किसी मीटिंग के लिए पुलिस से अनुमति के लिए चप्पल घिसने पड़ते हैं और प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से निपटने वाली , न्यूमतम मानवीय गरिमा से जीने के लिए नोएडा-गुड़गांव के मजदूर आंदोलन पर कहर बरपाने वाली पुलिस तिलचट्टा नेता केअमेरिका से आगमन पर हवाई अड्डे पर प्रदर्शन की अनुमति के साथ स्वागत करती है। गौरतलब है कि अभी भी बहुत से मजदूर तथा आंदोलन के समर्थक रासुका जैसी खतरनाक धाराओं में जेल में हैं। अमेरिका से आए तिलचट्टा नेता के हाथ में आरएसएस के प्रभात प्रकाशन से छपी अंबेडकर की आत्मकथा थी। गौरतलब है कि अंबेडकर ने कोई आत्मकथा लिखा ही नहीं है। परीक्षाओं की गड़बड़ियों के विरुद्ध कई राज्यों में छात्र सड़कों पर हैं और पुलिसिया कहर झेल रहे हैं। किसी तिलचट्टा नेता ने न तो आंदोलित छात्रों से कोई सहानुभूति जताई न ही मजदूरों से, न ही अपनी सैद्धांतिकी का कोई संकेत दिया। बाजपा-आरएसएस की बजाय राहुल गांधी और कांग्रेस की आलोचना किये। अन्ना की तरह भ्रष्टाचार खतम करने के लिए कटिबद्ध तिलचट्टों के प्रदर्शन के बारे में कांग्रेस के विरुद्ध आरएसएस प्रायोजित अन्ना-केजरी आंदोलन की पुनरावृत्त्ति का संदेह लाजमी है। यह वाकई यदि परिवर्तनकारी युवा आंदोलन बनता है, तो स्वागत करूंगा।
Tuesday, June 9, 2026
Thursday, June 4, 2026
बेतरतीब 191 (अपराधबोध 2)
कक्षा 7
जब (जुलाई,1965) मैं कक्षा 7 में गया तो कक्षा 8 में लग्गूपुर (जूनियर हाई स्कूल पवई) मेरे गांव का कोई नहीं था। 1963-64 में जो लड़के कक्षा 4 में मेरे सहपाठी थे वे अब कक्षा 6 में आ गए। मैं उसी साल कक्षा 4 से प्रोमोट होकर कक्षा 5 में चला गया था और अगली साल जब मैं कक्षा 6 में गया तो वे सब कक्षा 5 में। 1965-66 सत्र में वे कक्षा 6 में आए। इस तरह उस साल (1965-66) लग्गूपुर पढ़ने जाने वालों में कक्षा 6 में कई लोग थे – लल्लू बाबा के बेटे महेंद्र सिंह; पुरवा पर को सहती सिंह के पोते और इंद्रबली सिंह के बेटे जगदीश सिंह; उन्हीं को पट्टीदार यदुनाथ सिंह, जिनके (पिता और दादा का नाम याद नहीं है); देव नारायण सिंह के बेटे आद्या सिंह तथा बहाल यादव और भगवती धोबी। ये सब उम्र में मुझसे बड़े थे। उस साल कक्षा 7 में अपने गांव का मैं अकेले था और कक्षा 8 में कोई नहीं।
अपराधबोध 2
गांव के गैरसवर्णों में प्राइमरी से आगे पढ़ने वालों में मुझसे सीनियर थे मटरू यादव, जो मेरे लग्गूपुर में दाखिला लेने की साल, मिडिल पास कर लिए थे। उनका वास्तविक नाम कुछ और था जो मुझे अब याद नहीं है। वे मेरे बड़े भाई के साथ पढ़ते थे। 1965 में भगवती धोबी और राम बहाल यादव ही लग्गू पुर पढ़ने जाने वाले मेरे गांव के सहयात्रियों में गैर सवर्ण थे।
ठीक से याद नहीं है कि सिलसिला कैसे शुरू हुआ, लेकिन सत्र की शुरुआत से ही, भगवती धोबी और राम बहाल यादव बारी बारी में बस्ता ढोते थे। इसमें किसी को कुछ भी असामान्यय नहीं लगता था और सांस्कृतिक वर्चस्व के तहत विशेषाधिकार (priviledge) अधिकार लगने लगता है। कई महीने यह सिलसिला चलता रहा। यदि अहिराना होकर आता तो बहाल मेरा बस्ता ले लेते और बाद में भगवती तथा धोबियाना होकर जाने में यह क्रम बदल जाता, कुछ दूर भगवती के मेरा बस्ता ढोने के बाद बहाल ले लेते। मिडिल स्कूल पास करने के बाद, कम उम्र में ही किसी बीमारी से बहाल का देहांत हो गया।भगवती कालांतर में ब्लॉक की सरकारी नौकरी में लग गया और फिलहाल अकबर में घर बनाकर बीपी चौधरी नाम से बस गया है। एक बार भगवती का फोन नंबर कहीं से मिल गया था और फोन करके इस घटना के बारे में पूछा और जाहिर है, उन्हें यह घटना याद है। हमारे गांव की सरहद के बाद सलारपुर केी सरहद में हम लोग मुरदहिया बाग में स्कूल यात्रा का पहला पड़ाव डालते थे। वहां बगल के गांवों, चकिया और बखरिया के लड़के भी आ मिलते थे। उसे मुरदहिया क्यों कहा जाता था, हम नहीं सोचते थे। अब लगता है कि वहां शायद पहले मुर्दे जलाए जाते रहे होंगे, यानि वहां श्मसान रहा होगा।
1965 के अगस्त-सितंबर की बात होगी, मैं लगभग साढ़े नौ साल का था ौर भगवती मुझसे दो-ढाई साल बड़ा। . एक दिन मुरदहिया बाग में पड़ाव के बाद उठते हुए भगवती ने कहा कि वहां से अपना बस्ता कुछ दूर खुद ले चलूं, यानि कुछ दूर के लिए, बस्ता ढोने से इंकार कर दिया। यह बात मुझे इतनी नागवार लगी कि मैं गुस्से से आगबबूला हो गया तथा उसे मारने के लिए बेल्ट निकाल लिया। भगवती ने मेरा हाथ पकड़ लिया, यानि कि मार खाने से इंकार कर दिया। यह बात और भी नागवर लगी, मेरा हाथ पकड़ने यानि उसके मार खाने से इंकार करने पर मैं इतना अपमानित महसूस किया कि मुझे रोना आ गया और मैं रोते हुए वहां से वापस घर लौट गया। यह मुझे कितनी बड़ी बात लगी रही होगी कि 3 साल लग्गूपुर पढ़ने के दौरान वह एक मात्र दिन था जब मैं घर से स्कूल के लिए निकलने के बावजूद स्कूल नहीं गया। रोते हुए वापस आया देख बाबा परेशान हो गए उनके पूछने पर मैंने क्या बताया, और उन्होंने क्या समझा ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उनके क्रोध से गांव में सभी लोग आक्रांत रहते थे। जो बात मुझे थोड़ा थोड़ा-थोड़ा याद है वह यह है कि उनकी जमीन में बसे धोबी के बेटे की यह औकात कि उनके बेटे के साथ बदतमीजी करेगा। उनके क्रोधित होने की खबर नदी के किनारे बबूल के जंगल में बकरी चराते भगवती के पिता, संवली दादा तक पहुंची तो वे इतना घबरा गए बकरी हांकर घर ल्ले और लग्गूपुर स्कूल चले गए और वहां से भगवती को लेकर उसके ननिहाल पहुंचा दिए। वह कई दिनों तक न घर आया न स्कूल गया। उन दिनों भी कुछ लोग जातीय भेदभाव की बात नहीं मानते थे। लेकिन यह जातीय भेदभाव के अतिरिक्त और क्या था कि एक गैर सवर्ण छात्र के पिता एक सवर्ण के अनायास क्रोध से भयभीत होकर अपने बेटे को स्कूल जाना छुड़कर रिश्तेदारी में पहुंचा दिए?
