मैंने भी कई सालों से लाल किले का भाषण सुनना बंद कर दिया, वैसे भी महामानव की शकल बहुत रिपल्सिव लगती है। जंतरमंतर के मीमों और गीतों ने उसे और भी रिपल्सिव बना दिया है।15 अगस्त 1947 को, भारत के प्रथम और अभी तक के एकमात्र युगद्रष्टा प्रधानमंत्री, नेहरू ने, अपने सुविदित'नियति से मुठभेड़' भाषण में रेंगते भारत के स्ववलंबी, जागृत और वैज्ञानिक तेवर केशि क्षित भारत में तब्दीली के सपने की बात की थी और एक दशक से कम समय में नेहरू का सपना सच होता दिखा। देश में शिक्षा संस्थानों का जाल बिछना शुरू हो गया, जिसका मैं भी पहली पीढ़ी का लाभार्थी हूं। आईआईटी, एम्स, परमाणु शोधकेंद्र खुलने लगे, नेहरू ने उद्योगों को मंदिर कहा लेकिन भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए नहीं देश के पूंजीवादीकरण के लिए संसाधन चाहिए थे। अफीमयुद्ध के दौरान अफीम तस्करी से कई निजी राष्ट्रीय पूंजीपतियों का उद्भव तो हो चुका था लेकिन कोई बड़े औद्योगिक आधारभूत संरचनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर्स) में निवेश करने में न तो सक्षम थे न ही उद्यत। नेहरू सरकार ने सीमित राजस्व और सोवियत सहायता से भेल, सेल, बरौनी रिफाइनरी तथा ओएनजीसी जैसे सार्वजनिक औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया, कल्याणकारी राज्य जिसका उपपरिणाम था और जिन्हें मोदी सरकार ने एक-एक कर अपने कृपापात्र धनपशुओं को औने-पौने दामों में बेच दिया और बेच रहे हैं। युवाओं में अपनी अप्रियता देख-समझ कर महामानव के अंदर के फासीवादी कीड़े ज्यादा कुलबुलाने लगे हैं और भजन न गाकर विद्रोह के गीत गाने वाले युवकों तथा असहमति के स्वर वाले विवेकसम्मत लोगों को दिमागी नक्सल कह कर उन्हें पहचानने और दंडित करने की धमकी दे डाली। नेहरू ने नियति से दो हाथ करने की शुरुआत की महामानव ने स्वाधीनता दिवस के शताब्दी वर्ष तक विसित भारत का वायदा किया, वैसे विकसित भारत की बजाय विक्षिप्त भारत बनने लगा है। वैसे भी कौन जीता है, तेरे जुल्फ के सर होने तक। यदि युवा उमंगों की उड़ान जारी रही और उसे राजनैतिक दिशा मिली तो गुजराती युगल का राज बहुत दिन नहीं कायम रह पाएगा।
Sunday, August 16, 2026
दिमागी नक्सल
महामानव अपनी एंटयर पोलिटिकल साइंस की पढ़ाई को सार्थक करते हुए, महामानव नए नए शगूफे छोड़ते रहते हैं और उनके बजरंगी अनुयायी उन्हें रटकर उनका भजन गाते रहते हैं। जेएनयू आंदोलन के बाद उन्होंने सवाल-जवाब करने वाले स्टूडेंट्स के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग का शगूफा छोड़ा। यह अलग बात है कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने अंग्रेजी राज की बांटों-राज करो नीति के प्यादे बनकर भारतीय राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और भारत राष्ट्र के टुकड़े टुकड़े कर दिए। जिसके घाव नासूर बन न जाने कब तक रिसते रहेंगे।उनका बजरंगी गिरोह अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारत की सामासिक संस्कृति के टुकड़े टुकड़े करने की करतूत की निरंतरता बनाए हुए है। फिर उन्होने खान मार्केट गिरोह का सगूफा छोड़ा. यह भी अलग बात है कि खानमार्केट जाने वालों में भक्तों का प्रतिशत ज्यादा रहता है। बुद्धिजीवियों के लिए इन्होंने अर्बन नक्सल का शगूफा छोड़ा। और अब दिमागी नक्सल का। हर फासीवादी की तरह ये अवधारणाओं को कभी परिभाषित नहीं करते । आज ही सोसल मीडिया पर देखने को मिला कि दिमागी नक्सल जनता पार्टी बन गयी है। महामानव की जय हो।
Thursday, July 30, 2026
शहर पर गर काबिज हो जाएं सूअर
शहर पर गर काबिज हो जाएं सूअर
करने के लिए पुनर्स्थापित मानवीय सभ्यता
