Monday, November 20, 2017

Footnote 10 (The listing)

I read it 2nd time, but I had been in such an unprecedented state of mind that can't be defined, I will respond to it later as this moral mob lynching has inflicted so deep wounds not only intellectually but physically also. I didn't get in such a suicidal state because of the list but reactions of some friends who know me at par, I have no grudge against them taking their reactions as accumulated reactions to totality of the anti-woman social ambience and probably they really don't know how much loss has caused to me, my readers and my students. Right now I would say just that I have been an instinctive feminist watching my grandmother and mother and when I could not successfully rebel against my child marriage under inadvertent emotional blackmailing from them. The marriage with someone whom I had not seen and did not know anything about her for the next 3 years till our Gavna. Marriage was not my choice but living the marriage was my choice as if 2 people are victims of some social custom, one co-victim should not further victimise the more co-victim, as women are more co-victim in a patriarchy. That was a instinctive feminism of a 16 year old village boy.subsequent feminism has been a politically conscious one, my daughters are witness. My students across the batches, though I try to wary them, have been flocking around and trying to console me. They have been my strength to get out of the suicidal state. I shall write a philosophical note after I have fully survived from this moral mob lynching. But those who not trusting their own experiences with me, have made fatal comments that pushed me into suicidal state of mind. This is a sentimental reaction, if it hurts anybody, I ask their forgiveness. I thank all my students from various batches who have shown their solidarity, particularly to a 2001 batch student who commented on my Outlook interview that defined me as a teacher, which was revelation to me.

मार्क्सवाद 92 (लेनिन-ट्रॉट्स्की)

यह सामंती, प्रतिक्रियावादी, विकृत पूंजीवाद है। मैंने पहले भी कहा था कि अभी स्टालिन-ट्रॉट्स्की विवाद में फंसे बिना हम आज की परिस्थिति की मार्क्सवादी परिप्रक्ष्य से समीक्षा करें और उस हिसब से कार्यनीति बनाएं। रोजा लक्ज़ंबर ने 1918 में रूसी क्रांति पर अपने कालजयी लेख में लिखा है कि रूस की खास परिस्थितियों में अपनाई गई रणनीति को अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा क्राति के सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में नहीं पेश किया जाना चाहिए। लेकिन सीपीयसयू समेत कॉमिंटर्ऩ के तत्वाधान में बनी दुनिया की सभी पार्टियों ने रोजा की सलाह को नज़र-अंदाज किया और ऐतिहासिक संदर्भ विंदु और प्रेरणाश्रोत की बजाय रूसी क्रांति को सार्वभौमिक मिशाल मान लिया। मार्क्स ने 1848 में सशस्त्र वर्गसंघर्ष का आह्वान किया था लेकिन 1864 में प्रथम इंटरनेसनल के उद्बोधन में उनका तेवर बदला था, जिसके बारे में मार्क्स ने एंगेल्स को सफाई देते हुए लिखा कि सर्वस्वीकृति के लिए स्वर नरम है। 'हमें भाषा में नरम होना चागिए और कार्रवाई में सख्त क्योंकि 1848 सी क्रांतिकारी परिस्थियां कभी कभी बनती हैं। रूसी क्रांति तक पेरिस कम्यून की क्रांति का संदर्भ विंदु था। लेनिन ने 1871 की क्रांति के तरीके नहीं अपनाए, गलतियों से सीखा और सबसे पहले बैंकों और संप्रेषण संस्थानों पर कब्जा किया। निश्चित ही स्टालिन के पास लेनिन सी अंतर्दृष्टि नहीं थी फिर भी अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में स्टालिन ने जो किया या हमारे भारतीय वैचारिक पुरखों ने जो किया उसकी आलोचनात्मक समीक्षा होनी चाहिए, निंदा नहीं। रूसी क्रांति सामंतवाद और नवजात पूंजीवाद दोनों के विरुद्ध एकमुस्त थी। बुर्जुआ डेमोक्रेसी अल्पजीवी रही। क्रांति में, खासकर गृहयुद्ध और पूंजीवादी देशों के 'सफेद सेना' के समर्थन से जो विकट परिस्थितियां थीं, उनमें स्टालिन और ट्रॉट्स्की दोनों के सराहनीय योगदान हैं। सोवियत संघ, आर्थिक और सामरिक शक्ति स्टालिन के ही नेतृत्व में बना। स्टालिन की गल्तियों को अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और खतरों के परिप्रक्ष्य में देखना चाहिए।

Saturday, November 18, 2017

बेतरतीब 23 (बचपन 2)