उसी दिन से यह घटना मुझे उद्वेलित करती रही। सारा समय मैं इसी के बारे में सोचता रहा कि उसने मेरा बस्ता कुछ दूर ढोने के लिए मना किया था, जबकि मुझे अपना बस्ता खुद लेकर चलना चाहिए था। उसने मुझ पर जवाबी हमला तो नहीं किया, उसे मारने के लिए उठे मेरे हाथ को पकड़ भर लिया। वह मुझसे उम्र में बड़ा था ही शरीर से भी तगड़ा।अब लगता है कि वर्णाश्रमी सांस्कृतिक परिवेश में पले 9 साल के लड़के का यह आत्मचिंतन छोटी बाात नहीं थी। अपने ब्राह्मणीय श्रेष्ठताबोध पर अपराधबोध से ग्रस्त होकर एक दिन मैं भगवती के घर जाकर संवली दादा से उसे वापस बुलाने के लिए कहा और तय किया कि अबसे अपना बस्ता मैं खुद ढोऊंगा। ऐसा करने में अपराधबोध अधिक था या क्षमा भावना, ठीक से कह नहीं सकता। संवली दादा भगवती को वापस ले आए और हम सब सामान्य रूप से स्कूल जाने लगे ऐसे कि जैसे कोई बड़ी बात हुई ही न हो। अब लगता है कि यह उस समय की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना के लिहाज से असामान्य बात थी। उस दिन से मेरा व्यवहार भगवती और बहाल के साथ श्रेष्ठताबोध से मुक्त, मित्रवत समानुभूति का हो गया। अब सोचने पर पाता हूं कि इस घटना ने मुझे सामाजिक चेतना के प्रभाव से जनित व्यक्तित्वगत जातीय भेदभाव की विद्रूपता पर चिंतन को प्रेरित किया।
अब लगता है कि यह घटना मेरे व्यक्तित्व में आत्मावलोकन और आत्मालोचना की की शुरुआत की दृष्टि से निर्णायक साबित हुई। अब ब्राह्मणीय श्रेष्ठताबोध की सोच पर गंभीरता से सवाल करने लगा था। वर्णाश्रमी सास्कृतिक वर्चस्व के ऐतिहासिक संदर्भ में कर्मकांडी ब्राह्मण परिवेश में पैदा हुए, पले 9 साल के बालक का यह सांस्कृतिक आत्मालोकन और आत्मालोचना गौरतलब है।
Tuesday, June 2, 2026
बेतरतीब 190 (बचपन, प्राइमरी से आगे)
1964 में प्राइमरी यानि कक्षा 5 की परीक्षा पास करने के, बाद सबसे नजदीकी स्कूल लग्गूपुर पढ़ने गया जो हमारे गांव से 6-7 किमी दूर था। स्कूल लग्गूपुर गांव में एक जमींदार, सरजू पांडे की विशालकाय कोठी के आहाते में था, लेकिन उसका नाम जूनियर हाई स्कूल पवई था। पवई उस गांव से सटी हुई (लगभग 1किमी दूर) बाजार है। पांडे जी ने कोठी गोरखपुर में रहने वाले अपने दामाद क नाम संकल्प कर दिया था, और खाली रहती थी। उसी से सटा एक खपड़ैल बनाकर पति-पत्नी, उसी में रहते थे।सुना है, उसी गांव में ग्राम समाज की जमीन में वह स्कूल अलग भवन में बन गया है, मुझे कभी नजदीक से देखने का मौका नहीं मिला। अबकी बार गांव जाऊंगा तो देखने जाऊंगा। कोठी के बरामदे में कक्षा 8 की पढ़ाई होती थी और बरामदे से सटे दो कमरे ऑफिस और स्टाफ रूम के रूप में इस्तेमाल हते थे। कोठी के आहाे में विशाल अशोक के पेड़ के इर्द-गिर्द दो मड़हों में कक्षा 7 और कक्षा 6 के क्लास चलते थे। आहाते मे विशाल अशोक के पेड़ के नीचेे कुर्सियों पर शिक्षक बैठते थे।
जब हम कक्षा 6 में गए तो हमारे साथ कक्षा 4 में पढ़ने वाले लड़के तब कक्षा 5 में आए। कक्षा 5 के हमारे सहपाठियों में हमारे गांव के रमाकर उपाध्याय अपने बड़े भाई के साथ कलकत्ता चले गए, बाकी अगल-बगल के गांवों के लड़के कहां गए, पता नहीं। प्रभाकर जी कलकत्ता में किसी स्कूल में नौकरी करते थे। वे तब तक के हमारे गांव के चंद पढ़े-लिखे लोगों में थे। उन्हीं जितना पढ़े, सुर्जू भाई (सूर्यकुमार मिश्र) जौनपुर जिला कृषि कार्यालय में नौकरी करते थे। उस साल (1964 में)अपने गांव के से कक्षा 6 में लग्गूपुर पढ़ने जाने वाला मैं अकेला छात्र था, कक्षा 7 में कोई नहीं था। कक्षा 8 में 3 लोग थे, तीनों मेरे भइया के हमउम्र थे, भइया उसी साल 1964 में आठवीं पास कर, हाई स्कूल में पढ़ने गांव से 12 मील दूर, शाहगंज चले गए थे। जब मैं कक्षा6 में लग्गूपुर जाना शुरू किया तो साथ जाने वाले, कक्षा 8 के 3 लोग थे – राम बचन सिंह; सती प्रसाद मिश्र (लंगड़) तथा रामकिशोर मिश्र (बचूड़ी)। सती प्रसाद और किशोर क्रमशः चाचा भतीजे थे। लंगड़ भाई का नाम लंगड़ क्यों पड़ा, समझ में नहीं आता था, उनके पैर बिल्कुल दुरुस्त थे। वैसे गांव की संवेदनशीलता काफी क्रूर होती है, पैरों में कुछ खराबी वाले का बुलाने का नाम लंगड़ पड़ जाता था और नेत्रहीन का सूरदास। किशोर बताते हैं कि उनका और मेरे भइया तथा ठकुरइया के कनिक बाबा (कनिक बहादुर सिंह) के बेटे सत्येंद्र सिंह का जन्म एक-दो दिन के अंतर पर हुआ था। किशोर गांव के रिश्ते में भतीजे लगते हैं, उम्र में 4-5 साल बड़े होने के बावजूद मिलने पर या फोन पर चाचा जी संबोधन के साथ ही बात करते हैं। फौज में थे, शायद सूबेदार के पद से रिटायर होकर अब इलाहाबाद में बस गअए हैं। सती प्रसाद कलकत्ता में बैंक में नौकरी करते थे, 7-8 साल पहले कलकत्ता से गांव आते समय गया में ट्रेन से गिर कर घायल हो गए थे जिन्हें वहीं रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन वेे बचे नहीं।राम बचन सिंह दिल्ली में स्टेट्समैंन में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, 8-10 साल पहले किसी बीमारी से उनका निधन हो गया। इनके हमउम्र हमारे भइया का दिसंबर, 2023 में किडनी आदि की बीमारी से नोएडा के एक अस्पताल में निधन हो गया।
टेक्स्ट के बीच में फुटनोट की पुरानी आदत के लिए माफी के साथ आगे की कहानी यह है कि कक्षा 8 के अपने तीनें सीनियरों के साथ 10 बजे सग्गूपुर पहुंचने के लिए सुबह लगभग 7 बजे हम घर से निकल पड़ते थे, गांव पार करते करते ये तीनों लोग मिल जाते थे। हमारा पहला पड़ाव, लगभग डेढ़ किमी दूर, सलारपुर की मुर्दहिया बाग में होता था, वहां बगल के गांवों बखरिया के ठकुरी यादव और केदार यादव और चकिया के किशोर (छोटकू) कहांर मिलते थे और हम सलारपुर गांव के अंदर होतेे हुए गद्दोपुर के यमुना ताल पर पहुंचते थे। सलारपुर में घुसते ही पहला घर अंगनू कोहांर का था। अगनू भी कक्षा 8 में पढ़ते थे। अंगनू और सलारपुर के 2-3 लड़के और साथ हो लेते तथा सलारपुर के जुड़वां गांव रामनगर के कुछ लड़के यमुना ताल पर मिलते रामनगर के लड़कों में जयहिंद राजभर और विनोद सिंह और अभिमन्यु सिंह कक्षा 8 में थे, रामकेवल सिंह कक्षा 6 में हमारे साथ तथा कक्षा 6 और 7 में कुछ और लड़के थे, जिनके नाम याद नहीं हैं। यमुना ताल विशालकाय तालाब था जो गद्दोपुर,रामनगर और कछरा, तीन गांवों में फैला था। अब सुनते हैं यमुना ताल सिमट कर बहुत ही छोटा तालाब हो गया है। यमुना ताल के पड़ाव के बाद हम गद्दोपुर पहुंचते थे वहां पांडे लोगों के कुंए पर पानी पिया जाता तथा वहां के 3-4 लड़कों के साथ आगे बढ़ते और हमारा आखिरी पड़ाव लग्गूपुर के पहले बनवसिया बाग में होता, यदि समय बचा होता तो हम वहां कुछ खेलते और फिर लग्गूपुर गांव के अंदर होते हुए स्कूल पहुंचते। जाड़े में दिन जल्दी डूबने के चलते वापस घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो जाता था, लेकिन अंधेरे में भी रास्ते पर आंखें सध जाती थीं।
मिडिल स्कूल में 2 मौलवी साहब थे, ताहिर अली (हेड मास्टर) और आले हसन; एक बाबू साहब, श्याम नारायण सिंह; एक मुंशी जी (चंद्रबली यादव) तथा एक राय साहब (राम बदन राय)। राय साहब का गांव दूर था, इसलिए स्कूल पर ही रुकते थे। राय ससाहब का पोता दिल्ली विश्वविद्यालय के केएम कॉलेज में पढ़ता था, गांव पता चलने पर पूछा था कि उसके गांव (आजमगढ़ जिले में दुर्बासा के पास) के आसपास के मेरे एक शिक्षक थे तो उसने बताया कि वे जीवित थे और उसके दादा जी थे (2लाल पहले उनका देहांत हुआ)। 2012 में मैं अपनी ससुराल (मेरे गांव से लगभग 35 किमी) से मोटर साइकिल से घर जा रहा था, मुख्य सड़क से अपने गांव मुड़ते समय दिमाग में राय साहब से मिलने की बात आई और मुड़ा नहीं आगे बढ़ गया और वहां से सगभग 40 किमी दूर दुर्बासा पहुंचकर घाट पर चाय के साथ पुरानी यादें ताजा करके नए बने पुल से नदी पार कर, राय साहब के गांव (पश्चिम पट्टी) पहुंच गया। मैने 1967 में मिडिल पास किया था और ताज्जुब हुआ कि 45 साल बाद भी राय साहब ने बताने पर पहचान लिया और मेरे बारे में उस समय की कई बातें याद दिलाया। हमने 1964 में जब जूनियर हाई स्कूल पवई में कक्षा 6 में दाखिला लिया तो वहां 4 शिक्षक थे: प्रधानाध्यापक छोटे कद के, बड़े मौलवी साहब,ताहिर हुसैन; और लंबे कद के छोटे मौलवी साहब, आले हसन; बाबू साहब, श्याम नारायण सिंह और कृषि मास्टर मुंशीजी चंद्रबली यादव। बड़े मौलवी साहब कक्षा 6 को नहीं पढ़ाते थे।
