Saturday, October 10, 2026

जंतरमंतर 3

 कॉक्रोच जनता पार्टी के नेताओं के अमेरिका से दिल्ली आगमन पर पुलिस प्रोटेस्ट की अग्रिम अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर उन्हें लेने गयी और जंतरमंतर पर मंच बनाने की सुविधा दी। जब अपेक्षा से अधिक छात्रों का जमावड़ा हो गया और आंदोलन जनवादी करवट लेने लगा तब पुलिस बर्बरता पर उतारू हो गयी। कॉक्रोच नेता मंत्री नड्डा के घर जब वार्तालाप कर रहे थे, छात्रों पर दमन बढ़ गया। अबकी बार कॉक्रोच नेताओं के मुंबई से दिल्ली आगमन पर पुलिस ने उन्हें हवाई जहाज में ही अपनी हिरासत/हिफाजत में ले लिया और जंतर-मंतर इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। दिल्ली पुलिस के अलावा सीमा की सुरक्षा करने वाली बीएसएफ और सीआरपीएफ समेत तमाम एजेंसियों के 40 हजार से अधिक जवानों को तैनात कर दिया। नेहा बोरा समेत तमाम युवाओं को हिरासत में ले लिया। आपातकाल में भय का माहौल था लेकिन इतना नहीं तब केवल जाने माने नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी लेकिन आज के अघोषित आपातकाल में पुलिसिया दमन की गाज आमजन पर गिर रही है।

Thursday, October 8, 2026

जनादेश (रूसो)

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गुलामी बल पूर्वक लादी गयी है इसलिए बलपूर्वक उसे उखाड़ फेंकना न केवल लाजिमी है, बल्कि वांछनीय भी।

रूसो अपनी कालजयी कृति , ' Social Contract (सामाजिक अनुबंध)' की शुरुआत इन पंक्तियों के साथ करता है, 'मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और हर तरफ बेड़ियों में जकड़ा है'। ये बेड़िया धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी होती हैं। पैदा होते ही उस पर हिंदू-मुसलमान; बाभन-अहिर; गरीब अमीर; अभिजन-आमजन;.......... की तख्तियां चस्पा हो जाती हैं। इसी लिए वह एक ऐसा राज्य बनाना चाहता है जिसमें लोग पहले की तरह ( प्राकृतिक अवस्था जैसे) स्वतंत्र हो सकें।

पहले जैसी स्वतंत्रता के लिए वह एक अनुबंध की अनुशंसा करता है जो सार्वजनिक हित में कानूनों का जनादेश (General Will) निर्मित जिसके अनुसार आचरण सभी नागरिकों का अनिवार्य कर्तव्य होगा। 'किसी को भी जनादेश के उल्लंघन की अवुमति नहीं होगी, दूसरे शब्दों में हर किसी को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जाएगा'। गुलामी अधिकार नहीं हो सकता। 'स्वतंत्र होने की बाध्यता', दर असल सार्वजनिक हित में स्वयं के बनाए नियमों की बाध्यता, बाध्यता नहीं, स्वतंत्रता ही है।

Monday, October 5, 2026

हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं

 हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं

 हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं
भारत माता उसी तरह की संकटमोचक हैं जैसे विक्टोरिया युग में मजर ब्रिटानिका थी

यह गंगा स्नान जैसा है जिससे कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं
जिस तरह हनुमान चालिसा पढ़ने से भूत का डर खत्म हो जाता है
उसी तरह भारत माता की जय बोलकर किया गया हर अपराध
देश भक्ति हो जाता है और हर पाप पुण्य।

Saturday, September 26, 2026

मजदूरों के दमन की दास्तान

 मजदूरों के दमन की दास्तान


ईश मिश्र


आधुनिक राज्य पूंजीपति वर्ग के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी समिति है।  – कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स


सुविदित है कि अप्रैल, 2026 में नोएडा, गुड़गांव तथा अन्य औद्योगिक शहरों में मजदूरों ने काम की मानवीय स्थितियों और जिंदा रहने लायक मजदूरी के लिए शांतिपूर्ण हड़ताल की थी। 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट सेनिफेस्टो में लिखे उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि इतिहास के हर मोड़ पर होती रहती है। ताजा उदाहऱण, अप्रैल, 2026 के मजदूर आंदोलन का दमन है। जब भी मजदूर पूंजीपतियों से काम की न्यूनतम मानवीय स्थितियों और जीने की न्यूनतम जरूरतों भर की मजदूरी की मांग करता है तो पूंजीपतियों के हितों की रक्षा और मजदूरों के दमन और प्रताड़ना में राज्य मशीनरी उनसे आगे रहती है। 11 अप्रैल को मनेसर (गुड़गांव) के बाद जब मजदूरी में बढ़ोत्तरी और काम की स्थितियों की बेहतरी की मांग के साथ मजबूरन हड़ताल शुरू किया तो राज्य मशीनरी पूंजीपतियों की सेवा में, आंदोलनकारी मजदूरों और उनके समर्थन में उठी आवाजों के दमन में कर्तव्यपरायणबोध के साथ सक्रिय हो गयी।  मजदूरों के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करके दमन की परिस्थितियां तैयार करने के उद्देश्य से पूंजी पतियों के कारिंदों और पुलिसिया घुसपैठियों ने हिसा भड़काने की कोशिश की। (समयांतर, क्रमशः मई और जून, 2026) नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेसन से गिरफ्तार, आंदोलन के पक्ष में आवाज उठाने वाली, युवा कलाकार, श्रृष्टि के घर में फर्जी सबूत गढ़ने के पुलिस के प्रयास सीसीटीवी कैमरा में के फुटेज में आ गया। कैमरा देख पुलिस वालों ने फर्जीबाड़ा बंद कर दिया और कैमरा तोड़ने की कोशिश की। आंदोलन की शुरुआत के दिन, 11 अप्रैल को ही नोएडा की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि आंदोलन के ‘मास्टर माइंड्स’ को दबोचने का उनके पास पर्याप्त मसाला है तथा घरों और कारखानों से मजदूरों तथा मेट्रो स्टेसनों, सार्वजविक स्थलों एवं दफ्तरों से मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने वाले एक्टिविस्टों की गिरफ्तारियां होती रहीं। यह अलग बात है कि वे अभी तक  अदालत में कोई सबूत पेश नहीं कर पाईं। वैसे, भारत और उ.प्र. की नशासक पार्टी, भाजपा से इनके करीबी संबंध भी चर्चा में हैं। इनके पति, भाजपा के विधायक हैं और नोएडा की जिलाधीश मेधा रूपम बहुचर्चित केंद्रीय चुनाव आयुक्त, श्री ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं। 


सिद्धांतः स्वायत्त और स्वतंत्र समझी जाने वाली न्यायव्यवस्था का भी, व्यवहार में वही चरित्र होता है जो राज्य, यानि सरकार का। अपवाद स्वरूप. कभी कभी कुछ न्यायाधीश सिद्धांत को व्यवहार में भी लागू करते हैं और जगे जमीर की मिसाल पेश करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को 11 अप्रैल को मजदूरों के आंदोलन के सिलसिले में नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार किया और जमानत की संभावनाओं को निरस्त करने के लिए 13 मई को उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं थोप दी हैं। यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक, सत्यम वर्मा को 17 अप्रैल को, जनचेतना के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया। सत्यम वर्मा ‘मजदूर बिगुल’ अखबार में मजदूरों के पक्ष में लिखते रहे हैं। उन पर भी रासुका की धाराएं थोप दी गयी हैं, उनका मामला अभी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। गौर तलब है कि सत्यम दशकों से नोएडा गए ही नहीं हैं। 2 सितंबर, 2026 को इलाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव ने नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में अद्भुत और अभूतपूर्व फैसला सुनाया। इन जजों ने आकृति पर फर्जी, मनगढ़ंत आरोप लगाने और दुर्भावना से मजदूरों को प्रताड़ित करने के लिए उप्र पुलिस तथा नोएडा प्रशासन को तगड़ी फटकार लगाते हुए, रासुका के तहत आकृति की हिरासत को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया तथा उसे अवैध रूप से जेल रखने के 5 लाख मुआवजे का फैसला सुनाया। फैसले में जिलाधीश महोदया को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की पद के सपथ के उल्लंघन दोशी बताया गया और मुआवजे की रकम की वसूली उनके वेतन से करने का अभूतपूर्व निर्देश दिया। 


आकृति पर रासुका की संस्तुति करते समय नोएडा की जिलाधीश ने चिंता जताया था कि आंदोलन से औद्योगिक क्षेत्र की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और निवेश बाधित होगा। जिलाधीश महोदया को जिले की जनता और मजदूरों की नहीं पूंजीपतियों के हितों की चिंता है। 