बचपन की यादों के झरोखे से 2
ईश मिश्र

बचपन की बहुत बातें तो नहीं याद रहतीं कुछ रह जाती हैं। वैसे भी राजनैतिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े एक दूर दराज के गांव के बच्चों की दुनिया ही कितनी बड़ी होती थी? मेरे गांव के पश्चिम छोटी नदी (मझुई) बड़े बीहड़ों के पार एक गांव है मौलानीपुर। वहां बड़े बड़े कंकड़ीले टीले और छोटी-छोटी घाटियों से होती बहुत बचपन की यात्राओं में सोचता था पहाड़ कुछ इसी का व्यापक रूप होता होगा। दर्शनाथ गांव के ‘मेले’ के साथ विंध्याचल की पहली यात्रा तक यही धारणा बनी रही। तथ्यात्मक आत्मकथा के कई खतरे होते हैं। पहला तो अपनी बेवकूफियों और गलतियों, तकनीकी अवैधानिकताओं के सार्वजनिक होने का दूसरा जाने-अनजाने किसी की भावनाओं को आहत करने का। लेकिन मुक्तिबोध ने कहा है कि ‘उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे......’। पहला खतरा मेरे लिए तो कोई खतरा नहीं है, मेरे परिजन नाराज हो सकते हैं। मैं अपने बच्चों को सिखाने की कोशिस करता हूं कि जब भी लोकप्रियता और सही में चुनाव करना हो तो सही चुनो, अलोकप्रियता अस्थाई होती है; आसान और सही में सही चुनो, कठिनाइयां सरल हो जाएंगी या अप्रभावी। जिस वर्णन से किसी की छवि का सवाल होगा वहां नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि बच्चे न नैतिक होते हैं न अनैतिक, वे आत्म-संरक्षण की स्वाभाविक प्रवृत्ति से ओत-प्रोत मासूम जीव होते हैं, नैतिक-अनैतिक वे समाज में, समाजीकरण के दौरान बनते हैं। बाकी यादें और मेरी उस समय की सामाजिक रिश्तों की अपनी समझ की यादों की चर्चा बाद में, अभी स्कूल प्रकरण पूरा कर लूं।
पांचवीं की परीक्षा की कहानी बाद में पहले स्कूल का थोड़ा वर्णन। जैसाकि पहले भाग में बताया गया है कि शिक्षकों का संबोधन जाति आधारित था। ब्राह्मण शिक्षक – पंडित जी; क्षत्रिय – बाबू साहब अन्य जातियां -- मुंशी जी और मुसलमान – मौलवी साहब। इन संबोधनों से मुंशी जी और मौलवी साहब को भी कोई परेशानी नहीं थी। मार्क्स ने कहा है कि शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं, पूंजीवाद माल का ही नहीं विचारों का भी उत्पादन करता है और युगचेतना या विचारधारा का निर्माण करता है। विचारधारा शोषक और शोषित दोनों को प्रभावित करती है। सिर्फ पिता जी ही मां की आज्ञाकारिता को अपना अधिकार नहीं मानते थे बल्कि मां भी उसे कर्तव्य समझती थी। मैंने मानवीय संवेदन और सम्मान की भावनाएं, लगता है, दादी और मां से सीखा है और भूत-प्रेत से न डरना मां से। भूत-प्रेत की कहानियां बाद में कभी सुनाऊंगा। न सिर्फ सवर्ण को मुसलमान मित्र के लिए अलग बर्तन की व्यवस्था सही लगती थी, मुसलमान मित्र को भी कोई असहजता नहीं होती थी। वर्ण-व्यवस्था में दरार पड़ना शुरू हुआ था लेकिन दरार बहुत पतली थी। चमार-यादव-धोबी-लोहार-धुनिया-.. लड़के भी स्कूल जाने लगे एकाध लड़कियां भी, हालाकि भौतिक परिस्थियों के चलते बहुत आगे नहीं जा पाते थे। मुंशी (राम बरन) जी जब तक प्रधानाध्यापक थे तब तक दलित बच्चों का विशेष उत्पीड़न नहीं था। मुंशी जी का व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली था, मुझे उन्होने पढ़ाया नहीं, लेकिन तीनों गुरुओं में मैं उनकी सबसे अधिक इज्जत करता था, गुरु-अवमानना न माना जाय तो बाबू साहब का सबसे कम। मैं जब तक ‘सीनियर’ (4) क्लास में पहुंचा (1963) वे रिटायर हो गए। राम बरन मुंशी जी रिटायर हुए तो एक और मुंशी जी (रमझू राम) आ गए। उनकी जो छवि है दिमाग में – चकाचक धुला, प्रेस किया धोती-कुर्ता, करीने से कंघी किए बाल हल्की मूंछों वाले एक स्मार्ट युवक की। उनकी सहजता और बच्चों के साथ मित्रता मुझे बहुत अच्छी लगती थी। मुझे तो पढ़ाया नहीं, लेकिन मैं कभी-कभी बात कर लेता था। बाबू साहब का व्यवहार परोक्ष नहीं, प्रत्यक्षतः अवमानना का था। मुझे अच्छा नहीं लगता था, लेकिन प्रतिकार की न समझ थी न साहस। छुटके दलित बच्चों को मारते हुए भगाते थे कि चमार-सियार सब पढ़ लेंगे तो हल कौन जोतेगा? अगर कोई आ गया तो कहते थे, ‘भागो कहां तक भागोगे?’ अब कोई 5-6 साल के दलित बच्चे की बात मानेगा कि ‘सम्मानित’ बाबू साहब की? उनकी स्कूल से भागते बच्चों को पकड़-पकड़ पढ़ाने वाले शिक्षक की छवि बन गयी। अच्छा तो नहीं लगता था लेकिन मन को उद्वेलित नहीं करता था। मैं ब्राह्मण बालक था। भूमिका पहले ही लंबी हो गयी, लेकिन रामबरन मुंशी जी के बारे में थोड़ी सी बात की लालच छोड़ नहीं पा रहा हूं। आठवीं के बाद जब शहर चला गया तो घर आते-जाते मुंशी जी पवई चौराहे पर चाय की अड्डबाजी करते दिख जाते थे, सामने स्टूल पर बीड़ी का बंडल और माचिश होती। पहली बार जब पवई चौराहे पर मुंशी जी से मुलाकात हुई (1967-68), तत्कालिक प्रतिक्रिया में मैंने लपक कर उनका चरण स्पर्श कर लिया। मुझे सब ‘पंडितजी’ (पिताजी) के बेटे के रूप में जानते थे। आस-पास के लोग भौंचक्के होकर देखने लगे जैसे कोई अजूबा हो गया हो! मुंशीजी ने उठाकर गले लगाते हुए कहा, “क्यों नर्क में भेजना चाहते हो?” मुंशी जी पतुरिया जाति के थे। गुरर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु .... वाले समाज में गुरु का चरणस्पर्श चौराहे की खबर बन गयी। 1968-69 तक मां-बाप; बाबा-अइया...... को छोड़कर, जिनके चरणस्पर्श की बचपन से आदत थी, गुरूबाबा समेत सभी का चरणस्पर्श बंद कर चुका था लेकिन चौराहे पर जब भी मुंशी जी दिखते मैं उनका चरण स्पर्श जरूर करता। गुरू को ब्रह्मा मानने वाले को गुरू को मेरा सम्मान नागवार गुजरता, गुजरा करे। दिल्ली आने के बाद मुंशीजी से मुलाकातें लगभग न के बराबर हो गयीं। 2000 के आसपास की बात होगी, सुम्हाडीह चौराहे पर मुंशीजी से मुलाकात हो गयी, बिल्कुल फिट। मैं मन-ही-मन उम्र का अंदाज लगाने लगा। सुम्हाडीह से मेरे गांव, सुलेमापुर होते हुए सड़क बन जाने के बाद सुम्हाडीह और मेरे गांव में भी चाय के चौराहे बन गए। साइकिल से जब हम अपने गांव के चौराहे पर पहुंचे, मुंशी जी के साथ चाय-चर्चा के बाद बिदा लेते हुए स्वास्थ्य का राज पूछने पर बोले कि बीड़ी पीना छोड़ दिया, मांस-मछली अच्छा नहीं लगता और लोगों के साथ मस्ती से बतिआते हैं। मुंशीजी प्रणाम।