उठाना पड़ेगा तीर-धनुष
देश भर में फैलाना पड़ेगा जंतरमंतर का विचार
अगले उलगुलान के लिए
Tuesday, July 28, 2026
जंतरमंतर : नई पीढ़ी के नए रूपक
जंतरमंतर पर स्वस्फूर्त उमड़े जनसैलाब की प्रतीकात्मक जीत:
नई पीढ़ी के नए रूपक
ईश मिश्र
जंतरमंतर आंदोलन में कॉक्रोच जनता पार्टी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की प्रतीकात्मक मांग रखी थी। सरकार को 20 जुलाई से जंतरमंतर पर उमड़ते अभूतपूर्व जनसैलाब के दबाव में सरकार झुकने को मजबूर हो गयी और प्रधान का इस्तीफा ले लिया। मांग प्रतीकात्मक थी सो विजय भी प्रतीकात्मक ही है। खुद को अडिग मानने वाली मोदी-शाह की जोड़ी को युवाओं ने डिगा दिया। आंदोलन की घोषणा कॉक्रोच जनता पार्टी ने किया लेकिन वामपंथी छात्र संगठनों ने संवेग देकर उसे गतिमान रखा। आंदोलन से एकजुटता दिखाने के लिए लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांचुक आंदोलनकारियों के साथ अनशन पर बैठ गए। गौरतलब है कि सोनम कुख्यात रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत 26 लितंबर 2025 से जोधपुर जेल में बंद थे और उनपर देशद्रोह जैसे आरोप मढ़े गए थे । 170 दिन वे जेल में रखने के बाद सरकार ने उन्हें 14 मार्च 2026 को रिहा कर दिया। राजनैतिक चर्चाओं में कुछ लोग कयास लगा रहे थे कि उन्हें शायद किसी समझौते के तहत छोड़ा गया।जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान वाले सोनम वांचुक की आंदोलन में शिरकत ने आंदोलन की गति को हवा दिया और आंदोलनकारियों को प्रोत्साहन। साथ में जेएनयू में पीएचडी कर रही नेहा बोरा भी अपने अन्य कॉमरेडों के साथ अनशन पर बैठ गयी। अनशनकारियों की सेहत बिगड़ने लगी। 18 जुलाई को पुलिस ने सोनम वांचुक को धरना स्थल से उठा लिया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कर दिया। छात्र अनशनकारियों की सेहत की चिंता सरकार को नहीं हुई और उन्हें अनशन पर बैठे रहने दिया गया। वांगचुक और उनकी पत्नी ने गुड़गांव, मेदांता में स्थांतरित करने की मांग की और सरकार ने मान लिया। 23-24 जुलाई, 2026 की रात वांगचुक ने, आंदोलनरत विद्यार्थियों पर दया के सरकारी आश्वासन पर, मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के हाथों जूस पीकर और उन्हीं के हाथों भगवा अंगोछा ओढ़कर अनशन तोड़ दिया। प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, परीक्षा व्यवस्था में आमूलपरिवर्तन सारभूत मांग होती। लगभग महीने भर के आंदोलन और 5 दिन के नए जनसैलाब के प्रदर्शन के बाद प्रधान के इस्तीफे की प्रतीकात्मक मांग पूरी हो गयी और जंतरमंतर आंदोलन की प्रतीकात्मक जीत हो गयी। लेकिन जीत तो जीत होती है, प्रतीकात्मक ही सही, जश्न मनाना तो बनता ही है। बच्चे जश्न तो मना रहे हैं लेकिन यह जानते हुए कि यह विजय लड़ाई का अंत नहीं बल्कि नई लड़ाइयों की शुरुआत है।
पिछले एक महीने से जंतर-मंतर नई पीढ़ी नई पीढ़ी की नयी चेतना का प्रतीक बना रहा, हर रोज स्वस्फूर्त जनसैलाब उमड़ता रहा और नए रूपक गढ़ता रहा; नए नारे लगाता रहा; नए गीत गाता रहा; नए मुहावरे गढ़ता रहा और डर के ठेकेदारों को बिना डरे डराता रहा। सर्वसत्तावादी शासक का मुख्य हथियार होता है डर, वह डर बोता है और डर की फसल उगाता है। सारी फौज-पुलिस; गोला-बारूद; देश की लूट और मंदिर की चंदा-चढ़ावाचोरी की धन-दौलत के वावजूद जैसा कि जनकवि गोरख पांडेय ने लिखा है कि वह एक ही बात से डरता है कि कहीं निहत्थी जनता उससे डरना बंद न कर दे। जंतर-मंतर पर युवा उमंगों का निहत्था जन सैलाब निर्भय हो उमड़ता रहा। डर के ढेकेदार ने निडर युवाओं में डर पैदा