Saturday, July 4, 2026

जनअसंतोष और काक्रोची परिघटना

 

जन असंतोष और कॉक्रोची परिघटना :

 कुछ सवाल ?

ईश मिश्र

 

आसमान छूती मंहगाई, बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के पेपर लीक होने की परिघटनाओं की बारंबारता, खेती की समस्याओ, पश्चिम एशिया में अशांति से उत्पन्न तेल और गैस संकट से बढ़ी मंहगाई के चलते जनजीवन की बदहाली आदि कारणों से जनअसंतोष व्यापक होता जा रहा है और जनाक्रोश की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। काम के बेहतर हालात, काम के आटलघंटे तथा समुचित न्यूनतम मजदूरी की मांग के लिए नोएडा-गुड़गांव मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन आर्थिक मांगों तक सीमित है, फिर भी निर्मम दमन झेल रहा है। इस तरह के स्वस्फूर्त आंदोलन भविष्य के क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन की आशा की किरण तो दिखाते हैं, लेकिन इनसे. फिलहाल, किसी क्रांतिकारी राजनैतिक बदलाव की अपेक्षा करना अव्यवहारिक है। मौजूदा  नीट की परीक्षा में पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा की गड़बड़ियों के विरुद्ध  जन-असंतोष के प्रतिरोधों के प्रति सरकार लगातार दमनात्मक कदम उठा रही है। पेपर लीक, परीक्षा माफिया की धांधलियों तथा अन्य गड़बड़ियों के विरुद्ध आंदोलनों के संचालन के लिए, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने प्रतियोगी का गठन किया। कुछ दिन पहले, अखबारों की खबर के अनुसार, आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सांसद संजय सिंह इलाहाबाद सर्किट हाउस मेंप्रतियोगी छात्र संघर्ष समितिके कुछ छात्रों के साथ पेपर लीक के मुद्दे पर बातचीत कर रहे थे कि पुलिस और प्रशासन ने यह कह कर बातचीत में व्यवधान डाला कि उन्होंने पूर्व अनुमति नहीं ली थी, तब भी वे छात्रों के साथ बातचीत करते रहे तो पुलिस और प्रशासन ने सर्किट हाउस की बिजली कटवा दी। उप्र और राजस्थान की कई जगहों पर, बेरोजगारी तथा पेपर लीक के मुदेदों पर छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस दमन होता रहा।

 

मंहगाई और काम की दयनीय हालात से तंग आकर न्यूनतम मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने के अधिकार के लिए नोएडा और गुड़गांव तथा पानीपत, बरौनी समेत अन्य जगहों के ठेका मजदूरों का, अप्रैल के पहले हफ्ते  से जारी स्वस्फूर्त विरोध प्रदर्शन इस बढ़ते जनाक्रोश की एक स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मजदूरों के स्वस्फूर्त आंदोलन का नियोजित निर्मम दमन सुविदित है। कई मजदूर नेता  और उनके समर्थक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, कलाकार तथा छात्र, अभी भी अमानवीय परिस्थितियों में जेल की यातना झेल रहे हैं। दिल्ली के मानवाधिकार संगठन, जनहस्तक्षेप की रिपोर्ट के अनुसार, तमाम जद्दो जहद के बाद कई मजदूर नेता और आंदोलन के समर्थक जमानत पर छूट गए हैं लेकिन कई अभी भी मनगढ़ंत आरोपों में जेलों में बंद हैं। पत्रकार-लेखक सत्यम् वर्मा को लकनऊ से उठाकर गौत्बुद्धनगर केंद्रीय कारावास में बंद कर उनपर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनयम जैसे काले कानून की धाराएं मढ़ दी गयी हैं।  गौरतलब है कि अन्य जगहों के साथ, मजदूर बिगुल में जनपक्षीय लेखन करने वाले सत्यम वर्मा पर नोएडा में मजदूरों को उकसाने के आरोप लगाए गए हैं जबकि वे दशकों से नोएडा गए ही नहीं  हैं। सर्वविदित है कि सरकारें आंदोलनों पर दमन करने के लिए आंदोलनकारियो पर कभी आंदोलन के मुद्दों के आरोप नहीं लगाती बल्कि कानून-व्यलस्था के गढ़े हुए आरोप लगाती हैं। नोएडा और गुड़गांव में पुलिस द्वारा पकड़े गए सभी मजदूरों और उनके समर्थकों पर हत्या के प्रयास सहित एक से मनगढ़ंत आरोपों में एफआईआर दर्ज हैं। 