लंबी किंतु संबद्ध भूमिका के लिए मॉफी। दरअसल जब मन सेंटिया कर नस्टेल्जियाता है तो कलम अपनी मनमानी पर उतर आता है। बाबूसाहब ने भी मेरी प्रोन्नति को बहस मुवावसे के बाद मान लिया। लंबे-चौड़े सहपाठी अवमानना की नजर से देखते थे, देखते रहें। मुझे ताज्जुब होता था कि गणित (अंक गणित) जैसा आसान विषय बच्चों को मुश्किल क्यों लगता था? यह मुझे बहुत बाद में समझ आई जब मैं गणित मेरी आजीविका का साधन बना, लेकिन उस बारे में अभी नहीं फंसूंगा। कई काम हैं, इसलिए इस भाग को प्राइमरी पास करके खत्म करता हूं।

भाषा (हिंदी) और गणित दो विषय पढ़ाए जाते थे, बाकी शिल्प वगैरह का ‘प्रैक्टिल’ होता था, जिसमें बढ़ई, लोहार, कोंहार से बनवाकर कृषि-उपकरणों और उत्पादों के नमूने प्रदर्शित किए जाते थे। सच्चाई परीक्षार्थी, शिक्षक परीक्षक सब जानते थे। परीक्षा के पहले मुझे चेचक हो गया (माता माई निकल आईं)। परीक्षा की तिथि के एक दिन पहले तक मैं ठीक नहीं हुआ लेकिन परीक्षा देने पर अड़ा रहा। सबलोग समझाते रहे कि अभी मेरी उम्र के लड़के 2-3 साल पीछे हैं, वगैरह-वगैरह। अब लगता है मान जाना चाहिए था, लेकिन नहीं माना। माता माई निकली हों तो कमरे से बाहर निकलने के लिए जल छुआने की प्रथा थी। हारकर अइया (दादी) ने जल छुआया और मैं बरामदे की कोठरी में धुला-प्रेस किया कपड़ा तकिए के एक तरफ रख दिया और दूसरी तरफ सोने के पहले जो पहना था। परीक्षा केंद्र 2-3 किमी दूर मुत्कल्लीपुर में था। भइया आठवीं की परीक्षा दे चुके थे और साइकिल चलाते थे। सुबह अंधेरे में ही हम उनके साथ चल पड़े। उजाला होने पर देखा कि मैंने तकिए की दूसरी तरफ (गंदे) के कपड़े पहन लिया था, लेकिन अब क्या? लिखित परीक्षा के बाद मेरा चेचकग्रस्त होना पकड़ लिया गया और मुझे दूर अलग बैठा दिया गया। लेकिन मेरा काम तो हो ही गया था। वापस आकर चेचक के दाने बड़े-बड़े फोड़ों और फफोले बन गए। कई दिन फिर अलग-थलग कमरे में विस्तर पर रहा। ठीक होने पर शरीर में जगह-जगह दाग पड़ गए, कई अभी बचे हैं। 2-3 दिन में हीव परीक्षाफल आ गया, पता चला कि लिखित परीक्षा में में सबसे अधिक अंक थे। मैं खुशी के इजहार में घर से बाहर नहीं निकल सकता था, फिर भी बहुत खुश था। जुलाई, 1964 में मैं जब पिताजी के साथ टीसी लेने गया तो बाबू साहब ने मेरी जन्मतिथि 3 फरवरी 1954 लिख दिया, जो कि जन्म कुंडली से 26 जून 1955 है। मेरे पिताजी फैल गए कि सबकी उम्र 2-3 साल कम लिखते थे और मेरी सवा साल ज्यादा? बाबूसाहब ने समझाया कि 1969 में हाईस्कूल की परीक्षा के लिए 1 मार्च को कम-से-कम उम्र 15 साल होनी चाहिए, इसी लिए उन्होंने 1954 फरवरी की कोई तारीख लिख दिया। प्राइमरी की यादें इस बात से खत्म करता हूं कि 1964 में अपने गांव से छठी क्लास में लग्गू पुर जाने वाला अकेला था। एक प्रकाश दिल्ली अपने ताऊ के पास आ गया और रमाकर उपाध्याय अपने बड़े भाई प्रभाकर जी के पास कलकत्ता चले गये। तीन लोग आठवीं में थे और सातवीं में कोई नहीं। इनकी चर्चा मिडिल स्कूल की यादों के साथ।
जारी.......
19.11.2017

