मैंने कहा यार इस पर विस्तार से फिर लिखूंगा, पहले भी अपने कई लेखों और फेसबुक पोस्ट्स में लिख चुका हूं। मैं कभी शब्दों के जाल में नहीं उलझाता साफ-साफ कहता हूं और ऊपर मैंने कहा कि आजकल हमारे क्षेत्र-पूर्वी उ.प्र (अवधी-भोजपुरी इलाके) में सड़कों पर दिखती संस्कृति लंपटता और आपराधिक असहिष्णुता की संस्कृति का वर्चस्व है, इसके कारणों की समीक्षा होनी चाहुिए। ब्राह्मणवाद-नवब्राह्मणवाद पर लेख का वक्त अभी नहीं है। मैंने वायदा किया लिखूंगा, अभी कुछ विलंबित डेड लाइन पूरा कर लूं। काम या विचार की बजाय जन्म के आधार पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन ब्राह्मणवाद का मूल मंत्र है, जो जन्मना अब्राह्मण ऐसा करता है वह नवब्राह्मणवादी है. बाकी आप मेरे अंदर दक्षिणपंथी विचलन ढूंढ़ने को स्वतंत्र हैं।
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यह लंपटता बेरोजगारों तक नहीं सीमित है, रोजगोरशुदा, पढ़े-लिखों और पेंसनयाफ्ता तक। Tejpratap Pandey सही कह रहे हैं इनकी ही नहीं हर तरह के अपसंस्कृतिकरण की अंतत: जिम्मेदारी पूंजीवाद की है, इसलिए इन अपसंस्कृतियों के साथ खड़ा हुआ जाए? मैं नहीं मानता इसके लिए महज पूंजीवाद जिम्मेदार है, इसके लिए ब्रह्मणवादी और नवब्राह्मणवादी सोच जिम्मेदार है जो हमारी मौलिक विरासत है।
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