यहां मकसद मजदूर और छात्र आंदोलनों पर जारी दमन की व्यख्या या विश्लेषण नहीं है, वे अलग गंभीर व्याख्या तथा विश्लेषण के विषय हैं। इनकी चर्चा का मकसद जनअसंतोष के स्वघोषित प्रहरी, अमेरिका में ऑनलाइन गठित काक्रोच जनता पार्टी के भारत में आंदोलन की स्वस्फूर्तता पर सवाल खड़ा करना है। विरोध के प्रति बेहद असहिष्णु सरकार, अपने दमनतंत्र के प्रतीक, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को, प्रतिरोध-प्रदर्शन की अग्रिम अनुमति के साथ, काक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक के अमेरिका से भारत आगमन पर हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए भेजती है। इससे सहजबोध (कॉमनसेन्स) के किसी भी व्यक्ति के दिमाग में व्यापक जनअसंतोष के काक्रोची अभिव्यक्ति की स्वस्फूर्तता के प्रायोजित होने का संदेह स्वाभाविक है।

 

 जब छात्रों, युवाओं और मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों को देश में आम आदमी की बदहाली, शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, बेरोजगारी आदि ज्वलंत मुद्दों के चलते फैले जनअसंतोष और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति मानी जा रही है तभी भारत के स्वनामधन्य मुख्य न्यायाधीश की बेरोजगार युवाओं के लिए काक्रोच (तिलचट्टा) की उपाधि के वक्तव्य से फैले विवाद को लेकर सोसल मीडिया पर मीमों की भरमार हो गयी। मुख्य न्यायाधीश का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है तथा उनके पद की गरिमा के विपरीत। ऐसे हास्यास्पद बयान की ठिठोली या प्रहसन स्वाभाविक है। काक्रोचों के मीम का संक्रमण आभासी दुनिया से भौतिक दुनिया में हो गया। अतीत में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे और अमेरिका में रह रहे अभिजीत दिपके नामक युवक ने कुछ साथियों के साथ मिलकर काक्रोच जनता पार्टी का गठन कर दिया। जिस तरह पिछली शताब्दी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, उसी तरह देश में बढ़ते  जन असंतोष कोदिशा देनेकाक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिषेक दिपके, 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा के साथ अमेरिका से भारत के लिए निकल पड़े। लेकिन जैसा कि कहा गया कि इतिहास अगर खुद को दुहराता है तो पहली बार ट्रेजडी बन जाता है और दूसरी बार तमाशा। वैसे इतिहास कभी खुद को दुहराता नहीं, कभी कभी प्रतिध्वनित होता प्रतीत होता है और प्रतिध्वनि मौलिक आवाज नहीं होती। उल्लेखनीय है कि 6 जून, 2026 को अन्य लोगों के साथ काक्रोचों का हौसला बढ़ाने या काक्रोच जनता पार्टी के जमावड़े में जनवादीकरण की मशाल जलाने भाकपा (माले-लिबरेसन) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी दल-बल के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। हम सब जानते हैं कि विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने के लिए आम आदमी को खासकर मजदूरों और मजदूर संगठनों को एड़ी-चोटी का बल लगाना पड़ता है और यदि अनुमति मिलती भी है तो एक निश्चित अंतराल के लिए। अंतराल का उल्लंघन होने पर पुलिस सक्रिय हो जाती है। लेकिन प्रदर्शन के लिए आगमन की खबर सुनकर पुलिस के प्रतिनिधि प्रदर्शन की अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर दिपके के स्वागत में खड़े थे। पूरे प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा घेरा बनाकर पुलिस प्रदर्शनकारी नेताओं के साथ खड़ी रही।  कहा जा रहा है कि यह कॉक्रोची परिघटना भारत में जेन-जी का नमूना तथा व्यापक जनअसंतोष की स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति है। मुझे लगता है काक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित स्वस्फूर्तता है, जिसका उद्देश्य जनअसंतोष को भटकाना तथा उसमें विचलन पैदा करना है।

