Sunday, June 27, 2021

बेतरतीब 108 (बेटी)

 Ram Chandra Shukla हम 6 भाइयों के बाद बहन पैदा हुई थी, मुझसे लगभग 12 साल छोटी। जो न हो वह मिल जाए तो खुशी ज्यादा होती है। वह 6 महीने की थी तो मैं शहर पढ़ने चला गया और छुट्टियों में ही मुलाकात होती थी। मैं उसे सिर पर बैठाकर घुमाता था। मां और दादी कहतीं लड़की को सिर पर बैठा रहे हो, बेटियां ही होंगी। वह जब 8वीं पास की तो पढ़ाई बंद कराके उसकी शादी खोजी जाने लगी। मैं उस समय जेएनयू में एमफिल का छात्र था तथा डीपीएस में गणित पढ़ाने लगा था। पूरे खानदान से लड़-झगड़ कर अड़ कर उसे ले जाकर वनस्थली विद्यापीठ राजस्थान में एडमिसन कराया जहां से उसने एमए बीएड की पढ़ाई की। दूसरी बेटी पैदा हुई तो उधार लेकर उत्सव मनाया कि लोगों को यह न लगे कि दूसरी बेटी होने से दब गया। नतिनी का नाम पेट में थी तभी माटी रख दिया था। छोटी बेटी ने कहा कि बेटा हुआ तो ढेला रखेंगे? मैंने कहा तब देखेंगे। आई माटी ही। पिछले कई सालों, बल्कि दशकों से लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं, क्योंकि उनके मन में वंचनाओं और भेदभाव की यादें ताजा हैं। वे नई चुनौतियों के लिए तैयार हैं। मैंने शाहीन बाग पर लेख में इस परिघटना को नये नव जागरण का प्रतीक कहा था। मेरे ख्याल से भारत के भावी नए नवजागरण की नायिकाएं देवांगनाएं, नताशाएं तथा शरूफाएं होंगी और स्त्री प्रज्ञा तथा दावेदारी से लैश स्त्रीवादी चेतना इसका विशिष्ट आयाम होगी।

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