Wednesday, August 15, 2012

लल्ला पुराण २८



मित्रों, इस मंच पर कभी विआद हुआ था कि एक व्यक्ति एक दिन में कितनी पोस्ट डाल सकता है, यह मेरी तीसरी पोस्ट है. लेकिन बहुत दिनों बाद मंच पर आया हूँ और आगे भी वास्तविक दुनिया की व्यस्तताओं के चलते कम समय दे पाऊंगा. इ.वि. छात्रसंघ भवन के सभागार में ३७ साल बोलने का उत्साह और उल्लास था. लेकिन पहुंचते ही उल्लास अक़धा हो गया. भगत सिंह सिर्फ अंग्रेजी शोषण- दमन को नहीं बल्कि देशी शोषण दमन को भी खत्म करना चाहते थे. सभागार में� गांधी की तस्वीर के बाएं भगत सिंह की तस्वीर थी और दाहिने सुभाष बोस की तस्वीर थी. भगत सिंह की जगह राजीव गांधी विराजमान हैं और नेता जी की जगह खाली. शासक वर्गों को क्रांतिकारियों के विचारों से तो भय लगता है लेकिन विचारों से वे इतने खौफज़दा हैं कि उनकी तस्वीरों से भी उन्हें भय लगने लगा है. परिसर की परिक्रमा और कुछ शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं से बात-चीत के बाद इस मंच के कुछ सदस्यों के बौद्धिक स्तर पर मेरा आश्चर्य काफी कम हो गया.

एक और पोस्ट न डालनी पड़े इसलिए लगे हाथ एक बात और कह दूं और इसे मेरा अहंकार नहीं बल्कि मर्यादित स्वीकारोक्ति समझा जाये. कुछ लोगों को गुरेज है कि उनके सवालों का उत्तर नहीं देता, न उत्तर देना भी उत्तर है. मेरी मित्रता के लिए पात्रता की आवश्यकता होती है और शत्रुता के लिए भी. मित्रता की पात्रता कोई भी अर्जित कर सकता है. जैसे सम्मान अर्जित किया जाता है वैसे ही मित्रता भी. मेरी शत्रुता सीधे बराक ओबामा से है इसलिए उसके छोटे-मोटे संस्करण शत्रुता की खुशफ़ह्मी पाल सकते हैं. मित्रता और शत्रुता की ही तरह मुझसे बात चीट की पात्रता की आवश्यकता होती है जिसे अर्जित नहीं खोना पड़ता है, जो यह पात्रता खो देते हैं उनके वजूद का मैं संज्ञान नहीं लेता. खोने के बाद पात्रता अर्जित करनी पड़ती है.

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