बेतरतीब 22 (बचपन 1)

बचपन की यादों के झरोखे से (भाग 1)
ईश मिश्र
मेरे गांव के बचपन के एक मित्र का बेटा जो मुझे भी प्रिय है, यद्यपि दुआ-सलाम के अलावा बात-चीत कम ही हुई है, लेकिन सही एक्सपोजर मिलने पर संभावनाएं हैं। पिछली बार गांव की यात्रा में किसी मित्र ने कहा कि आप अपनी बिरादरी की अवहेलना मत किया कीजिए, मैंने मान लिया। मैं व्यक्तियों या जतियों की नहीं, प्रवृत्तियों की समीक्षा करता हूं, जाति कभी उसमें संयोगात आ जाती है। मेरी इलाबाद विवि में प्रोफेसरों की जातिगत लामबंदी पर एक पोस्ट पर इस प्रिय भतीजे (गांव के रिश्ते से पोता लगता है) ने याद दिलाया कि मैंने गांव में किसी से जाति पर न बोलने का वायदा किया था और यह कि विवि में, वह भी दिल्ली विवि में, प्रोफेसर होने के बावजूद गांव का कोई भी मुझ पर गर्व नहीं करता। मैं सेंटिया के नस्टल्जिया गया और जवाब लंबा आत्मकथात्मक लेख बन गया, जिसे कमेंट बॉक्स ने अस्वीकार कर दिया। 
इसमें किसी जाति-विरादरी की अवहेलना कहां है? इसमें तो एक घटना का जिक्र है और अफशोस जाहिर किया गया है कि सर्वोच्च शिक्षा के बावजूद लोग जन्म की संयोगात्मक अस्मिता से ऊपर उठ नहीं पाते। मैं इसलिए कोई काम नहीं करता कि मुझ पर कोई गर्व या शर्म महसूस करे, बल्कि इसलिए कि वह करना-कहना मेरे लिए विवेक सम्मत और मानवता के हित में है। मैंने अपने गांव के लिए कुछ किया ही नहीं तो कोई गर्व-शर्म क्यों महसूस करे? मेरे बारे में कौन क्या सोचता है वह उसकी सोचने की आजादी है। किसी की सोच उसकी फेसरी तो जीविकोपार्जन की नौकरी है जो किसी विरले संयोग से मिल गई, नहीं तो किसी और श्रम-बाजार में श्रमशक्ति बेचता। पूंजीवाद में आजीविका के लिए हम सब श्रम-शक्ति बेचने को अभिशप्त हैं, क्योंकि पूंजीवाद ने श्रमिक को श्रम के साधन से मुक्त कर दिया है और दुनिया को लेबर चौराहों का उपहार दिया है। शासक वर्ग जानबूझकर, जाति-धर्म जौसे कृतिम या गौड़ अंतर्विरोधों में श्रमिक और श्रमशक्ति की आरक्षित फौज (बेरोजगार) को फंसाकर मुख्य अंतर्विरोध, रोजी-रोटी यानि आर्थिक अंतर्विरोध की धार कुंद करने की कोशिस करता है। जब भी गांव जाता हूं, तो अपनी शक्ति की सीमाओं पर अफशोस होता है कि काश मैं यहां एक पुस्तकालय वाचनालय स्थापित कर सका होता! इतनी प्रचुर प्रतिभा देखता हूं लेकिन परिवेश की सीमाएं; संस्कार नाम की घुट्टी में पिलाई गयी भावना तथा मेधा के विकास के मंच और संसाधनों के अभाव में संभावनाएं, वास्तविकता में नहीं बदल पातीं। बच्चो के पास दैनिक जागरण और पूर्वांचल गाइड के अलावा पढ़ने को कुछ नहीं है, पुरातन, संकीर्ण सांस्कृतिक परिवेश सोच की समृद्धि में बहुत बड़का स्पीड-ब्रेकर है। जो नहीं कर-लिख पाया उसका ग्लानिबोध है, खेद नहीं है हर कोई जो कुछ चाहे एक ही जीवन में नहीं कर सकता और दूसरे जीवन की कहानी फरेब है। और इन सालों में, किसान-मजदूर-छात्र आंदोलनों से जुड़ाव ने मेरे गांव की परिधि बढ़ा दी है। पिछले 11-12 सालों में अपने गांव से अधिक तो उड़ीसा गया हूं वहां के किसान-आदिवासियों के जमीन आंदोलनों से जुड़कर लिखने के लिए और उनसे एकजुटता दिखाने के लिए।