Friday, June 5, 2015

कांधला सींप्रदायिक उत्पीड़न के विरोध का सांप्रदायिकरण


कांधला 
सींप्रदायिक उत्पीड़न के विरोध का सांप्रदायिकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ट्रेनों में मुसलमानों के साथ बदसलूकी की घटनाओं के विरोध में राज्य के शामली जिले के कांधला कस्बे में रेल रोको आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी तथा उसके बाद साम्प्रदायिक तनाव के समाचारों पर जनहस्तक्षेप की रिपोर्ट।



विषय सूची
1.         संदर्भ...................................................................................................................................4
2.         भूमिका................................................................................................................................5 
3.         घटनाक्रम.............................................................................................................................6
4.         घटना के कारण.....................................................................................................................8
5.         अफवाहें और सच...................................................................................................................8
6.         कुछ सवाल..........................................................................................................................10
7.          विभिन्न पक्षों की भूमिका.....................................................................................................11
8.          निष्कर्ष...............................................................................................................................12
9.          मांगें...................................................................................................................................13










1.         संदर्भ  
1 मई 2015 को जनता एक्सप्रेस ट्रेन से दिल्ली से सहारनपुर जा रहे तबलीगी जमात के एक सदस्य के साथ कुछ असामाजिक तत्वों ने बदसलूकी की। जमाती अपने मुकाम तक जाने के बजाय कांधला स्टेशन पर उतर गए और जमात के कुछ स्थानीय सदस्यों को साथ लेकर रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पुलिस थाने पहुंचे। कैराना से समाजवादी पार्टी के विधायक नाहिद हसन उस समय किसी अन्य मामले के सिलसिले में थाने में मौजूद थे। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ट्रेनों में मुसलमानों के खिलाफ बदसलूकी की बढ़ती घटनाओं के विरोध में रेल रोको आंदोलन का ऐलान कर दिया। अगले दिन इस आंदोलन के दौरान तोड़फोड़ और आगजनी की मामूली घटनाएं हुईं तथा पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़पों में कुछ लोग घायल हो गए। संघ परिवार के संगठनों ने अवाम की हिफाजत करने में प्रशासन और पुलिस की नाकामी के विरोध में इस जनाक्रोश को साम्प्रदायिक रंग देने के मकसद से मुसलमानों के खिलाफ अफवाहें फैलाने की मुहिम छेड़ दी।
