Saturday, April 19, 2014

तानाशाह की खोज -- तब और अब

आज श्वेता मिश्रा द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गयी 1970 के दशक में पढ़ी उदय प्रकाश की कविता-- तानाशाह की खोज -- पढ़ कर यह ख्याल आयाः

तभी तो लगा कि पढ़ी हुई कविता है. उदयप्रकाश जी हमारे वरिष्ठ सहपाठी थे जेयनयू में. कह नहीं सकता कि आज यह कविता उतनी ही या ज्यादा प्रसंगिक है. आज 1975 के पहले की इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस स्थान के हिसाब से भेष और उनके नटों-भटों की याद आती है. संघियों में में सदा ही मौलिकता का अभाव रहा है और नकलची परंपरा का चलन. इन्होने विचारधारा और गणवेश मुसोलिनी और हिलर से टीप लिया, नायक मिथकों तथा इतिहास-भूगोल अंदाजे  और अज्ञान से. क्षमा कीजिए फुटनोट लंबा हो गया. वाजपेयी जी नेहरू की नकल कर रहे थे तो फेंकू अधिनायकवाद में इंदिरा गांधी की नकल कर रहा है और नकल तो फिर भी नकल होती है. गरीबी हटाओ के नारे को बेचने के लिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्श की समाप्ति जैसे कई प्रगतिशील कदम उठाए और हर तानाशाह की तरह देश को अपनी जागीर समझ लिया और 1977 में जनता ने उन्हें 1 सफदरजंग रोड से विस्थापित कर दिया. जुस तरह से मोदियाये भांड और नट-भट मोदजी को भाजपा और भारत का पर्याय बता रहे हैं उसी तरह के 1 भांट थे कांग्रेस अध्यक्ष जेवकांत बरुआ जिन्होने इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज िंदिरा का नारा दिया.इंदिरा में कुछ राजनैतिक समझ विरासत में मिली थी लेकिन फेंकू की विरासत तो शाखा की लाठीबाजी और खो है यह गुजरात मॉडल बेचने के नाम पर कितने नरसंहार, आगजनी , लूट, बलात्कार, विस्थापन करवायेगा और जनता की कितनी जमीन-जल-जंगल अपने कारपोरेटी आकाओं को समर्पित करिगा अंदाज लगाया जा सकता है. 5000 करोड़ उसकी छवि निर्माण करने वाले थैलीशाहों को सूद समेत लौटाना भी तो होगा. लेकिन जनता जागेगी ही और जब नहीं टिके हिटलर हलाकू तो फेंकू किस खेत की मूली है. संघियों की केजरीवाल पर बौखलाहट में हमलों से पता चलता है कि वे मोदी की अवश्बयंभावी हार के पूर्वाभास से पगला गये हैं, परिणाम आने के बाद इनके कोहराम को रोकना होगा. मुझे कबीर और बुद्ध के बनारस के विवेक पर काफी भरोसा है. 

2 comments:

  1. बनारस में बौखलाहट में केजरीवाल पर हमले हार के डर का संकेत है.

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