रचना सिंह ने पौधे के साथ बैंगन और टमाटर की तस्वीर शेयर किया था तो कविवर केदार नाथ सिंह पर एनसीआरटी के लिए मित्र प्रवीण कुमार की फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर तथा असोसिएट डायरेक्टर के रूप में उनके गांव चकिया (बलिया जिला) की यात्रा की याद आ गयी। विस्तृत संस्मरण कभी यददाश्त पर जोर देकर लिखूंगा। हिंदू कॉलेज में प्रोफेसर, रचना केदारजी की सुपुत्री हैं।
चकिया चली गयी थी क्या? जाती हो कभी कि नहीं? मेरी तो चकिया की उस एकमात्र यात्रा की अविस्मरणीय यादें हैं। आंखों में बस गया है वह भूगोल। सूखी नदी (या नाला) के पार का जंगल (समाप्तप्राय), प्राइमरी स्कूल जहां शूट हुआ था क से कविता का दृश्य (फिल्म का शीर्षक दृश्य), बैरहिया थाना (उस बाजार में जलेबी और पकौड़ी के साथ चाय); माझी का पुल; पुल पर कवि द्वारा 'माझी का पुल' का पाठ उसके पहले पांटून पुल के किनारे झोपड़ी की दुकान में लगभग मुफ्त के भाव में लिट्टी-चोखे का भोज। केदार जी के साथ समय चुराकर पुल पारकर बिहार की जमीन पर पैर रखकर (पाल्हा छूकर) आना। केदार जी के अद्भुत संस्मरण सुनते हुए चकिया से बनारस की सड़क यात्रा। (रास्ते में गंगा में विसर्जित होने पहले अपने गांव की (हमारी) टौंस नदी में हाथ-मुंह धोने के लिए रुक) बनारस में गंगा पार उल्टी नाव के पास 'काशी' कविता का पाठ नदी में प्रवाहित होते दियों तथा उस पार, मणिकर्णिका घाट पर सीढ़ीनुमा आकार में जलती लाशों के विजुअल्स के साथ। पीके ने सूटिंग के दौरान कहा 'केदार जी हमारे अमिताभ बच्चन हैं, मैंने उसे डांटते हुए कहा था 'हमारे केदार जी केदार जी हैं'। (कभी एनसीआरटी जाना हुआ तो फिल्म की सीडी खरीदूंगा, तुम्हें मौका मिले तो ले लो।) गंगा में रात बजरे की अविस्मरणीय पार्टी तो अवर्णनीय है। चकिया से बनारस की यात्रा में राहुल सांकृत्यायन, त्रिलोचन शास्त्री, शमशेर सिंह आदि के केदार जी के संस्मरण टेप करना चाहिए था (इतनी ही अकल होती तो क्या बात थी?)। हो सका तो उस अविस्मरणीय यात्रा के संस्मरण कभी जरूर लिखूंगा।

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