इसी क्रम में पुणे में पुलिस ने अमितेश नामक एक युवक को गिरफ्तार किया जिसने ट्विटर पर अपने एक पोस्ट में कांधला की घटना को गोधरा की पुनरावृति बताते हुए 3 हजार मुसलमानों की हत्या करने के लिए हिंदुओं का आह्वान किया था। अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार अमितेश ने खुद को भारतीय जनता युवा मोर्चा का पदाधिकारी बताते हुए दावा किया था कि ट्विटर पर उसे फालो करने वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं। इसी बीच थाना भवन क्षेत्र से भाजपा के विधायक सुरेश राणा ने कांधला की जैन धर्मशाला में अपने समर्थकों की एक बैठक की और रिपोर्टों के मुताबिक उन्हेंमुसलमानों का मुकाबलाकरने के लिए उकसाया।
जनहस्तक्षेप ने अखबारों, टेलीविजन चैनलों तथा सोशल मीडिया पर प्रसारित खबरों का संज्ञान लेकर हकीकत का पता लगाने के लिए अपनी एक टीम कांधला भेजी। टीम ने 10 मई, 2015 को कांधला और कैराना का दौरा किया। उसने झड़प, तोड़फोड़ और आगजनी के स्थलों का मुआयना करने के अलावा प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, चश्मदीदों तथा आम नागरिकों से बातचीत की। टीम ने इस बात पर संतोष जाहिर किया कि कांधला के निवासियों ने साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के प्रयासों को नाकाम कर दिया और कस्बे में अमन-चैन बरकरार रहा। सोशल मीडिया पर 2 मई के प्रदर्शन को गोधरा की पुनरावृत्ति बताने वाले पोस्ट्स, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले करने के उकसावों और तमाम अफवाहों के बावजूद कोई हादसा नहीं हुआ। कैराना, कांधला और शामली में 1 और 2 मई की घटनाओं के निशान नहीं बचे हैं। लेकिन कुछ आशंकाएं और अनिश्चितताएं दोनों धार्मिक समुदायों के लोगों को परेशान कर रही हैं। 
टीम ने सबसे पहले कांधला बस अड्डे के नजदीक शिव मिष्ठान भंडार के मालिक शेर सिंह से बातचीत की। जनहस्तक्षेप की टीम के कांधला आने की खबर पाकर नजदीकी नीमखेड़ा शिविर के कुछ लोग उससे मिलने के लिए पहले से ही बस अड्डे पहुंचे हुए थे। ये लोग 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में संघ परिवार के उकसाए दंगों के बाद से ही शिविर में नारकीय स्थिति में रह रहे हैं। इन सब से बातचीत के बाद टीम ने कस्बे से थोड़ी दूर बागों से घिरे निर्जन में स्थित कांधला स्टेशन तथा रेल रोको आंदोलन के स्थल रेलवे फाटक का मुआयना किया। नीमखेड़ा शिविर के मुस्तकीम इस समूचे दौरे में गाइड के रूप में टीम के साथ रहे।
स्टेशन सुपरिंटेंडेंट बिशन सिंह, उनके सहयोगियों तथा रेल रोको आंदोलन के स्थल रेलवे फाटक पर तैनात केबिनमैन मुन्नी लाल से टीम ने लंबी बातचीत की। इसके बाद उसके सदस्यों ने पीडि़त जमाती को लेकर थाने जाने वाले तबलीगी जमात के स्थानीय सदस्यों से भी जानकारियां हासिल कीं। कांधला नगरपालिका परिषद के चेयरमैन और सपा के नेता हाजी वाजिद हसन के कस्बे में मौजूद नहीं होने के कारण उनके सहायकों से बातचीत की गई। नाहिद हसन से फोन पर बातचीत हुई। शहर कोतवाल एके चैहान से लंबी चर्चा में टीम को अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त हुईं।
टीम का नेतृत्व दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कालेज के प्रोफेसर ईश मिश्र ने किया। इसमें सुपरिचित राजनीतिक टिप्पणीकार राजेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार पार्थिव कुमार और हिंदी दैनिक नई दुनिया के संवाददाता धनंजय भी शामिल थे।
2.         भूमिका