स्कूल हम लोग खेलते-कूदते खुराफात मचाते जाते थे। रामनगर के एक जमींदार थे घोड़ सिंह। उनका नाम राधाधीन सिंह था,लकिन वे गालियां मां-बहन-बेटियों का घोड़े से रिश्ता जोड़कर देते थे। धमाचौकड़ी मचाते स्कूल जाते बच्चों को देखकर वेदूर से ही गाली देते थे, ‘तेली-तमोली-भर-बांगर क लड़िका एक तौ पढ़ै के न चाही, पढ़ै जइहें तो खुराफात मचैहेंट तरी बेटी क घोड़……’। इसलिए उन्हें सब घोड़ सिंह कहने लगे। जातीय श्रेष्ठतावाद एक सामाजिक सच्चाई थी,लेकिन प्रतिरोध की संस्कृति भी शुरू हो गयी थी। शिक्षा की सार्वभौमिक सुलभता औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मकउपपरिणाम है। गैर द्विज शूद्र जातियों के लड़के भी पढ़ने लगे थे। स्कूल कॉलेजों में लड़कियोंकी संख्या नगण्य थी। हमारी क्लास में पांडेय जी के खानदान की दो लड़कियां थीं और दूर के एक गांव, भुलेसरा की एक ही लड़की स्कूल आती थी। अब लगता है कि कि कितनी साहसी लड़की थी, भुलेसरा भी स्कूल से 6-7लकिमी दूर था। अगर समकोण त्रिभुज के माध्यम से भौगोलिक स्थिति का वर्णन करें तो हमारा गांव स्कूल से कर्ण की दूरी पर था तो भुलेसरा लंबवत भुजा की। उसका नाम विद्यावती था। हम कभी नजदीक की बाजार, मिल्कीपुर होते घर जाते तो भुलेसरा के बच्चे भी मिल्कीपुर तक साथ ही जाते थे, वहां से हमारा गांव 3-4 किमी दूर था। मिडिल स्कूल के एक ही सहपाठी, राधेमोहन सिंह से अभी तक संपर्क है, उनका गांव भुलेसरा के पास भरचकिया है। राष्ट्रीयसहारा में प्रूफ रीडर की नौकरी से रिटायर होकर वे गांव में ही रहते हैं। बासूपुर के एक जमींदार परिवार के भोले (देवेंद्र पांडे) से गांव जाने पर एकाध बार मुलाकात हो गयी। बासूपुर और लग्गूपुर के पांडेय परिवार एक ही कुल के हैं। स्कूल के हमारे एक सीनियर अभिमन्यु सिंह गांव जाने पर कभी कभी मिलते थे, प्राइमरी में शिक्षक थे, कुछ साल पहले उनका निधन हो गया। स्कूल के सहयात्रियों में एकाध दलित और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों (अब के ओबीसी) के लड़के भी थे उनमें जयहिंद राजभर काफी वाचाल थे। सलारपुर में घुसते ही अलगू कोंहार का घर पड़ता था। अलगू कक्षा 8 में पढ़ते थे। औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मक उपपरिणाम है शिक्षा की सैद्धांतिक सार्वभौमिक सुलभता, जो 1980-90 के दशक तक व्यवहार में भी दिखने लगी। तथाकथित छोटी जातियों को भी सैद्धांतिक रूप से शिक्षा की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन स्कूल जाने वाले लड़कों की संख्या नगण्य थी। फीस नाममात्र की थी – जहां तक मुझे याद है, प्राइमरी में 2 पैसा, मिडिल स्कूल में 2 आने थी तथा हाई स्कूल और इंटर में 2 रुपया 2 आना। इस तरह स्कूल की पढ़ाई हम लगों ने लगभग मुफ्त में की।
मार्च से स्कूल खुलने का समय 10 बजे से पीछे खिसक कर 7 बजे हो जाता था। 5 बजे ही घर से निकलना पड़ता था। घर की मुख्य रसोई के बरामदे के कोने में अइया (दादी) ने एक छोटा चूल्हा बना रखा था, सुबह सुबह कुछ बना देतीं थीं, और कुछ नहीं तो एक रोटी बन जाती थी दूध या घी में पिघलाकर गुड़ के साथ खाकर और कुछ भूजा वगैरह लेकर सुबह बहुत जल्दी स्कूल के लिए निकल पड़ता था। कक्षा 8 की जिला बोर्ड की परीक्षा मार्च में होती थी। जैसा ऊपर बता चुका हूं, मेरे अलावा गांव के और दीनों लोग कक्षा श्र में थे। हमारे गाव के तीनों सीनियर सहयात्री उसके बाद स्कूल जाना बंद कर दिए तो मार्च के बचे दिन और अप्रैल-मई में अपने गांव से मिडिल स्कूल जाने वाला मैं अकेला छात्र था। सलारपुर तक अकेले जाता था वहां से कुछ और साथी मिल जाते थे। इन गर्मियों में एक भूत का एपीसोड है जिसे थोड़ा बाद में बताता हूं।
हम जब स्कूल में दाखिला लिए तो स्कूल में सभी शिक्षक लगभग स्थानीय थे। सबसे नजदीक, पवई के आलेहसन मौलवी साहब थे, जो पैदल ही आ जाते थे। अंग्रेजी और इतिहास के शिक्षक श्याम नारायण सिंह, 5-6 किमी दूर के गांव छज्जो पट्टी के थे और हेड मास्टर, ताहिर मौलवी साहब 6-7 किमी दूर माहुल के थे तथा कृषि अध्यापर चंद्रबली मुंशी जी, 7-8 किमी दूर खैरुद्दीन पुर के। ये तीनों साइकिल से स्कूल आते थे। संस्कृत शिक्षक राम बदन राय दुर्बासा के पास पश्चिम पट्टी के थे, जो वहां से 25-30 किमी दूर था, वे स्कूल में ही रुकते थे। जिस बरामदे में कक्षा 8 की क्लास चलती थी उसके ऊपर के बरामदे को दोनों किनारे एक एक कमरे थे, उनमें से एक में राय साहब टिकते थे। स्कूल में रामशकल नाम के चपरासी थे, वे और उनकी मां भगतिन चाची मिल कर नौकरी करते थे, भगतिन चाची की बात की कुछ खास बातें कक्षा 8 की चर्चा के साथ बताऊंगा। रायसहब हमारे दाखिला लेने के बाद किसी और स्कूल से स्थांतरित होकर आए थे। मैं कद-काया में छोटे होने के नाते कक्षा में सबसे आगे बैठता था। संस्कृत का पहला पाठ सरस्वती बंदना था, “या कुंदेंदुतुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता…….”।राय साहब ने पूछा कि कौन वह श्लोक लय में पढ़ सकता था। मैंने हाथ उठा दिया , और पूरा श्लोक सही सही पढ़ दिया। रायसाहब ने छात्रों को संबोधित कर कहा कि आज से मुझे ईश नारायण मिश्र की बजाय पंडित ईशनारायण मिश्र बुलाया जाए। कुछ दिन लड़के पंडित कह चिढ़ाते थे, फिर छोड़ दिया।
एक दिन मैं स्कूल खुलने से थोड़ा पहले पहुंच गया और राय साहब स्कूल के कुंए पर नहा रहे थे। मुझे प्यास लगी थी, मैं कुंए पर पानी पीन पहुंचा। रामशकल कुंए से बाल्टी में पानी निकाल रहा था। राय साहबव में हंसकर पूछा कि क्या खाकर आया हूं मैंने थोड़ा हिचकिचाहट के साथ बताया, धूध रोटी, उन्होंने पूछा कितनी रोटी? मैंने कहा एक त वे रामशकल से बोले , “ अरे इसे जल्दी पानी पिलाओ, एक रोटी खाकर आया है”।
कक्षा 6 के एक और संस्मरण के बाद आगे बढ़ता हूं। यह जीवन की नैतिक अपराध बोध की पहली याद घटना है, इसे मैंने बहुत (लगभग 10 साल) पहले लिखा। जिसे यहां कॉपी-पेस्ट कर रहा हूं।
02,06.2026Friday, May 29, 2026
बेतरतीब 189 (विवाह)
54 साल पहले, 29 मई 1972 को हमारी शादी हुईं थी. विवाह के दिन मेरी उम्र 16 साल 11 महीने 3 दिन यानि लगभग 17 वर्ष थी, सरोद जी की इससे साल-6 महीने कम ही रही होगी। पिछले सालों में अपने विवाह के बारे में काफी-कुछ लिख चुका हूं, इस विषयमें कुछ और लिखने में पुनरावृत्ति की काफी संभावनाएं हैं। मौजूदाै पीढ़ी के युवकों को ऐसी शादियां अजूबा परिघटनाएं लगेंगी लेकिन, इतिहास की गतिविज्ञान के लिहाज से 54 साल लंबा समय है। हमारे बचपन का ऐतिहासिक चरण आर्थिक-सांस्कृतिक रूप से पूर्व-आधुनिक वर्णाश्रमी, सामंती चरण था और बदलाव की हवा बहना शुरू हो गयी थी। औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मक उपपरिणाम था, शिक्षा की सार्वभैमिक सुलभता, जिसके असर दिखने लगे थे। मैं इंडरमीडिएट (कक्षा 12) की परीक्षा देकर घर आया तो विवाह का कार्ड छप चुका था। असफल विद्रोह की कहानी फिर कभी।हम लोगों ने न तो शादी के पहले एक दूसरे को देखा था न शादी के लगभग 3 साल बाद गौने तक। 28 फरवरी, 1975 को हमारा गौना हुआ तब हम दोनों ने एक दूसरे सा बातचीत की शुरुआत किया। मैंने कहा सरोज जी, उन्होंने कहा हां। तभी से मैं उन्हें सरोज जी ही कहता हूं क्योंकि किसी को संबोधन की जो आदत पड़ जाए वह स्थाई हो जाती है। गौने के बाद भी, काफी दिन, अन्यान्य कारणों से हम साथ नहीं रहते थे, जब हमारी बड़ी बेटी स्कूल जाने की उम्र की हो गयी तब से हमने साथ रहना शुरू किया। 39 साल से हम साथ रह रहे हैं सरोज जी का बड़प्पन है कि थोड़ा-बहुत नोंक-झोंक के साथ मुझे इतने सालों से झेल रही हैं। उम्मीद है बाकी जिंदगी भी हंसी-खुशी कट जाएगी, सरोज जी को साभार शुभकामनाएं।
Saturday, May 23, 2026
जनहस्तक्षेप ( गुड़गांव मजदूर आंदोलन)
*जन हस्तक्षेप*
फासीवादी मंसूबों के खिलाफ अभियानता. 20 अप्रैल 2026
*गुड़गांव-मानेसर श्रमिकों के वेतन बढ़ोतरी आंदोलन पर दमन संबंधी जांच रिपोर्ट पर वक्तव्य-*
मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार संगठन जन हस्तक्षेप हरियाणा के गुड़गांव और मानेसर में विभिन्न कंपनियां के मजदूरों द्वारा वेतन बढ़ोतरी की मांग को लेकर दिए जा रहे धरने पर पुलिस प्रशासन द्वारा बर्बर लाठी चार्ज और मजदूर नेताओं व कार्यकर्ताओं को बीएनएस धारा 109 (सीआरपीसी की पुरानी धारा 307) के तहत हत्या के आरोप में गिरफ्तार करने की कड़ी निंदा करता है। साथ ही मांग करता है कि सरकार तुरंत सभी गिरफ्तार मजदूरों और कार्यकर्ताओं को रिहा करे और उन पर लगे आपराधिक धाराओं को वापस ले। साथ ही उन दोषी कंपनियों और श्रम विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे, जिन्होंने वर्ष 2025 में श्रमिक नेताओं के साथ बनी कमेटी में आम सहमति से वेतन बढ़ोतरी का फैसला लिए जाने के बावजूद उसे लागू नहीं किया और मजदूरों को आंदोलन के लिए विवश होना पड़ा। जन हस्तक्षेप हरियाणा सरकार से भी मांग करता है कि वह 2025 में मजदूरी को लेकर गठित कंपनी मालिकों के एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन नेताओं और श्रम विभाग के अधिकारियों की संयुक्त कमेटी द्वारा स्वीकृत किए गए 23196 रूपए न्यूनतम मजदूरी को तत्काल प्रभाव से नोटिफाई कर उसे लागू करे।
गुड़गांव-मानेसर में मजदूरों के शांतिपूर्ण वेतन बढ़ोतरी संबंधी आंदोलन पर कंपनी मालिकों और पुलिस प्रशासन के बर्बर दमन और गिरफ्तारियों की खबरों को देखते हुए तथ्यों की जांच के लिए जन हस्तक्षेप की चार सदस्यीय तथ्यानवेषी टीम 17 अप्रैल 2026 को गुड़गांव गई। टीम ने प्रभावित मजदूरों और भोडसी जेल में बंद श्रमिक कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिले कर विस्तृत बातचीत की। पुलिस प्रशासन और प्रबंधन ने 75 एफआईआर नंबर में 44 लोगों को गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ दिया, लेकिन वेल सोनिक कंपनी यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत, कोषाध्यक्ष पिंटू कुमार यादव, श्यामवीर, राजू, हरीश सहित अन्य श्रमिकों को 307 के तहत भोडसी जेल में बंद कर दिया था। जांच दल के लौटने के दूसरे दिन सोमवार 18 अप्रैल को अजीत सिंह की जमानत हो गई, लेकिन शेष लोग अभी भी जेल में हैं।
जन हस्तक्षेप की टीम ने तथ्यों की जांच में पाया कि मजदूरों का असंतोष लंबे समय से था। खास तौर पर ठेका मजदूर कम वेतन और बेतहाशा बढ़ रही महंगाई से त्रस्त थे। श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि 2025 में मजदूरी बढ़ाने को लेकर राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई थी। इसमें कंपनी प्रबंधन के एसोसिएशन, मजदूर यूनियन और श्रम विभाग के अधिकारी सदस्य थे। श्रमिकों की तरफ से अजीत सिंह, एटक के अनिल पवार और आकाश सदस्य थे। अंतिम बैठक दिसंबर में हुई, जिसमें न्यूनतम मजदूरी वृद्धि पर सहमति बनी। इसे 1 अप्रैल 2026 से लागू करना था। बाद में हरियाणा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट में संशोधन करते हुए 3 अप्रैल को 15220 रुपए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने पर सहमति दी और 8 अप्रैल को उसका नोटिफिकेशन जारी किया। यहां एक गौरतलब तथ्य है कि इसी दौरान हरियाणा सरकार ने गुड़गांव और मानेसर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादले किए।
शुरुआत में होंडा कंपनी में 2017 से ठेका मजदूरी पर काम कर रहे श्रमिकों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर धरना दिया। कंपनी ने 16 हजा और 18 हजार की दो कैटेगरी का वेतन देने की सहमति दी। इसका दूसरी कंपनियों के श्रमिकों पर व्यापक असर पड़ा। वहीं सरकार द्वारा 8 अप्रैल को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद, मुंजाल शोवा कंपनी मानेसर में बढ़े वेतन की नोटिस लगाने की मांग को लेकर 9 अप्रैल को श्रमिक धरने पर बैठ गए। इसके सामने की कंपनी सत्यम कंपनी के श्रमिक भी शाम को धरने पर बैठ गए। हालांकि इससे पहले रूप पॉलीमर्स के श्रमिक 5 अप्रैल को ही धरने पर बैठ गए थे। सत्यम और मुंजाल के श्रमिकों को कंपनी मालिकों और प्रशासन ने गेट पर बैठने से मना किया। इस पर श्रमिक तहसील परिसर में धरना देने चले गए। इस तरह 3 अप्रैल से लेकर आठ अप्रैल तक कई कंपनियों के श्रमिक तहसील पर धरना देने आ गये।
9 अप्रैल को ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन गारमेंट व अन्य उत्पादों की कंपनियों ने ऐसा नहीं किया। इससे पूरे इंडस्ट्रियल एरिया के श्रमिकों में असंतोष फैल गया। रिचा के तीन प्लांट है। इसके अलावा सत्यम रूप पॉलीमर आदि कई कंपनियां के श्रमिक 7 अप्रैल को धरने पर बैठ गए और बाद में कई और कंपनियों के श्रमिक जुड़ते गए। कई कंपनियों ने अपने मजदूरों को हड़ताल पर जाने की अनुमति नहीं दी। सेक्टर 37 में इन स्टाइल इंक कंपनी आदि के बाहर 25-30 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। गारमेंट कंपनी रिचा ग्लोबल ने जब बढ़े वेतन का नोटिस नहीं लगाया, तो श्रमिकों ने 9 तारीख को फैक्ट्री गेट पर जमा होकर नोटिस लगाने की मांग की। इसके तुरंत बाद ही पुलिस वहां पहुंच गई और उसने लाठी चार्ज किया। श्रमिक भाग कर मंगरोला, नाहरपुर आदि आसपास के गांवों की तरफ भागे, तो उन्हें रास्ते में पकड़ कर पीटा गया और जो भी मिला उसे गिरफ्तार कर लिया।
जांच के दौरान यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आए हैं कि कई कंपनियां के प्रबंधन ने तहसील पर धरना दे रहे श्रमिकों को अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया। यही नहीं श्रमिक स्थानीय गांवों में जिन लोगों के यहां कमरा किराए पर लेकर रहते हैं, उनसे भी दबाव डलवाया गया। गुड़गांव-मानेसर में ट्रेड यूनियन आंदोलन का इतिहास रहा है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि कंपनियां स्थानीय दबंग लोगों के जरिए मजदूरों पर हमले करवाने से लेकर सभी तरह के दबाव डलवाती रही हैं। हालांकि इस बीच कई कंपनियों ने बढ़ा वेतन लागू कर दिया, लेकिन अभी भी मानेसर की नील मेटल प्रोडक्ट, स्टरलाइट 4G जैसी कंपनियों ने बढ़ा वेतन नहीं दिया है। यही कारण है कि हरियाणा में 8 व 9 मई के बाद से छिटपुट कई कंपनियों में श्रमिक विरोध कर रहे हैं।
जांच टीम को श्रमिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि आंदोलन में कम वेतन और बेतहाशा महंगाई प्रमुख कारण था। 2019 में कंपनियों ने पुराने श्रमिकों को निकाल दिया था। उस समय अधिकांश मजदूर मिनिमम 15000 से लेकर ₹30000 तक वेतन पाते थे। उस समय उनकी यूनियन भी होती थी, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद 2021 से कंपनियों ने जब कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर रखा, तो उन्हें 10 और 11 हजार रुपए ही देना शुरू किया। वह यूनियन से भी नहीं जुड़ सकते थे, क्योंकि वह ठेकेदारों के माध्यम से आए थे। कंपनी प्रबंधन का भी यूनियन पर दबाव था कि वह ठेका श्रमिकों को अपना सदस्य नहीं बना सकते, अधिकांश कंपनियों में यूनियन है, लेकिन उसमें ठेका श्रमिक सदस्य नहीं बन सकते और ठेका श्रमिकों के सवाल पर यूनियन खामोश रहती हैं, जिन यूनियन ने ठेका श्रमिकों को सदस्य बनाया तो उनकी यूनियन की मान्यता समाप्त कर दी गई। बेल सोनी कंपनी की ट्रेड यूनियन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने ठेका कर्मियों को सदस्य बनाया तो कंपनी ने उसकी मान्यता लेबर आफिस (ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार) से शिकायत कर समाप्त करवा दी और कंपनी ने नई यूनियन बनवा दी। अब यह मामला हाई कोर्ट में है।
जन हस्तक्षेप जांच दल में हिंदू कॉलेज (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर ईश मिश्र, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे और वरिष्ठ पत्रकार हैदर नकवी शामिल थे। टीम ने जांच में पाया कि गुड़गांव-मानेसर में क्रांतिकारी मजदूर आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में कंपनी मालिकों और आरएसएस-बीजेपी की सरकार ने श्रमिकों के जीने लायक न्यूनतम वेतन को ही नहीं समाप्त किया है, बल्कि उनके यूनियन बनाने और विरोध प्रकट करने का संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों को भी समाप्त किया है।
जन हस्तक्षेप मांग करता है कि -
1- आंदोलन से जुड़े मजदूरों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ सभी मामले तुरंत वापस लिए जाएं और उन्हें रिहा किया जाए।
2- गिरफ्तार सभी श्रमिकों के जप्त किए गए मोबाइल आदि उपकरण उन्हें वापस लौटाए जाएं।
3- ठेका मजदूरों को यूनियन बनाने या पहले से चल रही यूनियन में शामिल होने का अधिकार दिया जाए।
4- अप्रैल माह से घोषित बढ़े वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए और वेतन वृद्धि को महंगाई से जोड़ा जाए। मजदूरों को पीएफ और ईएसआई का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाए।
