Thursday, November 13, 2014

फुटनोट 21

दीक्षा मिश्रा कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है, जिनकी नियति भाग्य के सितारों के भरोसे होती है उनके जीवन के सितारे धूल में मिल जाते हैं. नियति के दायरे में कैद खुलापन पिजरे के मोह में फंसे तोते की अाज़ादी या हजारों साल घर की चारदीवारी में कंगनों की हथकडी अौर पाजबों की बेड़ियों में जकड़ी, अाभूषणों के भार से दबी नारी की मर्यादित अाज़ादी  सी है. भगवान की ही तरह भाग्य की अवधारणा भी यथास्थिति की विद्रूपताओं की वैधता अौर अौचित्य के लिये गढी गयी. नियति का रोना खुल कर जीना नहीं, हालात से समझौते का बहाना है. जंगल हमें चुने इससे बेहतर उसका हमसे चुना जाना है. बहुत ऊंची हैं, मुश्किलों की दीवारें, मगर साहस के इरादों से कमतर. नियतिवाद शासित को यह सोचवाने का मंत्र है कि दयनीयता उसकी नियति है, अौर लोग गीता का उपदेश अात्मसात कर, चिंतन को  मुल्तवी कर, नियति-निर्दिष्ट राह पर चल पडते हैं. बाकी अाप कुछ भी मानने-न-मानने के लिये स्वतंत्र हैं. वैसे गुलामी की तरह नियतिवाद अधिकार नहीं हो सकता, अधिकार का भ्रम है. एक बार फ्रांसीसी, नारीवादी दार्शनिक सिमन द बुअा (द सेकंड सेक्स की लेखिका) से पत्रकारों ने पूछा, "जब अौरतें खुद स्वेच्छा से पारंपरिक जीवन में खुश हैं तो अाप अपने विचार उनपर क्यों थोपना चाहती हैं?" उनका जवाब था, "हम किसी पर कुछ नहीं थोपना चाहते, वे पारंपरिक जीवन से इस लिये खुश हैं कि उन्हें जीने के अौर तरीकों का ज्ञान ही नहीं है, हम सिर्फ उन्हें जीने के अन्य तरीकों से परिचित कराना चाहते हैं. अैर उनका क्या किया जाय जो जेल में भी शक्ति की अनुभूति कर लें.?"

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