जब भी आज़मगढ़, जौनपुर, बनारस, इलाहाबाद जाता हूं तो घर जाने का मन होता है, लेकिन समयाभाव में मन मशोस कर रह जाता हूं। पहले जब पिताजी वगैरह थे तब अपने घर जाता था, अब गांव। गांव में मैं एक यात्री महसूस करता हूं, एक ऐसी जगह की यात्रा जहां कुछ परिचित लोग हैं, लेकिन यात्रा का समय इतना कम होता है कि परिचितों से दुआ सलाम के अलावा कोई सार्थक संवाद हो सके, जिनमें कइयों को मैं अजूबा लगता हूं। कई पूछते हैं मैं ऐसा कैसे हो गया? लंबी जीवन यात्रा में दुनिया को तथ्य-तर्कों के आधार पर समझने की सायास आदत और इसकी शोषण-दमन की कुरूपता को समाप्त कर इसे खूबसूरत बनाने की चाहत के चलते। आजमगढ़ शहर पहली बार 2008 में बटाला हाउस 'एंकाउंटर' पर रिपोर्ट के लिए जनहस्तक्षेप-पीयूडीआर की टीम के सदस्य के रूप में गया। आजमगढ़ जिला बताने पर लोग शहर की बातें पूछते हैं, जो मैं जानता नहीं। और जरूरी काम करना था, लेकिन अपने प्रिय बच्चों से संवाद भी जरूरी काम है, वैसे भी इसके अवसर विरले ही मिलते हैं। पिछली एक दिन की यात्रा में तुम्हारी कुटी में रामानंद से संक्षिप्त संवाद सुखद था। अगली यात्रा में कुछ दिनों की गुंजाइश लेकर जाऊंगा। सुदूर आत्मावलोकन में पाता हूं कि बचपन से ही ऐसा ही हूं, तुमको तो याद नहीं होगा, शायद पैदा भी नहीं हुए थे, मेरे दादा जी पंचांग और कर्मकांड के प्रति कट्टर थे। 1967 में 12 साल की उम्र में 8वीं की बोर्ड परीक्षा देने खुरांसो जाना था, पैदल। साइत रात 12 बजे थी, रात भर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पार करते, (बीच-बीच में बाबा कंधे पर उठा लेते) 6 बजे खुरांसो पहुंचे, 7 बजे से परीक्षा थी। नंबर अच्छे आ गए, साइत की सार्थकता की अवधारणा भी 'सत्यापित' हो गयी। 13 साल की उम्र (9वीं कक्षा) तक मुझे शरीर पर जनेऊ की व्यर्थता का भान होने लगा और उतारकर फेंक दिया। जौनपुर पढ़ता था घर आता, बाबा मंत्र पढ़कर फिर से पहना देते, वापस बिलवाई गाड़ी पकड़ने जाते समय, लिलवा ताल की बाग में मैं किसी पेड़ में टांग देता कि कोई डोरा का इस्तेमाल कर लेगा, यह भी जानता था कोई करेगा नहीं क्योंकि दिमाग में टोटका-टोना का भय होता था। तुम्हारे पिताजी, लालू भाई, दामोदर, बाढ़ू, राजेंद्र, लालजी, भगवती, बहाल ( अकबाल यादव का भाई था, बहुत कम उम्र में किसी व्याधि के शिकार हो गए), भग्गल(स्व), मिलन, जगदीश, जयराम, ........ मेरे समउरी थे। ये सब बाबा के बारे में बताएंगे। मेरे अग्रज, आदित भाई, रविंदर... एक सीढ़ी ऊपर के। इनमें सो कोई भी इंटर से आगे नहीं पढ़ा। रमाकर ने हाईस्कूल के बाद कानपुर से आईटीआई किया। तुम्हारी दादी की अकाल मृत्यु से तुम्हारे पिताजी दोनों भाई शाहपुर में रहते थे, उनसे कम मुलाकात होती थी। विद्रोह की चेतना और साहस इतना नहीं था कि पहनने से इंकार कर देता। उन्होंने खुद ही, लाइलाज समझ बंद कर दिया। बाबा के नियमों का सबसे अधिक उल्लंघन करता था लेकिन सबसे अधिक प्यार भी मुझको ही करते थे (मुझे ऐसा लगता है)। दर-असल मैं छुट्टियों में घर आता था। दूर जाता रहा, घर की यात्राएं कम होती रहीं। वे बाग में (पहले रहट, फिर ट्यूबवेल पर) अपनी कुटी में ही रहते थे घर सिर्फ दोपहर और रात में भोजन करने आते थे। मुझे भी खेत-बाग घूमना पसंद है। जब चौराहे की चाय की अड्डेबाजी करने मिल्कीपुर/ पवई/परकौलिया न गया तो पूरी शाम बाबा के साथ उनकी कुटी पर बिताता। वे मुझे प्हयार से पागल कहते जो कालांतर में मेरा नाम पड़ गया। 1975 में गौना के बाद जब मेरी पत्नी आयीं तो उन्हें शक हुआ कि कहीं उनकी उनकी शादी धोखे से किसी पागल से हो गयी। वैसे भी लीक पर न चलना पागलपन ही माना जाता है। एक दिन उन्होंने अइया से पूछ ही लिया था।
