Sunday, August 31, 2014

डर डर कर नहीं जियी जाती ज़िंदगी

म“यह बात” मैं पहले कह चुका हूं, लेकिन ब्लॉग में किस नाम से सेब किया है और कब, याद  नहीं और  खोजने में वक़्त लगेगा. और वर्ड फाइल्स दुर्घटना की शिकार हो गई. कारणों, कारकों आदि के विवरण से भूमिका लम्बी हो जायेगी. शाफ्ट वेयर इंजीनियर मलवे से अवशेष निकालने की कोशिस में लगे हैं. “यह बात” वाली कविता किसी खास संदर्भ में फेस्बुक की एक पोस्ट पर कमेंट के रूप में पोस्ट करने का मन हुआ. खोजने की जहमतों के वर्गीकरण और विश्लेषण से भूमिका और लम्बी हो जायेगी. आखिर “यह बात” है क्या? क्यों कविता का विषय बनी? और मैंने जो लिखा था और जो याद नहीं, कविता है या नहीं आदि की संक्षिप्त चर्चा भी से भूमिका इतनी लंबी हो जायेगी कि कथ्य अदृश्य हो जायेगा. तो सीधे मुद्दे पर बात करते हैं (अब तक?). “यह बात” है डर, जिसके सहारे शासक, शासितों को शोषित होते रहने के लिये “राजी” करती है.

उपरोक्त पैराग्राफ लफ्फाजी का एक छोटा सा नमूना है -- जहाँ कुछ भी कहने की जरूरत न हो वहाँ “कुछ न कहने” के अंदाज़ में इतना कुछ कह जाना.

डर डर कर नहीं जियी जाती ज़िंदगी
डर डर कर नहीं जियी जाती ज़िंदगी
डर में जीने वाले लोग
जीने मे मरते हैं बार बार, दर-असल
धीरे धीरे मंद गति से
किसी पुरानी रुमानी फिल्म के निराश नायक की तरह.
नामुमकिन की ही तरह
डर भी एक सैद्धांतिक अवधारणा है
शासन का मूलमंत्र है
शासक की शासित के शोषण की साधना है
जब से आय पूंजी की दुनिया में भूमंडलीकरण का दौर
डर बन गया आवारा पूंजी का स्थायी ठौर
डर मौत का ही नहीं मौत के बाद का भी
बंद हो जाते हैं जीवन बीमाओं के निगमों में
मौत ही इकलौता अंतिम सत्य है
जिसका वक़्त अनिश्चित है
लेकिन ज़िंदगी तो इक सुंदर ज़िंदा सच्चाई है
मक्सद है जीना इक खूबसूरत ज़िदगी
जी जा सकती है जो हो निडर
डर डर कर जियी नहीं जाती ज़िंदगी
खिंचती है वह मौत के इंजार में.
(ईमिः31.08.2014)
तानाशाह 1
तानाशाह हर बात से डरता है
अपने पाप से डरता है
अपने आप से डरता है
हमारे गीतों से डरता है
अपने भीतों से डरता है
कायर कुत्तों की तरह 
झुंड में शेर हो जाता है
पत्थर उठाने के नाटक से ही 
दुम दबाकर भाग जाता 

तानाशाह 2
वह निकलता नहीं बाहर
हथियार बंद बंद मानव मशीनों के सुरक्षा कवच से
वह डरता है इस बात से कि मशीनें सोचने न लगें
अौर बदल जाय बंदूक की नली का रुख़
डरता है ज्ञान की शक्ति से
जला देता है लाइब्रेरी
वह डरता है इतिहास से
विकृत करता है उसे गल्प-पुराणों के महिमा मंडन से
वंचित करता है नई पीढ़ियों को उनके इतिहास से
लेकिन हर अगली पीढ़ी तेजतर होती है
तोड़ देती है तानाशाह की कुचेष्टा का मकड़जाल
इन विघ्नों के बावजूद नया इतिहास रचती है
तानाशाह का मर्शिया लिखती है
डरता है तानाशाह नई पीढ़ियों से
निर्बल बनाता है उन्हें कुशिक्षा अौर कुज्ञान से
लेकिन हर अगली पीढ़ी तेजतर होती है
अागे ही निकलती है 
तोड़कर कुज्ञान अौर कुशिक्षा के सारे ब्यूह 
मटियामेट हो जाता है तानाशाह
                             जागता है जब अौर जागता ही है अावाम का ज़मीर                          
(ईमिः30.08.2014)

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