5- ठेका मजदूरी की व्यवस्था खत्म किया जाए और कंपनियों को सीधे रोजगार देने का निर्देश दे।
6- गुड़गांव-मानेसर की सभी औद्योगिक इकाइयों और कंपनियों के रिकार्ड तैयार कर पंजीकृत किए जाएं साथ ही मजदूरों की रजिस्ट्री बने।
7- चार श्रम संहिता को निरस्त किया जाए और श्रम कानूनों एवं श्रम अधिकारों, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है, को लागू करना सुनिश्चित किया जाए।
संयोजक-
डॉक्टर विकास बाजपेई जेएनयू
सहसंयोजक-
अनिल दुबे वरिष्ठ पत्रकार
9811080915
Friday, May 22, 2026
मजदूर आंदोलन और पुलिस दमन
मजदूर आंदोलन और पुलिस दमन
ईश मिश्र
पूंजीवाद में मालिक कम-से-कम मजदूरी देकर मजदूर से ज्यादा-सा-ज्यादा काम लेना चाहता है यानि ज्यादा-सा-ज्यादा शोषण करना चाहता है और मजदूर इसे कम-से-कम करना चाहता है और अंततः समाप्त करना चाहता है। इसके लिए उसे संगठित होने की जरूरत होती है। कार्ल मार्क्स ने अपनी कालजयी कृति “पूंजी” में लक्षणिक रूप से कहा है, "पूंजी वह मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह जीवित श्रम का खून चूसकर ही जीवित रहती है, और श्रम के रूप में जितना अधिक खून चूसती है, उतना ही अधिक जीवित रहती है।"
सदियों के संघर्षों और शहादतों के परिणाम स्वरूप मजदूरों ने दिन के 8 घंटे के काम के अधिकार के साथ कुछ अधिकार हासिल किए थे। दिन के 8 घंटे के काम का अधिकार मार्क्स तथा यूरोप के अन्य जाने माने मजदूर नेताओं/समाजवादी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में 1864 में स्थापित मजदूर अंतर्राष्ट्रीय संगठन (फर्स्ट इंटरनेसनल) की प्रमुख मांगों में था। संघर्षों से हासिल मजदूर अधिकारों को इंगलैंड और अमेरिका में दक्षिणपंथी सरकारों ने 1980 के दशक से छीनना शुरू किया तथा 1990 के दशक में भूमंडलीकरण के साथ यह प्रवृत्ति भूमंडलीय हो गयी। भारत में भूमंडलीकरण के समर्थक भी इसमें निहित अमानवीय हद तक मजदूर विरोधी प्रवृत्तियों से सहमत थे और उन्होंने ‘मानवीय चेहरे के साथ’ भूमंडलीकरण की बात करना शुरू किया। भूमंडलीकरण के नाम पर एक तरफ कल्याणकारी संस्थाओं का विघटन शुरू हुआ दूसरी तरफ मजदूर विरोधी नीतियों का प्रतिपादन। मजदूर विरोधी नीतियां बनती और लागू होती गयीं और ट्रेड यूनियनें टूटती/कमजोर होती गयीं नजीजतन दशक-दर-दशक बीतते गए और मजदूर विरोधी नीतियों तथा मजदूरों के शोषण-दमन के विरुद्ध राष्ट्रीय या प्रदेश स्तर पर किसी ट्रेड यूनियन आंदोलन की खबर नहीं मिली। जो भी छिट-पुट समूह; मानवाधिकार संगठन या कार्यकर्ता मजदूरों के पक्ष में बोलते हैं, उन्हें सरकारें; उनके लंबरदार; सांप्रदायिक अंधभक्त और मृदंग मीडिया अर्बन नक्सल या देशद्रोही घोषित कर देती है। राष्ट्रीय ट्रेडयूनियनों का अस्तित्व संगठित क्षेत्र में सिमटता गया और धीरे धीरे उत्पादन का संगठित क्षेत्र नगण्य होता गया और असंगठित क्षेत्र में ट्रेडयूनियन बनाने की मनाही है। उत्पादन और सेवा-क्षेत्रों में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर ठेकेदारी प्रथा लागू होती गयी। 8 घंटे काम का अधिकार गूलर का फूल होता गया तथा अमानवीय स्तर की दयनीय मजदूरी पर 12 से 16 घंटे काम लिया जाने लगा। मार्क्स ने “दर्शन की गरीबी” में लिखा है कि अपनी आर्थिक परिस्थितियों के चलते मजदूर ‘अपने आप में वर्ग’ हैं, लेकिन तब तक वे एक भीड़ भर रहते हैं, जब तक साझा हितों के आधार पर साझे संघर्ष के लिए संगठित होकर ‘अपने लिए वर्ग’ नहीं बनते हैं। साझा हितों के आधार पर वे साझे संघर्ष के लिए तभी संगठित होते हैं, जब वे वर्गचेतना से लैश होते हैं। वर्ग चेतना से लैश होनने को सामाजिक चेतना का जनवादीकरण भी कहा जा सकता है। सामाजिक चेतना का निर्माण शासक वर्गों के वैचारिक प्रभाव के चलते होता है, जिसे मार्क्स ‘युग का विचार’ कहते हैं। युग के विचार यानि शासक वर्ग की विचारधारा को तोड़कर सामाजिक चेतना के जनवादीकरण या वर्गचेतना के संचार से ही मजदूर वर्गचेतना से लैश होकर वर्गसंघर्ष के लिए संगठित होता है। मजदूरी में वृद्धि और काम की परिस्थितियों जैसी मांगों के लिए आर्थिक संघर्ष भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा है, जिसे क्रांतिकारी राजनैतिक संघर्ष का पूर्वाभ्यास भी कहा जा सकता है। जैसा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुछ मजदूरों से बातचीत से लगा, किसी राजनैतिक पार्टी या राष्ट्रीय ट्रेडयूनियन के अभाव में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव तथा मानेसर एवं बिहार के बरौनी में फूटा मजदूरों का जनाक्रोश एवं हड़तालें स्वफूर्त वर्ग चेतना का परिणाम हैं।
पश्चिमी एशिया में अमेरिका-इज्रायल द्वारा थोपे गए साम्राज्यवादी युद्ध के चलते, रसोई-गैस की किल्लत की सबसे अधिक मार मजदूरों पर पड़ी और बहुत से मजदूर काम छोड़कर अपने गांव भागने लगे, लेकिन गांव में रोजी-रोटी की सुविधा होती तो वे पेट भरने के लिए हजार मील दूर क्यो आते? काम की शर्तों में सुधार और मजदूरी में न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीवन-बसर भर की बढ़ोत्तरी के लिए हड़ताल के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा। संविधान में जीने का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज है, और जीने की शर्त है भरण-पोषण की न्यूनतम जरूरतें जिन्हें पूरी करना साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी की व्यवस्था अनावश्यक मानती है। ऐसे में असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश का विस्फोट लाजिमी है। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आती हैं, “रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है।” बौखलाहट में सरकार मजदूरों, मजदूरों की जायज मांगों के लिए उनके आंदोलन का समर्थन करने वाले छात्र एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हिंसा भड़काने के झूठे आरेपों में गिरफ्तार कर रही है। नोएडा पुलिस यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं भगत सिंह तथा साथियों के दस्तावेजों के संपाद सत्यम वर्मा तथा मजदूर बिगुल से जुड़े कई छात्रों को गिरफ्तार कर चुकी है। गौतमबुद्ध नगर के जेल अधिकारियों के मार्फत मिली अपुष्ट खबरों के अनुसार, गंभीर आरोपों में बंद कुछ मजदूरों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा ज्यादातर मजदूरों को जमानत पर छोड़ा जा चुका है। मजदूरों के मामले में गंभीर आरोप कितने गढ़े हुए होते हैं, जग जाहिर है। आद्योगिक इलाके तथा कारखाना क्षेत्र पुलिस छावनियों में तब्दील हो गए हैं।
24 अप्रैल को मानवाधिकार संगठन “जन हस्तक्षेप” की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों से बातचीत में पाया कि आंदोलन की शुरुआत रिचा ग्लोबल गारमेंट कंपनी से हुई। कंपनी पहले गुड़गांव में थी और वहां अधिक वेतन देती थी। कुछ साल पहले कंपनी ने नोएडा सेक्टर 83 में शिफ्ट होने के बाद, मजदूरी में कटौती कर दी। इसके लिए कंपनी ने एक नायाब तरीका निकाला पहले मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया और फिर उन्हें ही कम वेतन पर फिर से काम पर रख लिया। जनहस्तक्षेप टीम को “एक मजदूर ने बताया कि 9 अप्रैल को खबर फैली कि हरियाणा सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन में 35% वृद्धि के कारण कंपनी के मानेसर प्लांट में अधिक वेतन दिया जा रहा है, जिससे कंपनी के नोएडा कार्यालय के मजदूरों में असंतोष बढ़ गया। वे समान काम की समान मजदूरी की मांग करने लगे। 9 अप्रैल 2026 को मजदूरों ने कंपनी गेट पर धरना शुरू कर दिया। 10 अप्रैल को प्रबंधन ने पुलिस बुलाई और कुछ मजदूरों को गिरफ्तार करवा दिया। इसके बावजूद विरोध शांतिपूर्ण बना रहा। अगले दिन विरोध मदरसन जैसी अन्य कंपनियों तक फैल गया।”
सरकार आंदोलन को दबाने और आंदोलनकारी मजदूरों का दमन करने तथा आंदोलन को बदनाम करने की जुगत में लग गयी। कल 28 अप्रैल 2026 को ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ द्वारा प्रेस क्लब दिल्ली में आयोजिक पत्रकार सम्मेलन में सरकार द्वारा आंदोलन का मास्टर माइंड घोषित, आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद ने वीडियो दिखाया जिसमें आदित्य और अन्य आंदोलनकारी शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील कर रहे हैं और व्याट्सअप की क्लिपिंग दिखाय़ा जिसमें पुलिस के घुसपैठिए आंदोलन को वदनाम करने के लिए हिंसा की अपील कर रहे हैं। खैर यह तो सुविदित तथ्य है कि मजदूरों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए पुलिस घुसपैठकर उसे हिंसक बनाने की कोशिश करती है चाहे वह 1886 का शिकागो का मजदूर आंदोलन हो या 2026 का नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गुडगांव-मानेसर का।
जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों से बातचीत में पता चला कि 13 अप्रैल को पुलिस ने कंपनियों के सामने सड़कों पर बैरिकेड्स लगा दिए, जिससे ट्रैफिक जाम हो गया। जाम में फंसे लोगों के विरोध के विरुद्ध पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिससे फैली अफरा-तफरी को चलते आंदोलन पास की फैक्ट्रियों तक फैल गया और धीरे-धीरे, आंदोलन नोएडा फेज 2, सेक्टर 59, 60, 62, 83 और 84 के औद्योगिक क्षेत्रों में फैलता गया। पुलिस ने मजदूरों की अंधाधुंध गिरफ्तारी शुरू कर दी और विरोध में देखते-देखते 30,000-40,000 मजदूर सड़कों पर आ गए। पुलिस ने एक हजार से ज्यादा मजदूरों को गिरफ्तार किया, उन्हें 5 से 7 दिनों तक जेल में रखा, उनके परिवारों को उनके ठिकाने की जानकारी तक नहीं दी। मजदूर न्यूनतम वेतन और श्रम कानूनों को लागू करनेके लिए आंदोलित थे लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर में उकसाने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आगजनी के झूठे आरोप हैं। घटना के बाद, सरकार और श्रम विभाग ने कई ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द करना शुरू कर दिया, जो इस बात का प्रमाण है कि सरकार भी मानती है कि उद्योगपति और ठेकेदार गड़बड़ कर रहे थे।
हमारी समझ से यह आंदोलन स्वस्फूर्त है तथा मजदूरों में अपने हितों के प्रति स्वस्फूत चेतना का संचार क्रांतिकारी परिघटना है और असहनीय, अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे मज़दूरों के आक्रोश के विस्फोट का जो सिलसिला बिहार में बरौनी और हरियाणा में पानीपत के बाद मानेसर, गुड़गांव, फरीदाबाद, उत्तरप्रदेश में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, इलाहाबाद, राजधानी दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों, राजस्थान में भिवाड़ी, टप्पूकड़ा, चौपानकी, खुशखेड़ा, नीमराना, और उत्तराखंड में लालकुआँ, हलद्वानी, रुद्रपुर से होते हुए आगे बढ़ा, वह अब गुजरात के सूरत और हजिरा आदि से होते हुए झारखण्ड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों तक फैलता जा रहा है। दक्षिण के औद्योगिक क्षेत्रों में भी ज्वालामुखी विस्फोट के लिए सतह के नीचे कुलबुला रहा है। यह लेख इस आशावादी मनोकामना के साथ समाप्त करना अनुचित न होगा कि उम्मीद है कि यह आंदोलन देश में मजदूरों के भावी क्रांतिकारी आंदोलन का पूर्वकथ्य साबित होगा।
Thursday, May 14, 2026
बेतरतीब 188(स्टीमर)
मैं पहली बार स्टीमर (पानी का जहाज ) में विंध्याचल जाने के लिए मिर्जापुर में गंगा पार करने के लिए बैठा। 1960 के आस-पास की बात होगी। उसके पहले, सुने थे कि हमारे गांव और आसपास के गांवों से लोग जौनपुर-भदोही होते हुए बैलगाड़ी से गंगा तट पहुंचते थे और नाव से गंगा पार कर विंध्याचल जाते थे। मैं 5 साल से ज्यादा उम्र का था यह बात निश्चितता से इसलिए कह सकता हूं कि मेरे सिर पर बड़े बाल नहीं थे और पांचवे साल में मेरी मुंडन हो चुकी थी। उस समय रेल से विंध्याचल जाने के दो रास्ते थे, बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय जाकर और वहां से गाड़ी बदलकर विंध्याचल जाना और दूसरा बिलवाई/शाहगंज से मुगलसराय की गाड़ी से जाकर बनारस में उतर जाना और वहां से इलाहाबाद (रामबाग) की छोटी लाइन (अब बड़ी लाइन हो गयी है) से माधो सिंह उतर कर नाव से गंगा पार कर मिर्जापुर/विंध्याचल जाना। यह बात मैं स्थितिजन्य आकलन से कह रहा हूं। अब उस यात्रा की और बाते तो हमें याद नहीं हैं लेकिन माधो सिंह स्टेसन याद है क्योंकि वहां मैं खो गया था और स्टीमर (पानी का जहाज) याद है। स्टीमर को मुझे जहाज कहते सुन किसी ने समझाया कि जहाज उससे 100 गुना बड़ा होता है। 2019 में कार से विंध्याचल से लौटते समय माधो सिंह स्टेसन देखने का मन हुआ । ब्रिटिशकालीन वह स्टेसन जस-का-तस बना हुआ है जाैसा कि हमने उसे बचपन में देखा था। वहां मेरी मां (माई) और दादी (अइया) समेत गांव के बहुत से स्त्री-पुरुष तथा बच्चों का मेला था। पैलेंजर से बनारस जाकर माधो सिंह आए होंगे। स्टेसन पर मैं मेले में से निकल कर घूमने चला गया तथा खीरा खाते हुए गांव के मेले में पहुंचा तो पता चला कि लोगों ने समझा कि मैं खो गया। खैर यह बात फिर कभी। उसके कई साल बाद मैं जब हाई स्कूल में जौनपुर पढ़ता था तो कभी कभी बनारस घूमने चला जाता था। उस समय अस्सी और रामनगर के बीच स्टीमर चलता था, मैं कई बार स्टीमर में चढ़ने के लिए अस्सी से रामनगर चला जाता था। अंडमान में जब वाकई जहाज देखा तब बचपन की बात याद आई कि जहाज स्टीमर सो 100 गुना बड़ा होता है, वास्तव में उससे भी बहुत बड़ा।
Monday, May 4, 2026
शिक्षा और ज्ञान 391 (राम रहीम)
एक पोस्ट पर कमेंट:
राम रहीम ने बलात्कार तो अपनी भक्तिनों का ही किया और भक्तिन का बलात्कार करना भगवान को अपराधी नहीं बना सकता अदालत ने विदेशी कानून के प्रभाव में उसे सजा सुना दिया ऐसे में हिंदुत्व सरकार द्वारा उसे पेरोल देना और प्रवचन करवाना पाप नहीं, पुण्य है। जहां तक उमर खालिद का सवाल है वह मुसलमान नाम वाला तो है ही ऊपर से मार्क्सवादी और नास्तिक भी है, पीएचडी भी उसने बस्तर के आदिवासियों पर किया है जिनकी जमीनेें और जंगल राष्ट्रीय धनपशु अडानी जी को चाहिए। ऐसे पापी को देशभक्त सरकार जमानत कैसे दे सकती है?
Friday, May 1, 2026
शिक्षा और ज्ञान 390 (साप्रदायिकता)
एक पोस्ट पर एक कमेंट का जवाब
सांप्रदायिकता का निर्माण अंग्रेजों ने बांटो-राज करो की नीति के तहत उपनिवेशविरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए इस्लामी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व राष्ट्रवाद की विचारधाराएं उछालकर किया और उसके लिए उसे मुस्लिम लीग-जमातेइस्लामी तथा हिंदू महासभा -आरएसएस के रूप में दोनों समुदायों से दलाल भी मिल गए, अपने इन्ही दलीालों की मदद से औपनिवेशिक शासक देश का विभाजन करने में सफल रहे। यदि देश का विभाजन न होता तो देश के किसी हिस्से में साप्रदायिक ताकतें सत्ता पर काबिज न हो पोतीं। मुस्लिम पाकिस्तान तो 1947 में ही बन गया, हिंदू पाकिस्तान अब बन रहा है।
Monday, March 23, 2026
बेतरतीब 187(अटारी)
एक पोस्ट पर कमेंट :
1983 में मुझे अटारी में समझौता एक्सप्रेस में सहायक गार्ड की नौकरी करने वाला एक मेरा हमउम्र पाकिस्तानी मिला, जियाउल हक का जमाना था, पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी थी उसे समझौता एकप्रेस की ड्यूटी इसलिए ज्यादा पसंद थी कि वह अमृतसर जाकर खुलेआम बीयर पी सकता था। उसके दादा आजमगढ़ के थे और रेलवे में नौकरी करते थे, बंटवारे के समय उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी और वे वहीं रह गए। वह खुद को आजमगढ़ का समझता था मुझसे मिलकर वह इतना गद गद हुआ जैसे वह अपने गांव-देश के किसी से मिला हो, वह कभी आजमगढ़ गया नहीं लेकिन अपने दादा-परदादा के घर और बाग का ऐसा सजीव चित्रण करता था जैसे कि उसका बचपन वहीं बीता हो।
महामानव
महाबली ने कहा, हमारे नॉनबायलोडिकल महामानव की नकेल उसके हाथ में है, महामानव उसके सामने नतमस्तक हो गए, शायद उसके पास एप्स्टीन फाइल की गुप्त जानकारियां हों, यदि मामला हरदीप पुरी तक सीमित होता तो महामानव ने उनसे छुटकारा पा लिया होता। पुरी इस अंदाज में अकड़ रहा है कि हम यदि डूबे सनम तो आपको भी ले डूबेंगे। महामानव महाबली के दर्शन को तो आतुर रहते ही हैं, तेलअवीव की तीर्थयात्रा में छोटे महाबली, इज्रायली नाजी नेता के भी दर्शन करके सनद ले आए। जब महाबली और छोटे महाबलियो ने बौराकर इरान पर ताबड़तोड़ हमला किया तो महामानव और उनके अंधभक्त सुर-असुर भजन गाने लगे। अब जब इरान ने जवाबी हमले में महाबली और उनके नायब को धूल चटादी तो महामानव ने इरानी राष्ट्रपति से शिकायत किया कि उन्हें अरब राजशाहियों में अमेरिकी अड्डों पर हमला नहीं करना चाहिए था, परमाणु हमले से इरान को तबाह करने वाले इज्रायली नाजियों की धमकी पर महामानव मतमस्तक हैं। महाबली ने कहा ईरान से तेल मत लो. महामानव ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने कहा रूस से तल लोगे तो दंडित करूंगा तो महामान ने कहा जैसी आज्ञा प्रभु। महाबली ने तरस खाकर कुछ समय तक रूस से तेल खरीदने पर छूट दे दी, महामानव कृपा पर गद गद हो गए। रूस ने धमकी दी कि यदि इज्रायल ने ईरान पर परमाणु हमला किया तो वह इज्रायल को नेस्तनाबूद कर देगा, महाबली और उनके नायब युद्ध रोकने का बहाना ढूंढ़ रहे हैं, इरान कह रहा है, फतह या शहादत।