करने के लिए वर्दीधारियों के बर्बर दमन का इस्तेमाल किया। सैकड़ों आंदलनकारी युवाओं के खिलाफ नामजद और बहुतों के खिलाफ बेनामी एफआईआर दर्ज किया। पुलिस ने अंधाधुंध लाठी भांजी; आंसूगैस छोड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित पेलेट गन का इस्तेमाल किया। अंग्रेजी दैनिक, ‘हिंदू’ में छपी खबर को पुलिस के आला अधिकारी नकारते रहे। राहुल गांधी ने पीड़ित के साथ प्रेस सम्मेलन किया, सरकार ने कहा कि राहुल गांधी राजनीति कर रहे हैं और हम सब जानते हैं राहुल गांधी राजनीतिज्ञ हैं। डर के ठेकेदार भी राजनीति कर रहे हैं, जंतरमंतर पर जुटे युवा भी राजनीति कर रहे हैं। डर के ठेकेदार महामानव और उनके कारिंदे डर की खेती करने की राजनीति कर रहे हैं और जंतरमंतर पर उमडी युवा उमंगे न डरने की। आंदोलनकारियों ने प्रतीकात्मक जीत का जश्न मनाया लेकिन वे भी जानते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान तो मोहरा भर है और शतरंज के खिलाड़ी जानते हैं कि वजीर का रास्ता खोलने के लिए, खुशी-खुशी, आसानी से मोहरे की बलि दे दी जाती है। राहुल गांधी ने वजीर पर निशाना साधा है। युवा आंदोलनकारियों पर दमनात्मक कार्रवई का आदेश देने वालों की जवाबदेही का सवाल उठाया है। इस बावत गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर लिखित जवाब मांगा है। युवाओं ने खुद को 140 करोड़ का सवघोषित मसीहा मानने वाले महामानव को डिगा दिया है और महानता की गठरी बांधकर निकलने का रास्ता ढूंढ़ने का संदेश दिया है।
भगवाकरण; विश्व बैंक के निर्देश पर प्रत्यक्ष-परोक्ष निजीकरण और रूढ़िवादीकरण के मद्देनजर बनी नई शिक्षा नीति; सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के परिप्रक्ष्य से मनमामे ढंग से पाठ्यक्रम में जोड़-घटा; इतिहास पुनर्लेखन के नाम पर इतिहास का पुनर्मिथकीकरण तथा विकृतिकरण; शिक्षा संस्थाओं में रटाया भजन गाने वाले भक्तों की नियुक्तियों की भरमार आदि देखते हुए नई पीढ़ियों को लेकर काफी हताशा की मनःस्थिति, 20 जुलाई से जंतर-मंतर पर उमड़ रहे जनसैलाब को देखकर बदलने लगी। युवाओं का आत्म-अनुशासन और आपसी सौहार्द तथा आंदोलनात्मक आपसी सहयोग देखकर मन में हताशाजन्य निराशा की जगह आशा का संचार होने लगा। भविष्य की पीढ़ियों में उम्मीद का विश्वास पुनर्स्थापित होने लगा और लगने लगा कि शिक्षा को रूढ़िगत बनाकर युवा उमंगों की उड़ान को नहीं रोका जा सकता। 20 जुलाई को जंतरमंतर पहुंचना मुश्कल था। रास्ता बनाते किसी तरह पहुंचने पर, उत्साह से भरे अभूतपूर्व जनसमूह को देखकर हम सब गदगद हो गए। नाचते-गाते-नारे लगाते युवाओं का इंद्रधनुषी जन सैलाब में हम जैसे उम्रदराज लोगों से विविधता पैदा हो रही थी। पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों की उपस्थिति अभूतपूर्व थी। जब लगने लगा कि पुलिस शांतिपूर्ण ढंग से व्यवस्था का निरीक्षण कर रही है तभी पुलिस की बर्बरता की खबरें आने लगीं। प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए। पुलिस ने लाठियों में कीलें लगा रखी थीं। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुरुष पुलिसियों ने बदसलूकी की, जिसके वीडियो वाइरल हुए। कई पुलिस वाले बिना नेमप्लेट के थे, कई बिना वर्दी के। बिना वर्दी वालों में पता नहीं पुलिस वाले ही थे या आरएसएस की शाखा में दंड (लाठी) प्रशिक्षित स्वयंसेवक! कुल मिलाकर वर्दीधारी और बिना वर्दी की पुलिस अराजकतापूर्ण हिंसा पर उतर आई। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने संयम नहीं खोया। बहुत से छात्रों और प्रदर्शनकारियों को पुलिस बसों में भरने लगी। पत्रकार, मित्र चंद्रभूषण ने फोन पर बताया था कि बहुत से प्रदर्शनकारियों के साथ उन्हें बुराड़ी थाना ले जाया गया था। इसी तरह बहुत से प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बसों में भरकर दूरदराज के थानों में ले जाकर छोड़ दिया। दमन से आंदोलनकारियों का हौसला टूटने की बजाय और मजबूत होता दिखा। पुलिस के साथ बसों में जाते लड़के-लड़कियां बेखौफ, गीत गाते और नारे लगाते जा रहे थे। लगने लगा था कि निहत्थी जनता ने डरना बंद कर दिया था और अब सर्वसत्तावादियों के डरने की बारी है।
दिल्ली में इतना बड़ा जनसैलाब बहुत दिनों बाद दिखा। एक दशक पहले जेएनयू आंदोलन के दौरान मार्च करते विशाल जनसमूह की याद आई, वह संगठित जनसैलाब था, यद्यपि उसमें भी दूर दराज से आए जेएनयू के पुराने छात्र भी थे लेकिन यह दिल्ली और दिल्ली के बाहर विभिन्न जगहों से स्वतः आया स्वस्फूर्त। जगह डगह से लोग आते गए कारवां बनता-बढ़ता गया। अलग अलग जगहों और शहरों से स्वतः आए इन प्रदर्शनकारियों में बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो पहली बार किसी प्रदर्शन में आए थे। लेकिन वे जानते हैं, वे क्यों आए हैं, वे शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में व्याप्त सड़ांध से वाकिफ हैं, और उसे दूर करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ डटे रहने को प्रतिबद्ध। वे अपनी बातें स्पष्टता से कहते हैं, बहुत से बच्चे अपने घर वालों की यथास्थितिवादी दृष्टिकोण से वाकिफ हैं और बहाना बनाकर आए हैं और बहुत से बच्चे अपने अभिभावकों को भी साथ लेकर आए हैं। कुल मिलाकर यह अपनी तरह का अलग आंदोलन है और लगता नहीं कि अपने आप इसकी निरंतरता टूटेगी। आंदोलन के संवेग को बनाए रखने में आइसा एवं अन्य वाम संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका को नजर अंदाज करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी होगी। वांगचुक के समानांतर भूख हड़ताल पर बैठी नेहा बोरा जैसे बहादुर बहादुर आंदोलनकारियों ने आंदोलन को जीवंत बनाए रखा। 23 दिन की भूख हड़ताल पर रही नेहा ने बीबीसी को दिए इंटरविव में सासंद चंद्रशेखर समेत सभी समर्थकों का आभार व्यक्त किया तथा छात्रों के दमन के लिए, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ प्रधानमंत्री आवास पर औचक धरना और गिरफ्तारी देने के लिए राहुल गांधी का भी आभार व्यक्त किया। वांगचुक जब जंतरमंतर पर अनशन पर थे तब राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा था कि वहां न आना राहुल का छोटापन है। कॉक्रोच नेताओं ने भी राहुल की आलोचना की थी। लेकिन राहुल गांधी तो इसी मुद्दे पर महीनों से, देहरादून, जोधपुर, कोटा आदि कई शहरों में छात्रों के प्रदर्शनों को संबोधितस कर रहे थे।
मुझे भी लगा कि युवाओं के इस जनसैलाब में राहुल गांधी को भी जाना चाहिए था। 21 जुलाई को राहुल गांधी और विपक्ष ने पेपर लीक और छात्रों की अन्य समस्याओं पर संसद में बहस की मांग की लेकिन स्पीकर ने बहस मुल्तवी कर दिया। राहुल गांधी ने विपक्ष के सांसदों तथा अन्य नेताओं के साथ लोककल्याण मार्ग यानि प्रधानमंत्री आवास पर, अनपेक्षित, औचक धरना देकर सबको हक्का-बक्का कर दिया। डर की खेती के बूते सर्वसत्तावाद बरकरार रखने वाला शासक डरपोक होता है। अपने घर के सामने नेता विपक्ष के नेतृत्व में विपक्षियों का धरना देखकर वह डर गया और राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों की गिफ्तारी के लिए पुलिस भेज दिया। गिरफ्तार करते समय पुलिस राहुल को घसीटकर ले गयी जिससे उन्हें चोट भी आई। छूटने के बाद छात्रों के साथ प्रेस सम्मेलन करते हुए, जब पत्रकारों ने उनके घसीटे जाने का सवाल पूछा तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे (पुलिस वाले)उनके कान में कह रहे थे कि इसे जल्दी हटाइए।
