Saturday, May 23, 2026

जनहस्तक्षेप ( गुड़गांव मजदूर आंदोलन)

 *जन हस्तक्षेप*

फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियान
ता. 20 अप्रैल 2026

*गुड़गांव-मानेसर श्रमिकों के वेतन बढ़ोतरी आंदोलन पर दमन संबंधी जांच रिपोर्ट पर वक्तव्य-*

मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार संगठन जन हस्तक्षेप हरियाणा के गुड़गांव और मानेसर में विभिन्न कंपनियां के मजदूरों द्वारा वेतन बढ़ोतरी की मांग को लेकर दिए जा रहे धरने पर पुलिस प्रशासन द्वारा बर्बर लाठी चार्ज और मजदूर नेताओं व कार्यकर्ताओं को बीएनएस धारा 109 (सीआरपीसी की पुरानी धारा 307) के तहत हत्या के आरोप में गिरफ्तार करने की कड़ी निंदा करता है। साथ ही मांग करता है कि सरकार तुरंत सभी गिरफ्तार मजदूरों और कार्यकर्ताओं को रिहा करे और उन पर लगे आपराधिक धाराओं को वापस ले। साथ ही उन दोषी कंपनियों और श्रम विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे, जिन्होंने वर्ष 2025 में श्रमिक नेताओं के साथ बनी कमेटी में आम सहमति से वेतन बढ़ोतरी का फैसला लिए जाने के बावजूद उसे लागू नहीं किया और मजदूरों को आंदोलन के लिए विवश होना पड़ा। जन हस्तक्षेप हरियाणा सरकार से भी मांग करता है कि वह 2025 में मजदूरी को लेकर गठित कंपनी मालिकों के एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन नेताओं और श्रम विभाग के अधिकारियों की संयुक्त कमेटी द्वारा स्वीकृत किए गए 23196 रूपए न्यूनतम मजदूरी को तत्काल प्रभाव से नोटिफाई कर उसे लागू करे।
गुड़गांव-मानेसर में मजदूरों के शांतिपूर्ण वेतन बढ़ोतरी संबंधी आंदोलन पर कंपनी मालिकों और पुलिस प्रशासन के बर्बर दमन और गिरफ्तारियों की खबरों को देखते हुए तथ्यों की जांच के लिए जन हस्तक्षेप की चार सदस्यीय तथ्यानवेषी टीम 17 अप्रैल 2026 को गुड़गांव गई। टीम ने प्रभावित मजदूरों और भोडसी जेल में बंद श्रमिक कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिले कर विस्तृत बातचीत की। पुलिस प्रशासन और प्रबंधन ने 75 एफआईआर नंबर में 44 लोगों को गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया, लेकिन वेल सोनिक कंपनी यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत, कोषाध्यक्ष पिंटू कुमार यादव, श्यामवीर, राजू, हरीश सहित अन्य श्रमिकों को 307 के तहत भोडसी जेल में बंद कर दिया था। जांच दल के लौटने के दूसरे दिन सोमवार 18 अप्रैल को अजीत सिंह की जमानत हो गई, लेकिन शेष लोग अभी भी जेल में हैं।
जन हस्तक्षेप की टीम ने तथ्यों की जांच में पाया कि मजदूरों का असंतोष लंबे समय से था। खास तौर पर ठेका मजदूर कम वेतन और बेतहाशा बढ़ रही महंगाई से त्रस्त थे। श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि 2025 में मजदूरी बढ़ाने को लेकर राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई थी। इसमें कंपनी प्रबंधन के एसोसिएशन, मजदूर यूनियन और श्रम विभाग के अधिकारी सदस्य थे। श्रमिकों की तरफ से अजीत सिंह, एटक के अनिल पवार और आकाश सदस्य थे। अंतिम बैठक दिसंबर में हुई, जिसमें न्यूनतम मजदूरी वृद्धि पर सहमति बनी। इसे 1 अप्रैल 2026 से लागू करना था। बाद में हरियाणा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट में संशोधन करते हुए 3 अप्रैल को 15220 रुपए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने पर सहमति दी और 8 अप्रैल को उसका नोटिफिकेशन जारी किया। यहां एक गौरतलब तथ्य है कि इसी दौरान हरियाणा सरकार ने गुड़गांव और मानेसर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादले किए।