जयप्रकाश नारायण कीसंपूर्ण क्रांतिके परिणामस्वरूप केन्द्र की सत्ता में आई जनता पार्टी का 1980 में विघटन भारतीय राजनीति का एक दुखद पड़ाव है। उसके जनसंघ धड़े का जब भारतीय जनता पार्टी के रूप में पुनर्गठन हुआ तो उसने उदार छवि के माध्यम से वैचारिक स्वीकार्यता के विस्तार के मकसद से अपरिभाषित गांधीवादी समाजवाद को दिशानिर्देशक दर्शन घोषित किया। लेकिन 1984 के सिख विरोधी जनसंहार के बाद राजीव गांधी को मिले अभूतपूर्व बहुमत ने संघ परिवार को बौखला दिया। उसने राम मंदिर के मुद्दे के जरिए हिंदुत्व के एजेंडे को आक्रामक तेवर देना शुरू किया जिसकी परिणति लालकृष्ण आडवाणी की सर्वविदित रथयात्रा में हुई। तब से ही भाजपा ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को अपनी चुनावी कामयाबी का हथियार बना रखा है। संघ परिवार के संगठन 2014 में हुए पिछले आम चुनावों से पहले मुजफ्फरनगर और शामली में किए गए साम्प्रदायिक दंगों के प्रयोग के प्रभाव की निरंतरता को बनाये रखने के लिये दूरदराज के इलाकों में तनाव के प्रसार के बहाने ढूंढते रहते हैं।
शामली तथा कैराना के बीच गंगा और यमुना के उपजाऊ दोआबे में ऊंघता सा, मुस्लिम बहुल और शांत कस्बा है कांधला। पांव में दर्द से परेशान बुजुर्ग शेर सिंह बचपन से इसी कस्बे में रहते हैं। उनके पिताजी रिक्शा चलाते थे। शेर सिंह पहले ढाबे में बरतन धोते थे मगर अब मिठाइयों की एक दुकान के मालिक हैं। उन्होंने बताया कि उनके कस्बे में किसी भी तरह के साम्प्रदायिक तनाव का कोई इतिहास नहीं है। निहित स्वार्थों की कोशिशों के बाद भी वहां अमन-चैन कायम है। मुजफ्फरनगर के कई गांवों में जब साम्प्रदायिक कोहराम मचा हुआ था उस समय भी यह कस्बा शांत रहा।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांधला का प्रतिनिधित्व शामली से कांग्रेस के विधायक पंकज कुमार मलिक करते हैं। कैराना से भाजपा के सांसद हुकुम सिंह लोकसभा में कांधला के प्रतिनिधि हैं। नजदीकी कैराना विधानसभा क्षेत्र से विधायक नाहिद हसन और कांधला नगरपालिका परिषद के चेयरमैन हाजी वाहिद हसन का ताल्लुक उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा से है। मुजफ्फरनगर और शामली के दंगों के मास्टरमाइंड माने जाने वाले थाना भवन क्षेत्र से भाजपा के विधायक सुरेश राणा को इस मामले में गिरफ्तार भी किया गया था।
3.         घटनाक्रम (अनुमानित समय के अनुसार)
01 मई, 2015
17:00 बजे - महाराष्ट्र के छह तबलीगी जमाती दिल्ली जंक्शन से 14545 फारुखनगर-सहारनपुर जनता एक्सप्रेस पर सवार हुए।
18:00 बजे - जमातियों में से एक, उमर फारूक अली खान को शौचालय जाने की जरूरत महसूस हुई। ट्रेन में शौचालय के दरवाजे के सामने कुछ लोग खड़े थे। फारूक अली ने उनसे रास्ता देने के लिए कहा जिस पर उन सब ने गालीगलौच शुरू कर दी। एतराज करने पर उन्होंने फारूक अली को पीटना शुरू कर दिया। उपद्रवियों ने उसके कपड़े फाड़ डाले, दाढ़ी नोची और उससे 20400 रुपए भी लूट लिए। 
19:15 बजे - सभी छह जमाती अपने मुकाम सहारनपुर से पहले ही कांधला स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए। उन्होंने कस्बे की जुमा मस्जिद पहुंच कर वहां मौजूद लोगों को अपने साथ हुई बदसलूकी की जानकारी दी। जख्मी जमाती की स्थानीय लोगों ने मस्जिद में ही मरहमपट्टी की।
19:30 बजे - फारूक अली और उसके साथी कुछ स्थानीय जमातियों को साथ लेकर घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए कांधला थाने पहुंचे। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, नाहिद हसन एक अन्य मामले के सिलसिले में पहले से ही थाने में मौजूद थे। हाजी वाजिद हसन भी कुछ देर में वहां पहुंच गए। इन दोनों नेताओं ने पुलिस अधिकारियों को मौखिक चेतावनी दी कि बागपत रोड और शामली स्टेशनों के बीच ट्रेनों में मुसलमानों पर लगातार हो रहे हमलों के विरोध में वे अगले दिन रेल रोको आंदोलन करेंगे। कांधला थाने से यह जानकारी शामली जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को भेज दी गई।