कुछ अच्छा पर अप्रत्यासित करता तो बाबा बोलते 'पगला केहे होई'। (तुमने तो बेटा यादों के झरोखे में ऐसा फंसा दिया कि बाकी कामों को इंतजार करना पड़ेगा) दुर्भाग्य से विरासत में मिले छोटे-बड़े के संस्कारों के चलते हमारे परिवारों में दो पीढ़ियों में संवाद की परंपरा नहीं है। 11वीं क्लास में अपने बड़के बाबू से किसी बहस में उलझ गया और एकबैग मेरी अच्छे बच्चे की छवि चकनाचूर हो गयी। बाबा से संवाद में मिले खजाने को कभी मौकै मिला तो लिपिबद्ध करूंगा, खासकर 1945-46 में रंगून से ढाका होते हुए, कलकत्ता पहुंचने का उनका यात्रा विवरण। बाबा कई पार कहते जो मैं पढ़ रहा हूं। मैं 11वीं में था, मुझे लगता था मैं तो फीजिक्स, कमेस्ट्री किस्म के विषय पढ़ता था। एक बार कोर्स की टैगोर की एक कहानी (अंग्रजी में) सुनाया, उन्हें अच्छा लगा। बाबा को जब पंचांग की गणनाओं; सब्जी के खेत की निराई; सब्जी तोड़ने-छिलने-काटने आदि कामों से फुर्सत होती तो वे रस्सी बुनते या तकली पर जनेऊ। आम के सीजन में तो उनकी खाट बड़की बाग में एक खास पेड़ के नीचे होती थी। उस पेड़ का नाम ही बाबा वाला पड़ गया।
एक सुबह मैं नदी के तीरे लोनियाना के इस पार तक घूमकर, उस पार गोखवल पर नजर डालकर, बरास्ता मीरपुर मैं बाग में पहुंचा तो जनेऊ कात रहे थे तो मेरे मन में आया, आज उन्हें तकली की गति के हवाले उन्हें गुरुत्वाकर्षण और आवर्ती गति के न्यूटन के सिद्धांत के बारे में बताऊं। मैंने बाबा से पूछा कि उनकी तकली एक निश्चित परिधि में ही क्यों घूमती है? थोड़ा इधर-उधर क्यों नहीं जाती? उन्होने कहा गोल घूमेगी तभी तो सूत कताएगा। पेड़ की डाल पर कुछ टंगा था मैंने उसे खींच-छोड़कर बाबा से फिर पूछा, यह इतनी दूर से इतनी दूरी में ही क्यों घूमता है, इधर-उधर क्यों नहीं जाता। उनकी सारी व्याख्या ईश्वर की माया और इच्छा पर आधारित थी। लेकिन मेरी बातें चाव से सुन रहे थे और टोक रहे थे। मुझे जो लगता था कि वे अपनी मान्यताओं के गलत साबित होने पर उनके गुस्से पर पोते की चीजों की व्याख्या करने की कला पर खुशी में दब जाती थी। घर मैं अकेला बालक था जिन्हें उनकी गुस्से की डांट कभी नहीं खानी पड़ी। हां मुझे चौराहे की अड्डेबाजी से लौटने में ज्यादा देर होने लगती तो खूब गुस्सा होते लेकिन मेरे पहुंचने का बाद नहीं। उस दिन की चर्चा में इतनी देर हो गयची कि बाबा के नदी नहाकर भोजन करने का वक्त हो गया। बाबा को पृथ्वी का आकार और गुरुत्वाकर्षण शक्ति, आवर्ती गति तथा न्यूटन के गति के नियम बताया। बाबा को नई बातें सुनकर मजा आ रहा था। उठते हुए बोले, “का रे पगला, न्यूटनवा भगवानौ से बड़ा है का?” मैंने कहा “नाहीं बाबा वतना त नाय लेकिन तब्बौ बहुत बड़ा रहल”। बाबा घर से ले आया हुआ खाना नहीं खाते थे, ले आने में रास्ते में अपवित्र हो सकता था। किसी शाम घर जाने का मन नहीं हुआ तो वहीं अहरा लगाते और पौत्रबधुओं की दावत और पिकनिक हो जाती।   