 जिलाधीश के विरुद्ध न्यायलय   इस फैसले पर निजी चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार, मित्र ने कहा कि वह (मेधा रूपम) इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाएंगी और उसके पिता की ही तरह सरकार के हितैषी मुख्य न्यायाधीश, सूर्यकांत उन्हे राहत दिलाने का कुछ जुगाड़ जरूर करेंगे। उनकी बात सही निकली। मुख्य न्याधीश ने शीघ्रता दिखाते हुए उनके मामले को बारी के पहले ही सूचीबद्ध कर लिया और रोस्टर का उल्लंघन करते हुए, चुनाव आयोग के वकील रह चुके, न्यायाधीश महेश चंद्र शर्मा की पीठ में भेज दिया, जिसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  फैसले की प्रतिकूल टिप्फणियों और जुर्माने पर अंतरिम स्थगन का आदेश दिया। वायर   में छपी एक खबर के अनुसार वकीलों के संगठन  “लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सीजेआई सूर्यकांत को पत्र लिखकर नोएडा डीएम मेधा रूपम की याचिका को मौजूदा रोस्टर से अलग पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने पर सवाल उठाए हैं. संगठन ने मामले की विशेष तौर पर सूचीबद्ध करने, सुनवाई की ऑडियो-वीडियो फीड सीमित किए जाने को लेकर चिंता जताई है. याचिका छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की रासुका के तहत हिरासत से जुड़े मामले से संबंधित है.”  देश में, खासकर देश के युवाओं और मजदूरों में, मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध भी जनमत बन रहा है, जो कभी भी जनअसंतोष और जनाक्रोश में तब्दील हो सकता है। यहां भारत की प्रशासनिक या न्याय व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की न गुंजाइश है, न जरूरत, वे तो अलग-अलग  व्यापक विमर्श के विषय हैं। मकसद यह बताना है कि आधुनिक यानि पूंजीवादी राज्य अपने विभिन्न अंगो के माध्यम से   में पूंजीपतियों के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी संस्था है। 


गौरतलब बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आ पायी है, क्योंकि रासुका की गिरफ्तारी निरस्त हुई है और भी कई मामले हैं, कुछ में जमानत हो गयी है, कुछ में बाकी है। आधुनिक राज्य का दोगलापन है कि वह कभी भी राजनैतिक आरोप नहीं लगाता बल्कि आंदोलन का राजनीति का अपराधीकरण करता है। नोएडा और गुड़गांव में फैक्ट फाइंडिंग के दौरान जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों की गिरफ्तारियों और एफआईआर में दर्ज आरोपों में अद्भुत समानता देखने को मिली। ज्यादातर आरोपपत्रों में एक आरोप हत्या का प्रयास था। सभी पर कई कई मामले दर्ज हैं। हर मामले की अलग अलग जमानत की कोशिश करनी पड़ती है। 500-600 रु. की दिहाड़ी करने वाले मजदूर के लिए 50 हजार की जमानत का प्रबंध मुश्किल होता है। 25000 की जमानत की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान थी, 50000 की जमानत में सत्यापन की प्रक्रिया में बहुत समय लग जाता है। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता  ने बताया कि बहुत से मजदूर जमानत के बावजूद, जमानती के सत्यापन प्रक्रिया की झंझटों के चलते अभी जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं।

आंदोलन से मजदूरों को बहुत ठोस फायदा नहीं मिला, जो भी नाममात्र की वेतन वृद्धि हुई वह मंहगाई में बढ़ोत्तरी की तुलना में बहुत कम है। इस आंदोलन से जो ठोस फायदा हुआ है वह है भविष्य में ज्यादा संगठित संघर्ष की उम्मीद बनी है। मुर्दा माहौल में ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों का आंदोलित होना आशा की एक किरण है कि इन संघर्षों मजदूरों के भविष्य के संघर्षों की प्रेरणा मिलेगी और संघर्षों के दौरान साझे हितों की चेतना विकसित होगी और मजदूर संगठित हो ‘अपने आप में’  वर्ग से ‘अपने लिए’ वर्ग बनेगा। उम्मीद करते हैं कि मजदूरों के संघर्ष के इतिहास की गाड़ी आगे बढ़ेगी।     


जंतर मंतर 3

 ज्ञानेश तो प्यादा है, लगता है, कॉक्रोचों को प्रतिरोध की राजनीति पर राहुल गांधी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाया गया है।


प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, वास्तविक मांग तो शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की होनी चाहिए थी, प्रधान की जगह ज्यादा दकियानूस, स्त्रीविरोधी बलात्कार समर्थक प्रहलाद जोशी आ गया है। ज्ञानेश जाएगा कोई इससे भी बड़ा खिलाड़ी आजाएगा। "सिर्फ हगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, ......... हमारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। इंकिलाब जिंदाबाद।

Tuesday, September 22, 2026

जंगलराज

 


यूपी में अपराधियों की बोलती तूती है
सत्ता में बैठे सबसे बड़े अपराधी हैं
कानून व्यवस्था जिनके पैरों की जूती है
जैसा देखा सबने जंतरमंतर पर
कुछ अपराधी सादे कपड़ों में होते हैं
कुछ खाकी वर्दी में सितारे टांके रहते हैं
कुछ शूट-बूट में रहते हैं
और कुछ गेरुआधारी हैं
बिहार तो नाम का जंगलराज
यूपी में जंगलराज का नाम है रामराज
दिल्ली दोश का राजधानी है
जंगलराज की रानी है
23.09.2026

Saturday, September 19, 2026

knowledge

 Key to any knowledge is questionng; questioning

 anything and everything beginning with one's own 

minset.

Words

 Words acqiure meaning through 

tone/connotation/inntent and the context.

Friday, September 18, 2026

सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा

 सब याद रखा जाएगा
जब जनअदालत इतिहास पर फैसला देने बैठेगी

बजरंगी नाज़ियों के गुनाहों पर बहस होगी
और इन बजरंगी नाजियों के हर गुनाह की सजा मुर्रर होगी।

Friday, September 11, 2026

बेतरतीब 192 (बचपन)

 हमारे बचपन में हमारे गांव में पहला शहरी खेल वॉलीबॉल ही पहुंचा था, गांव के खेल (कबड्डी, झाबर, शुटुर्र या शुर्र, लखनी, गुल्ली डंडा आदि) तो थे ही। उस समय (1960-67) ब्लॉक में गांव स्तर पर युवक मंगल दल की खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिताएं होती थी। वॉलीबॉल में हमारे गांव की टीम ब्लॉक के अन्य गांवों में खेलने जाती थी और दूसरे गांवों की टीम हमारे गांव में आती थीं। ग्रामीण खेलों में टीमें बन जाने पर दोनों टीमों के कप्तानों (कुछ और कहा जाता था, भूल गया) के बीच गोंटी या पत्ता से लॉटरी से तय होता था कि मैं किस टीम में रहूं। एकाधबार ऐसा हुआ कि छुआ गया कि नहीं पर टीमों में झगड़ा हो जाता और खेल बंद होने की नौबत आ जाती। मुझे लगता कि खेल ही तो है चलता रहनी चाहिए और मेरा मामला होने पर, छूने या छुआ जाने के विरोधी टीम के दावे को मान लेता। इसलिए दोनों टीमों में मुझे बोझ ( Liability) समझा जाता था। 1967 में हाई स्कूल (कक्षा 9-10) की पढ़ाई करने जब शहर चला गया तब भा गांव आने पर अपने से जूनियर लड़कों के साथ खेलता, तब दोनों ही टीमें मुझे अपनी टीम में शामिल करने को तैयार रहतीं। अब तो गांव के काफी खेल खत्म से हो गए हैं, सभी आयु समूह के लड़के क्रिकेट ही खेलते हैं।

Thursday, September 10, 2026

जब भी हम सोचते हैं नए सिरे से शुरू करने को

 जब भी हम सोचते हैं शुरू करने को

 जब भी हम सोचते हैं शुरू करने को
नए सिरे से

तब तक जो भी हो चुका हो
नए सिरे से शुरू करना हमेशा नया होता है
पुरानी मंजिलें पुरातन हो चुकी होती हैं
और इंतजार कर रही होती हैं नई मंजिलें
किलकारी मारते बच्चे बड़े हो चुके होते हैं
नए नग्में लिख रहे होते हैं नई पीढ़ी के
और हम कहते हैं
हर अगली पीढ़ी हमेशा तेजतर होती है
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गवाह बनती है
इतिहास की अनवरत यात्रा की
पाषाणयुग से साइबर युग तक।
(ईमि: 09.09.2026)

Tuesday, September 8, 2026

सियासत 5 (1857 के बाद औपनिवेशिक नीति)

एक पोस्ट पर कमेंट

विद्रोही औपनिवेशिक भारतीय सेना के सैनिकों की पहल पर, आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में 1857 की सशस्त्र किसान क्रांति औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकती यदि ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम जैसे भारतीय रजवाड़ों ने अंग्रेजों की दलाली में भारतीय आवाम की आजादी के संग्राम के साथ गद्दारी न की होती। औपनिवेशिक काल में भारतीय सामंती शासक वर्ग चरित्र अपने किसानों की स्वतंत्रता की कीमत पर औपनिवेशिक गुलामी को तरजीह देने का रहा है। आरा के रणबांकुरे कुंवर सिंह, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई और अवध की बेगम हजरत महल जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सारे रजवाड़ों ने 1857 के आंदोलन में भारतीय आवाम के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया था। क्रांति के दौरान (1857-58) कार्ल मार्क्स, लंदन में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर, न्यू यॉर्क ट्रिब्युन में अपने डिस्पैचेज में औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध भारतीय आवाम के एकताबद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लगातार लिखते रहे। बाद में उनके लेखों का संकलन, 'प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम (The First Indian War of Independence)' शीर्षक से छपा। 1907 में क्रांति के पचासवें साल के उपलक्ष्य में वीडी सावरकर ने 'भारत का स्वतंत्रता संग्राम' (India's War of Independence)' शीर्षक से पुस्तक लिखी। यह सावरकर के जीवन का विप्लवी काल था। इसी अवधि की गतिविधियों के लिए औपनिवेशिक शाकों ने सावरकर को गिरफ्तार किया लेकिन सावरकर के क्रांतिकारी बुलबुले क्षणिक साबित हुए। औपनिवेशिक जेल की यातना से वे टूट गए और अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति के मुहरे ही नहीं, सक्रिय एजेंट बन गए। 1857 पर1907 की अपनी किताब में सावरर ने भारतीय आवाम की , खासकर हिंदू-मुसलमान की एकताबद्धता की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। बजरंगी इस किताब को नहीं प्रचारित करते।

