Tuesday, November 24, 2015

फुटनोट 57

Sunil Kumar 'suman'  बिल्कुल सही कह रहे हैं. सार्वंजनिक तौर पर वंचित तपके के खिलाफ जातिवादी उल्टी करने वाले तथाकथित प्रतिभाशालियों के दिमाग का कूड़ा इतनी जल्दी नहीं साफ होगा, इंकिलाबी प्रतिकार ही इसका जवाब है. 1985-87 की कभी की बात  है. साममंदिर शिलापूजन के कार्यक्रम में अगले दिन अडवाणी जी जयपुर आने वाले थे. बस बस अड्डे की बजाय डिपो जाकर रुकी. जयपुर से जाने वाली बसें बंद थी. बहन को बनस्थली छोडने ट्रेन से जा रहा था. एक-बनाम सभी बहस में उलझ गया. एक हट्टा-कट्टा नौजवान बाहें चढ़ाये मेरी तरफ बढ़ा. मैंने कहा बांहे नीचे कर लो. वजन देककर डर जाऊं तब तो दुनिया के सारे मर्दों से डर कर रहूं. उसने बांहे तो नीची कर ली और तेज आवाज में बोला, इतना ऊंच-नीच, जात-पांत की बात कर रहा हू तो क्या अपनी बहन बेटी की शादी चमार से कर दूंगा. मेरा स्वस्फूर्त जवाब था, मैं तो खुद चमार हूं और सबकी बोलती बंद. उग्र-आक्रमकता मर्यादित-सहिष्णुता में बदल गयी -- देखिये मेरा मतलब यह नहीं था टाइप. ये मानसिक विकलांगता के शिकार लोग हैं, जनवादी क्रांति ही इसका इलाज़ है.

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