Friday, February 23, 2018

कोई बात बेबुनियाद नहीं होती

कोई बात बेबुनियाद नहीं होती
हक की लड़ा बेबात नहीं होती
नहीं आते अमूर्त विचार किसी निर्वात से
निकलते हैं वे वस्तुगत पर दृष्टिपात से
पाता है यथार्थ संपूर्णता दोनों के द्वंद्वात्मक संवाद से
न देती तुम ग़र एकता की आवाज
लगाता न मैं इंकिलाब जिंदाबाद
(ईमि: 24,02.2018)

लल्ला पुराण 187 ( हबीब जालिब)

Shailendra Gaur सहमत। सवाल-दर-सवाल; जवाब-दर-सवाल ही विकास का मूलमंत्र है, सर्वज्ञ फतवेबाजी नहीं। कई सवाल सवाल नहीं होते, मानसिक संरचना की अभिव्यक्ति होती है। इनका यह सवाल नहीं अज्ञानतापूर्ण ज्ञान है। किसी भी देश का मार्क्सवादी उस देश के मजहब का शत्रु माना जाता है। इऱफान हबीब (इतिहासकार) पर मुसंघियों के अनंत हमले हुए। पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब ने ज्यादा वक्त जिया की जेलों में बिताया। वाम के भूत से संघी-मुसंघी दोनों परेशान रहते हैं। 'न मेरा घर है खतरे में, न तेरा घर है खतरे में/वतन को कुछ नहीं खतरा, निजाम-ए-जर है खतरे में'। 'बहुत सुन ली आपकी तकरीर मौलाना, बदली नहीं मगर मेरी तकदीर मौलाना/हकीकत क्या है ये तो आप जानें या खुदा जाने, सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना'। 'हिंदुस्तान भी मेरा है, पाकिस्तान भी मेरा है/दोनों मे ही लेकिन अमरीका का डेरा है'। (जालिब) हर समझदार व्यक्ति युद्धविरोधी है और अपने देश की जंगखोरी की सरकार के लिए देशद्रोही। जंग चाहता जंगखोर, ताकि राज कर सके हरामखोर। अफवाहजन्य इतिहास बोध से उपजी अफवाहगोई देश की अखंड़ता और सामासिक एकता के लिए खतरनाक होता है।

लल्लापुराण 186 ( स्व के न्याय और स्वार्थबोध)

स्वयं को ही बेहतर मानने का कोई इगो नहीं है। मेरी बेटी के साथ मेरे संवाद को कोई सुने तो दांत तले उंगली दबा ले। कभी कहता हूं कि अपने बाप से ऐसा करती हो? दूसरे के बाप के साथ ऐसा करने में खतरे की बात करती है। ज्यादा कुछ कहने पर कहती है, उसके बाप ने यही सिखाया है। हम बहुत अच्छे दोस्त हैं। मैं समानता के सुख को सर्वोच्च सुख मानता हूं।

मिडिल स्कूल में टीचर ने पूछा क्या बनोगे, अह 11-12 साल के गांव के लड़के को क्या मालुम क्या बनेगा? मैंने कहा अच्छा। अच्छा तो प्रेडिकेट है अपने आप में कुछ नहीं, अच्छा इंसान, अच्छा शिक्षक, अच्छा बाप, अच्छा वार्डन। अच्छा बनने के लिए लगातार अच्छा करना पड़ता है। अच्छा करने के लिए 'क्या अच्छा है?' जानना पड़ता है। जानने का कोई फॉर्मूला नहीं है, खास परिस्थिति में दिमाग के इस्तेमाल से जाना जा सकता है।

सभ्य (वर्ग) समाज व्यक्तित्व को विखंडित करता है -- स्व का न्यायबोध और स्व का स्वार्थबोध में। स्व के न्यायबोध की प्रथमिकता स्व के स्वार्थबोध की प्राथमिकता से ज्यादा सुखद है। सोचने का साहस और सोच के परिणामस्वरूप समझ को व्यवहार में सामाजिक प्रचलन की परवाह किए व्यवहार में अमल करने की जुर्रत, अच्छा करना है। बिल्ली के गले में घंटी बांधना ही है तोमैं ही क्यों नहीं? मैं निजी आक्षेप और मेरा नाम देखते ही पंजीरी खाकर भजन गाने वालों से कोफ्त हो जाती है, अपनी भाषा की मर्यादा और समय बचाने के लिए उन्हें अदृश्य कर देता हूं। अच्छा होने के सुख का मूलमंत्र है, करनी-कथनी में एका का लगातार प्रयास।

लल्ला पुराण 185 (जोहरा बेगम)

