Sunday, November 22, 2015

नारी विमर्श 6


Shailendra Jha स्त्री-पुरुष में सामान्य मित्रता की असंभाव्यता की समझ की आपकी तंगजेहनियत या कमनिगाही का कारण का शायद अनुभव की दुनिया का सीमित होना हो. मैँ इलाहाबाद के संकीर्णतावादी, श्रेणीबद्ध सामंती माहौल से निकलकर, 1976 में आपातकाल में भूमिगत अस्तित्व की संभावनाओं की तलाश में जेयनयू पहुंचा तो किसी इलाहाबाद के सीनियर से मुलाकात हुई तो रहने का इंतजाम हो गया और एक अलग दुनिया देखने को मिली. आधी रात तक लड़कियाँ उतनी ही बेफिक्री से घूम रही जितने लड़के. कोई भी बात किसी लड़की से वैसे कह सकते हो जैसे किसी लड़के से। सेक्सुअल हैरेसमेंट की कभी कोई बात सुनने मे नहीं आती थी, शायद इसलिये भी की छोटा सा (आबादी के लिहाज से) सब एक दूसरे को कम-से-कम शकल से जानते थे. किसी मित्र ने नीलिमा की बात यूटोपिया कहा. जब तक कुछ हो नहीं जाता तबतक यूटोपिया लगता है. उच्चतम शिक्षा के बावजूद यदि हम ब्राह्मण-भूमिहार से इंसान न बन पाय़ें या पुरुष-स्त्री से इंसान न बन पाये तो शिक्षा तथा ज्ञान के अंतःसंबंधों पर गंभीर पुनर्विचार की जरूरत है. दुर्भाग्य से मर्दवादी मर्यादा स्त्री को स्त्री पहले इंसान बाद में मानती है. इससे भी दुर्भाग्य से अभी भी मर्यादा का जाल काटने में असमर्थ ज्यादातर स्त्रियां भी खुद को स्त्री पहले मानती हैं इंसान बाद में.

 

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