Sunday, August 16, 2026

महामानव और 15 अगस्त

 मैंने भी कई सालों से लाल किले का भाषण सुनना बंद कर दिया, वैसे भी महामानव की शकल बहुत रिपल्सिव लगती है। जंतरमंतर के मीमों और गीतों ने उसे और भी रिपल्सिव बना दिया है।15 अगस्त 1947 को, भारत के प्रथम और अभी तक के एकमात्र युगद्रष्टा प्रधानमंत्री, नेहरू ने, अपने सुविदित'नियति से मुठभेड़' भाषण में रेंगते भारत के स्ववलंबी, जागृत और वैज्ञानिक तेवर केशि क्षित भारत में तब्दीली के सपने की बात की थी और एक दशक से कम समय में नेहरू का सपना सच होता दिखा। देश में शिक्षा संस्थानों का जाल बिछना शुरू हो गया, जिसका मैं भी पहली पीढ़ी का लाभार्थी हूं। आईआईटी, एम्स, परमाणु शोधकेंद्र खुलने लगे, नेहरू ने उद्योगों को मंदिर कहा लेकिन भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए नहीं देश के पूंजीवादीकरण के लिए संसाधन चाहिए थे। अफीमयुद्ध के दौरान अफीम तस्करी से कई निजी राष्ट्रीय पूंजीपतियों का उद्भव तो हो चुका था लेकिन कोई बड़े औद्योगिक आधारभूत संरचनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर्स) में निवेश करने में न तो सक्षम थे न ही उद्यत। नेहरू सरकार ने सीमित राजस्व और सोवियत सहायता से भेल, सेल, बरौनी रिफाइनरी तथा ओएनजीसी जैसे सार्वजनिक औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया, कल्याणकारी राज्य जिसका उपपरिणाम था और जिन्हें मोदी सरकार ने एक-एक कर अपने कृपापात्र धनपशुओं को औने-पौने दामों में बेच दिया और बेच रहे हैं। युवाओं में अपनी अप्रियता देख-समझ कर महामानव के अंदर के फासीवादी कीड़े ज्यादा कुलबुलाने लगे हैं और भजन न गाकर विद्रोह के गीत गाने वाले युवकों तथा असहमति के स्वर वाले विवेकसम्मत लोगों को दिमागी नक्सल कह कर उन्हें पहचानने और दंडित करने की धमकी दे डाली। नेहरू ने नियति से दो हाथ करने की शुरुआत की महामानव ने स्वाधीनता दिवस के शताब्दी वर्ष तक विसित भारत का वायदा किया, वैसे विकसित भारत की बजाय विक्षिप्त भारत बनने लगा है। वैसे भी कौन जीता है, तेरे जुल्फ के सर होने तक। यदि युवा उमंगों की उड़ान जारी रही और उसे राजनैतिक दिशा मिली तो गुजराती युगल का राज बहुत दिन नहीं कायम रह पाएगा।

दिमागी नक्सल

 महामानव अपनी एंटयर पोलिटिकल साइंस की पढ़ाई को सार्थक करते हुए, महामानव नए नए शगूफे छोड़ते रहते हैं और उनके बजरंगी अनुयायी उन्हें रटकर उनका भजन गाते रहते हैं। जेएनयू आंदोलन के बाद उन्होंने सवाल-जवाब करने वाले स्टूडेंट्स के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग का शगूफा छोड़ा। यह अलग बात है कि उनके वैचारिक पूर्वजों ने अंग्रेजी राज की बांटों-राज करो नीति के प्यादे बनकर भारतीय राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और भारत राष्ट्र के टुकड़े टुकड़े कर दिए। जिसके घाव नासूर बन न जाने कब तक रिसते रहेंगे।उनका बजरंगी गिरोह अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारत की सामासिक संस्कृति के टुकड़े टुकड़े करने की करतूत की निरंतरता बनाए हुए है। फिर उन्होने खान मार्केट गिरोह का सगूफा छोड़ा. यह भी अलग बात है कि खानमार्केट जाने वालों में भक्तों का प्रतिशत ज्यादा रहता है। बुद्धिजीवियों के लिए इन्होंने अर्बन नक्सल का शगूफा छोड़ा। और अब दिमागी नक्सल का। हर फासीवादी की तरह ये अवधारणाओं को कभी परिभाषित नहीं करते । आज ही सोसल मीडिया पर देखने को मिला कि दिमागी नक्सल जनता पार्टी बन गयी है। महामानव की जय हो।