भारतीय रजवाड़ों और कुछ धनपशुओं की मदद से औपनिवेशिक शासक क्रांते का दमन करने में कामयाब तो रहे लेकिन भारी धन-जन की क्षति हुई। जिसका प्रतिशोध उन्होंने पकड़े गए क्रांतिकारियों के यातनापूर्ण दमन से लिया। आवाम में खौफ फैलाने के लिए, अवध के गांवों में सड़कों के किनारे पेड़ों में लटकाई गए विद्रोहियों के सिर की कहानियां हमारे बचपन तक जनश्रुति का हिस्सा थीं। औपनिविशक शासकों ने1857 की सशस्त्र क्रांति को कुचल तो दिया लेकिन भविष्य की ऐसी संभावनाओं ने उन्हें आतंकित कर दिया।

इन संभावनाओं को नाकाम करने के लिए उन्होंने, एक तरफ, बांटो-राज करो की नीति के तहत सांप्रदायिक विचारधारा की अवधारणा गढ़ी। औपनिवेशिक बुद्धिजीवियो/इतिहासकारों ने हिंदुस्तानियों के लिए हिंदू नस्ल और मुस्लिम नस्ल संबोधन इस्तेमाल शुरू किया। जिसका शोधपूर्ण विवरण जिसका शोधपूर्ण विवरण 1990 के दशक की शुरुआत में छपी ,जानेमाने इतिहासकार, ज्ञान पांडे की पुस्तक, Construction of Communalism in Colonial North India में देखा जा सकता है। सांप्रदायिकता की विचारधारा गढ़ने का मुख्य मकसद उपनिवेश विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करना था। इसके लिए दोनों ही प्रमुख समुदायों से उन्हें नामी-गिरामी दलाल मिल गए। सांप्रदायिकता यानि धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अनैतिहासिक अवधारणा ऐतिहासिक रूप से विकसित हो रहे राष्टवाद की अवधारणा के विरुद्ध साजिश के तौर पर गढ़ी गयी और इतिहास की विडंबना है कि उसे राष्ट्रवाद के पर्याय के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अवधारणा यदि ऐतिहासिक होती तो पाकिस्तान से टूट कर बांगलादेश क्यों बनता?

दूसरी तरफ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध बढ़ रहे जमअसंतोष को शांत करने के लिए शेफ्टी वॉल्व के तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ जिसे असंतोष को सुविधाओं के मांगपत्र के माध्यम से भटकाया जा सके। इतिहास में कईन बार अनचाहे (Inadvrtent) परिणाम नियोजित उद्देश्य से अलग और ज्यादा अहम हो जाते हैं। कालांतर में कांग्रेस शेफ्टी वॉल्व की बजाय उपनिवेश विरोधी आंदोलन का मुख्य मंच बन गया।

जारी.....

Friday, September 4, 2026

हत्यारों के ग्लोबल सरगना

 हत्यारों के ग्लोबल सरगना के स्वागत के

विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम में मैं भी शामिल था
और सुना था उसकी प्रशंसा में आपकी यह कविता
और खुश हो रहा था कि
हत्यारा नहीं समझ पाया था प्रशंसा में छिपा व्यंग्य
और बच गया था
आपका नाम उसकी हिटलिस्ट में आने से
और सुन पा रहा हूं आज भी
प्रशंसा में लिप्त व्यंग्य की
आप की कविता
और करता हूं व्यक्त आभार
हत्यारों के ग्लोबल सरगना की नासमझी का

(ईमि: 04. 09.2026)

Wednesday, September 2, 2026

सियासत 4 (फासीवाद)

 क्या यह फासीवाद नहीं है?


सोचिए आप सुबह की सैर पर निकलें और सादे वेश में, दो उठागीर आप को उठा लें और मीलों दूर एक थाने में लेजाकर बताएं कि उन्हें पूछताछ के लिए लेजाया गया और आपको पता चले कि वे उठाईगीर अमित शाह की दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल हैं, तो 1930-40 के दशक के नाजी जर्मनी या 1920-40 के के दशक के फासीवादी इटली की याद नहीं आएगी? आज तक पता नहीं चला है कि 20 जुलाई को जंतरमंतर पर कील लगी साठियों से बच्चों पर कहर ढाने वाले गुंडे कौन थे? सादी वर्दी में पुलिस वाले या भाड़े के?

कल चाणक्यपुरी में नेहरू पार्क सुबह की सैर करते वक्त जिन आशीष जोशी को बिना कारण बताए या घर वालों को सूचित किए , दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ वाले पुलिसकर्मियों द्वारा उठा लिया गया वे भारत सरकार की सेवा अतिरिक्त सचिव पद से हाल ही में रिटायर हुए विरष्ठ अधिकारी हैं। स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, उन्होंने सोसलमीडिया की अपनी एक्स पोस्ट में बताया कि स्पेसल सेल वाले उन्हें स्पेसल सेल के थाने फ्रेंड्स कॉलेनी ले गए थे और शाम को घर छोड़ गए। बाकी बातें बाद में बताएंगे।

स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, जोशी ने जंतरमंतर आंदोलन के दौरान, एक्स पर बच्चों पर निर्दयता से हमले को लेकर अमितशाह और गृह सचिव के बीच मतभेद को लेकर एक पोस्ट लिख दिया था। गृह सचिव बच्चों पर सख्त कार्रवाई के खिलाफ थे।

जब एक वरिष्ठ रिटायर अधिकारी को सोसल मीडिया पर लिखने के लिए उठा लिया जा सकता है तो आम आदमी का क्या? लोगों में खौफ पैदा करने की ऐसी कार्रवाई फासीवाद का लक्षण नहीं है? भक्त कहेंगे दिन भर थाने में रखने के बाद छोड़ तो दिया गया! अगर उन्हें पूछताछ के लिए ले जाना था या गिरफ्तार करना था तो सरकार को कानूनी प्रक्रिया का पालन तो करना था।

मार्क्सवाद 358 (नोएडा मजदूर आंदोलन )

 इस सत्योत्तर (Post truth) युग में भी कभी कभी न्यायालयों में न्याय भी हो जाता है, न्याय करने वाले न्यायाधीशों को सलाम, आकृति को लाल सलाम। सत्यम को अविलंब रिहा किया जाए। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक पीठ ने उप्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए, नोएडा के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में एनएसए के तहत बंद एक्टिविस्ट छात्रा आकृति चौधरी को रिहा कर दिया और नोएडा की डीएम के वेतन से 5 लाख रु. मुआवजे का आदेश दिया। नोएडा की डीएम के वेतन से आकृति को मुआवजा का आदेश तुरंत लागू हो इससे ऊपर तक पहुंच रखने वाले नौकरशाहों की मनमानी पर रोक लगेगी। गौरतलब है कि नोएडा की डीएम मेधा रूपम वोट चोरी मुख्य अभियुक्त ज्ञानेश कुमार (मुख्य चुनाव आयुक्त) की बेटी हैं।

Monday, August 31, 2026

हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी

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कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी-उर्दू विभाग एक ही हैं क्योंकि दोनों भाषाओं में केवल लिपि का अंतर है, जिसे हिंदुस्तानी कहा जहा जा सकता है। 1919 के कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में प्रस्तावित किया था, जिसे गैरहिंदी भाषी प्रतिनिधियों का समर्थन भी प्राप्त था। हिंदुस्तानी से गांधी का आशय उत्दीतर भारत में बोली जाने वाली भाषा से था जिसे कुछ लोग फारसी लिपि में लिखते थे और कुछ नागरी में।-शुद्धतावादियों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की वकालत की।

1949 में राष्ट्रीय संपर्क भाषा के प्रश्न पर सविधान सभा हिंदी-हिंदुस्तानी पर तीखी बहस के बाद मतदान हुआ और दोनों पक्षों में समान मत पड़े, अंततः राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी को स्वीकृति मिली।

फारसी लिपि में छपी हिंदी रचनाएं पाकिस्तानी उर्दू भाषियों के लिए उसी तरह सुगम हैं जैसे नागरी में छपी मंटो की कहानियां या हबीब जालिब के नज्में हिंदी भाषी हिंदुस्तानियों के लिए। प्रेमचंद पहले उर्दू में ही लिखते थे। उर्दू के कुछ बड़े उपन्यासकार- कहानी कार हैं, कृष्ण चंदर, 'शिकस्त' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है;राजेंद्र सिंह बेदी: विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर लिखने वाले महान कहानीकार; 'एक चादर मैली सी' उनका मास्टरपीस है।रतन नाथ धर 'सरशार': उर्दू के शुरुआती उपन्यासकारों में से एक। उनका उपन्यास 'फ़साना-ए-आज़ाद' मील का पत्थर माना जाता है। हमारे मित्र हैं, प्रोफेसर आसिफ नक्वी, म्युजिऑलॉजी के प्रोफेसर थे, उर्दू में अफसाने लिखते हैं और शायरी करते हैं, नागरी पढ़ लेते हैं , लेकिन मंद गति से। मैं उनकी कविताएं उसी तरह अच्छी करह समझ लेता हूं जिस तरह हबीब जालिब, इब्ने इंशां या फैज की।

