं पर टीमों में झगड़ा हो जाता और खेल बंद होने की नौबत आ जाती। मुझे लगता कि खेल ही तो है चलता रहनी चाहिए और मेरा मामला होने पर, छूने या छुआ जाने के विरोधी टीम के दावे को मान लेता। इसलिए दोनों टीमों में मुझे बोझ ( Liability) समझा जाता था। 1967 में हाई स्कूल (कक्षा 9-10) की पढ़ाई करने जब शहर चला गया तब भा गांव आने पर अपने से जूनियर लड़कों के साथ खेलता, तब दोनों ही टीमें मुझे अपनी टीम में शामिल करने को तैयार रहतीं। अब तो गांव के काफी खेल खत्म से हो गए हैं, सभी आयु समूह के लड़के क्रिकेट ही खेलते हैं।