Thursday, June 18, 2015

तस्वीर

ढूढ़ रहा था तुम्हारी यही तस्वीर
उतारा था जिसे कविता में
तुमसे मिलने से पहले ही
और थमा दिया था लाल फरारा
कल्पना करो उस कवि की खुशी के आलम का
साकार हो जिसकी कल्पना
लेकिन तुम तो पहले ही
उठा चुकी थी इंकिलाबी परचम
कविता की कल्पना के पहले
कल्पना यथार्थ का ही अमूर्तिकरण है
(ईमिः 18.06.2015)

4 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, २० जून, २०१५ की बुलेटिन - "प्यार, साथ और अपनापन" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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