Saturday, August 29, 2026

सियासत 3 (भौगोलिक सीमाएं)

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दुनिया की सभी भौगोलिक सीमाएं ऐतिहासिक रूप से खींची गयी नकली सीमाएं हैं। हिंद-पाक की सीमा तो अनैतिहासिक है जो उपनिवेश-विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के कृत्रिम शगूफे छोड़े, फैलाए और हिंदू-मुस्लिम नाम पर खून खराबे करवाए और पूर्व (बंगाल) और पश्चिम ( पंजाब) में मनमानी लकीरें खींच दी। औपनिवेशिक शासक अपने हिंदू-मुस्लिम दलालों की मदद से भारत राष्ट्र के टुकड़े करने में सफल रहे और बंटवारे का घाव अभी तक नासूर बन टपक रहे हैं। फैज़ के शब्दों में, "खून के धब्बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद"। यदि धर्म राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक आधार हो सकता तो भाषा के नाम पर पाकिस्तान के दो टुकड़े क्यों होते? मुझे एक बार (बहुत पहले) कहीं एक सिंधी, पाकिस्तानी स्त्री से परिचय हुआ। उसने सवाल किया कि मैं उससे उर्दू की बजाय अंग्रेजी में क्यों बात कर रहा था, मेरे कहने पर कि मुझे उर्दू नहीं आती तो हंसने लगी, बोली कि इतनी अच्छी उर्दू तो बोलता हूं, मेरे यह कहने पर कि यह तो हिंदी है, वह बोली एक ही बात हुई। उसने शिकायत की हिंदुस्तानी मुजाहिरों ने उर्दू थोपकर उनकी भाषा (सिंधी) को दोयम बना दिया।

Thursday, August 27, 2026

नास्तिकता

 एक पोस्ट पर एक कमेंट पर कमेंट का जवाब


मैं वृद्धावस्था में नहीं, किशोरावस्था (17 साल) में ही नास्तिक हो गया था औग 18-19 साल में भगत सिंह का नास्तिकता पर लेख ने नैतिक समर्थन प्रदान किया तथा उसके एकाध साल बाद भगवान के अस्तित्व पर वोल्नटेयर द्वारा लगाए प्रशनचिन्ह ने बौद्धिक औचित्य। मैं कर्मकांडी पुरोहित नहीं था, न ही पुरोहिती परिवार में पैदा हुआ था, कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ पला। मेरा कहने का आशय केवल इतना है कि एक कर्मकांडी परिवेश के बालक की प्रामाणिक नास्तिकता की यात्रा कठिन, आत्मान्वेषी आत्म संघर्ष की यात्रा थी। भगवान के भय का आतंक भीषण था। नास्तिकता की मंजिल पर पहुंच कर भगवान के भय से मुक्ति के आत्मसुख की अनुभूति अद्भुत थी। लोग कहते थे बुढ़ापे में भगवान ही याद आते हैं, अब तो लगभग 72 का हो गया अभी तक तो नहीं बाद आए। यदि व्यक्ति भूत और भगवान के भय से मुक्त हो जाए तो वह निर्भय हो जाता है।

Tuesday, August 25, 2026

जंतरमंतर 2

 एक पोस्ट पर कमेंट:


जंतरमंतर आंदोलन में AISA के अलावा एसएफआई, एआईएसएफ तथा कई अन्य वाम छात्र संगठन भी थे, पहली जरूरत इन वाम संगठनों में एकता की है जो 10 साल पहले जेएनयू आंदोलन के समय बन रही थी किंतु इनके मातृ संगठनों के चलते वह बन नहीं पाई, अब समय है कि बनाएं। काक्रोच पार्टी यदि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के रास्ते पर भी चलना चाहे तो pressure from below के चलते चल नहीं पाएगी। मुझे शुरू में यह प्रायोजित लगा था और अब भी लग रहा है लेकिन मैंने समयांतर में एक लेख में लिखा था कि कई बार inadvertent consequences are different and more substantial than intended ones. अब जंतरमंतर आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो चुका है और राहुल गांधी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है। फासीवाद से लड़ने के लिए आपसी मतभेदों को भूलकर एकजुट होने की जरूरत है तथा वाम सगटनों को सीजेपी और कांग्रेस के साथ मिलकर नई शिक्षा नीति एवं एनटीए के विरुद्ध एक व्यापक मोर्चा बनाना चाहिए जो विस्तृत होकर राष्ट्रव्यापी राजनैतिक आंदोलन का स्वरूप ग्रहण करे। इंकिलाब जिंदाबाद। जय भीम लाल सलाम।

Saturday, August 22, 2026

जंतरमंतर 1

 मैं तो हमेशा भविष्य की पीढ़ियों के प्रति यह सोचकर आशावान रहता था कि इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता इसलिए इतिहास के यूटर्न्स को अस्थाई मानता था, इताहास के यू टर्न से उपजी हताशा पर रोहित बेमुला से निकले जय भीम लाल सलाम के नारे ने पानी फेरना शुरू किया और जेएनयू आंदोलन ने उसे पानी में डुबो दिया था। अब जंतरमंतर आंदोलन ने आशा की नई किरणें दिखाई हैं। इंकिलाब जिंदाबाद।

Sunday, August 16, 2026

महामानव और 15 अगस्त

 मैंने भी कई सालों से लाल किले का भाषण सुनना बंद कर दिया, वैसे भी महामानव की शकल बहुत रिपल्सिव लगती है। जंतरमंतर के मीमों और गीतों ने उसे और भी रिपल्सिव बना दिया है।15 अगस्त 1947 को, भारत के प्रथम और अभी तक के एकमात्र युगद्रष्टा प्रधानमंत्री, नेहरू ने, अपने सुविदित'नियति से मुठभेड़' भाषण में रेंगते भारत के स्ववलंबी, जागृत और वैज्ञानिक तेवर केशि क्षित भारत में तब्दीली के सपने की बात की थी और एक दशक से कम समय में नेहरू का सपना सच होता दिखा। देश में शिक्षा संस्थानों का जाल बिछना शुरू हो गया, जिसका मैं भी पहली पीढ़ी का लाभार्थी हूं। आईआईटी, एम्स, परमाणु शोधकेंद्र खुलने लगे, नेहरू ने उद्योगों को मंदिर कहा लेकिन भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए नहीं देश के पूंजीवादीकरण के लिए संसाधन चाहिए थे। अफीमयुद्ध के दौरान अफीम तस्करी से कई निजी राष्ट्रीय पूंजीपतियों का उद्भव तो हो चुका था लेकिन कोई बड़े औद्योगिक आधारभूत संरचनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर्स) में निवेश करने में न तो सक्षम थे न ही उद्यत। नेहरू सरकार ने सीमित राजस्व और सोवियत सहायता से भेल, सेल, बरौनी रिफाइनरी तथा ओएनजीसी जैसे सार्वजनिक औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया, कल्याणकारी राज्य जिसका उपपरिणाम था और जिन्हें मोदी सरकार ने एक-एक कर अपने कृपापात्र धनपशुओं को औने-पौने दामों में बेच दिया और बेच रहे हैं। युवाओं में अपनी अप्रियता देख-समझ कर महामानव के अंदर के फासीवादी कीड़े ज्यादा कुलबुलाने लगे हैं और भजन न गाकर विद्रोह के गीत गाने वाले युवकों तथा असहमति के स्वर वाले विवेकसम्मत लोगों को दिमागी नक्सल कह कर उन्हें पहचानने और दंडित करने की धमकी दे डाली। नेहरू ने नियति से दो हाथ करने की शुरुआत की महामानव ने स्वाधीनता दिवस के शताब्दी वर्ष तक विसित भारत का वायदा किया, वैसे विकसित भारत की बजाय विक्षिप्त भारत बनने लगा है। वैसे भी कौन जीता है, तेरे जुल्फ के सर होने तक। यदि युवा उमंगों की उड़ान जारी रही और उसे राजनैतिक दिशा मिली तो गुजराती युगल का राज बहुत दिन नहीं कायम रह पाएगा।

दिमागी नक्सल

 महामानव अपनी एंटयर पोलिटिकल साइंस की पढ़ाई को सार्थक करते हुए, महामानव नए नए शगूफे छोड़ते रहते हैं और उनके बजरंगी अनुयायी उन्हें रटकर उनका भजन गाते रहते हैं। जेएनयू आंदोलन के बाद उन्होंने सवाल-जवाब करने वाले स्टूडेंट्स के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग का शगूफा छोड़ा। यह अलग बात है कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने अंग्रेजी राज की बांटों-राज करो नीति के प्यादे बनकर भारतीय राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और भारत राष्ट्र के टुकड़े टुकड़े कर दिए। जिसके घाव नासूर बन न जाने कब तक रिसते रहेंगे।उनका बजरंगी गिरोह अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारत की सामासिक संस्कृति के टुकड़े टुकड़े करने की करतूत की निरंतरता बनाए हुए है। फिर उन्होने खान मार्केट गिरोह का सगूफा छोड़ा. यह भी अलग बात है कि खानमार्केट जाने वालों में भक्तों का प्रतिशत ज्यादा रहता है। बुद्धिजीवियों के लिए इन्होंने अर्बन नक्सल का शगूफा छोड़ा। और अब दिमागी नक्सल का। हर फासीवादी की तरह ये अवधारणाओं को कभी परिभाषित नहीं करते । आज ही सोसल मीडिया पर देखने को मिला कि दिमागी नक्सल जनता पार्टी बन गयी है। महामानव की जय हो।

