Sunday, May 1, 2022

नारी विमर्श 24 (अंधविश्वास)

 फरेबी बाबाओं पर एक विमर्श में किसी ने कहा कि डर और अंधविश्वास के चलते पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां ज्यादा ऐसे बाबाओं के शरण में जाती हैं। उस पर --


स्त्रियों में अपेक्षाकृत यह अतिरिक्त असुरक्षा, डर, आत्मविश्वास की कमी, दैवीय चमत्कार में अंधविश्वास उनके स्त्री होने के नाते नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रशिक्षण और सामाजीकरण के चलते होता है। स्त्रीवादी दार्शनिक सिमोन द बुआ ने सही कहा है कि स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। आर्थिक बदलाव के साथ राजनैतिक और कानूनी बदलाव तुरंत होते हैं, लेकिन सांस्कृतिक बदलाव में चेतना में बदलाव की जरूरत होती है, जो अपेक्षाकृत अधिक मुश्किल होते हैं और अधिक उसमें अधिक समय लगता है। जन्म से ही समाजीकरण के दौरान संस्कार के रूप में, विरासत के नाम पर सांस्कृतिक मूल्यों को हम अंतिम सत्य के रूप में आत्मसात कर लेते हैं, जिनमें बदलाव के लिए अतिरिक्त वाह्य ही नहीं आंतरिक आत्मसंघर्ष की भी जरूरत होती है। लेकिन बदलाव अवश्यंभावी है, स्त्रियां जैसे-जैसे शिक्षा एवं आर्थिक क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं, वर्जित क्षेत्रों का अन्वेषण कर रही हैं, नए आसमान गढ़ रही हैॆं, उनकी चेतना का अग्रगामी होना अवश्यंभावी है। जैसे जैसे आत्मविशवास मजबूत होगा दैवीयता का भय और दैवीय चमत्कारों में अंधविश्वास घटता जाएगा और वे मुक्ति के नए नए द्वीप रचेंगी। स्त्री प्रज्ञा और दावेदारी का रथ इतना आगे बढ़ चुका है कि आज कोई भी बेटा-बेटी में फर्क करने की बात सार्वजनिक रूप से नहीं करता, एक बेटे के लिए 4 बेटियां भले ही पैदा कर ले और इसका दोष एकमात्र स्त्री के सिर नहीं मढ़ा जा सकता वह तो मिथ्याचेतना के चलते पुरुष की सहभागी बन जाती है।

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