शुरुआत में होंडा कंपनी में 2017 से ठेका मजदूरी पर काम कर रहे श्रमिकों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर धरना दिया। कंपनी ने 16 हजा और 18 हजार की दो कैटेगरी का वेतन देने की सहमति दी। इसका दूसरी कंपनियों के श्रमिकों पर व्यापक असर पड़ा। वहीं सरकार द्वारा 8 अप्रैल को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद, मुंजाल शोवा कंपनी मानेसर में बढ़े वेतन की नोटिस लगाने की मांग को लेकर 9 अप्रैल को श्रमिक धरने पर बैठ गए। इसके सामने की कंपनी सत्यम कंपनी के श्रमिक भी शाम को धरने पर बैठ गए। हालांकि इससे पहले रूप पॉलीमर्स के श्रमिक 5 अप्रैल को ही धरने पर बैठ गए थे। सत्यम और मुंजाल के श्रमिकों को कंपनी मालिकों और प्रशासन ने गेट पर बैठने से मना किया। इस पर श्रमिक तहसील परिसर में धरना देने चले गए। इस तरह 3 अप्रैल से लेकर आठ अप्रैल तक कई कंपनियों के श्रमिक तहसील पर धरना देने आ गये।
9 अप्रैल को ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन गारमेंट व अन्य उत्पादों की कंपनियों ने ऐसा नहीं किया। इससे पूरे इंडस्ट्रियल एरिया के श्रमिकों में असंतोष फैल गया। रिचा के तीन प्लांट है। इसके अलावा सत्यम रूप पॉलीमर आदि कई कंपनियां के श्रमिक 7 अप्रैल को धरने पर बैठ गए और बाद में कई और कंपनियों के श्रमिक जुड़ते गए। कई कंपनियों ने अपने मजदूरों को हड़ताल पर जाने की अनुमति नहीं दी। सेक्टर 37 में इन स्टाइल इंक कंपनी आदि के बाहर 25-30 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। गारमेंट कंपनी रिचा ग्लोबल ने जब बढ़े वेतन का नोटिस नहीं लगाया, तो श्रमिकों ने 9 तारीख को फैक्ट्री गेट पर जमा होकर नोटिस लगाने की मांग की। इसके तुरंत बाद ही पुलिस वहां पहुंच गई और उसने लाठी चार्ज किया। श्रमिक भाग कर मंगरोला, नाहरपुर आदि आसपास के गांवों की तरफ भागे, तो उन्हें रास्ते में पकड़ कर पीटा गया और जो भी मिला उसे गिरफ्तार कर लिया।
जांच के दौरान यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आए हैं कि कई कंपनियां के प्रबंधन ने तहसील पर धरना दे रहे श्रमिकों को अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया। यही नहीं श्रमिक स्थानीय गांवों में जिन लोगों के यहां कमरा किराए पर लेकर रहते हैं, उनसे भी दबाव डलवाया गया। गुड़गांव-मानेसर में ट्रेड यूनियन आंदोलन का इतिहास रहा है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि कंपनियां स्थानीय दबंग लोगों के जरिए मजदूरों पर हमले करवाने से लेकर सभी तरह के दबाव डलवाती रही हैं। हालांकि इस बीच कई कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन अभी भी मानेसर की नील मेटल प्रोडक्ट, स्टरलाइट 4G जैसी कंपनियों ने बढ़ा वेतन नहीं दिया है। यही कारण है कि हरियाणा में 8 व 9 मई के बाद से छिटपुट कई कंपनियों में श्रमिक विरोध कर रहे हैं।