Thursday, July 30, 2026

शहर पर गर काबिज हो जाएं सूअर

 शहर पर गर काबिज हो जाएं सूअर

 शहर पर गर काबिज हो जाएं सूअर
इंसानों को बनना होगा शिकार

करने के लिए पुनर्स्थापित मानवीय सभ्यता
उठाना पड़ेगा तीर-धनुष
देश भर में फैलाना पड़ेगा जंतरमंतर का विचार
अगले उलगुलान के लिए

Tuesday, July 28, 2026

जंतरमंतर : नई पीढ़ी के नए रूपक

 जंतरमंतर पर स्वस्फूर्त उमड़े जनसैलाब की प्रतीकात्मक जीत: 

नई पीढ़ी के नए रूपक

ईश मिश्र

जंतरमंतर आंदोलन में कॉक्रोच जनता पार्टी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की प्रतीकात्मक मांग रखी थी। सरकार को 20 जुलाई से जंतरमंतर पर उमड़ते अभूतपूर्व जनसैलाब के दबाव में सरकार झुकने को मजबूर हो गयी और प्रधान का इस्तीफा ले लिया। मांग प्रतीकात्मक थी सो विजय भी प्रतीकात्मक ही है। खुद को अडिग मानने वाली मोदी-शाह की जोड़ी को युवाओं ने डिगा दिया। आंदोलन की घोषणा कॉक्रोच जनता पार्टी ने किया लेकिन वामपंथी छात्र संगठनों ने संवेग देकर उसे गतिमान रखा। आंदोलन से एकजुटता दिखाने  के लिए लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांचुक आंदोलनकारियों के साथ अनशन पर बैठ गए। गौरतलब है कि सोनम कुख्यात रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत 26 लितंबर 2025 से जोधपुर जेल में बंद थे और उनपर देशद्रोह जैसे आरोप मढ़े गए थे । 170 दिन वे जेल में रखने के बाद सरकार ने उन्हें 14 मार्च 2026 को रिहा कर दिया। राजनैतिक चर्चाओं में कुछ लोग कयास लगा रहे थे कि उन्हें शायद किसी समझौते के तहत छोड़ा गया।जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान वाले सोनम वांचुक की आंदोलन में शिरकत ने आंदोलन की गति को हवा दिया और आंदोलनकारियों को प्रोत्साहन। साथ में जेएनयू में पीएचडी कर रही नेहा बोरा भी अपने अन्य कॉमरेडों के साथ अनशन पर बैठ गयी। अनशनकारियों की सेहत बिगड़ने लगी। 18 जुलाई को पुलिस ने सोनम वांचुक को धरना स्थल से उठा लिया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कर दिया। छात्र अनशनकारियों की सेहत की चिंता सरकार को नहीं हुई और उन्हें अनशन पर बैठे रहने दिया गया। वांगचुक और उनकी पत्नी ने गुड़गांव, मेदांता में स्थांतरित करने की मांग की और सरकार ने मान लिया। 23-24 जुलाई, 2026 की रात वांगचुक ने, आंदोलनरत विद्यार्थियों पर दया के सरकारी आश्वासन पर, मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के हाथों जूस पीकर और  उन्हीं के हाथों भगवा अंगोछा ओढ़कर  अनशन तोड़ दिया। प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, परीक्षा व्यवस्था में आमूलपरिवर्तन सारभूत मांग होती। लगभग महीने भर के आंदोलन और 5 दिन के नए जनसैलाब के प्रदर्शन के बाद प्रधान के इस्तीफे की प्रतीकात्मक मांग पूरी हो गयी और जंतरमंतर आंदोलन की प्रतीकात्मक जीत हो गयी। लेकिन जीत तो जीत होती है, प्रतीकात्मक ही सही, जश्न मनाना तो बनता ही है। बच्चे जश्न तो मना रहे हैं लेकिन यह जानते हुए कि यह विजय लड़ाई का अंत नहीं बल्कि नई लड़ाइयों की शुरुआत है। 


पिछले एक महीने से जंतर-मंतर नई पीढ़ी नई पीढ़ी की नयी चेतना का प्रतीक बना रहा, हर रोज स्वस्फूर्त जनसैलाब उमड़ता रहा और नए रूपक गढ़ता रहा; नए नारे लगाता रहा; नए गीत गाता रहा; नए मुहावरे गढ़ता रहा और डर के ठेकेदारों को बिना डरे डराता रहा। सर्वसत्तावादी शासक का मुख्य हथियार होता है डर, वह डर बोता है और डर की फसल उगाता है। सारी फौज-पुलिस; गोला-बारूद; देश की  लूट और मंदिर की चंदा-चढ़ावाचोरी की धन-दौलत के वावजूद जैसा कि जनकवि गोरख पांडेय ने लिखा है कि वह एक ही बात से डरता है कि कहीं निहत्थी जनता उससे डरना बंद न कर दे। जंतर-मंतर पर युवा उमंगों का निहत्था जन सैलाब निर्भय हो उमड़ता रहा। डर के ढेकेदार ने निडर युवाओं में डर पैदा करने के लिए वर्दीधारियों के बर्बर दमन का इस्तेमाल किया। सैकड़ों आंदलनकारी युवाओं के खिलाफ नामजद और बहुतों के खिलाफ बेनामी एफआईआर दर्ज किया। पुलिस ने अंधाधुंध लाठी भांजी; आंसूगैस छोड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित पेलेट गन का इस्तेमाल किया। अंग्रेजी दैनिक, ‘हिंदू’ में छपी खबर को पुलिस के आला अधिकारी नकारते रहे। राहुल गांधी ने पीड़ित के साथ प्रेस सम्मेलन किया, सरकार ने कहा कि राहुल गांधी राजनीति कर रहे हैं और हम सब जानते हैं राहुल गांधी राजनीतिज्ञ हैं। डर के ठेकेदार भी राजनीति कर रहे हैं, जंतरमंतर पर जुटे युवा भी राजनीति कर रहे हैं। डर के ठेकेदार महामानव और उनके कारिंदे डर की खेती करने की राजनीति कर रहे हैं और जंतरमंतर पर उमडी युवा उमंगे न डरने की।  आंदोलनकारियों ने प्रतीकात्मक जीत का जश्न मनाया लेकिन वे भी जानते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान तो मोहरा भर है और शतरंज के खिलाड़ी जानते हैं कि वजीर का रास्ता खोलने के लिए, खुशी-खुशी, आसानी से मोहरे की बलि दे दी जाती है। राहुल गांधी ने वजीर पर निशाना साधा है। युवा आंदोलनकारियों पर दमनात्मक कार्रवई का आदेश देने वालों की जवाबदेही का सवाल उठाया है। इस बावत गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर लिखित जवाब मांगा है। युवाओं ने खुद को 140 करोड़ का सवघोषित मसीहा मानने वाले महामानव को डिगा दिया है और महानता की गठरी बांधकर निकलने का रास्ता ढूंढ़ने का संदेश दिया है। 


भगवाकरण; विश्व बैंक के निर्देश पर प्रत्यक्ष-परोक्ष निजीकरण और रूढ़िवादीकरण के मद्देनजर बनी नई शिक्षा नीति; सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के परिप्रक्ष्य से मनमामे ढंग से पाठ्यक्रम में जोड़-घटा; इतिहास पुनर्लेखन के नाम पर इतिहास का पुनर्मिथकीकरण तथा विकृतिकरण; शिक्षा संस्थाओं में रटाया भजन गाने वाले भक्तों की नियुक्तियों की  भरमार आदि देखते हुए नई पीढ़ियों को लेकर काफी हताशा की मनःस्थिति, 20 जुलाई से जंतर-मंतर पर उमड़ रहे जनसैलाब को देखकर बदलने लगी। युवाओं का आत्म-अनुशासन और आपसी सौहार्द तथा आंदोलनात्मक आपसी सहयोग देखकर मन में हताशाजन्य निराशा की जगह आशा का संचार होने लगा। भविष्य की पीढ़ियों में उम्मीद का विश्वास पुनर्स्थापित होने लगा और लगने लगा कि शिक्षा को रूढ़िगत बनाकर युवा उमंगों की उड़ान को नहीं रोका जा सकता। 20 जुलाई को जंतरमंतर पहुंचना मुश्कल था। रास्ता बनाते किसी तरह पहुंचने पर, उत्साह से भरे अभूतपूर्व जनसमूह को देखकर हम सब गदगद हो गए। नाचते-गाते-नारे लगाते युवाओं का इंद्रधनुषी जन सैलाब में हम जैसे उम्रदराज लोगों से विविधता पैदा हो रही थी। पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों की उपस्थिति अभूतपूर्व थी। जब लगने लगा कि पुलिस शांतिपूर्ण ढंग से व्यवस्था का निरीक्षण कर रही है तभी पुलिस की बर्बरता की खबरें आने लगीं। प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए। पुलिस ने लाठियों में कीलें लगा रखी थीं। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुरुष पुलिसियों ने बदसलूकी की, जिसके वीडियो वाइरल हुए। कई पुलिस वाले बिना नेमप्लेट के थे, कई बिना वर्दी के। बिना वर्दी वालों में पता नहीं पुलिस वाले ही थे या आरएसएस की शाखा में दंड (लाठी) प्रशिक्षित स्वयंसेवक!  कुल मिलाकर वर्दीधारी और बिना वर्दी की पुलिस अराजकतापूर्ण हिंसा पर उतर आई। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने संयम नहीं खोया। बहुत से छात्रों और प्रदर्शनकारियों को पुलिस बसों में भरने लगी। पत्रकार, मित्र चंद्रभूषण ने फोन पर बताया था कि बहुत से प्रदर्शनकारियों के साथ उन्हें बुराड़ी थाना ले जाया गया था। इसी तरह बहुत से प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बसों में भरकर दूरदराज के थानों में ले जाकर छोड़ दिया। दमन से आंदोलनकारियों का हौसला टूटने की बजाय और मजबूत होता दिखा। पुलिस के साथ बसों में जाते लड़के-लड़कियां बेखौफ, गीत गाते और नारे लगाते जा रहे थे। लगने लगा था कि निहत्थी जनता ने डरना बंद कर दिया था और अब सर्वसत्तावादियों के डरने की बारी है। 


