कक्षा 7
जब (जुलाई,1965) मैं कक्षा 7 में गया तो कक्षा 8 में लग्गूपुर (जूनियर हाई स्कूल पवई) मेरे गांव का कोई नहीं था। 1963-64 में जो लड़के कक्षा 4 में मेरे सहपाठी थे वे अब कक्षा 6 में आ गए। मैं उसी साल कक्षा 4 से प्रोमोट होकर कक्षा 5 में चला गया था और अगली साल जब मैं कक्षा 6 में गया तो वे सब कक्षा 5 में। 1965-66 सत्र में वे कक्षा 6 में आए। इस तरह उस साल (1965-66) लग्गूपुर पढ़ने जाने वालों में कक्षा 6 में कई लोग थे – लल्लू बाबा के बेटे महेंद्र सिंह; पुरवा पर को सहती सिंह के पोते और इंद्रबली सिंह के बेटे जगदीश सिंह; उन्हीं को पट्टीदार यदुनाथ सिंह, जिनके (पिता और दादा का नाम याद नहीं है); देव नारायण सिंह के बेटे आद्या सिंह तथा बहाल यादव और भगवती धोबी। ये सब उम्र में मुझसे बड़े थे। उस साल कक्षा 7 में अपने गांव का मैं अकेले था और कक्षा 8 में कोई नहीं।
अपराधबोध 2
गांव के गैरसवर्णों में प्राइमरी से आगे पढ़ने वालों में मुझसे सीनियर थे मटरू यादव, जो मेरे लग्गूपुर में दाखिला लेने की साल, मिडिल पास कर लिए थे। उनका वास्तविक नाम कुछ और था जो मुझे अब याद नहीं है। वे मेरे बड़े भाई के साथ पढ़ते थे। 1965 में भगवती धोबी और राम बहाल यादव ही लग्गू पुर पढ़ने जाने वाले मेरे गांव के सहयात्रियों में गैर सवर्ण थे।
ठीक से याद नहीं है कि सिलसिला कैसे शुरू हुआ, लेकिन सत्र की शुरुआत से ही, भगवती धोबी और राम बहाल यादव बारी बारी में बस्ता ढोते थे। इसमें किसी को कुछ भी असामान्यय नहीं लगता था और सांस्कृतिक वर्चस्व के तहत विशेषाधिकार (priviledge) अधिकार लगने लगता है। कई महीने यह सिलसिला चलता रहा। यदि अहिराना होकर आता तो बहाल मेरा बस्ता ले लेते और बाद में भगवती तथा धोबियाना होकर जाने में यह क्रम बदल जाता, कुछ दूर भगवती के मेरा बस्ता ढोने के बाद बहाल ले लेते। मिडिल स्कूल पास करने के बाद, कम उम्र में ही किसी बीमारी से बहाल का देहांत हो गया।भगवती कालांतर में ब्लॉक की सरकारी नौकरी में लग गया और फिलहाल अकबर में घर बनाकर बीपी चौधरी नाम से बस गया है। एक बार भगवती का फोन नंबर कहीं से मिल गया था और फोन करके इस घटना के बारे में पूछा और जाहिर है, उन्हें यह घटना याद है। हमारे गांव की सरहद के बाद सलारपुर केी सरहद में हम लोग मुरदहिया बाग में स्कूल यात्रा का पहला पड़ाव डालते थे। वहां बगल के गांवों, चकिया और बखरिया के लड़के भी आ मिलते थे। उसे मुरदहिया क्यों कहा जाता था, हम नहीं सोचते थे। अब लगता है कि वहां शायद पहले मुर्दे जलाए जाते रहे होंगे, यानि वहां श्मसान रहा होगा।
1965 के अगस्त-सितंबर की बात होगी, मैं लगभग साढ़े नौ साल का था ौर भगवती मुझसे दो-ढाई साल बड़ा। . एक दिन मुरदहिया बाग में पड़ाव के बाद उठते हुए भगवती ने कहा कि वहां से अपना बस्ता कुछ दूर खुद ले चलूं, यानि कुछ दूर के लिए, बस्ता ढोने से इंकार कर दिया। यह बात मुझे इतनी नागवार लगी कि मैं गुस्से से आगबबूला हो गया तथा उसे मारने के लिए बेल्ट निकाल लिया। भगवती ने मेरा हाथ पकड़ लिया, यानि कि मार खाने से इंकार