जोहरा बेगम के नब्बेवें जन्मदिन पर टीवी पर एक पत्रकार ने पूछा कि उन्हें मौत का डर नहीं लग रहा था उन्होंने उल्टे उससे पूछा, "तुम यकीन से कह सकते हो कि मेरे पहले नहीं मरोगे? जोहरा बेगम तो उसके बाद काफी दिन रहीं, उस पत्रकार का नहीं पता। इस बात की याद इस बात से आई कि कई लोग मेरे बुढ़ापे पर तरस खाकर मेरी मौत की कामना करने लगते हैं। मौत अंतिम सत्य है लेकिन अनिश्चित। जिंदगी निश्चित और ठोस, उसी का आनंद लें। दुर्वाशा का देश है मैं डर जाता हूं क्योंकि मुझे 135 साल जीना है, 72 साल ही अब बचे हैं, किसी के शाप से इससे भी कम हो सकती है। शाप से बचने के लिए उनकी दृष्टि से ओझल हो जाता हूं। 1974-75 में एक बार कटरा पानी की टंकी के पास लल्लू के ठेले पर चाय पीते हुए सब बात-बात में किसी ने कहा वह इतने साल जीना चाहता है, वह इतने, 100 तक कोई पहुंच ही नहीं रहा था। मेरे मुंह से निकला मैं तो 135 साल जिऊंगा (चाहता हूं, नहीं। गणित का विद्यार्थी था, जिसमें कमोबेश कुछ नहीं होता)। तबसे इस संख्या में बदलाव का कोई कारण नहीं मिला। अरो भाई जो अपुने हाथ में नहीं उसकी चिंता क्यों? जो हाथ में है, जो जीवन है, जो अनिश्चित नहीं निश्चित है, उसे सुंदरतम बनाएं, वह विचारों के विकास-विस्तार और उन्हे व्यवहार में अमल करते हुए जीने से संभव है। मुझे वैसे इन बातों का बुरा मानने से ऊपर उठ जाना चाहिए। लेकिन ऋषि-मुनि तो हूं नहीं एक आवारा 'वामी' हूं, कभी-कभी नही उठ पाता ऊपर। भाई मैं 1955 में बिना अपनी मर्जी के पैदा हो गया और बिना अपने प्रयास के उम्र साल-दर-साल बढ़ती ही जाएगी। प्रोफाइल में भी सफेद दाढ़ी की ही तस्वीर शफल करता रहता हूं, कभी कभी नस्टेल्जिया के कोई सिर पर बाल वाली तस्वीर लगा देता हूं, आश्वस्त होने के लिए कि दाढ़ी कभी काली भी थी और सिर पर बाल भी थे। हा हा ।

लल्ला पुराण 184 (समय निवेश)

 इलाहाबाद विवि के एर फेसबुक ग्रुप, लल्ला की चुंगी, पर फेसबुक मित्र पूर्णेंदु शुक्ल से इनबॉक्स में संवाद का अंश:

आप खंगालिए मेरी पोस्ट। कम-से-कम 50 लेख अन्यान्य विषयों पर। इस मंच पर बहुत से सवर्ण पुरुषों के अपनी पोस्ट पर कमेंट देख लगता है इन लड़कों ने जीवन में कुंजी और दैनिक जागरण या पीसीयस कोचिंग नोट्स के अलावा कुछ पढ़ा ही नहीं है। कुछ ऐसे ही लंपट मेरा नाम देखते ही धर्म धर्म--जेयनयू जेयनयू अभुआने लगतै हैं। आप देखिये 3-4 साल की पोस्ट्स में कृष्ण की चर्चा नहीं है। पारितोष दूबे की मां-बहन वाले कमेंट के साथ मेरी पोस्ट के बाद अरविंद राय ने एक पोस्ट डाला कि मैं उनके आराध्य कृष्ण को फरेबी कह रहा था उनकी भावनाएं आहत हुई हैं, टिपिकल संघी साजिश धर्मोंमाद फैलाकर दंगे करवाना, मॉबलिंचिंग करना, जैसे योगी की वाहिनी का वह दीक्षित गाय काटकर कर रहा था। इसे मैं अपढ़ समझता था शातिर नहीं। मैंने सोचा था कि ऐसे अपढ़ों को कुछ पढ़ा दूंगा, लेकिन ये तो आभासी दुनिया के लंपट हैं, सीखने की बजाय शिक्षक को नीचा दिखाने की कोशिस करते हैं। 2 अक्षर अंग्रेजी पढ़ नहीं सकते भाषा की तमीज है नहीं। इन लंपटों पर बहुत समय बर्बाद किया। कल एक लेख का समय इस मंच पर नष्ट कर दिया। इनकी भाषा सड़क छाप गुंडों की भाषा लगती है। मैं इन्हें ब्लॉक इसलिए करता हूं कि मैं कई बार 42 साल पहले 20 का होने की बात भूल कर अपनी भाषा भ्रष्ट कर लेता हूं। कल एक झुंडवीर ने कहा कि सामने होता तो वे मुझे भाषा की तमीज सिखाते, ऐसे जैसे मैं गुंडों और कुत्तों से डरता हूं जो झुंड में शेर हो जाते हैं, वैसे पत्थर उठाने के अभिनय से ही दुम दबाकर भाग जाते हैं।  मैं समय खर्च करता हूं, व्यर्थ नहीं। यहां निवेश के हानिपूर्ण प्रभाव हैं।  इस ग्रुप पर अब ब्लॉग से नए लेख शेयर करने के अलावा सक्रिय सदस्यता समाप्त करता हूं, समय कम है काम ज्यादा। पता नहीं कैसा पालन-पोषण-शिक्षा मिलती है इन्हें, कि बात करने की न्यूनतम तमीज भी नहीं निभा पाते। सानियर-जूनियर की संस्कृति की बात करते हैं और बाप की उम्र के सीनियर की बिन कारण बताए मां-बहन करने लगते हैं, मेरी दुनिया में इलाहाबाद भी है, लेकिन उससे परे भी है। सादर।

