Wednesday, August 24, 2016

क्षणिकाएं 59 (801-810)

801
आवारगी की ज़िंदगी भी अजीब है
जरूरत नहीं होती संभलकर चलने की
बेपरवाही-ए-अंजाम भी कमाल है
खुद-ब-खुद आ जाता है 
जज़्बा-ए-जुर्रत बगागावत का
सपने देखतेै रहे हसीन दुनिया की
कदम पड़ते रहे राह बनती गयी
ठोकर खाते रहे हिम्मत बढ़ती गयी
लड़खड़ाते रहे और गिरते रहे
मगर लड़ते रहे और बढ़ते रहे
लड़ते रहे पढ़ने के लिए 
और पढ़ते रहे ज़ुल्म से लड़ने के लिए
चलते रहे और गिरते रहे
उठते रहे फिर चलते रहे
कटते रहे  और मुस्कराते रहे
मरते रहे और जीते रहे
उठते रहे और लड़ते रहे
बढ़ते रहे और कटते रहे 
मुड़कर मगर पीछे देखा नहीं.
(ईमिः25.07.2016)
802
न करना गिला जख़्मों का है रीतकाल की बात
होती थी औरत जब हुस्न के जलवे की सौगात
तोड़ दिया जब तुमने हुस्न के जलवे का पिंजरा
बंद करो ज़ख़्म सहने का सिलसिला बेशिकवा
जख़्म के बदले जख्म नहीं है उचित विचार
जख़्म दुखते रहेंगेे हो न अगर उनका प्रतिकार
होता नहीं तजुर्बा जिनका जख़्म खाने का
रंज नहीं होता उन्हें औरों को जख़्म देने का
माना कि खंजर का जवाब नहीं है खंजर
ढाल उठाना तो वाजिब है मगर
आ जाएगा इससे ख़ंज़र पे जो थोड़ा सा ख़म
इसका ही होगा उनको बहुत भारी ग़म
जख़्म के बदले गम है अच्छा प्रतिकार
आये शायद इससे उनमें रंज़ का विचार
(ईमि: 02,08.2016)
803
लौटना ही है तो थोड़ और ठहर जाओ
यादों की गठरी में थोड़ा भार तो हो
हा हा
(ईमि: 04.08.2016)
804

शाम लगती है मयखाने का एकांत
जाम छलकाते हुए अपने ही नाम
कहने का मतलब
खुद के साथ पीने में भी मजा आता है
(ईमि:8 04.08.2016)
805
परवाह क्यों करते हो किसी भी बात की
छोटी हो या बड़ी
तुमने तो पार किए हैं तकलीफ के उमड़ते समंदर
जज्बातों के दुस्साहस से
हा हा
(ईमिः 04.08.2016)
806
तफसील से पढ़ना पड़ता है तुम्हारी किताब
लफ्ज-दर-लफ्ज़
कहीं कोई हर्फ-ए-सदाकत छूट न जाये
ऐसे में जब
बाइजाजत इबादत लिखने लगे हों दानिशमंदों के कलम
चंद बगावती कलमअच्छे लगते हैं
आदत है जिनकी बेइजाजत बेबाकी की
ऐसे में जब
सौ साल जीने की ख़ाहिस करें नामवर लोग
पाकर अपसंस्कृति मंत्री से उपमा
बेकार बूढ़े बैल की
लिखता रहे तुम्हारा कलम हर्फ-ए-बगावत
बेख़ौफ, बेइज़ाज़त, बेबाक
(ईमिः04.08.2016)
807
न चौंकने की मजाल का उठता नहीं सवाल
नई बात से चौंकने का नहीं है मेरा मिजाज
हर लम्हा कमाल करना है ज़िंदगी की फितरत
रखती है जो खुदी के नित नये अन्वेषण की हशरत
इससे चौकते हैं यथास्थितिवादी अभागे लोग
होता जिन्हें विरासती भक्तिभाव का असाध्य रोग
बताता है इतिहास पर एक वैज्ञानिक दृष्टिपात
होता नहीं परिवर्तन के सिवा कोई और स्थिरांक
(ईमि: 14.08.2016)
808

इरोम शर्मीला के नाम

सुनो साथी इरोम!
मैं मिला नहीं कभी तुमसे
मगर समानुभूति है तुमसे
एक साथी इंसान के नाते
इंसानियत के साझे सरोकार के नाते
जानता हूं तुम्हारी जंग के बारे में
अपनी जमीन पर फौजी हुकूमत के खिलाफ
हत्या और बलात्कार के रिवाज के खिलाफ
तब से जब सुना था पहली बार
एक अकेली युवती की
विशाल सेना के विरुद्ध बुलंद ललकार