20 जुलाई, 2026 से शुरू जनसैलाब का उमड़ना जारी रहा और हर रोज बढ़ता रहा। बहुत से नाबालिग 11वीं-12वीं कक्षा के बच्चे भी शामिल होते रहे। जब भी जंतरमंतर गया गाजियाबाद के जुनैद भाई आंदोलनकारियों को खाना खिलाते और पानी पिलाते हुए हमेशा मिले। प्रदर्शनकारियों को मुफ्त खाना खिलाने के “आपराध” में योगी की पुलिस ने उनके परिजनों को गिरफ्तार कर लिया और मानवाधिकार संगठनों के होहल्ला करने पर छोड़ा। जोमैटो और स्वीगी के डिलीवरी वाले लड़के ढेरों की संख्या में दिखे। किसी को आंदोलनकारियों के भोजन का ऑर्डर हैदराबाद के किसी ने दिया तो किसी को अहमदाबाद के किसी ने। आंदोलन का समर्थन आधार बढ़ता रहा। प्रदर्शनकारी दूरदराज के शहरों से आने लगे। जंतरमंतर दूरदराज के शहरों में फैलने लगा। जंतरमंतर जगह के नाम से विचार में तब्दील हो गया। आंदोलन के बढ़ते समर्थन आधार को देखकर डर की बदौलत राज करने वाली सरकार डर गयी और प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। युवा पीढ़ी को एक सलाम तो बनता ही है।
6 जून को जंतरमंतर पर जब काक्रोची परिघटना शुरू हुई तो मुझे यह आंदोलन अन्ना आंदोलन की ही तरह प्रायोजित लगा, अब भी लगता है। मुझे लगा था कि अयोध्या में चढ़ावाचोरी तथा देश भर में परीक्षा व्यवस्था में फर्जीबाड़े के विरुद्ध देश के विभिन्न शहरों में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों से ध्यान भटकाने के लिए कॉक्रोची परिघटना प्रायोजित की गयी। बोस्टन में आभासी दुनिया में मीम से शुरू कर राजनैतिक दल, कॉक्रोच जनता पार्टी बनाने वाले अभिजीत दिपके, जंकरमंतर पर, 6 जून, 2026 को प्रतिरोध प्रदर्शन की योजना के साथ दिल्ली आते हैं तो हवाई अड्डे पर प्रदर्शन की अग्रिम अनुमति के साथ दिल्ली पुलिस उनका स्वागत करती है। जानकार सूत्रों का कहना है कि कॉक्रोच जनता पार्टी के गठन के पहले आरएसएस के थिंकटैंक के रूप में जाने जाने वाले दत्तात्रेय होशबोले और राम माधव अमेरिका में थे। यह महज संयोग भी हो सकता है। इस बावत मैंने लिखा भी (समयांतर, जुलाई, 2026), लेकिन यह भी लिखा कि कई बार प्रायोजन के उपपरिणाम प्रायोजन के उद्देश्य से अलग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। गौर तलब है कि 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन उपनिवोशवाद-विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करने के सेफ्टी वॉल्व के रूप में हुआ था, लेकिन कालांतर में वह उपनिवेशविरोधी आंदोलन की प्रमुख मंच बन गयी। और प्रायोजित नेता परिघटना के प्रायोजित मंजिल से भटक कर दूर चले जाने के बाद वापस नहीं जा सकते, जैसे कॉक्रोच जनता पार्टी के नेता अब चाहकर भी न तो आंदोलन वापस ले सकते हैं, न ही वापस जा सकते हैं। ऐसा करने से उनकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी जैसा वांगचुक के साथ हुआ। वांगचुक ने रात के अंधेरे में न सिर्फ भाजपा मंत्रियों के हाथ जूस पिया बल्कि अपने गांधीवादी कंधों पर उनके द्वारा ओढ़ाया गया भगवा गमछा भी धारण कर लिया। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत लगभग 100 दिन जेल में बिताने के बाद मार्च, 2026 में, सोनम वांचुक को अचानक रिहा कर दिया गया। गौरतलब है कि अप्रैल 2026 के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में रासुका में बंद पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता सत्यम वर्मा और छात्र आकृति चौधरी की रिहाई की मांग पर कोई सुनवाई नहीं हो रही। वागचुक ने अपनी सफाई में वीडियो जारी किया है। लेकिन विश्वसनीयता खत्म होने पर फिर से मुश्किल से बनती है।