जांच टीम को श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि आंदोलन में कम वेतन और बेतहाशा महंगाई प्रमुख कारण था। 2019 में कंपनियों ने पुराने श्रमिकों को निकाल दिया था। उस समय अधिकांश मजदूर मिनिमम 15000 से लेकर ₹30000 तक वेतन पाते थे। उस समय उनकी यूनियन भी होती थी, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद 2021 से कंपनियों ने जब कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखा, तो उन्हें 10 और 11 हजार रुपए ही देना शुरू किया। वह यूनियन से भी नहीं जुड़ सकते थे, क्योंकि वह ठेकेदारों के माध्यम से आए थे। कंपनी प्रबंधन का भी यूनियन पर दबाव था कि वह ठेका श्रमिकों को अपना सदस्य नहीं बना सकते, अधिकांश कंपनियों में यूनियन है, लेकिन उसमें ठेका श्रमिक सदस्य नहीं बन सकते और ठेका श्रमिकों के सवाल पर यूनियन खामोश रहती हैं, जिन यूनियन ने ठेका श्रमिकों को सदस्य बनाया तो उनकी यूनियन की मान्यता समाप्त कर दी गई। बेल सोनी कंपनी की ट्रेड यूनियन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने ठेका कर्मियों को सदस्य बनाया तो कंपनी ने उसकी मान्यता लेबर आफिस (ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार) से शिकायत कर समाप्त करवा दी और कंपनी ने नई यूनियन बनवा दी। अब यह मामला हाई कोर्ट में है।
जन हस्तक्षेप जांच दल में हिंदू कॉलेज (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर ईश मिश्र, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे और वरिष्ठ पत्रकार हैदर नकवी शामिल थे। टीम ने जांच में पाया कि गुड़गांव-मानेसर में क्रांतिकारी मजदूर आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में कंपनी मालिकों और आरएसएस-बीजेपी की सरकार ने श्रमिकों के जीने लायक न्यूनतम वेतन को ही नहीं समाप्त किया है, बल्कि उनके यूनियन बनाने और विरोध प्रकट करने का संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों को भी समाप्त किया है।
जन हस्तक्षेप मांग करता है कि -
1- आंदोलन से जुड़े मजदूरों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ सभी मामले तुरंत वापस लिए जाएं और उन्हें रिहा किया जाए।
2- गिरफ्तार सभी श्रमिकों के जप्त किए गए मोबाइल आदि उपकरण उन्हें वापस लौटाए जाएं।
3- ठेका मजदूरों को यूनियन बनाने या पहले से चल रही यूनियन में शामिल होने का अधिकार दिया जाए।
4- अप्रैल माह से घोषित बढ़े वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए और वेतन वृद्धि को महंगाई से जोड़ा जाए। मजदूरों को पीएफ और ईएसआई का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाए।
5- ठेका मजदूरी की व्यवस्था खत्म किया जाए और कंपनियों को सीधे रोजगार देने का निर्देश दे।
6- गुड़गांव-मानेसर की सभी औद्योगिक इकाइयों और कंपनियों के रिकार्ड तैयार कर पंजीकृत किए जाएं साथ ही मजदूरों की रजिस्ट्री बने।
7- चार श्रम संहिता को निरस्त किया जाए और श्रम कानूनों एवं श्रम अधिकारों, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है, को लागू करना सुनिश्चित किया जाए।
संयोजक-
डॉक्टर विकास बाजपेई जेएनयू
सहसंयोजक-
अनिल दुबे वरिष्ठ पत्रकार
9811080915

