Sunday, April 2, 2017

मार्क्सवाद 50 (धर्म)

मार्क्सवाद एक गतिशील विज्ञान है और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो कुरान नहीं. धर्म को अफीम वाला पूरा वाक्य पढ़ लिया होता तो समझने में आसानी होती. मार्क्स 1844 में प्रकाशित, 'अ कन्ट्रीब्यूसन टू द क्रिटिक ऑफ हेगेल्स फिलॉस्फी ऑफ राइट' में लिखते हैं, "धर्म हृदयविहीन परिस्थितियों का हृदय है, आत्माविहीन दुनिया की आत्मा है और पीड़ित की राहत, धर्म लोगों की अफीम है." चूंकि धर्म राहत का भ्रम देता है इसलिए लोगों की अफीम है. धर्म मनुष्य की वेदना और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है। धर्म मनुष्य को शक्ति का भ्रम देता है वास्तविक शक्ति नहीं;('जिसका कोई नहीं, उसका खुदा है यारों') धर्म सुख का भ्रम देता है , वास्तविक सुख नहीं ,जो सामाजिक परिवर्तन से आता है। इसलिए वे परिस्तिथियाँ बदलना जरुरी है जिनमे मनुष्य भ्रमात्मक सुख में भूला रहता है। हम धर्म नहीं खत्म करना चाहते बल्कि उन परिस्थितियों को, जिनसे धर्म की जरूरत होती है. लोगों को वास्तविक सुख मिलेगा तो भ्रम की जरूरत नहीं रहेगी और वह अनावश्यक हो जाएगा. घर में खाने को नहीं है मगर 2-3 घंटे कीर्तन, भजन, धर्मकथा सुनकर; दिन में कई नमाज पढ़कर; नवरात्र या रमजान भर ब्रत रखकर उसे लगता है वह सुखी है। यह सुख का भ्रम है। वास्तविक सुख जीवन की हालत में सुधार से आता है जिसके लिए संघर्ष करना चाहिए। शोषक वर्ग आदमी को धर्म के सुख के मायाजाल में उलझाये रखता है , ताकि वह वास्तविक सुख के लिए संघर्ष न करे। इस से शोषकों के हितो की हानि होती है। आप देखते है सारे धार्मिक अनुष्ठान तथा मंदिर निर्माण बड़े-बड़े फरेबी बाबा, अरबों-खरबों में खेलने वाले नेता, दलाल, पूंजीपति, मुनाफाखोर ,कालाबाजारी , जमाखोर , शोषक कराते है। ये आम आदमी को निष्क्रिय और मुर्ख बनाते है.

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