सोनम वांगचुक के खेल का पर्दाफाश हो चुका, उनकी इतनी ही भूमिका थी। कॉक्रोच जनता पार्टी के नेता आखिर तक शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे। वैसे इस सरकार में कोई भी मंत्री अपने मंत्रालय के फैसले स्वतंत्र रूप से तो लेता नहीं, कहा जाता है कि सारे फैसले कर्तव्य तीर्थ में अंतिम रूप लेते हैं। जो भी हो फिलहाल तो नई पीढ़ी, जिसे कुछ लोग जेन जी (Gen Z) कह रहे हैं जीत की खुशी मना रही है और उम्मीद करना चाहिए कि अगली बड़ी लड़ाई की तैयारी। युवा उमंगों को सलाम।
समयांतर, अगस्त 2026 में प्रकशानार्थ
26,07.2026
Friday, July 24, 2026
Jantarmantar
From the very beginning I have been maintaining that Dipke and Co. have been RSS sponsored and Wangchuk, who was released from NSA under some deal was added to the sponsored list by VK Saxena the former Lt Govenor of Delhi and presently employed on the same post in Laddhakh. But some times the inadvertent, different consequences become more substantial. The Jantar Mantar movement is no more a CJP movement but has become an independent, spontaneous peoples' movement expressing the long term popular discontent. It is expanding in different parts of the country reminding the similar expansion of Shaheenbag few years ago. The Laeft students organizations must be thanked for turning a sponsored movement to divert the massive popular discontent into national peoples' movement. I have been visiting Jantar Mantar everyday since 20 July. Gratitude to the spontaneous upsurge of the new generation. I wrote about it in SAMAYANTAR, July 2026
Answer to a question on a coment on a post regarding CJP
. There is reliable information that KJPwas planned in Boston in connivance with Rammadhav and co. to puncture the ongoing students' protests sipported by Cong and the left organizations in various cities. In normal cases one has to rum around for permission for the protest, Dipke, when after transforming his virtual meme movement into real party, came to India, he was received by, Delhi Police with advanced permission for protest. Wangchuk was released from draconian NSA, soposedly under some deal and broke his fast with saffron shawl and taking juice from ministers. These are readons for suspicios apprehensions. Dipke 's protest on 6 June took place under Police protection. Participation of AISA and other left organizations changed scene leading to spontaneous outpour of students from all over the country. At times inadvertent consequences are different and more substantial thsn the intended goals, as it hadhappened in case of Congress around 1and1/2 centuries ago. It was formed as safety volve but transformed into main platform of the anticolonial movement. Salutes to the new veneration of protesters. I have been going to the Jantarmantar almost everyday. Shall go tomorrow.As far as Wangchuk is concerned, he was introduced to Dipke by Amit Shah loyalist VK Saxena, Lt. Gov. Laddhakh and firmer LG Delhi.
