Saturday, June 4, 2011

युवराज

युवराज
ईश मिश्र
चरणों में रहता जन है,यह मूल मंत्र जन-तंत्र का
तंत्र उचारता मंत्र जन उसे दुहराता रहा
पता न चला उसे इसके आदि-अंत का
माउंटबेटन ने जब किया इसका ऐलान
नेहरू ने भी दोहराया जंब उसका फरमान
जन ने सोचा स्व-तंत्र का हुआ पूरा अरमान
राह गया चकित देख तंत्र का अहंकार-अभिमान
भरता रहा वह पानी नई पीढिओ की आस के साथ
काबिज हो गए मंच पर नए राजा-रानी युवराज के साथ
देख अपनी हसरतो की दुर्दशा, जन हैरान है
सामने उसके नई लडाइओ का बिवाबान है
निकलते आए हैं, निकलेगा ही कोई रास्ता
असली आजादी से पड़ा है अबकी जन को वास्ता
नहीं चलेगी इस जनतंत्र में तंत्र की मनमानी
नहीं होगा युवराज कोई और न राजा-रानी
आएगा मगर तभी ऐसा नया जनतंत्र
होगा जब सर्मायेदारी का अंत

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