Friday, May 22, 2026

मजदूर आंदोलन और पुलिस दमन

 मजदूर आंदोलन और पुलिस दमन

ईश मिश्र

पूंजीवाद में मालिक कम-से-कम मजदूरी देकर मजदूर से ज्यादा-सा-ज्यादा काम लेना चाहता है यानि ज्यादा-सा-ज्यादा शोषण करना चाहता है और मजदूर इसे कम-से-कम करना चाहता है और अंततः समाप्त करना चाहता है। इसके लिए उसे संगठित होने की जरूरत होती है। कार्ल मार्क्स ने अपनी कालजयी कृति “पूंजी” में लक्षणिक रूप से कहा है, "पूंजी वह मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह जीवित श्रम का खून चूसकर ही जीवित रहती है, और  श्रम के रूप में जितना अधिक खून चूसती है, उतना ही अधिक जीवित रहती है।"


सदियों के संघर्षों और शहादतों के परिणाम स्वरूप मजदूरों ने दिन के 8 घंटे के काम के अधिकार के साथ कुछ अधिकार हासिल किए थे।  दिन के 8 घंटे के काम का अधिकार मार्क्स तथा यूरोप के अन्य जाने माने मजदूर नेताओं/समाजवादी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में 1864 में स्थापित मजदूर अंतर्राष्ट्रीय संगठन (फर्स्ट इंटरनेसनल) की प्रमुख मांगों में था। संघर्षों से हासिल मजदूर अधिकारों को इंगलैंड और अमेरिका में दक्षिणपंथी सरकारों ने 1980 के दशक से छीनना शुरू किया तथा 1990 के दशक में भूमंडलीकरण के साथ यह प्रवृत्ति भूमंडलीय हो गयी। भारत में भूमंडलीकरण के समर्थक भी इसमें निहित अमानवीय हद तक मजदूर विरोधी प्रवृत्तियों से सहमत थे और उन्होंने ‘मानवीय चेहरे के साथ’ भूमंडलीकरण की बात करना शुरू किया। भूमंडलीकरण के नाम पर एक तरफ कल्याणकारी संस्थाओं का विघटन शुरू हुआ दूसरी तरफ मजदूर विरोधी नीतियों का प्रतिपादन। मजदूर विरोधी नीतियां बनती और लागू होती गयीं और ट्रेड यूनियनें टूटती/कमजोर होती गयीं नजीजतन दशक-दर-दशक बीतते गए और मजदूर विरोधी नीतियों तथा मजदूरों के शोषण-दमन के विरुद्ध राष्ट्रीय या प्रदेश स्तर पर किसी ट्रेड यूनियन आंदोलन की खबर नहीं मिली। जो भी छिट-पुट समूह; मानवाधिकार संगठन या कार्यकर्ता मजदूरों के पक्ष में बोलते हैं, उन्हें सरकारें; उनके लंबरदार; सांप्रदायिक अंधभक्त और मृदंग मीडिया अर्बन नक्सल या देशद्रोही घोषित कर देती है। राष्ट्रीय ट्रेडयूनियनों का अस्तित्व संगठित क्षेत्र में सिमटता गया और धीरे धीरे उत्पादन का संगठित क्षेत्र नगण्य होता गया और असंगठित क्षेत्र में ट्रेडयूनियन बनाने की मनाही है। उत्पादन और सेवा-क्षेत्रों में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर ठेकेदारी प्रथा लागू होती गयी। 8 घंटे काम का अधिकार गूलर का फूल होता गया तथा अमानवीय स्तर की दयनीय मजदूरी पर 12 से 16 घंटे काम लिया जाने लगा। मार्क्स ने “दर्शन की गरीबी” में लिखा है कि अपनी आर्थिक परिस्थितियों के चलते मजदूर ‘अपने आप में वर्ग’ हैं, लेकिन तब तक वे एक भीड़ भर रहते हैं, जब तक साझा हितों के आधार पर साझे संघर्ष के लिए संगठित होकर  ‘अपने लिए वर्ग’ नहीं बनते हैं। साझा हितों के आधार पर वे साझे संघर्ष के लिए तभी संगठित होते हैं, जब वे वर्गचेतना से लैश होते हैं। वर्ग चेतना से लैश होनने को सामाजिक चेतना का जनवादीकरण भी कहा जा सकता है। सामाजिक चेतना का निर्माण शासक वर्गों के वैचारिक प्रभाव के चलते होता है, जिसे मार्क्स ‘युग का विचार’ कहते हैं। युग के विचार यानि शासक वर्ग की विचारधारा को तोड़कर सामाजिक चेतना के जनवादीकरण या वर्गचेतना के संचार से ही मजदूर वर्गचेतना से लैश होकर वर्गसंघर्ष के लिए संगठित होता है। मजदूरी में वृद्धि और काम की परिस्थितियों जैसी मांगों के लिए  आर्थिक संघर्ष भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा है, जिसे क्रांतिकारी राजनैतिक संघर्ष का पूर्वाभ्यास भी कहा जा सकता है। जैसा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुछ मजदूरों से बातचीत से लगा, किसी राजनैतिक पार्टी या राष्ट्रीय ट्रेडयूनियन के अभाव में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव तथा मानेसर एवं बिहार के बरौनी में फूटा मजदूरों का जनाक्रोश एवं हड़तालें स्वफूर्त वर्ग चेतना का परिणाम हैं।   