वापस बचपन तथा जनेऊ की कहानी पर आते हैं। जो भी लिख रहा हूं, वह अपने पिताजी समेत मेरे किसी भी समकालीन से सत्यापित कर सकते हो। हम लोग 'चौबे क निमिया के नीचे' (जहां अब मंगला भाई और जंगबहादुर भाई की गोशालाएं हैं) आमने-सामने खाट पर बैठे थे। मैंने पशीने से परेशान होकर बनियान निकाला, मंगला भाई ने कहा, 'ये बच्चा, ब्राह्मण बालक की खाली पीठ अच्छी नहीं लगती’। मुझे शब्दशः याद है, "मंगला भाई, ब्राह्मण होने में मेरा क्या योगदान है, 100 फुट दक्षिण पैदा होता तो अहिर होता और 100 फुट उत्तर (बेगीकोल) तो लोहार"। पुरुखों की परंपरा का तर्क, मैं माना नहीं कि जरूरी नहीं कि हमारे पूर्वज हमसे अधिक बुद्धिमान रहे हों। बल्कि हर अगली पीढ़ी तेजतर होती है, तभी मानव पाषाण युग से साइबर युग तक पहुंचा है।
जिन  समौरी (हमउम्र) समकालीनों का जिक्र किया है उनमें दामोदर को छोड़कर सब मुझसे 2-4 महीने बड़े थे। जयनारायण(स्वर्गीय) मुझसे एक-डेढ़ साल ही छोटे थे तो मां-दादी का ध्यान ज्यादा उधर ही रहता। मैं कम उम्र में ही भइया की पूछ पकड़कर स्कूल जाने लगा। गदहिया गोल में ही मुझे संख्याओं के खेल में मजा आने लगा। मुझे पहाड़ा याद नहीं हुआ समझ आ गया। पंडित जी (स्व. श्री सीताराम मिश्र) ने पता नहीं क्या प्रतिभा देखी कि गदहिया गोल से 1 में कर दिया। 3 क्लास रूम थे 3 टीचर और छः कक्षाएं। कक्षाओं का बंटवारा वरिष्ठता के क्रम में था। गदहिया गोल और कक्षा 1 पंडित जी पढ़ाते थे; कक्षा 2 और 3 बाबूसाहब (बासुदेव सिंह, बेगीकोल के) तथा 4 और 5, प्रधानाध्यापक, मुंशीजी (अड़िका के मुंशी राम बरन)। कक्षा 2 और 3 पूरे साल साल भर पढ़ा। कक्षा 4 में पहुंचने पर मुंशी जी रिटायर हो गए और बाबू साहब प्रधानाचार्य हो गए और कक्षा 4 और 5 पढ़ाने लगे जो एक ही कमरे में एक ही कतार में बैठते थे। लालू भाई उस समय कक्षा 3 में थे। कक्षा 5 में अड़िका के जय राम और श्रीराम यादव थे अपने गांव के रविंद्र उपाध्याय और रमाकर थे, एक दो लड़के गोखवल और बखरिया के थे और शायद एकाध अपने गांव के और। कुल 8-9 छात्र थे। कक्षा 4 में मैं, महिंदर सिंह, भगवती धोबी, जगदीश सिंह, राम बहाल यादव कुछ चकिया और बखरिया के लड़के थे। कक्षा 4 से 5 में प्रोन्नति की कहानी अपने बच्चों को सुनाता हूं तो उन्हें किंवदंति लगती है। डिप्टी साहब (यसडीआई) मुआइने पर आए थे। कई दिनों से स्वागत की तैयारी हो रही थी। चाय-पानी के बाद हमारे क्लास में आ गए। जहां कक्षा 5 की कतार खत्म होती थी वहीं से 4 की शुरू। मैं दोनों कतारों के विभाजन विंदु पर बैठता था। डिप्टी साहब ने अंकगणित का कोई सवाल पूछा। कक्षा 5 वाले सारे चुपचाप खड़े होते गए। मेरे लिए सवाल बहुत आसान था, चटपट उठकर बता दिया। डिप्टी साहब ने पीठ ठोंका और बाबू साहब ने कहा कि मैं तो अभी कक्षा 4 में था, डिप्टी साहब ने कहा, “इसे 5 में करो। मैं अगले दिन भाषा और गणित की किताब और गोपाल छाप 2 नोटबुक लेकर कक्षा 5 की कतार में सबसे आगे बैठ गया। सभी क्रोध से देख रहे थे लेकिन कुछ बोले नहीं। बाबू साहब आए तो वहां बैठने के लिए डांटने लगे और अपनी पुरानी जगह पर जाकर बैठने को कहा। लेकिन मुझे लगा कि जब डिप्टी साहब ने कह दिया तो इन्हें नहीं रोकना चाहिए। मैंने कहा, “जब डिप्टी साहब कहि देहेन त अब हम पांटै में पढ़ब”। वे बोले, “मिडिल स्कूल जाए के लग्गूपुर पढ़ै जाब्य, त भेंटी भर क हय सलारपुर के बहवा में बहि जाब्या”। हम बोले, “चाहे बहि जाई चाहे बुढ़ि जाई, डिप्टी साहब बोल देहेन त अब हम पांटै मं पढ़ब”। और इस तरह मैं कक्षा 4 से 5 में चला गया। वैसे एक बार उस बाहा में मैं वाकई बहने लगा था। यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि मैं बचपन से ही थोड़ा चिंतनशील और अपने समकालीनों स था।
जारी....
18.11.2017
   



