Wednesday, April 24, 2013

मुक्ति


                                                  मुक्ति                       
ईश मिश्र
रूसो ने जब सार्वजनिक संप्रभुता का सिद्धांत दिया
सहभागी जनतंत्र की धारणा का सूत्रपात किया
अराजक हो यदि जनतंत्र का आकार- प्रकार
गंदा कर सकती है तालाब एक ही मछली बारंबार
था उसको इस खतरे का उसको पूरा पूर्वानुमान
देस की दुर्दशा का नहीं जिम्मेदार भगवान
बल्कि चालाकी से बन गया जो अपार धनवान
इसीलिये रचा उसने जन-गण-मन का प्रावधन
राजा-रानी को धता बता सम्प्रभू बना जनादेश
नहीं टाल सकता कोई भी जनहित के आदेश 
लुटेरों-जमाखोरो को दिया उसने साफ़-साफ़ संदेश
चूर-चूर हो जाओगे मानोगे नहीं जो संप्रभु का आदेश 
छेडेगा कोई कमीना गर जनता के जज्बात
नहीं होगी बरदाश्त उसकी खुराफात
नहीं कर सकेगी कोई मछली गंदा तालाब
तोड़ दिया जायेगा उसका माल--असबाब
गुलामी नहीं हो सकती किसी का भी अधिकार
जरूरी हुआ तो डंडे से होगा मुक्ति का प्रसार.
द्रौपदी की साडी है उनीस सौ तिरासी
कितना भी फाडे उसे दुर्योधन सियासी
[march-june 2011]

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