पश्चिमी एशिया में अमेरिका-इज्रायल द्वारा थोपे गए साम्राज्यवादी युद्ध के चलते, रसोई-गैस की किल्लत की सबसे अधिक मार मजदूरों पर पड़ी और बहुत से मजदूर काम छोड़कर अपने गांव भागने लगे, लेकिन गांव में रोजी-रोटी की सुविधा होती तो वे पेट भरने के लिए हजार मील दूर क्यो आते? काम की शर्तों में सुधार और मजदूरी में न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीवन-बसर भर की बढ़ोत्तरी के लिए हड़ताल के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा। संविधान में जीने का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज है, और जीने की शर्त है भरण-पोषण की न्यूनतम जरूरतें जिन्हें पूरी करना साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी की व्यवस्था अनावश्यक मानती है। ऐसे में असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश का विस्फोट  लाजिमी है। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आती हैं, “रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है।”  बौखलाहट में सरकार मजदूरों, मजदूरों की जायज मांगों के लिए उनके आंदोलन का समर्थन करने वाले छात्र एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हिंसा भड़काने के झूठे आरेपों में गिरफ्तार कर रही है। नोएडा पुलिस यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं भगत सिंह तथा साथियों के दस्तावेजों के संपाद सत्यम वर्मा तथा मजदूर बिगुल से जुड़े कई छात्रों को गिरफ्तार कर चुकी है। गौतमबुद्ध नगर के जेल अधिकारियों के मार्फत मिली अपुष्ट खबरों के अनुसार, गंभीर आरोपों में बंद कुछ मजदूरों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा ज्यादातर मजदूरों को जमानत पर छोड़ा जा चुका है। मजदूरों के मामले में गंभीर आरोप कितने गढ़े हुए होते हैं, जग जाहिर है। आद्योगिक इलाके तथा कारखाना क्षेत्र पुलिस छावनियों में तब्दील हो गए हैं।  


24 अप्रैल को मानवाधिकार संगठन “जन हस्तक्षेप” की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों से बातचीत में पाया कि आंदोलन की शुरुआत रिचा ग्लोबल गारमेंट कंपनी से हुई। कंपनी पहले गुड़गांव में थी और वहां अधिक वेतन देती थी। कुछ साल पहले कंपनी ने नोएडा सेक्टर 83 में शिफ्ट होने के बाद, मजदूरी में कटौती कर दी। इसके लिए कंपनी ने एक नायाब तरीका निकाला पहले मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया  और फिर उन्हें ही कम वेतन पर फिर से काम पर रख लिया। जनहस्तक्षेप टीम को “एक मजदूर ने बताया कि 9 अप्रैल को खबर फैली कि हरियाणा सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन में 35% वृद्धि के कारण कंपनी के मानेसर प्लांट में अधिक वेतन दिया जा रहा है, जिससे कंपनी के नोएडा कार्यालय के मजदूरों में असंतोष बढ़ गया। वे समान काम की समान मजदूरी की मांग करने लगे। 9 अप्रैल 2026 को मजदूरों ने कंपनी गेट पर धरना शुरू कर दिया। 10 अप्रैल को प्रबंधन ने पुलिस बुलाई और कुछ मजदूरों को गिरफ्तार करवा दिया। इसके बावजूद विरोध शांतिपूर्ण बना रहा। अगले दिन विरोध मदरसन जैसी अन्य कंपनियों तक फैल गया।”