दिल्ली में इतना बड़ा जनसैलाब बहुत दिनों बाद दिखा। एक दशक पहले जेएनयू आंदोलन के दौरान मार्च करते विशाल जनसमूह की याद आई, वह संगठित जनसैलाब था, यद्यपि उसमें भी दूर दराज से आए जेएनयू के पुराने छात्र भी थे लेकिन यह दिल्ली और दिल्ली के बाहर विभिन्न जगहों से स्वतः आया स्वस्फूर्त। जगह डगह से लोग आते गए कारवां बनता-बढ़ता गया। अलग अलग जगहों और शहरों से स्वतः आए इन प्रदर्शनकारियों में बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो पहली बार किसी प्रदर्शन में आए थे। लेकिन वे जानते हैं, वे क्यों आए हैं, वे शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में व्याप्त सड़ांध से वाकिफ हैं, और उसे दूर करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ डटे रहने को प्रतिबद्ध। वे अपनी बातें स्पष्टता से कहते  हैं, बहुत से बच्चे अपने घर वालों की यथास्थितिवादी दृष्टिकोण से वाकिफ हैं और बहाना बनाकर आए हैं और बहुत से बच्चे अपने अभिभावकों को भी साथ लेकर आए हैं। कुल मिलाकर यह अपनी तरह का अलग आंदोलन है और लगता नहीं कि अपने आप इसकी निरंतरता टूटेगी। आंदोलन के संवेग को बनाए रखने में आइसा एवं अन्य वाम संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका को नजर अंदाज करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी होगी। वांगचुक के समानांतर भूख हड़ताल पर बैठी नेहा बोरा जैसे बहादुर बहादुर आंदोलनकारियों ने आंदोलन को जीवंत बनाए रखा। 23 दिन की भूख हड़ताल पर रही नेहा ने बीबीसी को दिए इंटरविव में सासंद चंद्रशेखर समेत सभी समर्थकों का आभार व्यक्त किया  तथा छात्रों के दमन के लिए, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ प्रधानमंत्री आवास पर औचक धरना और गिरफ्तारी देने के लिए राहुल गांधी का भी आभार व्यक्त किया। वांगचुक जब जंतरमंतर पर अनशन पर थे तब राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा था कि  वहां न आना राहुल का छोटापन है। कॉक्रोच नेताओं ने भी राहुल की आलोचना की थी। लेकिन राहुल गांधी तो इसी मुद्दे पर महीनों से, देहरादून, जोधपुर, कोटा आदि कई शहरों में छात्रों के प्रदर्शनों को संबोधितस कर रहे थे।


मुझे भी लगा कि युवाओं के इस जनसैलाब में राहुल गांधी को भी जाना चाहिए था। 21 जुलाई को राहुल गांधी और विपक्ष ने पेपर लीक और छात्रों की अन्य समस्याओं पर संसद में बहस की मांग की लेकिन स्पीकर ने बहस मुल्तवी कर दिया। राहुल गांधी ने विपक्ष के सांसदों तथा अन्य नेताओं के साथ लोककल्याण मार्ग यानि प्रधानमंत्री आवास पर, अनपेक्षित, औचक धरना देकर सबको हक्का-बक्का कर दिया। डर की खेती के बूते सर्वसत्तावाद बरकरार रखने वाला शासक डरपोक होता है। अपने घर के सामने नेता विपक्ष  के नेतृत्व में विपक्षियों का धरना देखकर वह डर गया और राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों की गिफ्तारी के लिए पुलिस भेज दिया। गिरफ्तार करते समय पुलिस राहुल को घसीटकर ले गयी जिससे उन्हें चोट भी आई। छूटने के बाद छात्रों के साथ प्रेस सम्मेलन करते हुए, जब पत्रकारों ने उनके घसीटे जाने का सवाल पूछा तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे (पुलिस वाले)उनके कान में कह रहे थे कि इसे जल्दी हटाइए।


20 जुलाई, 2026 से शुरू जनसैलाब का उमड़ना जारी रहा और हर रोज बढ़ता रहा। बहुत से नाबालिग 11वीं-12वीं कक्षा के बच्चे भी शामिल होते रहे। जब भी जंतरमंतर गया गाजियाबाद के जुनैद भाई आंदोलनकारियों को खाना खिलाते और पानी पिलाते हुए हमेशा मिले। प्रदर्शनकारियों को मुफ्त खाना खिलाने के “आपराध” में योगी की पुलिस ने उनके परिजनों को गिरफ्तार कर लिया और मानवाधिकार संगठनों के होहल्ला करने पर छोड़ा। जोमैटो और स्वीगी के डिलीवरी वाले लड़के ढेरों की संख्या में दिखे। किसी को आंदोलनकारियों के भोजन का ऑर्डर हैदराबाद के किसी ने दिया तो किसी को अहमदाबाद के किसी ने। आंदोलन का समर्थन आधार बढ़ता रहा। प्रदर्शनकारी दूरदराज के शहरों से आने लगे। जंतरमंतर दूरदराज के शहरों में फैलने लगा। जंतरमंतर जगह के नाम से विचार में तब्दील हो गया। आंदोलन के बढ़ते समर्थन आधार को देखकर डर की बदौलत राज करने वाली सरकार डर गयी और प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। युवा पीढ़ी को एक सलाम तो बनता ही है।


6 जून को जंतरमंतर पर जब काक्रोची परिघटना शुरू हुई तो मुझे यह आंदोलन अन्ना आंदोलन की ही तरह प्रायोजित लगा, अब भी लगता है। मुझे लगा था कि अयोध्या में चढ़ावाचोरी तथा देश भर में परीक्षा व्यवस्था में फर्जीबाड़े के विरुद्ध देश के विभिन्न शहरों में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों से ध्यान भटकाने के लिए कॉक्रोची परिघटना प्रायोजित की गयी। बोस्टन में आभासी दुनिया में मीम से शुरू कर राजनैतिक दल, कॉक्रोच जनता पार्टी बनाने वाले अभिजीत दिपके, जंकरमंतर पर,  6 जून, 2026 को प्रतिरोध प्रदर्शन की योजना के साथ दिल्ली आते हैं तो हवाई अड्डे पर प्रदर्शन की अग्रिम अनुमति के साथ दिल्ली पुलिस उनका स्वागत करती है। जानकार सूत्रों का कहना है कि कॉक्रोच जनता पार्टी के गठन के पहले आरएसएस के थिंकटैंक के रूप में जाने जाने वाले दत्तात्रेय होशबोले और राम माधव अमेरिका में थे। यह महज संयोग भी हो सकता है।  इस बावत मैंने लिखा भी (समयांतर, जुलाई, 2026), लेकिन यह भी लिखा कि कई बार प्रायोजन के उपपरिणाम प्रायोजन के उद्देश्य से अलग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। गौर तलब है कि 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन उपनिवोशवाद-विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करने के सेफ्टी वॉल्व के रूप में हुआ था, लेकिन कालांतर में वह उपनिवेशविरोधी आंदोलन की प्रमुख मंच बन गयी। और प्रायोजित नेता परिघटना के प्रायोजित मंजिल से भटक कर दूर चले जाने के बाद वापस नहीं जा सकते, जैसे कॉक्रोच जनता पार्टी के नेता अब चाहकर भी न तो आंदोलन वापस ले सकते हैं, न ही वापस जा सकते हैं। ऐसा करने से उनकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी जैसा वांगचुक के साथ हुआ। वांगचुक ने रात के अंधेरे में न सिर्फ भाजपा मंत्रियों के हाथ जूस पिया बल्कि अपने गांधीवादी कंधों पर उनके द्वारा ओढ़ाया गया भगवा गमछा भी धारण कर लिया। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत लगभग 100 दिन जेल में बिताने के बाद मार्च, 2026 में, सोनम वांचुक को अचानक रिहा कर दिया गया। गौरतलब है कि अप्रैल 2026 के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में रासुका में बंद पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता सत्यम वर्मा और छात्र आकृति चौधरी की रिहाई की मांग पर कोई सुनवाई नहीं हो रही। वागचुक ने अपनी सफाई में वीडियो जारी किया है। लेकिन विश्वसनीयता खत्म होने पर फिर से मुश्किल से बनती है। 