02 मई, 2015
06:00 बजे - लगभग 150 आंदोलनकारियों की भीड़ ने कांधला स्टेशन के नजदीक रेलवे फाटक पर धरना शुरू कर दिया। धरना शांतिपूर्ण था मगर इससे ट्रेनों का आवागमन रुक गया। भीड़ लगातार बढ़ती गई और कुछ ही समय में सैंकड़ों आंदोलनकारी जमा हो गए।
08:30 बजे - जमाती पर हमले के दोषियों की 24 घंटों के अंदर गिरफ्तारी का पुलिस से आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन खत्म। नाहिद हसन, वाजिद हसन और उनके समर्थक रेलवे फाटक से लौटने लगे। लेकिन नगरपालिका परिषद के पूर्व चेयरमैन और बहुजन समाज पार्टी के नेता हाजी इस्लाम अपने समर्थकों के साथ फाटक पर ही जमे रहे।
08:50 बजे - भीड़ ने रेलवे केबिन पर पथराव शुरू कर दिया। फाटक के नजदीक खड़ी 04735 बीकानेर-हरिद्वार ट्रेन पर भी पत्थर फेंके गए मगर किसी यात्री को चोट नहीं आई। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़प शुरू। चार आंदोलनकारी घायल जिनमें से एक की हालत नाजुक। कई पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं।
09:15 बजे - कांधला थाने के सामने खड़े कई जब्तशुदा पुराने वाहनों को आग लगा दी गई।

4.         घटना के कारण
घटना का तात्कालिक कारण जमाती पर ट्रेन में हुआ हमला रहा। मगर 2013 के दंगों के बाद से बागपत रोड और शामली स्टेशनों के बीच ट्रेनों में मुसलमानों पर दर्जनों हमले हो चुके हैं। मुस्लिम महिलाओं के साथ ट्रेन में छेड़छाड़ की घटनाएं आम हो गई हैं। पुलिस और जीआरपी ने इन हमलों को रोकने और इनके दोषियों को गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं की। जमात के एक स्थानीय नेता हाजी मुजम्मल खान ने बताया कि लगभग डेढ़ साल पहले जमातियों के एक जत्थे पर हमले के बाद पांच हमलावरों को जीआरपी ने हिरासत में लिया था। मगर छपरौली से राष्ट्रीय लोकदल के विधायक वीरपाल सिंह राठी ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर उन सब को छुड़ा लिया। इन हमलों की वजह से इलाके के मुसलमानों में पहले से ही जबर्दस्त आक्रोश था और ताजा घटना ने आग में घी का काम किया।
5. अफवाहें और सच
()
अफवाहः बाहर से ट्रकों में भर कर हथियार कांधला लाए गए।
सचः कोई सबूत नहीं। संभवतः इस बेबुनियाद अफवाह की शुरुआत सुरेश राणा ने करवाई। उन्होंने 4 मई की रात कांधला के जैन मंदिर में अपने समर्थकों के साथ बैठक की। बैठक में क्या चर्चा हुई, इसके बारे में पुलिस अधिकारियों ने भी अनभिज्ञता जाहिर की। शहर कोतवाल ने कहा कि यह बैठक जैन मंदिर पर पथराव की घटना के बाद हुई थी। मगर जैन मंदिर पर पत्थर फेंके जाने की घटना की निष्पक्ष तौर पर पुष्टि नहीं हो सकी। थाने में इस घटना के बारे में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई। सुरेश राणा इस अफवाह-आख्यान और इसके गोपन मंसूबों को छिपाते भी नहीं हैं। सहारनपुर से प्रकाशित अखबारों से पता चलता है कि जैन मंदिर में बैठक करने के बाद उन्होंने चेतावनी दी थी किप्रशासन अगर उपद्रव करनेवालों पर नकेल नहीं कसेगा तो जनता खुद उनसे निपटेगी
शुरुआत के लगभग ढाई घंटों तक रेल रोको आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। कांधला के स्टेशन सुपरिंटेंडेंट के अनुसार इस दौरान 74022 शामली-दिल्ली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। इस ट्रेन, इसके सैंकड़ों यात्रियों और स्टेशन पर मौजूद अन्य लोगों पर कोई हमला नहीं किया गया। अलबत्ता 08:50 बजे के बाद रेलवे केबिन और उसके नजदीक खड़ी बीकानेर-हरिद्वार ट्रेन पर पथराव हुआ। थाने के सामने भी सिर्फ कुछेक जब्तशुदा पुराने वाहनों को आग लगाई गई। कस्बे के बाकी हिस्सों में कहीं भी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि आंदोलनकारियों ने किसी आधुनिक हथियार का इस्तेमाल किया। अगर ट्रकों में भर कर हथियार लाए गए होते तो उनका उपयोग भी किया ही गया होता।