 सरकार आंदोलन को दबाने और आंदोलनकारी मजदूरों का दमन करने तथा आंदोलन को बदनाम करने की जुगत में लग गयी। कल 28 अप्रैल 2026 को ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ द्वारा प्रेस क्लब दिल्ली में आयोजिक पत्रकार सम्मेलन में सरकार द्वारा आंदोलन का मास्टर माइंड घोषित, आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद ने वीडियो दिखाया जिसमें आदित्य और अन्य आंदोलनकारी शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील कर रहे हैं और व्याट्सअप की क्लिपिंग दिखाय़ा जिसमें पुलिस के घुसपैठिए आंदोलन को वदनाम करने के लिए हिंसा की अपील कर रहे हैं। खैर यह तो सुविदित तथ्य है कि मजदूरों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए पुलिस घुसपैठकर उसे हिंसक बनाने की कोशिश करती है चाहे वह 1886 का शिकागो का मजदूर आंदोलन हो या 2026 का नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गुडगांव-मानेसर का।   


जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों से बातचीत में पता चला कि 13 अप्रैल को पुलिस ने कंपनियों के सामने सड़कों पर बैरिकेड्स लगा दिए, जिससे ट्रैफिक जाम हो गया। जाम में फंसे लोगों के विरोध के विरुद्ध पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिससे फैली अफरा-तफरी को चलते आंदोलन पास की फैक्ट्रियों तक फैल गया और  धीरे-धीरे, आंदोलन नोएडा फेज 2, सेक्टर 59, 60, 62, 83 और 84 के औद्योगिक क्षेत्रों में फैलता गया। पुलिस ने मजदूरों की अंधाधुंध गिरफ्तारी शुरू कर दी और विरोध में देखते-देखते  30,000-40,000 मजदूर सड़कों पर आ गए। पुलिस ने एक हजार से ज्यादा मजदूरों को गिरफ्तार किया, उन्हें 5 से 7 दिनों तक जेल में रखा, उनके परिवारों को उनके ठिकाने की जानकारी तक नहीं दी। मजदूर न्यूनतम वेतन और श्रम कानूनों को लागू करनेके लिए आंदोलित थे लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर में उकसाने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आगजनी के झूठे आरोप हैं। घटना के बाद, सरकार और श्रम विभाग ने कई ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द करना शुरू कर दिया, जो इस बात का प्रमाण है कि सरकार भी मानती है कि उद्योगपति और ठेकेदार गड़बड़ कर रहे थे। 

हमारी समझ से यह आंदोलन स्वस्फूर्त है तथा मजदूरों में अपने हितों के प्रति स्वस्फूत चेतना का संचार क्रांतिकारी परिघटना है और असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश के विस्फोट का जो सिलसिला बिहार में बरौनी और हरियाणा में पानीपत के बाद मानेसर, गुड़गांव, फरीदाबाद, उत्तरप्रदेश में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, इलाहाबाद, राजधानी दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों, राजस्थान में भिवाड़ी, टप्पूकड़ा, चौपानकी, खुशखेड़ा, नीमराना, और उत्तराखंड में लालकुआँ, हलद्वानी, रुद्रपुर से होते हुए आगे बढ़ा, वह अब गुजरात के सूरत और हजिरा आदि से होते हुए झारखण्ड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों तक फैलता जा रहा है। दक्षिण के औद्योगिक क्षेत्रों में भी ज्वालामुखी विस्फोट के लिए सतह के नीचे कुलबुला रहा है। यह लेख इस आशावादी मनोकामना के साथ समाप्त करना अनुचित न होगा कि उम्मीद है कि यह आंदोलन देश में मजदूरों के भावी क्रांतिकारी आंदोलन का पूर्वकथ्य साबित होगा। 

25.05.2026

समयांतर, मई, 2026 वमें प्रकाशित

Thursday, May 14, 2026

बेतरतीब 188(स्टीमर)