सोनम वांगचुक के खेल का पर्दाफाश हो चुका, उनकी इतनी ही भूमिका थी। कॉक्रोच जनता पार्टी के नेता आखिर तक शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे। वैसे इस सरकार में कोई भी मंत्री अपने मंत्रालय के फैसले स्वतंत्र रूप से तो लेता नहीं, कहा जाता है कि सारे फैसले कर्तव्य तीर्थ में अंतिम रूप लेते हैं। जो भी हो फिलहाल तो नई पीढ़ी, जिसे कुछ लोग जेन जी (Gen Z) कह रहे हैं जीत की खुशी मना रही है और उम्मीद करना चाहिए कि अगली बड़ी लड़ाई की तैयारी। युवा उमंगों को सलाम। 


समयांतर, अगस्त 2026 में प्रकशानार्थ

26,07.2026


Friday, July 24, 2026

Jantarmantar

 From the very beginning I have been maintaining that Dipke and Co. have been RSS sponsored and Wangchuk, who was released from NSA under some deal was added to the sponsored list by VK Saxena the former Lt Govenor of Delhi and presently employed on the same post in Laddhakh. But some times the inadvertent, different consequences become more substantial. The Jantar Mantar movement is no more a CJP movement but has become an independent, spontaneous peoples' movement expressing the long term popular discontent. It is expanding in different parts of the country reminding the similar expansion of Shaheenbag few years ago. The Laeft students organizations must be thanked for turning a sponsored movement to divert the massive popular discontent into national peoples' movement. I have been visiting Jantar Mantar everyday since 20 July. Gratitude to the spontaneous upsurge of the new generation. I wrote about it in SAMAYANTAR, July 2026


Answer to a question on a coment on a post regarding CJP

. There is reliable information that KJPwas planned in Boston in connivance with Rammadhav and co. to puncture the ongoing students' protests sipported by Cong and the left organizations in various cities. In normal cases one has to rum around for permission for the protest, Dipke, when after transforming his virtual meme movement into real party, came to India, he was received by, Delhi Police with advanced permission for protest. Wangchuk was released from draconian NSA, soposedly under some deal and broke his fast with saffron shawl and taking juice from ministers. These are readons for suspicios apprehensions. Dipke 's protest on 6 June took place under Police protection. Participation of AISA and other left organizations changed scene leading to spontaneous outpour of students from all over the country. At times inadvertent consequences are different and more substantial thsn the intended goals, as it hadhappened in case of Congress around 1and1/2 centuries ago. It was formed as safety volve but transformed into main platform of the anticolonial movement. Salutes to the new veneration of protesters. I have been going to the Jantarmantar almost everyday. Shall go tomorrow.As far as Wangchuk is concerned, he was introduced to Dipke by Amit Shah loyalist VK Saxena, Lt. Gov. Laddhakh and firmer LG Delhi.


Tuesday, July 14, 2026

राष्ट्रवाद

 राष्ट्रवाद विचारधारा है, अतः मिथ्याचतना

भारत में साम्राज्यवाद की विचारधारा के रूप में उबरा था राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद की रक्षा करने के लिए
औपनिवेशिक सरकार की सेवा में लड़ते थे भारतीय सैनिक
धीरे धीरे जब उभरने लगा उपनिवेश विरोधी आंदोलन
बदलने लगी राष्ट्रवाद की परिभाषा
उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा का रूप लेने लगा राष्ट्रवाद
और इस तरह जन्मने लगा भारतीय राष्ट्रवाद
और टकराने लगे दो राष्ट्रवाद
साम्राज्यवादी औपनिवेशिक राष्ट्रवाद और साम्राज्यविरोधी भारतीय राष्ट्रवाद
पहले के पास भारतीयों की वर्दीधारी सेना थी
सैन्यविहीन भारतीय राष्ट्रवाद के पास थी निहत्थी जनता
निहत्थे भारतीय राष्ट्रवाद से आतंकित हो गया हथियारबंद औपनिवेशिक राष्ट्रवाद
और खंडित करने को भारतीय राष्ट्रवाद अपनाया बांटो राज करो की नीति
और खोज लिया हिंदू और मुसलमान वफादार दलाल
उभरते भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध एक ने नारा दिया हिंदू राष्ट्र का
और दूसरे ने निजामेइलाही के पाकिस्तान का
और साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद जीत गया भारतीय राष्ट्रवाद से
सांप्रदायिकता की विचारधारा बन गयी वैकल्पिक राष्ट्रवाद की विचारधारा
टुकड़े-टुकड़े हो गया भारतीय राष्ट्र और विखंडित हो गया भारतीय राष्ट्रवाद
1947व में ही बन गया मुस्लिम पाकिस्तान
हिंदू पाकिस्तान बनने में बहुत समय लग गया
और भारतीय राष्ट्र के अवशेष उसे चुनौती दे रहे हैं
वापस भारत राष्ट्र बनने में और भी बहुत समय लगेगा।

Friday, July 10, 2026

सियासत 2 (कांग्रेस में संघ का पांचवां कॉलम)

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शशि थरूर के अलावा कांग्रेस में आरएसएस का एक मजबूत पांचवां कॉलम है, और हमेशा से रहा है जिसने राजीव गांधी की राजनैतिक नातजुर्बेकारी का फायदा उठाकर कांग्रेस को डुबाने की प्रक्रिया शुरू की थी। बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और मेरठ-मलियाना-हाशिमपुरा उसी की दुर्बुद्धि से रचे गए। इसने अपना काम 1948 वमें बाबरी मस्जिद में राम लला के प्रकटीकरण से ही शुरू कर दिया था, जिसे नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व ने हवा पकड़ने से रोक दिया था लेकिन वह जमीन में दबा रहा और 1992 में ज्वालामुखी बन फूटा। मनमोहन सरकार में भी बहुत सी जनविरोधी नीतियों को पीछे इसी का हाथ है। कांग्रेस में आमूल जीर्णोद्धार के लिए व्यापक सफाई अभियान की जरूरत है, शुरुआत थरूर से होनी चाहिए।

Saturday, July 4, 2026

जनअसंतोष और काक्रोची परिघटना

 

जन असंतोष और कॉक्रोची परिघटना :

 कुछ सवाल ?

ईश मिश्र

 

आसमान छूती मंहगाई, बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के पेपर लीक होने की परिघटनाओं की बारंबारता, खेती की समस्याओ, पश्चिम एशिया में अशांति से उत्पन्न तेल और गैस संकट से बढ़ी मंहगाई के चलते जनजीवन की बदहाली आदि कारणों से जनअसंतोष व्यापक होता जा रहा है और जनाक्रोश की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। काम के बेहतर हालात, काम के आटलघंटे तथा समुचित न्यूनतम मजदूरी की मांग के लिए नोएडा-गुड़गांव मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन आर्थिक मांगों तक सीमित है, फिर भी निर्मम दमन झेल रहा है। इस तरह के स्वस्फूर्त आंदोलन भविष्य के क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन की आशा की किरण तो दिखाते हैं, लेकिन इनसे. फिलहाल, किसी क्रांतिकारी राजनैतिक बदलाव की अपेक्षा करना अव्यवहारिक है। मौजूदा  नीट की परीक्षा में पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा की गड़बड़ियों के विरुद्ध  जन-असंतोष के प्रतिरोधों के प्रति सरकार लगातार दमनात्मक कदम उठा रही है। पेपर लीक, परीक्षा माफिया की धांधलियों तथा अन्य गड़बड़ियों के विरुद्ध आंदोलनों के संचालन के लिए, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने प्रतियोगी का गठन किया। कुछ दिन पहले, अखबारों की खबर के अनुसार, आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सांसद संजय सिंह इलाहाबाद सर्किट हाउस में ‘प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति’ के कुछ छात्रों के साथ पेपर लीक के मुद्दे पर बातचीत कर रहे थे कि पुलिस और प्रशासन ने यह कह कर बातचीत में व्यवधान डाला कि उन्होंने पूर्व अनुमति नहीं ली थी, तब भी वे छात्रों के साथ बातचीत करते रहे तो पुलिस और प्रशासन ने सर्किट हाउस की बिजली कटवा दी। उप्र और राजस्थान की कई जगहों पर, बेरोजगारी तथा पेपर लीक के मुदेदों पर छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस दमन होता रहा।

 

मंहगाई और काम की दयनीय हालात से तंग आकर न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने के अधिकार के लिए नोएडा और गुड़गांव तथा पानीपत, बरौनी समेत अन्य जगहों के ठेका मजदूरों का, अप्रैल के पहले हफ्ते  से जारी स्वस्फूर्त विरोध प्रदर्शन इस बढ़ते जनाक्रोश की एक स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मजदूरों के स्वस्फूर्त आंदोलन का नियोजित निर्मम दमन सुविदित है। कई मजदूर नेता  और उनके समर्थक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, कलाकार तथा छात्र, अभी भी अमानवीय परिस्थितियों में जेल की यातना झेल रहे हैं। दिल्ली के मानवाधिकार संगठन, जनहस्तक्षेप की रिपोर्ट के अनुसार, तमाम जद्दो जहद के बाद कई मजदूर नेता और आंदोलन के समर्थक जमानत पर छूट गए हैं लेकिन कई अभी भी मनगढ़ंत आरोपों में जेलों में बंद हैं। पत्रकार-लेखक सत्यम् वर्मा को लकनऊ से उठाकर गौत्बुद्धनगर केंद्रीय कारावास में बंद कर उनपर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनयम जैसे काले कानून की धाराएं मढ़ दी गयी हैं।  गौरतलब है कि अन्य जगहों के साथ, मजदूर बिगुल में जनपक्षीय लेखन करने वाले सत्यम वर्मा पर नोएडा में मजदूरों को उकसाने के आरोप लगाए गए हैं जबकि वे दशकों से नोएडा गए ही नहीं  हैं। सर्वविदित है कि सरकारें आंदोलनों पर दमन करने के लिए आंदोलनकारियो पर कभी आंदोलन के मुद्दों के आरोप नहीं लगाती बल्कि कानून-व्यलस्था के गढ़े हुए आरोप लगाती हैं। नोएडा और गुड़गांव में पुलिस द्वारा पकड़े गए सभी मजदूरों और उनके समर्थकों पर हत्या के प्रयास सहित एक से मनगढ़ंत आरोपों में एफआईआर दर्ज हैं। 