कर दिया। यह बात और भी नागवर लगी, मेरा हाथ पकड़ने यानि उसके मार खाने से इंकार करने पर मैं इतना अपमानित महसूस किया कि मुझे रोना आ गया और मैं रोते हुए वहां से वापस घर लौट गया। यह मुझे कितनी बड़ी बात लगी रही होगी कि 3 साल लग्गूपुर पढ़ने के दौरान वह एक मात्र दिन था जब मैं घर से स्कूल के लिए निकलने के बावजूद स्कूल नहीं गया। रोते हुए वापस आया देख बाबा परेशान हो गए उनके पूछने पर मैंने क्या बताया, और उन्होंने क्या समझा ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उनके क्रोध से गांव में सभी लोग आक्रांत रहते थे। जो बात मुझे थोड़ा थोड़ा-थोड़ा याद है वह यह है कि उनकी जमीन में बसे धोबी के बेटे की यह औकात कि उनके बेटे के साथ बदतमीजी करेगा। उनके क्रोधित होने की खबर नदी के किनारे बबूल के जंगल में बकरी चराते भगवती के पिता, संवली दादा तक पहुंची तो वे इतना घबरा गए बकरी हांकर घर ल्ले और लग्गूपुर स्कूल चले गए और वहां से भगवती को लेकर उसके ननिहाल पहुंचा दिए। वह कई दिनों तक न घर आया न स्कूल गया। उन दिनों भी कुछ लोग जातीय भेदभाव की बात नहीं मानते थे। लेकिन यह जातीय भेदभाव के अतिरिक्त और क्या था कि एक गैर सवर्ण छात्र के पिता एक सवर्ण के अनायास क्रोध से भयभीत होकर अपने बेटे को स्कूल जाना छुड़कर रिश्तेदारी में पहुंचा दिए?
उसी दिन से यह घटना मुझे उद्वेलित करती रही। सारा समय मैं इसी के बारे में सोचता रहा कि उसने मेरा बस्ता कुछ दूर ढोने के लिए मना किया था, जबकि मुझे अपना बस्ता खुद लेकर चलना चाहिए था। उसने मुझ पर जवाबी हमला तो नहीं किया, उसे मारने के लिए उठे मेरे हाथ को पकड़ भर लिया। वह मुझसे उम्र में बड़ा था ही शरीर से भी तगड़ा।अब लगता है कि वर्णाश्रमी सांस्कृतिक परिवेश में पले 9 साल के लड़के का यह आत्मचिंतन छोटी बाात नहीं थी। अपने ब्राह्मणीय श्रेष्ठताबोध पर अपराधबोध से ग्रस्त होकर एक दिन मैं भगवती के घर जाकर संवली दादा से उसे वापस बुलाने के लिए कहा और तय किया कि अबसे अपना बस्ता मैं खुद ढोऊंगा। ऐसा करने में अपराधबोध अधिक था या क्षमा भावना, ठीक से कह नहीं सकता। संवली दादा भगवती को वापस ले आए और हम सब सामान्य रूप से स्कूल जाने लगे ऐसे कि जैसे कोई बड़ी बात हुई ही न हो। अब लगता है कि यह उस समय की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना के लिहाज से असामान्य बात थी। उस दिन से मेरा व्यवहार भगवती और बहाल के साथ श्रेष्ठताबोध से मुक्त, मित्रवत समानुभूति का हो गया। अब सोचने पर पाता हूं कि इस घटना ने मुझे सामाजिक चेतना के प्रभाव से जनित व्यक्तित्वगत जातीय भेदभाव की विद्रूपता पर चिंतन को प्रेरित किया।
अब लगता है कि यह घटना मेरे व्यक्तित्व में आत्मावलोकन और आत्मालोचना की की शुरुआत की दृष्टि से निर्णायक साबित हुई। अब ब्राह्मणीय श्रेष्ठताबोध की सोच पर गंभीरता से सवाल करने लगा था। वर्णाश्रमी सास्कृतिक वर्चस्व के ऐतिहासिक संदर्भ में कर्मकांडी ब्राह्मण परिवेश में पैदा हुए, पले 9 साल के बालक का यह सांस्कृतिक आत्मालोकन और आत्मालोचना गौरतलब है।
