Wednesday, February 22, 2017

दस्तूर सम्राटों का

जब तक है दस्तूर सम्राटों का कायम
नहीं चलेगा सरकार बदलने से काम
चाहिए ग़र सचमुच का इंसाफ
बदलना पड़ेगा ज़र का निज़ाम
इसीलिए कहा जाता है इसे तताकथित जनतंत्र
खाता है जनता की जपता है धनकुबेरों का मंत्र
गायब है जैसे पब्लिक प्लेटो की रिपब्लिक से
वैसे ही जन गायब है इस पूंजीवादी जनतंत्र से
कहा था कार्ल मार्क्स ने कोई डेढ़ सौ साल पहले
शोषित-वंचितो को मिलता है हक़ तयशुदा वक्त सेे
उत्पीड़कों में से जिसे चाहे अपनी मर्जी से चुन ले
कार्ल मार्क्स ने ही कही थी यह भी बात
शासक वर्ग के विचार ही हैं शासक विचार
नहीं करता पूंजीवाद उत्पादन महज माल का
चलाता है कारखाने भी विचारों के उत्पादन का
पराधीन हैं भौतिक उत्पादन के श्रम के साधन से
निर्भर होते मालिक पर ही बौद्धिक उत्पादन के लिए
मुक्त करना है आवामी सोच वक्त की युगचेतना से
लैस करना होगा इसे खुद को जनवादी वर्गचेतना से
तब बन पाएगी आवाम का जनवादी संगठन
बनाएंगे दुनिया के मजदूर मानव-मुक्ति का चमन
तब तक जुमलेबाजों में से चुनने को अभिशप्त
चुनें उसे जो लूट और क्रूरता में हो थोड़ा कम
(ईमिः 22.02.2017)

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