Wednesday, June 2, 2021

शिक्षा और ज्ञान 310(स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा))

 "स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा (Liberty, Equality and Fraternity)" के नारे के साथ संपन्न फ्रांसीसी क्रांति (1789) के वैचारिक जनक माने जाने वाले दार्शनिक रूसो की कालजयी पुस्तक 'सामाजिक संविदा (Social Contract)' की शुरुआत इस पंक्ति से होती है, " मनुष्य पैदा तो स्वतंत्र होता है लेकिन हरतरफ बेडियों में जकड़ जाता है (Man is born free but everywhere he is in chains)"। आज के भारत के संदर्भ में इसे इस तरह कहा जा सकता है कि मनुष्य पैदा तो इंसान होता है लेकिन पैदा होते ही उसे जन्म के संयोग से मुसलमान (शेख, सैयद, धुनिया, दर्जी, कुरैशी आदि)-हिंदू (बाभन, ठाकुर, अहिर, पासी, आदि) बना दिया जाता है और आर्थिक परिस्थितियों से अमीर-गरीब। कहने का मतलब इंसान पैदा तो स्वतंत्र होता है लेकिन समाज उसे परतंत्र बना देता है। अपने कृत्य को सुधारने की जिम्मेदारी भी समाज की है। इसका समाधान वह एक ऐसे समाज की रचना में खोजता है जिसमें व्यक्ति पहले जैसा स्वतंत्र हो सके। आर्थिक परिस्थितियों द्वारा निर्मित असमानता का उन्मूलन वर्गचेतना से लैश संगठित सर्वहारा क्रांति से ही संभव है। लेकिन जन्म के संयोग से निर्मित धर्म, जाति, लिंग आधारित असमानता तो हम व्यक्तिगत रूप से भी इस संयोग से समाज द्वारा थोपी गयी अस्मिता से मुक्त होकर पहले (जन्म के समय) जैसे इंसान बन कर खत्म कर सकते हैं, जिसे मुहावरे की भाषा में बाभन से इंसान बनना कहता हूं।

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