Wednesday, December 28, 2016

मोदी विमर्श 53(नोटबंदी 10)

लोहिया ने 1960 के दशक में कहा था, ज़िंदा क़ौमें 5 साल इंतजार नहीं करतीं. लेकिन हम ज़िंदा क़ौम हैं कि नहीं, कई बार शक होने लगता है. जनता की त्राहि-त्राहि के बीच भक्त पंजीरी खाकर भजन गा रहे हैं। जबान फिसल गई 50 हफ्ते को 50 दिन कह गये वज़ीरे-आज़म. अब कहेंगे, 'भाई और बहनों, इंसान की जुबान कभी-कभी फिसलती है कि नहीं?' "फिसलती है". 'मैं, एक लखटकिया सूट वाला फकीर हूं कि नहीं?' "हूं". 'फकीर भी इंसान होता है कि नहीं?' "होता है". 'मैं इंसान हूं कि नहीं' चुप्पी. 'हूं कि नहीं?' चुप्पी 'बोलिए भाइयों और बहनों, मैं इंसान हूं कि नहीं?, फिर चुप्पी. वज़ीर-ए-आज़म ने सशस्त्र सुरक्षाकवच की तरफ इशारा कर ललकार-हुंकार शैली की बुलंद आवाज में उवाचा, 'भाइयों और बहनों मैं इंसान हूं कि नहीं?' सभी बुलंद आवाज में बोल पड़े, "मैं इंसान हूं". वज़ीर-ए-आज़म वाक्य में कर्ता और क्रिया के फर्स्ट-थर्ड परसन के चक्कर में न पड़, जवाब को हां मान लिया. 'तो भाइयों और बहनों, मैं भी इंसान हूं, इंसान की जुबान फिसलती है, तो भाइयों और बहनों मेरी भी फिसल गई. तो भाइयों और बहनों, मैं बेईमानों को छोड़ूंगा नहीं, एक-एक का संहार करूंगा, 50 दिन की बजाय 50 हफ्ते भले लग जाएं. तो भाइयों और बहनों बेईमान राष्ट्र के दुश्मन हैं कि नहीं?' "हैं". उनका संहार होना चाहिए कि नहीं?' "होना चाहिएि" 'तो भाइयों-बहनों नोटबंदी के चलते बैंकों की कतारों में कालाधन सफेद करने के चक्कर में बहुत से बेईमान मरे कि नहीं?' तब तक भूख और भाषण के प्रकोप से श्रोता बेहोश हो गए थे और लाउडस्पीकर से आवाज आने लगी, "मरे, मरे, मरे". 'अभी तो ये शुरुआत है'.

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