गरीब आदमी गैस का सिलिंडर लेकर उसी तरह लंबी लाइनों में खड़ा टूल्हा जलने के इंतजाम का इंतजार कर रहा है जैसे वह नोटबंदी की सनक की मार से बैंको के आगे लंबी लाइन में खड़ा था। मध्यवर्ग तो अभी तक पेट पर भी लात खाकर भजन गा रहा है, लेकिन शीघ्र ही उसे भी पेट पर भी लात के लाले पड़ने वाले हैं। अयोध्या के रामलला महामानव को सद्बुद्धि दें कि वे देश को प्रलय की आग में झोंकने से बाज आएं।
Tuesday, March 17, 2026
बेतरतीब 186(तीरे के खेत)
नदी के किनारे एक बगीचा है।हमारे बचपन में थोड़ा ऊंचाई पर 7-8 बड़े इमली के पेड़ थे और कोने में एक विशाल जामुन, थोड़ा नीचे महुआ, जामुन, आम और ढाख के पेड़ थे नीचे कोने में नदी के किनारे एक बंसवार। आम, जाम जामुन,महुआ, ढाख के पेड़ भूतपूर्व हो गए लेकिन इमली के पेड़ अभी भी जस-के तस हैं और घनी बंसवार में कुछ बांस अभी भी बचे हैं। अबकी घर गया तो एक सुबह तीरे के खेत (घर से पूरब , नदी के किनारे) देखने का मन हुआ, जो कई दशक परती रहने के बाद नदी उस पार के गांव कादीपुर (लोनियाना) का एक व्यक्ति इस शर्त पर बुआई को राजी हुआ कि पहली साल वह कुछ नहीं देगा उसके बाद से बंटाईदारी करेगा। गेंहू और सरसों की फसल बहुत अच्छी तैयार है। हमारे लड़कपन में इन खेतो में जब भी गन्ना बोया जाता तो अगले तीन-चार सालों बिन बोए उपज देता. कटने के बाद पेड़ा के रूप में उगकर। कुछ साल मूंगफली की खेती हुई थी। लोनियाने के ही किसी ने अधिया पर बोया था, मूंगफली की रखवाली कठिन काम था। शाही का बहुत डर होता था। उसके बाद कभी शाही नहीं देखा, शाही चलता तो कांटे छम छम बोलते आदमियों की आहट पर कांटे खड़े कर लेता अन्यथा पीठ प चिपकाए रखता। खैर तीरे के खेत देखने के रास्ते में बगैचा में से गया सोचा कोई दिखता तो इमलियों के बीच फोटो खिंचवाता, लेकिन सेल्फी एक ही पेड़ के साथ ले पाया, वह भी ऐसा कि पता ही ही नहीं चल रहा है कि किस चीज का पेड़ है. इस बगैचे के दक्षिण वन विभाग की जमीन में एक बड़ा मंदिर परिसर बन गया है जो सौ साल से अधिक समय में हमारे गांव की सबसे उल्लेखनीय परिघटना है। मंदिर निर्माण की कहानी फिर कभी।
Thursday, March 12, 2026
बेतरतीब 185 (जनेऊ)
एक पोस्ट पर कमेंटः
जो भी साहित्यिक, ऐतिहासिक, कंवदंतीय साक्ष्य उपलब्ध हैं उनसे कहीं यह नहीं लगता कि कबीर की मृत्यु सिकंदर लोदी के आदेश से हाथी के कुचलने से हुई, यह तो निश्चित है कि कबीर ईश्वर-अल्लाह समेत सभी सत्ताओं को चुनौती देेते रहते थे। बाकी साधु-संतों द्वारा सत्ताओं को चुनौती देने या उनसे असहज सवाल करने की पौराणिक मिसालें ऐतिहासिक नहीं हैं, पुराण किसी विशिष्ट नैतिक मूल्यों को महिमामंडित और स्थापित करने के लिए गढ़े जाते हैं। यह जरूर लगता है कि प्रचीन काल के शासक आज की तुलना में ज्यादा सहिष्णु लगते हैं वरना वेद रचयिताओं की भर्त्सना करके चारवाक जैसे दार्शनिक जिंदा रहे थे। पहले के धार्मिक लोग भी आज से असहिष्णु नहीं थे। मेरे दादा जी पचांग के कट्टर अनुयायी और अबाध, अगाध आस्तिक थे। घर में ठाकुर का भोग लगने के पहले रसोई से किसी को भोजन नहीं मिल सकता था। हमारी दादी (अइया) ने छोटे बच्चों के लिए रसोई के बरामदे के एक कोने में छोटा सा चूल्हा बना रखा था। चुटिया (चुर्की) से मेरे छुटकारा पाने का किसी ने संज्ञान ही नहीं लिया और जनेऊ से मुक्ति पाने पर शुरू मेरे बाबा मंत्र पढ़कर जनेऊ पहना देते थे घर से वापस जाते समय गांव के बाहर निकते ही मैं फिर निकाल देता। जब उन्हें लगा कि उनके प्रयास व्यर्थ जा रहे हैं तो मेरे तर्कों का सम्मान करते हुए प्रयास बंद कर दिए । वैसे उन्हें मेरी नास्तिकता या जनेऊ न पहनना उन्हें पसंद नहीं था लेकिन उसके लिए मुझे न तो कभीन दंडित किया गया न ही अपमानित, वैसे कुछ घटनाओं के चलते उन्होंने पहले ही मेरा नाम पागल रख दिया था, लेकिन मुझे प्यार करना नहीं छोड़ा।
Wednesday, March 11, 2026
शिक्षा और ज्ञान 389 (जाति)
एक पोस्ट पर कमेंटः
हर जगह की ही तरह भारत में भी कारीगर समुदाय आर्थिक रूप से सामंती जकड़ से मुक्त हो गया था और मार्क्स ने कहा ही है कि अर्थ ही मूल है, तो उसे सामाजिक मुक्ति की सूझी और यूरोप में कारीगरों ने व्यापारियों के साथ मिलकर अपने गिल्ड बनाए और सड़क के चौराहों और बंदरगाहों के इर्द गिर्द कस्बे बसाना शुरू किया, कालांतर में तिजारती पूंजीवाद के विकास में जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। भारत में कारीगर जातियां शूद्र कोटि में थीं तो सामाजिक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने यह सोच कर कि इस्लाम में भगवान के सामने सब समान हैं, धर्मांतरण कर मुसलमान बन गए, लेकिन वहां भी भगवान के सामने सब समान हैं, आपस में नहीं। जाति है कि जाती ही नहीं वे वहां भी जाति लेकर गए।
Monday, March 9, 2026
शिक्षा और ज्ञान 388(नव मैकार्थीवाद)
एक पोस्ट पर एक कमेंट
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, दुनिया के द्विध्रुवीय ध्रुवीकरण के साथ शीतयुद्ध की शुरुआत हुई और शीतयुद्ध शुरू हो गया अमेरिका में अंधराष्ट्रवादी लामबंदी के लिए सोवियत संध के रूप में एक साझा दुश्मन खोजा गया और एक साझी बुराई के रूप में वामपंथ। जोसेफ मैकार्थी नामक एक दुष्ट, लफ्फाज रिपब्लिकन सेनेटर के सिर पर वामपंथ का भूत सवार हुआ जिसके असर में अमेरिका और हिंदुस्तान समेत तमाम अन्य देशों के वास्तविक और छद्म 8क्षिणपंथी आज भी अभुआते रहते हैं, वैसा ही जैसा कि हिंदुत्व फासीवादियों के सिर पर पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम नरेटिव का सवार रहता है। मैकार्थी ने अमेरिका में बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों, वैज्ञानिकों की सूची का अन्वेषण किया जो अमेरिका में सोवियत घुसपैठिए या वामपंथी थे। परमाणुवैज्ञानिक रोेगबर्ग दंपत्ति को सिंग-सिंग चेयर पर बैठाकर मार ही दिया गया। अमेरिका में मैकार्थीवाद के कुकर्मों के विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है, हिंदुस्तान में नवमैकार्थीवादी हर बुराई के लिए 'वामियों' का अन्वेषण करते हैं, इससे वे बुराई के कारण खोजने के कठिन काम से बच जाते हैं, वैसे जैसे धार्मिक हर बात का करण-कारण किसी दैवीय शक्ति के हवाले करके। हिंदुस्तान में वामियों की राजनैतिक उपस्थिति नगण्य सी है फिर भी यहां के नवमैकार्थीवादी हर बात के लिए वामियों को जििम्मेदार ठहराने से नहीं चूकते। वाैसे यह बात सही है कि निजी विवादों से उपजी घटनाओं में लोग जातिवादी (दलित-ब्राह्मण) या सांप्रदायिक (हिंदू-मुसलमान) कोण ढूंढ़ने की भूल करके सामाजिक विद्वेष पैदा करनने की गलती करते रहते हैं।
Wednesday, March 4, 2026
नेहरूनामा 1
पिछले कई सालों से अंधभक्त नेहरू के बारे में अफवाहों का भजन गाते रहते हैं। एक ऐसे ही अंधभक्त के कमेंट का जवाब:
अंधभक्त इतिहास नहीं पढ़ते शाखा की जहालतपूर्ण बौद्धिकों में उड़ाई गई अफवाहों का भजन गाते हैं। नेहरू के बाप इतने रईश थे कि चाहते तो वे शहंशाही जिंदगी जी सकते थे लेकिन उन्होंने सारा वैभव त्याग कर, पैतृक संपत्ति राष्ट के नाम करकरके स्वतंत्रता आंदोलन में कूदना वाजिब समझा और कई साल जेलों में बिताया जहां उन्होंने कई कालजयी कृतियों की रचना की। देश को समर्पित उनकी संपत्तिया स्वराजभवन और आनंदभवन आज भी पर्यटन विभाग के जरिए राष्ट्रीय राजस्व में वृद्धि कर रही हैं। लेकिन जैसा कहा कि अंधभक्त बंददिमाग जाहिल होता है, पेट पर लात को भी प्रसाद की तरह खाकर रटी फवाहों का भजन गाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के बाद नेहरू ने खादी ही पहना, लखटकिया शूट नहीं।
Monday, February 9, 2026
भागवत पुराण 1
मोहन भागवत ने पशुओं की डॉक्टरी की पढ़ाई की है लेकिन कोई कह रहा था कि वह गधों का गड़ेरिया बन गया। उसने कहा कि बांग्लादेश के हिंदुओं को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए यही बात अगर बांगला देश का कोई यहां के मुससलमानों से कहता तो??