16 साल निराहार लड़ती रही
तुम्हे पता ही नहीं चला
कि तुम्हारी हाड़-मांस की काया
कब बुत बन गई
और आराध्य की तलाश में भटकते पंथ को
एक आराध्य देवी मिल गयी
तुम जानती ही हो बुतों पर चढ़ावे का रिवाज
फूलते-फूलते रहे कई मुल्ले-पुजारी
बनी रही जब तक तुम आराध्य मूर्ति
बढ़ती रही भक्तों की तादात देश-विदेश में
लेकिन मैं तो नास्तिक हूं
तन से तो नहीं मन से तुम्हारे साथ था
सलाम करता था
नाइंसाफी को ललकारने के
तुम्हारे तुम्हारे जज्बे को
हैरत होती थी
हृदयहीन हुकूमत में संवेदना जगाने की
तुम्हारी जुर्रत पर
खुश होता था
असंभव पर निशाना साधने की
तुम्हारी फितरत पर
जब तुम बुतपरस्तों की आराध्य थी
बुत को इंसान बनते देख
टूटने लगा भक्ति का नशा
किनारा कर लिया भक्तों ने
समझकर कोई प्रेतात्मा

और अब भी हूं साथी इंसान के नाते
इंसानियत के साझे सरोकार के नाते
तुम्हारे हाड़-मांस के इंसान होने के अधिकार के साथ
हर इंसान की तरह तुम्हारे प्यार करने के अधिकार के साथ
चुनाव से निज़ाम बदलने की खुशफहमी के अधिकार के साथ
इंसानियत के साझे सरोकार के नाते

सुनो शर्मीला!
हैरत में मत पड़ो पाकर खुद को अकेला
लड़ती रहो बढ़ती रहो
हम वाहक हैं अपनी गौरवशाली परंपराओं के
ढोते हैं बोझ पूर्वजों की पीढ़ियों की लाशों की
सनातनी कर्तव्यबोध के साथ
हम मुर्दापररस्त हैं
करते हैं बुतों की पूजा
पत्थर में प्राणप्रतिष्ठा
लेकिन जैसे ही बुत में आ जाती है सचमुच की जान
बन जाता है बुत सचमच का इंसान
भागता है भक्त समझकर उसे प्रेतात्मा
भटकता है इंसान भूतों की तरह
भटकाव बेहतर है मिथ्या स्पष्टता से
मैं नास्तिक हूं मैं
भटकते हुए तुम्हारी तलाश-ए-राह से
समानुभूति के साथ तुम्हारे साथ हूं
इंसानियत के साझे सरोकार के नाते
(ईमि: 15.08.2016)
809
सीरिया में रूसी मिसाइल हमले में बच गये बच्चे की तस्वीर पर टिप्पणी:

इस बच्चे का जुर्म है कि पैदा हुआ सीरिया में
खेल रहे हैं जहां नर आखेट दुनिया के दो महाबली
छिप कर करते हैं वार अपने अपने कारिंदों के दुश्मनों पर
फेकते हैं दूर से ही मिसाइल
मारते हैं बच्चे होते नहीं जो दुश्मन किसी के
बच गया यह बच्चा बड़ा होगा
बच गये और बच्चों के साथ खड़ा होगा
इस बच्चे का जुर्म है कि पैदा हुआ इस धरती पर
दूषित हो चुकी है जो बम-गोलों के जखीरे से
और उन्नति का प्रतीक है नर आखेट का खेल
गर चाहते हैं ये बच्चे बचपन में ही न मरें
खेलते-किलकारते पढ़ें-बढ़ें
खत्म करना होगा
नर आखेट का सिलसिला
ध्वस्त करना होगा
युद्धोंमाद की बुनियाद पर खड़ा सभ्यता का किला
(ईमि: 19.08.2016)
810
क्या नहीं कर सकती है औरत?
सरला माहेश्वरी, गीता गैरोला, महाश्वेता बन सकती है औरत
लॉरा ज़ेटकिन, रोज़ालक्ज़ंबर्ग बन सकती हेै औरत
औरत की परिभाषा बदल रही है औरत
तोड़कर हुस्न के ज़लवे का पिज़ड़ा
पाजेबों की बेड़ियां और कंगनों की हथकड़ियां
अंतरिक्ष नाप सकती है औरत
फौजी बर्बरता के विरुद्ध इरोम शर्मीला बन सकती है औरत
कलम को औजार-ओ-हथियार बना सकती है औरत
बंदूक से कायम ग़ुलामी के खिलाफ बंदूक उठा सकती है औरत
सफेद को स्याह और स्याह को सफेद कर सकती है औरत
चाय के प्याले में तूफान खड़ा कर सकती है औरत
छोड़कर पीठ देना हवा को
हवा का रुख़ बदल सकती है औरत
ध्वस्त कर मर्दवाद का किला
इंसानियत को मुक्त कर सकती है औरत
(ईमि: 24,08.2016)

(बस यूं ही, सुबह सुबह कलम आवारा हो गया)

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