Thursday, February 22, 2018

लल्ला पुराण 183 (राम)

Shailendra Singh बाल्मीकि के शूद्र होने की बात ब्राह्मणो द्वारा फैलाई गयी किंवदंति है, जैसे कालिदास के मूर्खता की किंवदंतियां। जी, वर्णाश्रम की शुरुआत तार्किक श्रम विभाजन के रूप में हुई। कालांतर में ब्राह्मणों ने परजीवी वर्गों (सवर्ण) की प्रिविलिजेज अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने और श्रमजीवियों की अधीनता को स्थाईभाव देने के लिए इसे जन्मजात बना दिया। यह काम अत्रेय ब्राह्मण की रचना तक (लगभग 1000 ईशापूर्व) हो चुका था। बुद्ध के समय तक जन्म आधारित वर्णाश्रम गहरी जड़ें जमा चुका था, बुद्ध का विद्रोह इसी विकृति के विरुद्ध था।

लल्ला पुराण 182 (धर्म)

Gitendra Singh धर्म पर मैंने अपना एक लेख इस ग्रुप में पोस्ट किया था, लेकिन ये पढ़ते तो हैं नहीं, नाम देखते ही इन पर वामी कौमी का भूत सवार हो जाता है। वेदांतियों में चारवाक हूं कविता में मैंने अपना परिचय दे दिया था। सीपीयम में घमासान (समयांतर, फरवरी) लेख भी शेयर किया था। जिन्हें ये वामी-कौमी कहते हैं, उन्हें हम वामी-कौमी मानते नहीं, वे हमें अराजक मानते हैं। लेकिन पढ़ने का धैर्य इनके पास है नहीं, ये जिल्द देखकर किताब की समीक्षा लिखने वाले लोग है। जिस तरह ब्राह्मणवाद कर्म-विचारों की बजाय जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घटना के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है, उसी तरह ये लोग जो लिखा है उसे पढ़कर, उनका खंडन-मंडन करने की बजाय, नाम देखते ही वामी-कौमी भूत से पीड़ित हो अभुआने लगते हैं। और कुछ नहीं मिलता तो कुछ युवा मेरे बुढ़ापे पर तरस खाने लगते हैं जैसे वे चिरयुवा ही रहेंगे? ऐसी विकृत सोच बच्चों के दिमागों में कहां से आती है? क्या हम उन्हें यही पढ़ाते हैं? धर्म पीड़ित की आह है, निराश की आश है, पीड़ा का कारण भी है, प्रतिरोध का संबल भी। धर्म खुशी की खुशफहमी देता है। किसी से धर्म छोड़ने को कहने का मतलब है उस खुशफहमी को छोड़ने को कहना है, लेकिन यह तब तक नहीं हो सकता जब तक खुशफहमी की जरूरत की परिस्थितियां नहीं खत्म होती। वास्तविक सुख मिलने पर खुशफहमी की जरूरत नहीं रहेगी, धर्म अपने आप अनावश्यक हो जाएगा। हमारा समाजीकरण ऐसा होता है कि हमारे अंदर आत्मबल पर अविश्वास बढ़ता है और दैविकता पर विश्वास। आत्मबलबोध वापस पाने के बाद इंसान को भ्रम की जरूरत नहीं रहती, वह कष्टों को तथ्यात्मक रूप से समझता है, दैवीय अभिशाप के रूप में नहीं। मेरी पत्नी का मानना है कि उनकी मनौती के चलते मुझे नौकरी मिली। मेरा क्या जाता है, अगर उन्हें इसमें खुशी की खुशफहमी मिलती है! लेकिन आत्मबल पर विश्वास की प्राप्ति के लिए कठिन और निरंतर आत्मावलोकन-आत्मसंघर्ष की जरूरत होती है। इसी दुरूह प्रक्रिया को मैं मुहावरे में बाभन से इंसान बनना कहता हूं, जनेऊ तोड़ना जिसकी पूर्व-शर्त है।
एक कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मण बालक की नास्तिकता का सफर आसान नहीं था। मार्क्सवाद धर्म को नहीं, उन परिस्थितियों को खत्म करने की बात करता है जिनके चलते धर्म की जरूरत होती है, धर्म अपने आप खत्म हो जाएगा। इसी लिए हम ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जिसमें कष्ट ही न हों, कष्ट-निवारक की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कई बार सरोज जी के फूल तोड़ने के लिए गुड़हल की डाल भी लटकाता हूं। देवी को लाल गुड़हल प्रिय हैं और इसलिए खिलते ही टूट जाते हैं। कभी कहता हूं देवी को संख्या से क्या मतलब, लेकिन आस्था के सवाल पर तर्क बेअसर हो जाता है।