Tuesday, July 14, 2026
राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद विचारधारा है, अतः मिथ्याचतना
भारत में साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में उबरा था राष्ट्रवादराष्ट्रवाद की रक्षा करने के लिए
औपनिवेशिक सरकार की सेवा में लड़ते थे भारतीय सैनिक
धीरे धीरे जब उभरने लगा उपनिवेश विरोधी आंदोलन
बदलने लगी राष्ट्रवाद की परिभाषा
उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा का रूप लेने लगा राष्ट्रवाद
और इस तरह जन्मने लगा भारतीय राष्ट्रवाद
और टकराने लगे दो राष्ट्रवाद
साम्राज्यवादी औपनिवेशिक राष्ट्रवाद और साम्राज्यविरोधी भारतीय राष्ट्रवाद
पहले के पास भारतीयों की वर्दीधारी सेना थी
सैन्यविहीन भारतीय राष्ट्रवाद के पास थी निहत्थी जनता
निहत्थे भारतीय राष्ट्रवाद से आतंकित हो गया हथियारबंद औपनिवेशिक राष्ट्रवाद
और खंडित करने को भारतीय राष्ट्रवाद अपनाया बांटो राज करो की नीति
और खोज लिया हिंदू और मुसलमान वफादार दलाल
उभरते भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक ने नारा दिया हिंदू राष्ट्र का
और दूसरे ने निजामेइलाही के पाकिस्तान का
और साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद जीत गया भारतीय राष्ट्रवाद से
सांप्रदायिकता की विचारधारा बन गयी वैकल्पिक राष्ट्रवाद की विचारधारा
टुकड़े-टुकड़े हो गया भारतीय राष्ट्र और विखंडित हो गया भारतीय राष्ट्रवाद
1947व में ही बन गया मुस्लिम पाकिस्तान
हिंदू पाकिस्तान बनने में बहुत समय लग गया
और भारतीय राष्ट्र के अवशेष उसे चुनौती दे रहे हैं
वापस भारत राष्ट्र बनने में और भी बहुत समय लगेगा।
Friday, July 10, 2026
सियासत 2 (कांग्रेस में संघ का पांचवां कॉलम)
एक पोस्ट पर कमेंट
शशि थरूर के अलावा कांग्रेस में आरएसएस का एक मजबूत पांचवां कॉलम है, और हमेशा से रहा है जिसने राजीव गांधी की राजनैतिक नातजुर्बेकारी का फायदा उठाकर कांग्रेस को डुबाने की प्रक्रिया शुरू की थी। बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और मेरठ-मलियाना-हाशिमपुरा उसी की दुर्बुद्धि से रचे गए। इसने अपना काम 1948 वमें बाबरी मस्जिद में राम लला के प्रकटीकरण से ही शुरू कर दिया था, जिसे नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व ने हवा पकड़ने से रोक दिया था लेकिन वह जमीन में दबा रहा और 1992 में ज्वालामुखी बन फूटा। मनमोहन सरकार में भी बहुत सी जनविरोधी नीतियों को पीछे इसी का हाथ है। कांग्रेस में आमूल जीर्णोद्धार के लिए व्यापक सफाई अभियान की जरूरत है, शुरुआत थरूर से होनी चाहिए।