Friday, November 17, 2017

शिक्षा और ज्ञान 134 (ज्ञानी और जातिवाद)

1972 में इलाहाबाद विवि में दाखिला लिया। 4 साल एक छोटे से शहर जौनपुर में हाई स्कूल-इंटर की पढ़ाई करके विवि जाने वाला अपने गांव का पहला लड़का था। जौनपुर भी गांव का ही सांस्कृतिक विस्तार था। मैं सोचता था कि जात-पांत का मामला गांव के अपढ़ लोगों तक सीमित होगा, प्रोफेसर लोग तो परम ज्ञानी हैं, इन पूर्वाग्रह-दुराग्रहों से मुक्त होंगे! विवि में पहला छात्र आंदोलन 'जगदीश दीक्षित नहीं चुनाव नहीं'. जगदीश दीक्षित विवि से निष्काषित एक बुजुर्ग छात्र नेता थे। 1971-72 के छात्रसंघ की निरंतरता 1972-73 में भी बनी रही। दूसरा 'आेदोलन' बॉटनी विभाग में कायस्थ प्रोफेसरों के चैंबरों में तोड़-फोड़ का था।खबर फैली कि प्रो. भटनागर ने किसी लड़की के साथ बद्तमीजी की थी। इसका पता कभी नहीं चल पाया कि किस लड़की के साथ बजतमीजी की थी। मेरी समझ में नहीं आया कि किसी एक प्रोफेसर ने बद तमीजी की थी तो बाकियों के चैंबरो में तोड़-फोड़ क्यों? पता चला कि प्रोफेसरों की 'ब्राह्मण लॉबी' के पोषित छात्रों ने यह काम 'कायस्थ लॉबी' को उनकी 'औकात' दिखाने के लिए किया। तभी मैं जाना कि भटनागर कायस्थ होते हैं। मिश्र, पांडेय, जोशी, पंत आदि के चैंबर बीच-बीच में छोड़कर श्रीवस्तव, वर्मा, सक्सेना आदि के चैंबरों को निशाना बनाया गया था। यह मेरे जीवन का, तब तक का सबसे बड़ा कल्चरल शॉक था और ज्ञान और शिक्षा के अंर्विरोध का पहला साक्षात्कार।

Thursday, November 16, 2017

Marxism 37 (education)

In my early teens I had very bad opinions about communists that they have no religion and no social familial morality. An since communists were "agents" of Russia hence hated it too. I did not know what I thought about them but knew that they are some kind of monster. No one told me explicitly any such thing but I acquired it through socialization. That is why I try t teach my students to shed the acquired morality and values and replace them by rational ones. But one of the visitors to my place in the village was a CPI(M) local leader but a very good and charming old man, Bhgavati Singh. I was quite impressed with his way of relating to people. Once I asked him that despite being such a wonderfully good person why he was a communist? It was summer of 1969, I was a 14 year old boy studying in X in a small city and had come home in vacations. When we were discussing a Musahar boy of around my age was sweeping and cleaning the leftover of the previous evening's feast. Mushar is considered to be lowest of low in the Hindu caste order. I did not know how much I had learnt from what he said but in retrospect I find him to be a very good teacher as for me a good teacher is one who keeps in mind the intellectual level of the student and his exposures. He asked pointing to the boy that if he would around my age. I confirmed. the he asked should all the boys of you age should study? Again I had to confirm, of course yes. He said that he was a communist because he wants that this boy too gets opportunity to be a student like me and all the children should get right and opportunity to education. And he was too good not despite but because of being a communist. We had a long discussion I do not remember much of it but I was feeling good as many other people. One lecture cant change the long acquired prejudices but my disliking for the word communist was diluted. At 18, I thought I was a Marxist without much knowledge of Marxism, without really knowing what imperialism; communalism; secularism; .... are. I still was a nationalist too without really knowing what the nationalism was except that Pakistan and China are enemies of the nation. It is only after being little better read in Marxism and experiences of various movements I realized that a worker like the capital has no nation and I am a worker.

Wednesday, November 15, 2017

मार्क्सवाद 91 (टीटो)

इस पर बाद में विस्तार से बात करेंगे, अभी मार्शल टीटो की एक बात बताता हूं। एक साथी ने किसी जगह के बारे में टीटो से कहा कि वह तो समतल इलाका है वहां गुरिल्ला वार कैसे हो सकता है? मार्शल टीटो ने कहा कि वहां तो सबसे सफल गुरिल्ला वार हो सकता है। हाकिम परेशान रहते थे कि ये गुरिल्ले कब और किधर से आते थे? कहीं से आते हों तब न। दिन में जिम्मेदार नागरिक और रात में गुरिल्ला। इस तरह के नैतिक जनसमर्थन के बिना सशस्त्र क्रांति मुश्किल होती है। मेरी राय में आज का वक्त फासीवाद का हर मोर्चे पर विरोध करते हुए, जनांदोलनों से जनबल बनाना होगा। एक साथी ने ऊपर सही कहा है कि बुद्धिजीवी जन से कटे हुए हैं जन के बीच जाकर ही जनवाद सीख सिखा सकता है। इसमें व्यावहारिक कठिनाइयां हो सकती हैं, लेकिन वह अपनी बातें इनके पास पहुंचाने की जुगाड़ कर अपनी भूमिका को ज्यादा सार्थक बना सकता है।

इसीलिए साथी अभी सशस्त्र क्रांति का वक्त नहीं है, क्योंकि जब तक जनता आपको अपना न मानकर दुश्मन मानेगी, सशस्त्र क्रांति बहुत सीमित सफलता पाएगी और उनके सरकारी दमन को नैतिक जनसमर्थन मिलता रहेगा। अभी वक्त क्रांति की तैयारी का है और अभी मुख्य शत्रु फासीवादी कॉरपोरेट है। अभी सामाजिक चेतना के जनवादीकरण के प्रयासों को बहुत तेज करना पड़ेगा। 1980 के दशक में तबके सेंट्रल विहार में लिबरेसन के ओवर ग्राउंड-अंडरग्राउंड में बहुत अच्छा तालमेल था। लेकिन वे भी सीपीयम के रास्ते चल पड़े