Tuesday, January 27, 2026
ब्राह्मणवाद 2
एक पोस्ट पर कमेंटः
शिक्षा पर एकाधिकार के चलते तथाकथित ज्ञान पर वर्चस्व के बल पर ब्राह्मणवाद का सामाजिक वर्चस्व सदियों से बना रहा। शिक्षा की सिद्धांततः सार्वभौमिक सुलभता औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक सकारात्मक उपपरिणाम है जिससे ब्राह्मणवाद का वर्चस्व दरकने लगा। उस वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए मुसलमान के रूप में एक साझे दुश्मन के नाम पर हिंदुत्व की विचारधारा गढ़ी गयी, जिससे अल्पसंख्यक वर्चस्व की रक्षा बहुसंख्यक यानि बहुजन की ताकत से की जा सके। हिंदुत्व ब्राह्मणवाद की ही राजनैतिक अभिव्यक्ति है।
Friday, January 9, 2026
ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति
बुद्ध के समय तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी, अनुगत्तरानिकाय और दीर्घ निकाय में बुद्ध एक ब्राह्मण श्रोता से ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से मनुष्यों की उत्पत्ति और ब्राह्मणीय क्षेष्ठता का परिहास करते हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में राजधर्म प्रजा का रक्षण-पालन और योगक्षेम सुनिश्चित करना है। रक्षण में धर्म यानि वर्णाश्रमं धर्म का रक्षण भी है। वर्णाश्रम की प्रमुखता भले न रही हो लेकिन व्यवस्था के रूप में वर्णाश्रम के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। अशोक के बौद्ध होने के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्यशासन के अंत के बाद बौद्ध संस्कृति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति शुरू हुई और प्रतिक्रांति के बौद्धिक औचित्य के लिए पुराण लिखे गए तथा पुराणकाल में इतिहास का मिथकीकरण शुरू हुआ और वर्णाश्रम को संस्थागत बनाने की बुनियाद पड़ी।
Thursday, January 8, 2026
पुनीत-आभा
जैसा उन्होने बताया था, पुनीत डंडन से आभा दयाल की मुलाकात लखनऊ में हुई थी। पुनीत से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ में, जेएनयू से पढ़े और श्रीपत मिश्र के मुख्यमंत्रित्व काल में लखनऊ विवि में लेक्चरर बने आशुतोष मिश्र के साथ हुई थी। 1985-86 में, मैं कुछ दिनों साकेत के पास, पुष्पविहार में सरकारी कॉलोनी में एक फ्लैट सबलेटिंग पर लिया था। आभा को साथ अभय की शादी हो चुकी थी। पुनीत लखनऊ से किसी काम से दिल्ली आए थे और मेरे पास रहने आए, आभा उन दिनों नीपा में नौकरी करती थीं। पुनीत से मिलने वे पुष्पविहार मेरे फलैट पर मिलने आईं। मुझे यह सामान्य मित्रवत मुलाकात लगी थी।
बाद में पता चला कि पुनीत दिल्ली शिफ्ट हो गए और आभा के साथ ही रहने लगे।
आखिरी दिनों में अभय पांडव नगर में नहीं नोएडा में रहते थे और उसके पहले कटवरिया सराय में।
मैं जब हिंदू कॉलेज में हॉस्टल वार्डन था तब अभय कटवरिया के अपने मकान मालिक के साथ एकाध बार मिलने आए थे, बाद में फोन पर बात होती रहती थी, अभय ने कई बार नोएडा बुलाया लेकिन अब-तब करते चलता रहा और एक दिन अभय के असमय निधन की खबर मिली।
अभय की समृतियों को सलाम।
Friday, January 2, 2026
बेतरतीब 184 (अहरा)
अहरा
Pradeep Saurabh की बैगन के भुर्ते के वर्णन पर मुझे अहरा पर बनने वाले भोजन की याद आ गयी। अहरा उपले(कंडे) का अस्थाई चूल्हा होता था, जिसे पहले लोग अक्सर यात्रा में बनाते थे। पूर्वी उप्र में सड़क निर्माण के कार्य में जुटे मजदूर अहरा लगाते दिख जाते थे। मुझे अहरे पर बने भोजन की बचपन की पहली याद अपने मुंडन की है। मेरी मुंडन उम्र के पांचवे साल में हुई थी। बाबू जी (पिताजी) और अइया (दादी) के साथ मुंडन के बाद भैरो बाबा (कप्तीानगंज-महराजगंज के पास) से लौट रहा था। मेरे गांव से भैरो बाबा की दूरी कम-से-कम 40 किमी होगी। वापसी में किसी गांव में किसी किसान की नई सार (गाय-भैंस-बैलों का घर बनी थी), उस गांव में पिताजी के परिचित कुछ लोग थे, उनकी मदद से उन्होंने मिट्टी के बर्तन और कंडों का इंतजाम किया था। उक्त पोस्ट पर यह कमेंट लिखा गया था।
हमारे बचपन में यात्रा में लोग अहरा लगाते थे और बैगन का चोखा अहरे के भोजन का अनिवार्य हिस्सा होता था। मेरे बाबा बाग/ खेत/ट्यूबवेल की अपनी कुटी पर ही रहते थे, दोपहर और शाम को भोजन के लिए घर आते थे। वैसे खेत से घर की दूरी ज्यादा नहीं है, 700-800 मीटर ही होगी। कभी कभी उनका मन रात को खाना खाने घर आने का नहीं होता तो बाग में ही अहरा लगाते।
गांवों में अहरा लगाने का शिल्प,पता नहीं, अब भी बचा है या नहीं। अहरा कंडे (उपले) का अस्थाई, पिरामिडाकार चूल्हा होता है। जिसके ऊपर दाल-भात की मिट्टी की हंड़िया रखी जाती है। दाल पकने में ज्यादा समय लगता है इसलिए सीधे आंच पर दाल की हंडिया रखी जाती थी उसके ऊपर चावल की जिसके ऊपर मिट्टी का ढक्कन। सीधी आंच से दाल पकती है और उसकी भाप से चावल पकता है। अहरे की आग में आलू और बैगन तथा यदि खेत में हुआ तो टमाटर डाल दिया जाता है, जो दाल-चावल पकने तक भुन जाते हैं। यदि आंटा गूथने की सुविधा हुई तो उसकी भौरी भी आग में डाल दी जाती थी जो भी दाल चावल पकने तक पक जाती थी। भुना हुआ आलू-बैगन का भरता बनाकर उनमें बारीक कटी हरी मिर्च और नमक मिला दिया जाता था और दाल-भात; चोखा भौरी (लिट्टी) की दावत तैयार। जब भी बाबा बाग में अहरा लगाते तो मेरी पत्नी और भाभी (पौत्र बधुओं) को भी आमंत्रित करते जिनकी बाग-खेत में पिकनिक हो जाती। मेरी पत्नी (सरोज जी) आज भी नॉस्टेल्जिया कर उन पिकनिकों और अहरे पर पके दावत की याद करती है।
Thursday, January 1, 2026
बेतरतीब 183 (प्राइमरी स्कूल)
मित्र Vivek Mishra अपने पिताजी ( कालजयी साहित्यकार, प्रो. राम दरश मिश्र) के प्राइमरी स्कूल की तस्वीर शेयर किया उस पर कमेंट में मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आ गया।
हमारे गांव के प्राइमरी स्कूल में भी एक बड़े कच्चे खपड़ैल कमरे के चारों तरफ बरामदे थे, सामने का बरामदा बरामदा ही था बगल और पीछे के 3 बरामदे मिट्टी की दीवारों से घेर कर कमरे बना दिए गए थे जो कि क्लास रूम थे। तीन कमरों में पढ़ने वाले गदहिया गोल को मिलाकर 6 कक्षाओं के विद्यार्थी होते थे और पढ़ाने वाले 3 शिक्षक। एक कमरे में सबसे जूनियर शिक्षक गदहिया गोल और कक्षा 1 को पढ़ाते थे और दूसरे में उनसे सीनियर शिक्षक कक्षा 2 और 3 को तथा तीसरे में हेडमास्टर कक्षा 4 और 5 को। मैं गदहिया गोल से 1 में और 4 से 5 में कूद-फांद के चलते 4 ही साल उस स्कूल में पढ़ा और 2 ही शिक्षकों से। जब मैं कक्षा 4 में पहुंचा तो तबके हेड मास्टर रिटार हो गए और उनसे जूनियर शिक्षक जिन्हों ने हमें कक्षा 2 और 3 में पढ़ाया था वे हेड मास्टर बन गए और 4 तथा 5 को पढ़ाने लगे। यानि 4 सालों में 3 साल एक ही शिक्षक से पढ़ना पड़ा था।