(ख)
अफवाहः आंदोलनकारियों का इरादा 2002 के गोधरा कांड को दोहराने का था।
सचः यह अनर्गल प्रचार भी सुरेश राणा की शह पर ही शुरू हुआ लगता है। उन्होंने सहारनपुर के अखबारों में छपे अपने बयान में कहा कि दूसरा गोधरा होते-होते बच गया। सोशल मीडिया के जरिए यह अफवाह फैलाने पर अमितेश नामक जिस युवक को पुणे में गिरफ्तार किया गया, उसने खुद को भारतीय युवा मोर्चा का पदाधिकारी बताया। रिपोर्टों के अनुसार इस युवक का ट्विटर अकाउंट फॉलो करने वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं। साफ है कि यहक्रिया-प्रतिक्रिया के 2002 के गुजराती फार्मूलेके दोहराव की खुली चेतावनी थी। वैसे भी 2013 और 2015 के बीच तथा मुजफ्फरनगर से सहारनपुर और शामली तक साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगों के ज्यादातर मौकों पर सुरेश राणा की संदिग्ध मौजूदगी ने इन मामलों से उनका रिश्ता धुएं और आग जैसा साबित किया है। 
किसी भी लिहाज से ऐसा नहीं लगता कि कांधला में आंदोलनकारियों का इरादा ट्रेनों या यात्रियों को नुकसान पहुंचाने का था। पथराव के दौरान एक ट्रेन के कुछेक शीशे टूट गए मगर यात्रियों में से किसी को भी चोट नहीं आई। अगर आंदोलनकारियों का इरादागोधरा कांडकी पुनरावृति का होता तो उन्होंने शुरुआत में ही ट्रेन और यात्रियों को निशाना बनाया होता। कांधला के स्टेशन सुपरिटेंडेंट ने भी इस बात की पुष्टि की कि भीड़ ने केवल रेलवे फाटक, केबिन और उसके पास रोक ली गयी बीकानेर-हरिद्वार एक्सप्रेस पर मामूली पथराव किया। लेकिन स्टेशन पर इंतजार कर रहे यात्रियों या प्लेटफार्म पर खड़ी 74022 डाउन शामली-दिल्ली सवारी गाड़ी को क्षति पहुंचाने की आंदोलनकारियों ने कोई कोशिश नहीं की। लिहाजा हरिद्वार जानेवाली ट्रेन को साम्प्रदायिक आधार पर निशाना बनाये जाने की अफवाह भी केवल शरारतपूर्ण ही नहीं बल्कि किसी बड़े साम्प्रदायिक एजेंडे का सूचक है।
6.         कुछ सवाल
() जमाती पर हमला ट्रेन के सुजरा स्टेशन पार करने के बाद हुआ था। उसने बीच के स्टेशनों बड़ौत और कासिमपुर खेड़ी को छोड़ कांधला में उतरने का फैसला क्यों किया?
हाजी मुजम्मल खान ने बताया कि हमलावर बड़ौत तक ट्रेन में ही थे। जमातियों को डर था कि हमलावर फिर से उनके साथ मारपीट कर सकते हैं। वे सीधे अपने मुकाम सहारनपुर तक पहुंचना चाहते थे। मगर कांधला के ही एक सहयात्री ने उन्हें सलाह दी कि वे ट्रेन से उतर कर घायल जमाती की मरहम पट्टी करा लें। तबलीगी जमात के संस्थापक मोहम्मद इलियास कंधालवी के कांधला का मूल निवासी होने के कारण हो सकता है, जमाती बेहतर इलाज और सुरक्षा की उम्मीद में इस कस्बे में उतर गए हों।  
() आंदोलनकारियों में ज्यादातर लोग कांधला से बाहर के थे। उन्हें रातोंरात रेल रोको आंदोलन की जानकारी कैसे मिली?
सपा नेताओं ने आंदोलन की योजना रात में ही बना कर पुलिस को मौखिक सूचना भी दे दी थी। रात में ही उन्होंने लामबंदी शुरू कर दी थी। जमातियों के आने के समय मस्जिद में मौजूद कुछ युवकों ने सोशल मीडिया के जरिए अपने जानकारों को घटना के बारे में बताया।
() थाने के सामने खड़े वाहनों को आग किसने लगाई?
