Wednesday, May 28, 2014

एक सुर्ख सवेरे के लिए

लड़ता है क्रांतिकारी मज़लूम के लिए
क्योंकि उसे लड़ना ही है
लड़ना है एक सुर्ख सवेरे के लिए
बेपनाह के बसेरे के लिए
डर डर कर नहीं लड़ी जाती जंग
इसीलिए हो निडर चलना है संग संग
बंद कर देगा जिस दिन डरना आवाम
मच जाएगा निज़ाम-ए-ज़र में कोहराम
हों उसके पास कितने भी तोप और बम
डरेगा वह हमसे ग़र डरना बंद कर दें हम
हों उसपे त्रिसूल-ओ-तलवारकितने भी
कांप जायेगा हमारी निर्भय ललकार से ही
चाहते हैं ग़र इंसाफ के लिए लड़ना
छोड़ना होगा भूत-ओ-भगवान से डरना
लड़ना ही है हमें, लड़े बिना कुछ नहीं मिलता
हक़ के एक एक इंच के लिए है लड़ना पड़ता
(ईमिः28.05.2014)

No comments:

Post a Comment