Saturday, March 3, 2018

लल्ला पुराण 197 (शिक्षा और सोच की तमीज)

साथियों ,अब किसी पर मेरे लिए अभद्र भाषा के प्रयोग के लिए ग्रुप में कर्रवाई न करने का निवेदन करता हूं। बाकी जब तक हूं, ग्रुप के नियमों का पालन करूंगा। "सामूहिक बुद्धिमत्ता निजी बुद्धिमत्ता से सदा श्रेष्ठतर होती है कोई एक व्यक्ति कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो"। और मुझे रूसो का जबरन आजाद करने की बात बहुत आकर्षित करती है। यह जबरन दरअसल जबरन होता ही नहीं क्योंकि सामूहिकता के समान सदस्य के रूप में खुद द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने को बाध्य किया जाना, जबरन की कोटि में नहीं आता। कल कुछ पुराने शिष्य-मित्र आ गए। उनके जाने के बाद इस ग्रुप में एक प्रोफेसर समेत कई (सौभाग्य से बहुत कम) बच्चों के व्यवहार (भाषा और सोच, क्योंकि आभासी दुनिया मे यही दिखता है) के बारे में गहन चिंतन में फंस गया। आत्मग्लानि हो रही थी कि मैं क्यों कभी कभी निराधार निजी आक्षेपों और अनर्गल प्रलापों से तिलमिलाकर भूल जाता था कि 42 साल पहले 20 का था। यह एक शिक्षक को शोभा नहीं देता, लेकिन शिक्षक संयोग से एक साधारण इंसान ही होता है। हम सब अलग अलग क्षमताओं से संपन्न सधारण इंसान हैं, कुछ असाधारण दिखने की कोशिस करते हैं। मुझे साधारणता से गहरा प्रेम है। अब मैंने सारे आक्षेप-अभद्रताओं के प्रति सहनशीलता पैदा कर लिया है कि 42 साल का अंतर न भूलूं, शिक्षकीय धैर्य के साथ अपनी शक्ति और क्षमता की सीमाओं में सीखने-सिखाने का प्रयास करता रहूंगा। यह विचार कल 2002 बैच के दो शिष्य-मित्रों से बात-चीत में किसी 16 साल पुरानी घटना के जिक्र से आया। घटना का लब्बोलुबाब है कि मैं ग्राउंड में इन बच्चों के साथ क्लास में पढ़ाई किसी बात पर बहस कर रहा था। एक टेंसन सिंह मार्का गंभीर सहकर्मी ने दूर से मुझे बुलाया, पास जाने पर शिकायत करने लगे कि स्टूडेंट्स की मौजूदा पीढ़ी कितनी बद्तमीज हो गई है, शिक्षकों की इज्जत नहीं करते। मैंने पूछा यह जरूरी बात बताने के लिए अभी क्यों बुलाया? उन्होंने कहा कि ग्राउंड में क्लास लेने में कोई बुराई नहीं है लेकिन बच्चों को चाहिए था कि मेरे लिए कुर्सी ले आते मैं उन्ही के बराबर जमीन (घास) पर बैठा था। उनको मेरा जवाब पूरी क्लास हो गया, जिसका लब्बो लबाब है कि इज्जत दहेज या दलाली में नहीं मिलती, कमाई जाती है; समता का सुख सर्वश्रेष्ठ सुख है....। जिस बात के लिए इस घटना का जिक्र किया वह है कि हमने उनसे पूछा, हमारे विद्यार्थी कैसे हैं, इसमें हमारा कोई योगदान है क्या? नहीं तो बांधे बोरिया विस्तर। शिक्षक होने के नाते बच्चों पर गुस्सा करने की बजाय अपनी लामुदायिक आत्मालोचना करना चाहिए। भाषा की आक्रामकता कलम की फितरत है, नए मुहावरो का प्रचार और नई उक्तियों को लोकोक्तियों में तब्दील करने की कोशिस भी लेखकीय दायित्व है। मैं ईश मिश्र, माटी का नाना (विलोम वल्दियत) हलफनामा देकर वायदा करता हूं कि कभी नहीं भूलूंगा कि 42 (जून के बाद 43) साल पहले 20 साल का था और किसी के किसी आक्षेप और बुरा नहीं मानूंगा।
04.03.2018)

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