पुलिस का यह कहना अविश्वसनीय लगता है कि आग आंदोलन खत्म होने के बाद रेलवे फाटक से लौटते लोगों ने लगाई। आंदोलनकारी तो दोषियों की गिरफ्तारी के पुलिस के आश्वासन से संतुष्ट होने के बाद लौट रहे थे। ऐसे में वे आगजनी क्यों करेंगे? रेलवे फाटक और थाने के बीच लगभग 2 किलोमीटर का फासला है। उस समय ज्यादातर पुलिसकर्मी रेलवे फाटक पर तैनात थे। अगर हमला हथियारबंद आंदोलनकारियों ने किया होता तो वे सिर्फ सड़े-गले वाहनों को निशाना क्यों बनाते। उनके सामने तो समूचा थाना लगभग खाली पड़ा था। मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें फंसाने के मकसद से खुद ही जब्तशुदा खटारा वाहनों को आग लगा दी।
() ढाई घंटों तक शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने के बाद आंदोलनकारी अचानक पथराव और तोड़फोड़ पर क्यों उतारू हो गए?
नगरपालिका परिषद के चेयरमैन के सहायकों के अनुसार हाजी इस्लाम ने सपा नेताओं के मौके से चले जाने के बाद आंदोलनकारियों को उकसाया। घटना के दौरान मौके पर तैनात एक पुलिस सबइंस्पेक्टर ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि आंदोलनकारी रेलवे फाटक से स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे। पुलिस ने उन्हें प्लेटफार्म की ओर जाने से रोका जिसके बाद उन्होंने पथराव शुरू कर दिया।


() गोली किसने चलाई?
चार घायलों में से एक को गोली लगी। पुलिस का कहना है कि यह गोली देसी कट्टे की थी जिसे भीड़ में से ही किसी ने चलाया था। दूसरी ओर मुस्लिम नेताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस वालों ने ही भीड़ पर देसी कट्टे से गोली चलाई ताकि फायरिंग करने के इलजाम से बच सकें।
7.         विभिन्न पक्षों की भूमिका
() प्रशासन और पुलिसः इस घटना के लिए प्रशासन और पुलिस को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जा सकता है। प्रशासन ने 2013 के दंगों के बाद से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के संबंधों के बीच बनी खाई को पाटने की कभी कोई कोशिश नहीं की। जैसा कि पुलिस अधिकारियों ने भी स्वीकार किया, बागपत रोड और शामली स्टेशनों के बीच ट्रेनों में मुसलमानों पर हमले और मुस्लिम महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आम बात हो गई है। ऐसे कई मामलों की रिपोर्ट पुलिस और जीआरपी में की गई मगर इन दोनों ने इन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। रेल रोको आंदोलन की एक बड़ी वजह जख्मी जमाती की रिपोर्ट लिखने में पुलिस की आनाकानी रही।
इस क्षेत्र में रेलवे स्टेशनों पर और ट्रेनों के अंदर सुरक्षा की व्यवस्था एकदम लचर है। जनहस्तक्षेप की जांच टीम को कांधला स्टेशन पर जीआरपी या स्थानीय पुलिस की कोई मौजूदगी नहीं दिखाई दी। स्टेशन सुपरिंटेंडेंट ने तो यहां तक कहा कि वह बदमाशों के डर से ही अपने क्वार्टर के बजाय कस्बे में किराए का मकान लेकर रहते हैं। उन्होंने बताया कि स्टेशन के आसपास छीनाझपटी की घटनाएं होती रहती हैं। केबिन पर पथराव के दौरान वहां तैनात केबिनमैन मुन्नी लाल इस हादसे से अब तक नहीं उबर पाया है। उसने जांच दल से कहा, ‘‘साहब, हमारे लिए कोई सुरक्षा नहीं है। इस जंगल में मेरे साथ कुछ हो जाए तो मैं क्या कर पाउंगा?’’
