Friday, July 18, 2014

क्षणिकाएं 27 (481-90)



481
नेता की भितरघात तो समझ आती है
खुली खुशामद करे, ये तो हद है
बदनामी छिपाना तो समझ आता है
उसका डंका कोई पीटे ये तो हद है
शिक्षक का न पढ़ाना समझ आता है
कुज्ञान की फसल उगाये ये तो हद है
मालिक की वफादारी तो समझ आती है
अपना ही गांव जला दे, ये तो हद है
मालिक की मुसीबत से मायूस होना समझ आता है
उसके लिए जान दे दे ये तो हद है
ख़ुदगर्जी में सर नवाना तो समझ आता है
कोई साष्टांग करे ये तो हद है
(ईमिः24.06.2014)
482

अगली मंजिल
मंजिलें और भी हैं इस मंजिल से आगे
जोड़ना है इन सभी मंजिलों के धागे
रहती अगली मंजिल की सदा हसरत
बढ़ते ही जाने की है मेरी फितरत
एथेंस में करता सुकरात सी चहल
कारों के बेदर्द शहर में गाता ग़ज़ल
हमसफर हाजी कहते मुझे बुतपरस्त
खैय्याम कहते हूं हाजी जबरदस्त
लड़ते बढ़ते बस चलता जाता हूं
पहुंच मंजिल पे थोड़ा सुस्ताता हूं
खत्म नहीं होता सफर पाकर मंजिल
अगली फिर अगली का करता है दिल
(ईमिः 26.06.2014)
483
नहीं है गरीब की हंसी निशानी उसके चेहरे पर दौलत की
बयान-ए-यक़ीन है ये नामाकूल में जीने की कुव्वत की
यह हंसी खोजती है नामाकूल के माकूल में तब्दीली की राह
इस हंसी के हवाले से अमीर करता जन जन को गुमराह
कहता फिरता है नहीं गरीब को धनदौलत की चाह
गरीब की इस हंसी में छिपी है एक और संगीन बात
समझने लगा है वह अब अमीरों की फरेबी खुराफात
यह हंसी भविष्यवाणी है छेड़ेगा वह फैसलाकुन जंग गरीबी के खिलाफ
श्रम की शर्त पर कर देगा परजीवी अमीरों को मॉफ
(ईमिः26.06.2014)
484
हम तो लेते तलाश रेगिस्तान में भी मोती
दुस्साहसी मिशाल की ग़र बात न होती
(ईमिः27.06.2014)
485
जब तुम बोलती हो इंकिलाब
बौखला जाता है मर्दवाद
(ईमिः29.06.2014)
486
ग़ाफिल की एक ग़ज़ल परः
शुक्रिया किस बात का गाफिल,. ये तो है खानाबदोश महफिल
हवा ने दरवाजा खटकाया होगा, लगा कोई मेहमान आया होगा
देगा क्यों कोई आपको आवाज़, है जो माशूकी जल्वे का मोहताज
सराब-ओ-सबाब पर फन वारा, बनना चाहते हो मशीहा आवारा
रेगिस्तान में मोती की तलाश, करेगी ही मन-मानस को हताश
चाहते हो ग़र मोती तलाशना, सीखना होगा गहरे समुद्र में तैरना
शराब-ओ-सबाब पर है ग़ज़ल वारी, क्यों करेंगे लोग आपकी ग़मखा़री
चाहते हैं गर लोग दें आपको आवाज़, ग़म-ए-जहां से बुनिए ग़ज़ल की साज
(हा हा ग़ाफिल साहब, दिल पर न लें, गफ़लत में स्वस्फूर्त तुकबंदी हो गयी)
(ईमिः 29.06.2014)
487
पल पल बदलती हो तुम बार बार
बदले स्वरूपों का मगर साश्वत है सार
चकित हिरणी सी आंखों में असीम प्यार
भले ही दिखें करती तीक्ष्ण सरवार
पक्व-बिंब से अधरों का गतिविज्ञान
बिखेरता प्रासंगिक गूढ़ मुस्कान
यहीं तक रोकता हूं फिलहाल कलम
आगे का वर्णन अभी बना रहे भरम
(ईमिः30.06.2014)
488
चाय बागान का अहोभाग्य, रेणु से मुलाकात का सौभाग्य
यह उन्मुक्त ओ उन्मत्त मुस्कान, प्रकृति को करती और छटावान
नहीं गुमान प्रकृति पर विजय का, हर्ष है साथ उसके सामंजस्य का
यही रहा है सदा से कुदरती नाता, सदैव रही है प्रकृति जीवन दाता
निजाम-ए-ज़र ने बदला विधान, छेड़ दिया है प्रकृति पर घमासान
किया कुदरती रिश्ते को लहूलुहान,
 बनाता है उस पर धन की सीढ़ियां, भाड़ में जायें अगली पीढ़ियां,
होंगी वे भी तो धरती की ही संतान, उन्हें भी चाहिए प्रकृति का वरदान,
 आइए लेते हैं आज यह संकल्प, ढूंढ़ेंगे प्रकृति के विनाश का विकल्प
(ईमिः01.07.2014)
489
तोड़ने होंगे प्रतिबंधों के फाटक, करना है ग़र नाइंसाफी की मुख़ालाफत
तोड़ने होंगे चंगेजों के तेग और चंपुओं के खंज़र, करनी है ग़र तालीम की आज़ादी की हिफ़ाजत
लगाने होगे एकता के बुलंद विप्लवी नारे, करना है ग़र परिसर मुक्त तुगलकी फरमानों से
तोड़ना ही पड़ेगा शाही वर्जनाए, मिटाना है ग़र निशान जहालत की ताकत का,
आइए खंड-खंड कर दें अनुशासन का पाखंड, बंद करे फाटक के बाहर से विरोध,
और करें परिसर में प्रवेश, देने मुक्ति का संदेश
नहीं है रखवाले की बपौती ये परिसर, हक़ है शिक्षक-छात्रों का इस पर
(ईमिः04.07.2014)
490
नहीं होता जीने से अलहदा ज़िंदगी का मकसद
मुकम्मल मकसद है जीना एक सार्थक ज़िंदगी
साथ साथ चलते हैं बाकी सहायक मकसद
अनाहूत स्वयंभू परिणामों की तरह
(ईमिः06.07.2014)










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