Tuesday, May 13, 2014

झुकता नहीं ये सर


 झुकता नहीं ये सर
हम समझते हैं हवा का रुख, नहीं देते पीठ मगर
हैं हम सबके सचमुच की आजादी के पक्षधर
गुलामी नहीं हो सकती किसी इंसान का हक़
जबरन करेंगे आज़ाद मनसा गुलामों को भरसक
हम  देते हैं दिशा समय के सावन को बांधते नहीं
साध्य का हुनर सिखाते हैं किसी को साधते नहीं
कहते नहीं ज़ुल्मत को जिया और सरसर को सबा
 करते मेहनतकश की ग़मख़ारी देते नहीं धोखा
है दुश्मनी हमारी साम्राज्यवादी ज़र के निज़ाम से
न कि उसके किसी टुच्चे-मुच्चे ज़रखरीद गुलाम से
मानता नहीं ज़र के ग़ुलाम को मुल्क का खुदा
झुकता नहीं ये सर हो जाये भले ही धड़ से ज़ुदा
लगा देगें खाकनशीनों को जगाने में उम्र सारी
हो जायें हाथ कलम भले शायर न बनेगा दरबारी
(ईमिः13.05.2014)

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