Saturday, June 21, 2014

लल्ला पुराण 159

T.n. Tiwari आप को किसी वामपंथी ने कभी गाली दिया क्या? अगर आपको कह दूं कि आप अफवाहों और पूर्वाग्रहों पर आधारित ज्ञान पर फतवानुमा वक्तव्य देते हैं तो आप इसे गाली समझ लेंगे. आप वामपंथ के बारे में क्या और किन श्रोतों से जानते हैं? आपके कौव्वा-तीतर कहने से मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता आपके भाषाबोध का ही खुलासा होता है. चीन के बारे में कुछ और पढ़ने की बात तो छोड़िए आप अखबारी ज्ञान भी नहीं रखते, लगता है दैनिक जागरण से ही चक्षु संतृप्त कर लेते हैं. आपकी संक्षिप्त जानकारी के लिए बता दूं कि माओ की मौत के बाद से ही चीन का पूंजीवादीकरण शुरू हो गया था. 1989 में प्रक्रिया का चरम तक पहुंचते पहुंचते इसके विरुद्ध छात्रों के समाजवादी आजादी के आंदोलन की पूंवादी चीनी राज्य की टैंकों ने कुचला. इगली क्रांति की प्रतीक्षा है.  अगर आप कुछ पढ़ते तो आपके मालुम होता कि वामपंथ के पास पूंजीवाद का निटोजित विकल्प हैः श्रम के फल पर श्रमिक का अधिकार यानि उत्पादन साधनों औरसमाज संसाधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त कर सामाजिक स्वामित्व की स्थापना जो कि आज नहीं तो कल अवश्यंभावी है. जिसके लिए जनवादी जनचेतना की जरूरत है जिसके लिए जरूरी है कि हमारे आप जैसे अपेक्षाकृत सुविधा-संपन्न श्रमिक शासक होने की खुशफहमी से मुक्त होकर इस तथ्य को पहचानें कि श्रम ही जीवन की आत्मा है. लेकिन अगर आप अंबानी के उड़न खटोले पर घूमेंगे तो कृष्णा बेसिन उसे देकर, गैस के दाम बढ़ाकर श्रमिक के पेट पर लात मारेंगे ही, रेल अपुने कारपोरेटी आकाओं को औने-पौने दाम में बेचेंगे ही और उनकी झंझट कम करने के लिए किराया बढ़ायेंगे ही. सांप्रदायिक उन्माद के ओपेन एजेंडा के पीछे मुल्क कारपोरेटों को बेचने का हिडेन एजेंडा है. अगर मेरी बात बुरी लगे तो मॉफ कीजिएगा. दर-असल सत्यम् ब्रूयात वाले श्लोक की दूसरी लाइन मैंने पढ़ा ही नहीं. मित्र कुछ पढ़िए और दिमाग का इस्तेमाल करिए तब सार्थक विमर्श हो सकता है.

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