दिपके और साथी काक्रोच जनता पार्टी के परचम तले 6 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद लखनऊ और पुणे में भी कार्यक्रम कर आए। जिस तरह केजरीवाल को मंच पर किसी ने चांटा मारा था उसी करह  दिपके को भी किसी ने चांटा मार दिया। लखनऊ-पुणे से दिपके फिर जंतर-मंतर पहुंचे और बोले अब तब तक नहीं हटेंगे जब तक शिक्षामंत्री इस्तीफा नहीं देते और उन्हें पुलिस ने अभी तक नहीं हटाया। जरा सोचिए यौन शोषण के विरुद्ध धरने पर बैठी कुश्ती की खिलाड़ियों को पुलिस ने घसीट घसीट कर हटाया और बंद किया था। आंदोलित किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने कंटीले बाड़ लगाने और सड़क पर कीलें गाड़ने का काम किया था। 70 से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने शहादत दी थी। लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी ने कहा कि वे तब तक नहीं हटेंगें जब तक उनकी मांगे नहीं मान ली जातीं और आज (27 जून, 2026) पांचवे दिन तक पुलिस संरक्षण में वे जंतर-मंतर पर बदस्तूर मौजूद हैं।  कॉक्रोच नेता प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों तथा किसानों का भी आह्वान कर रहे हैं। 

 

अन्ना-रामदेव-केजरीवाल ने भी समाज के सब तपकों का आह्वान किया था और उनका आह्वान अनसुना नहीं गया था।कॉक्रोचों के समर्थन में जुटी भीड़ देखकर 16 साल पहले अन्ना हजारे, किरण बेदी, रामदेव, केजरीवालों के नेतृत्व में  ‘इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी)आंदोलन में में जुट रही भीड़ याद आती है, जिसने केंद्र में कांग्रेस सरकार को हटाकर भाजपा सरकार और दिल्ली में कांग्रेस सरकार को हटाकर केजरी सरकार को स्थापित करने का काम किया था। उस समय किसी अखबार/पत्रिका या स्थापित पोर्टल में  सेना के भगोड़े अन्ना के अनशन की आलोचना छपने की गुंजाइश नहीं थी, तो फेसबुक पर उसे आरएसएस-कॉरपोरेट प्रायोजित आंदोलन लिख दिया था, तो बहुत गालियां मिलीं थी। जिस तरह आज कई वामपंथी कॉक्रोचों को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे हैं उसी तरह उस समय भी बहुत से वामपंथी भी अन्ना को जनवादी परिवर्तन का दूत मान रहे थे। भ्रष्टाचार के आरोप कोई साबित नहीं हुए अन्ना अपने आश्रम में चले गए, किरन बेदी गवर्नर बन गयी, रामदेव व्यापार बढ़ाने में लग गए और केजरीवाल जय श्रीराम के समानांतर जय हनुमान के नारे पर सवार हो मुख्य मंत्री बन गए।   

 

पेपर लीक को मुख्य मुद्दा बनाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू कॉक्रोची प्रतिरोध की स्वस्फूर्तता मुझे प्रायोजित स्वस्फूर्तता लगती है। कई वामपंथी मित्र मेरी राय को लेनिन के हवाले से बचकाना विकार कह रहे हैं। एक स्वनामधन्य वामपंथी पत्रकार तो बहुत ही आक्रामक अंदाज में नवीनता को बर्दाश्त न कर पाने वाला दकियानूस कह दिया। ऐसी ही प्रतिक्रिया अनना हजारे के आंदोलन की आलोचना पर मिली थी। बचपन में अपने गांव में कहावत सुनी थी कि बरसात के पानी की कई धाराएं जब मिलकर  किसी बड़े जलाशय की तरफ जाने लगें तो उसके रास्ते में विचलन पैदा कर उसे कई हिस्सों में बांटकर जलाशय तक पहुंचने से रोक देना चाहिए। मुझे लगता है कॉक्रोची भटकाव जन असंतोष की धाराओं के मिलकर जलाशय बनने से रोकने के रास्ते का भटकाव है। कांग्रेस का हाल का जो भी इतिहास रहीा हो फिलहाल राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिरोध की धुरी बन रही है, दिपके के पहले  भाषण में सरकार से अधिक कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला किया गया। लगता है वाम पार्टियां और कुछ वाम बुद्धिजीवी विभ्रम की दशा में हैं। व्यापक जनअसंतोष को जनवादी दिशा देने की रणनीति उनकी समझ में नहीं आ रही है और उन्हें कॉक्रोच आंदोलन असंतोष को जनवादी दिशा देने स्वस्फूर्त एजेंट लगता है लेकिन मुझे कॉक्रोची स्वस्फूर्तता प्रायोजित लगती है। मुझे लगता है कि मजदूरों का स्वस्फूर्त आंदोलन भारत के बहुजन (कागार वर्ग) की सामाजिक चेतना के जनवादीकरण का पथ प्रशस्त  करेगा और साझे संघर्षों से निकली एकता उन्हें अपने आप में वर्ग से अपने लिए वर्ग बनने में मददगार साबित होगा। 

 26.06.2026