 मैं पहली बार स्टीमर (पानी का जहाज ) में विंध्याचल जाने के लिए मिर्जापुर में गंगा पार करने के लिए बैठा। 1960 के आस-पास की बात होगी। उसके पहले, सुने थे कि हमारे गांव और आसपास के गांवों से लोग जौनपुर-भदोही होते हुए बैलगाड़ी से गंगा तट पहुंचते थे और नाव से गंगा पार कर विंध्याचल जाते थे। मैं 5 साल से ज्यादा उम्र का था यह बात निश्चितता से इसलिए कह सकता हूं कि मेरे सिर पर बड़े बाल नहीं थे और पांचवे साल में मेरी मुंडन हो चुकी थी। उस समय रेल से विंध्याचल जाने के दो रास्ते थे, बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय जाकर और वहां से गाड़ी बदलकर विंध्याचल जाना और दूसरा बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय की गाड़ी से जाकर बनारस में उतर जाना और वहां से इलाहाबाद (रामबाग) की छोटी लाइन (अब बड़ी लाइन हो गयी है) से माधो सिंह उतर कर नाव से गंगा पार कर मिर्जापुर/विंध्याचल जाना। यह बात मैं स्थितिजन्य आकलन से कह रहा हूं। अब उस यात्रा की और बाते तो हमें याद नहीं हैं लेकिन माधो सिंह स्टेसन याद है क्योंकि वहां मैं खो गया था और स्टीमर (पानी का जहाज) याद है। स्टीमर को मुझे जहाज कहते सुन किसी ने समझाया कि जहाज उससे 100 गुना बड़ा होता है। 2019 में कार से विंध्याचल से लौटते समय माधो सिंह स्टेसन देखने का मन हुआ । ब्रिटिशकालीन वह स्टेसन जस-का-तस बना हुआ है जाैसा कि हमने उसे बचपन में देखा था। वहां मेरी मां (माई) और दादी (अइया) समेत गांव के बहुत से स्त्री-पुरुष तथा बच्चों का मेला था। पैलेंजर से बनारस जाकर माधो सिंह आए होंगे। स्टेसन पर मैं मेले में से निकल कर घूमने चला गया तथा खीरा खाते हुए गांव के मेले में पहुंचा तो पता चला कि लोगों ने समझा कि मैं खो गया। खैर यह बात फिर कभी। उसके कई साल बाद मैं जब हाई स्कूल में जौनपुर पढ़ता था तो कभी कभी बनारस घूमने चला जाता था। उस समय अस्सी और रामनगर के बीच स्टीमर चलता था, मैं कई बार स्टीमर में चढ़ने के लिए अस्सी से रामनगर चला जाता था। अंडमान में जब वाकई जहाज देखा तब बचपन की बात याद आई कि जहाज स्टीमर सो 100 गुना बड़ा होता है, वास्तव में उससे भी बहुत बड़ा।

Monday, May 4, 2026

शिक्षा और ज्ञान 391 (राम रहीम)

 एक पोस्ट पर कमेंट:


राम रहीम ने बलात्कार तो अपनी भक्तिनों का ही किया और भक्तिन का बलात्कार करना भगवान को अपराधी नहीं बना सकता अदालत ने विदेशी कानून के प्रभाव में उसे सजा सुना दिया ऐसे में हिंदुत्व सरकार द्वारा उसे पेरोल देना और प्रवचन करवाना पाप नहीं, पुण्य है। जहां तक उमर खालिद का सवाल है वह मुसलमान नाम वाला तो है ही ऊपर से मार्क्सवादी और नास्तिक भी है, पीएचडी भी उसने बस्तर के आदिवासियों पर किया है जिनकी जमीनेें और जंगल राष्ट्रीय धनपशु अडानी जी को चाहिए। ऐसे पापी को देशभक्त सरकार जमानत कैसे दे सकती है?