() भारतीय जनता पार्टीः पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाने का षडयंत्र मौजूदा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 2014 के आम चुनावों से पहले रचा था। चूंकि भाजपा को इसका काफी राजनीतिक लाभ हुआ लिहाजा वह अपने इस कुत्सित अभियान को जारी रखे है। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यकों पर जारी हमले भी इस अभियान का ही परिणाम हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों के सूत्रधारों में से एक सुरेश राणा जमातियों पर हमले की घटना के फौरन बाद कांधला में नमूंदार हुए। उनके चरण कांधला में पड़ने के बाद ही कस्बे में अफवाहों का बाजार गर्म होने लगा। जाहिर है, भाजपा इस घटना का उपयोग कर हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने का इरादा रखती थी। नफरत की इस खेती में जिले का प्रशासन और पुलिस पूरी तरह भाजपा के साथ है।
() समाजवादी पार्टीः इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सपा नेताओं नाहिद हसन और वाजिद हसन ने भीड़ को तोड़फोड़ या आगजनी के लिए उकसाया। मगर घटनाक्रम से यह भी साफ है कि इन दोनों ने पुलिस पर हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनाने के बजाय मौके का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। वे सपा सरकार की चिरपरिचित नीति पर चलते हुए मुसलमानों के भय का दोहन कर उन्हें अपने पीछे गोलबंद करने के प्रयास में लगे रहे। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि नाहिद हसन और वाजिद हसन के बीच सपा के अंदर वर्चस्व की लड़ाई है। उनके बीच खुद को मुसलमानों का ज्यादा बड़ा पैरोकार दिखाने की होड़ रहती है। रेल रोको आंदोलन का आनन-फानन में किया गया फैसला भी इसी प्रतिद्वंद्विता का नतीजा था। 
() बहुजन समाज पार्टीः ऐसा लगता है कि सपा और बसपा नेताओं की प्रतिद्वंद्विता ने ही इस शांतिपूर्ण आंदोलन को उग्र बना दिया। हाजी इस्लाम पर आरोप है कि नाहिद हसन और वाजिद हसन के मौके से चले जाने के बाद उन्होंने अपने समर्थकों को पथराव के लिए उकसाया। इसके पीछे उनका इरादा खुद को मुसलमानों का ज्यादा बड़ा खैरख्वाह दिखाने का हो सकता है।  
() राष्ट्रीय लोकदलः पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने जाटों का असली प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले रालोद को अप्रासंगिक बना दिया है। वीरपाल सिंह राठी का डेढ़ साल पहले जमातियों पर हमले के दोषियों को जीआरपी से छुड़ाना इस बात का सबूत है कि रालोद अपराधियों का सहयोग लेकर अपनी राजनीतिक नैया को पूरी तरह डूबने से बचाने की हताश कोशिश में है।
8.         निष्कर्ष
कांधला में मुसलमानों के आंदोलन को साम्प्रदायिक रंग देना सिरे से गलत है। यह मुसलमानों के जानमाल की हिफाजत करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने में सरकार, प्रशासन और पुलिस की कोताही और नाकामी पर जनता का लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन था। चूंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ट्रेनों में मुसलमानों पर हमले लगातार हो रहे हैं इसलिए प्रदर्शनकारियों का रेलवे से खफा होना लाजिमी था। वैसे भी जनता के विरोध प्रदर्शनों में ट्रेनों को रोका जाना सामान्य बात है। भाजपा ने हमेशा की तरह प्रशासन और पुलिस के सहयोग से अफवाहें फैला कर इस घटना को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की।
9.         मांगें
() जमाती पर हमला करने वाले सभी बदमाशों को तुरंत गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाए।
() इस बात की न्यायिक जांच कराई जाए कि शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे लोगों को पथराव और तोड़फोड़ के लिए किसने उकसाया। गोलीबारी और थाने के सामने वाहनों को आग लगाए जाने की घटना की भी जांच कराई जाए।
() अफवाह फैलाने और आंदोलनकारियों को उकसाने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाए।
() ट्रेनों में मारपीट, छेड़खानी और लूटपाट की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के लिए उनके अंदर और रेलवे स्टेशनों पर पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया जाए। इस तरह की घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

0/ईश मिश्रा

(संयोजक, जनहस्तक्षेप)                       

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