Sunday, July 6, 2014

फूट नोट 2 (ईश्वर विमर्श 10 )

मेरे दादा जी पंचांग के विद्वान माने जाते थे. खुद को भी मानते थे. उनको अथाह विश्वास था कि पंचांग में शुभ-अशुभ, तिथि-मुहूर्त की सभी बातें अक्षरशः सत्य मानते थे. उनकी आस्था की पराकाष्ठा का अनुभव उस समय कैसा लगा था, सही सही नहीं बता सकता, लेकिन आज सोच कर बहुत अच्छा लगता है. मेरा जूनियर हाई स्कूल बोर्ड की परीक्षा का केंद्र हमारे गांव से लगभग 20-25 किमी दूर, दुर्वासा (आज़मगढ़) के पास खुरांसों नामक गांव के स्कूल में पड़ा था. उम्र 12 होने को थी. अगली सुबह 7 बजे से परीक्षा थी, रात 12 बजे क्रस्थान का शुभ मुहूर्त था. यात्रा पोस्टपोंड करने की गुंजाइश तो है. गांव के बाहर अगले गांव में किसी के यहां कोई कपड़ा या सामान प्रसअथान के रूप में रख दीजिए. प्रीपोन की गुंजाइश नहीं होती. दिन का मामला होता तो मेरे पिता जी साइकिल से पहुंचा देते. अंधेरी रात, चांद आधी रात के बाद निकला था. चल पड़े आजा-पोता -- पोता दुबला-पतला कृषकाय और दादा 6 फुटे बलिष्ठ -- नदी के बीहड़ों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते की रोमांचक रात्रि-यात्रा पर. दादाजी साथ में लोटा-डोरी लेकर चलते थे, 3 कोस (6 मील) दूर माहुल बाजार के पास कुएं से पानी पीने के बाद फिर उतर पड़े बीहड़ों के रास्ते मंजिल तक, सुबह 6 बजे के आस-पास. इतना समय था कि नहा कर चाय पी सकूं. परीक्षाएं अच्छी हुईं. संयोग अंधविश्वासों को बल प्रदान करते हैं. उस समय फर्स्ट आना बड़ी बात मानी जाती थी. खैर, मॉफी चाहता हूं, फूटनोट कुछ लंबा हो गया, तो मूलकथा पर वापस आता हूं. हर समुदाय अपनी ऐतिहासिक जरूरतों के अनुसार, अपनी शब्दावली, मुहावरे, पर्व, धर्म और देवी-देवताओं की अवधारणाएं गढ़ता हैं. इसीलिए देश-काल के अनुरूप ये अवधारणाएं बदलती रही है. रिग्वैदिक देवी-देवताओं में ब्रह्मा-विष्णु-महेश की तिकड़ी के बैकुंठ के किसी देवी-देवता का जिक्र नहीं है. पहले भगवान गरीब और असहाय की मदद करता था अब जो खुद अपनी मदद करे उसकी. (जारी...   )

No comments:

Post a Comment