Monday, May 10, 2021

लल्ला पुराण 371 (भाषा की तमीज)

 


यह पूछना कि भाषा की तमीज मां-बाप से सीखा या कहीं और से? व्यंग्यात्मक प्रश्न है। यदि अपनी भाषा मर्यादित है तो उसका श्रोत बताने में हर्ज नहीं होना चाहिए। कह दीजिए कि मां-बाप से नहीं स्वयं या मित्रमंडली में सीखा।
बच्चे प्रवचन से नहीं पर्यवेक्षण (Observation) से सीखते हैं। Children are very keen observer and imitators. बिल्कुल सही कह रहे हैं, "स्वयं का प्राकृतिक संस्कार संगत व परिस्थिति उसके व्यक्तित्व का विकास करती हैं"। बिल्कुल सही कह रहे हैं, इसमें एक बात और जोड़ लीजिए, परवरिश और परिवेश एवं खुद का सचेत प्रयास। व्यक्तित्व पर पहला प्रभाव परिवार का पड़ता है। चंबल के डाकू का बेटा बाप के सिखाने से नहीं, बाप और उसके साथियों के व्यवहार को देखकर सीखता है। संगत और स्कूली शिक्षा आदि के माहौल के साथ परिवार का भी प्रभाव पड़ता है। मेरी बेटियां छोटी थीं तो कभी कोई फोन आता तो कभी मन करता कि उनसे यह बोलने को कहदूं कि घर पर नहीं हूं। फिर सोचता कि अगर इन्हें कभी झूठ न बोलने की सीख दूंगा तो सोचेंगी कि देखो झूठ न बोलने की सीख देता है और अपने काम से झूठ बोलने को कहता है और मैं खुद फोन अटेंड करता। शिक्षक और मां-बाप को प्रवचन से नहीं मिशाल से पढ़ाना चाहिए। एक बाक एक पसिद्ध इतिहासकार और प्रोफेसर ने किसी बात पर कहा कि उनका बेटा गुंडा निकल जाए तो वे क्या करसकते हैं। (वैसे उनके बेटे बहुत ही अच्छे इंसान और विद्वान हैं।) मैंने कहा था कि ऐसे में उन्हें अपनी परवरिश पर पुनर्विचार करना चाहिए। खैर छोड़िए। मित्र, यहां किसी का किसी से खेत-मेंड़ का झगड़ा नहीं है, मर्यादित भाषा और मर्यादित आचरण से हमलोग इस मंच को विमर्श का सार्थक मंच बना सकते हैं।

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