यहां मकसद मजदूर और छात्र आंदोलनों पर जारी दमन की व्यख्या या विश्लेषण नहीं है, वे अलग गंभीर व्याख्या तथा विश्लेषण के विषय हैं। इनकी चर्चा का मकसद जनअसंतोष के स्वघोषित प्रहरी, अमेरिका में ऑनलाइन गठित काक्रोच जनता पार्टी के भारत में आंदोलन की स्वस्फूर्तता पर सवाल खड़ा करना है। विरोध के प्रति बेहद असहिष्णु सरकार, अपने दमनतंत्र के प्रतीक, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को, प्रतिरोध-प्रदर्शन की अग्रिम अनुमति के साथ, काक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक के अमेरिका से भारत आगमन पर हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए भेजती है। इससे सहजबोध (कॉमनसेन्स) के किसी भी व्यक्ति के दिमाग में व्यापक जनअसंतोष के काक्रोची अभिव्यक्ति की स्वस्फूर्तता के प्रायोजित होने का संदेह स्वाभाविक है।

 

 जब छात्रों, युवाओं और मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों को देश में आम आदमी की बदहाली, शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, बेरोजगारी आदि ज्वलंत मुद्दों के चलते फैले जनअसंतोष और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति मानी जा रही है तभी भारत के स्वनामधन्य मुख्य न्यायाधीश की बेरोजगार युवाओं के लिए काक्रोच (तिलचट्टा) की उपाधि के वक्तव्य से फैले विवाद को लेकर सोसल मीडिया पर मीमों की भरमार हो गयी। मुख्य न्यायाधीश का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है तथा उनके पद की गरिमा के विपरीत। ऐसे हास्यास्पद बयान की ठिठोली या प्रहसन स्वाभाविक है। काक्रोचों के मीम का संक्रमण आभासी दुनिया से भौतिक दुनिया में हो गया। अतीत में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे और अमेरिका में रह रहे अभिजीत दिपके नामक युवक ने कुछ साथियों के साथ मिलकर काक्रोच जनता पार्टी का गठन कर दिया। जिस तरह पिछली शताब्दी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, उसी तरह देश में बढ़ते  जन असंतोष को ‘दिशा देने’ काक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिषेक दिपके, 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा के साथ अमेरिका से भारत के लिए निकल पड़े। लेकिन जैसा कि कहा गया कि इतिहास अगर खुद को दुहराता है तो पहली बार ट्रेजडी बन जाता है और दूसरी बार तमाशा। वैसे इतिहास कभी खुद को दुहराता नहीं, कभी कभी प्रतिध्वनित होता प्रतीत होता है और प्रतिध्वनि मौलिक आवाज नहीं होती। उल्लेखनीय है कि 6 जून, 2026 को अन्य लोगों के साथ काक्रोचों का हौसला बढ़ाने या काक्रोच जनता पार्टी के जमावड़े में जनवादीकरण की मशाल जलाने भाकपा (माले-लिबरेसन) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी दल-बल के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। हम सब जानते हैं कि विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने के लिए आम आदमी को खासकर मजदूरों और मजदूर संगठनों को एड़ी-चोटी का बल लगाना पड़ता है और यदि अनुमति मिलती भी है तो एक निश्चित अंतराल के लिए। अंतराल का उल्लंघन होने पर पुलिस सक्रिय हो जाती है। लेकिन प्रदर्शन के लिए आगमन की खबर सुनकर पुलिस के प्रतिनिधि प्रदर्शन की अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर दिपके के स्वागत में खड़े थे। पूरे प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा घेरा बनाकर पुलिस प्रदर्शनकारी नेताओं के साथ खड़ी रही।  कहा जा रहा है कि यह कॉक्रोची परिघटना भारत में जेन-जी का नमूना तथा व्यापक जनअसंतोष की स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मुझे लगता है काक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित स्वस्फूर्तता है, जिसका उद्देश्य जनअसंतोष को भटकाना तथा उसमें विचलन पैदा करना है।

दिपके और साथी काक्रोच जनता पार्टी के परचम तले 6 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद लखनऊ और पुणे में भी कार्यक्रम कर आए। जिस तरह केजरीवाल को मंच पर किसी ने चांटा मारा था उसी करह  दिपके को भी किसी ने चांटा मार दिया। लखनऊ-पुणे से दिपके फिर जंतर-मंतर पहुंचे और बोले अब तब तक नहीं हटेंगे जब तक शिक्षामंत्री इस्तीफा नहीं देते और उन्हें पुलिस ने अभी तक नहीं हटाया। जरा सोचिए यौन शोषण के विरुद्ध धरने पर बैठी कुश्ती की खिलाड़ियों को पुलिस ने घसीट घसीट कर हटाया और बंद किया था। आंदोलित किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने कंटीले बाड़ लगाने और सड़क पर कीलें गाड़ने का काम किया था। 70 से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने शहादत दी थी। लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी ने कहा कि वे तब तक नहीं हटेंगें जब तक उनकी मांगे नहीं मान ली जातीं और आज (27 जून, 2026) पांचवे दिन तक पुलिस संरक्षण में वे जंतर-मंतर पर बदस्तूर मौजूद हैं।  कॉक्रोच नेता प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों तथा किसानों का भी आह्वान कर रहे हैं। 

 

अन्ना-रामदेव-केजरीवाल ने भी समाज के सब तपकों का आह्वान किया था और उनका आह्वान अनसुना नहीं गया था।कॉक्रोचों के समर्थन में जुटी भीड़ देखकर 16 साल पहले अन्ना हजारे, किरण बेदी, रामदेव, केजरीवालों के नेतृत्व में  ‘इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी)’ आंदोलन में में जुट रही भीड़ याद आती है, जिसने केंद्र में कांग्रेस सरकार को हटाकर भाजपा सरकार और दिल्ली में कांग्रेस सरकार को हटाकर केजरी सरकार को स्थापित करने का काम किया था। उस समय किसी अखबार/पत्रिका या स्थापित पोर्टल में  सेना के भगोड़े अन्ना के अनशन की आलोचना छपने की गुंजाइश नहीं थी, तो फेसबुक पर उसे आरएसएस-कॉरपोरेट प्रायोजित आंदोलन लिख दिया था, तो बहुत गालियां मिलीं थी। जिस तरह आज कई वामपंथी कॉक्रोचों को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे हैं उसी तरह उस समय भी बहुत से वामपंथी भी अन्ना को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे थे। भ्रष्टाचार के आरोप कोई साबित नहीं हुए अन्ना अपने आश्रम में चले गए, किरन बेदी गवर्नर बन गयी, रामदेव व्यापार बढ़ाने में लग गए और केजरीवाल जय श्रीराम के समानांतर जय हनुमान के नारे पर सवार हो मुख्य मंत्री बन गए।   

 

पेपर लीक को मुख्य मुद्दा बनाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू कॉक्रोची प्रतिरोध की स्वस्फूर्तता मुझे प्रायोजित स्वस्फूर्तता लगती है। कई वामपंथी मित्र मेरी राय को लेनिन के हवाले से बचकाना विकार कह रहे हैं। एक स्वनामधन्य वामपंथी पत्रकार तो बहुत ही आक्रामक अंदाज में नवीनता को बर्दाश्त न कर पाने वाला दकियानूस कह दिया। ऐसी ही प्रतिक्रिया अनना हजारे के आंदोलन की आलोचना पर मिली थी। बचपन में अपने गांव में कहावत सुनी थी कि बरसात के पानी की कई धाराएं जब मिलकर  किसी बड़े जलाशय की तरफ जाने लगें तो उसके रास्ते में विचलन पैदा कर उसे कई हिस्सों में बांटकर जलाशय तक पहुंचने से रोक देना चाहिए। मुझे लगता है कॉक्रोची भटकाव जन असंतोष की धाराओं के मिलकर जलाशय बनने से रोकने के रास्ते का भटकाव है। कांग्रेस का हाल का जो भी इतिहास रहीा हो फिलहाल राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिरोध की धुरी बन रही है, दिपके के पहले  भाषण में सरकार से अधिक कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला किया गया। लगता है वाम पार्टियां और कुछ वाम बुद्धिजीवी विभ्रम की दशा में हैं। व्यापक जनअसंतोष को जनवादी दिशा देने की रणनीति उनकी समझ में नहीं आ रही है और उन्हें कॉक्रोच आंदोलन असंतोष को जनवादी दिशा देने स्वस्फूर्त एजेंट लगता है लेकिन मुझे कॉक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित लगती है। मुझे लगता है कि मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन भारत के बहुजन (कागार वर्ग) की सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का पथ प्रशस्त  करेगा और साझे संघर्षों से निकली एकता उन्हें अपने आप में वर्ग से अपने लिए वर्ग बनने में मददगार साबित होगा। 

 26.06.2026