Friday, May 1, 2026

शिक्षा और ज्ञान 390 (साप्रदायिकता)

 एक पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब


सांप्रदायिकता का निर्माण अंग्रेजों ने बांटो-राज करो की नीति के तहत उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए इस्लामी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व राष्ट्रवाद की विचारधाराएं उछालकर किया और उसके लिए उसे मुस्लिम लीग-जमातेइस्लामी तथा हिंदू महासभा -आरएसएस के रूप में दोनों समुदायों से दलाल भी मिल गए, अपने इन्ही दलीालों की मदद से औपनिवेशिक शासक देश का विभाजन करने में सफल रहे। यदि देश का विभाजन न होता तो देश के किसी हिस्से में साप्रदायिक ताकतें सत्ता पर काबिज न हो पोतीं। मुस्लिम पाकिस्तान तो 1947 में ही बन गया, हिंदू पाकिस्तान अब बन रहा है।

Monday, March 23, 2026

बेतरतीब 187(अटारी)

 एक पोस्ट पर कमेंट :


1983 में मुझे अटारी में समझौता एक्सप्रेस में सहायक गार्ड की नौकरी करने वाला एक मेरा हमउम्र पाकिस्तानी मिला, जियाउल हक का जमाना था, पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी थी उसे समझौता एकप्रेस की ड्यूटी इसलिए ज्यादा पसंद थी कि वह अमृतसर जाकर खुलेआम बीयर पी सकता था। उसके दादा आजमगढ़ के थे और रेलवे में नौकरी करते थे, बंटवारे के समय उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी और वे वहीं रह गए। वह खुद को आजमगढ़ का समझता था मुझसे मिलकर वह इतना गद गद हुआ जैसे वह अपने गांव-देश के किसी से मिला हो, वह कभी आजमगढ़ गया नहीं लेकिन अपने दादा-परदादा के घर और बाग का ऐसा सजीव चित्रण करता था जैसे कि उसका बचपन वहीं बीता हो।

महामानव

 महाबली ने कहा, हमारे नॉनबायलोडिकल महामानव की नकेल उसके हाथ में है, महामानव उसके सामने नतमस्तक हो गए, शायद उसके पास एप्स्टीन फाइल की गुप्त जानकारियां हों, यदि मामला हरदीप पुरी तक सीमित होता तो महामानव ने उनसे छुटकारा पा लिया होता। पुरी इस अंदाज में अकड़ रहा है कि हम यदि डूबे सनम तो आपको भी ले डूबेंगे। महामानव महाबली के दर्शन को तो आतुर रहते ही हैं, तेलअवीव की तीर्थयात्रा में छोटे महाबली, इज्रायली नाजी नेता के भी दर्शन करके सनद ले आए। जब महाबली और छोटे महाबलियो ने बौराकर इरान पर ताबड़तोड़ हमला किया तो महामानव और उनके अंधभक्त सुर-असुर भजन गाने लगे। अब जब इरान ने जवाबी हमले में महाबली और उनके नायब को धूल चटादी तो महामानव ने इरानी राष्ट्रपति से शिकायत किया कि उन्हें अरब राजशाहियों में अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना चाहिए था, परमाणु हमले से इरान को तबाह करने वाले इज्रायली नाजियों की धमकी पर महामानव मतमस्तक हैं। महाबली ने कहा ईरान से तेल मत लो. महामानव ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने कहा रूस से तल लोगे तो दंडित करूंगा तो महामान ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने तरस खाकर कुछ समय तक रूस से तेल खरीदने पर छूट दे दी, महामानव कृपा पर गद गद हो गए। रूस ने धमकी दी कि यदि इज्रायल ने ईरान पर परमाणु हमला किया तो वह इज्रायल को नेस्तनाबूद कर देगा, महाबली और उनके नायब युद्ध रोकने का बहाना ढूंढ़ रहे हैं, इरान कह रहा है, फतह या शहादत।


गरीब आदमी गैस का सिलिंडर लेकर उसी तरह लंबी लाइनों में खड़ा टूल्हा जलने के इंतजाम का इंतजार कर रहा है जैसे वह नोटबंदी की सनक की मार से बैंको के आगे लंबी लाइन में खड़ा था। मध्यवर्ग तो अभी तक पेट पर भी लात खाकर भजन गा रहा है, लेकिन शीघ्र ही उसे भी पेट पर भी लात के लाले पड़ने वाले हैं। अयोध्या के रामलला महामानव को सद्बुद्धि दें कि वे देश को प्रलय की आग में झोंकने से बाज आएं।