Sunday, August 26, 2012

दमन विरोधी सम्मलेन



दमन विरोधी सम्मलेन
ईश मिश्र

बहुत ऊंची हैं तुम्हारे जेल की चहारदीवारियाँ
हमा आवाज की बुलंदियों से फिर भी कमतर हैं
कौन कहता है पस्त हो गए हौसले हमारे
अभी तो नाव मझधार में पडी है
हम तो माझी हैंसंभाल लिया है पतवार हमने
बस हवा का रूख  बदलने की तनिक देर जो बाकी है.
(जेल में लिखी विश्वविजय की कविता)

11 अगस्त 2012 को सरकारी दमन के विरुद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र-संघ भवन के सभागार में कई जनसंगठनों -- पीयूसीएल; जनहस्तक्षेप; जन संस्कृतिक मंच; अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा आदि -- एवं सीपीआई(माले) न्यू डेमोक्रेसी एवं सीपीआई(माले) लिबरेसन तथा कई ट्रेड-यूनियनों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, दमन-विरोधी सम्मलेन में “अघोषित आपात काल” एवं यूएपीए, आईपीसी धारा १२४-ए, यूपी गैंगेस्टर ऐक्ट आदि काले कानूनों की समवेत स्वर से भर्त्सना करते हुए, इन कानूनों के तहत जेलों में बंद राजनैतिक बंदियों की अविलम्ब रिहाई की मांग की गयी. प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए, वयोवृद्ध न्यायमूर्ति (सेवान्निवृत्त) रामबल्लभ मल्होत्रा ने इन कानूनों को औपनिवेशिक और जनविरोधी बतायाप्रतीत. सम्मलेन के दौरान न्यायमूर्ति मल्होत्रा के नेतृत्व में प्रतीकात्मक विरोध स्वरुप इन काले कानूनों की प्रतियां जलाई गयीं.

जनतांत्रिक अधिकारों पर सरकारी दमन के इस सम्मेलन का आयोजन मूलतः माओवादी साहित्य रखने के आरोप में निचली अदालत द्वारा पत्रकार एवं उ.प्र. पीयूसीएल की संगठन सचिव, सीमा आज़ाद और उनके पति, मानवाधिकार कार्यकर्ता विश्व विजय को सजा सुनाये जाने के विशेष सन्दर्भ ‘अघोषित आपात काल’ पर बहस एवं इसके विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए लिया गया था. इसी दौरान इन दोनों को उच्च न्यायालय से जमानत मिल गयी. सम्मलेन में इनकी उपस्थिति ने विमर्श को और भी जीवंत बना दिया. इन्होने जनान्दोलनों और मानवाधिकारों के प्रति अपनी असंदिग्ध प्रतिबद्धता का इज़हार करते हुए बताया कि जेल की यातनाओं बने उनके इरादों को और भी मजबूत कर दिया है, तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र-संघ भवन का सभागार ‘लाल सलाम’ के क्रांतिकारी अभिवादन से गूँज उठा. और विश्वविजय ने जब उपरोक्त कविता सुनाया तो लाल सलाम की जगह ‘इन्किलाब जिंदाबाद’ के नारों ने ले ली. अभी वक्ताओं ने मौजूदा दौर को अघोषित आपात काल बताया और घोषित आपात काल से ज्यादा खतरनाक है. सम्मेलम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों की नगण्य उपस्थिति से शहरी बुद्धिजीवियों के जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरोकार के स्तर को लेकर चिंता अस्वाभाविक थी क्यों कि अघोषित आपात काल और उसके असाधारण काले कानूनों के निशाने पर सिर्फ गरीब, मजदूर, किसान, आदिवासी और उनके अधिकारों के हिमायती चंद मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और जनतांत्रिक बुद्धिजीवी हैं, जब कि घोषित आपात काल में निशाने पर मध्य-वर्ग  और शासक वर्गों के भी कुछ टपके थे. इस सम्मलेन की खास बात इन्किलाब जिंदाबाद के नारों के साथ पहुंचे २०० से किसान-मजदूर स्त्री-पुरुषों की भागीदारी थी. कुछ किसान-मजदूरों के भाषण में और गीतों से झलकती भूमंडलीकरण के आर्थिक-सांस्कृतिक खतरों की समझ गौर-तलब थी. यह भी गौर तलब था कि यमुना घाटी के दूर दराज गावों से आये इन किसानो-मजदूरों के प्रतिबद्ध, जुझारू संघर्षों ने सैंड माइनिंग माफिया और भूमि माफिया की सत्ता से मिलीभगत को बेनकाब और नाकाम कर दिया है. इन आन्दोलनों के लगभग सभी प्रमुख कार्यकर्त्ताओं पर बहुत सारे फर्जी मुक़दमे दायर हैं. सम्मलेन ने एकमत से इस तरह की दमनकारी कार्रवाइयों की निंदा करते हुए सरकार से सभी फर्जी मुकदमें वापस लेने की मांग किया. 

 सेवा-निवृत्त न्यायमूर्ति राम बल्लभ मल्होत्राओ.डी.सिंह सिंह इतिहासकार प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा जैसे बुजुर्गों की सक्रियताजोश और युवकों में घुल-मिलकर उनका मार्ग दर्शन करते देखना प्रेरणादायी था. वर्मा जी ने दमन और दमनकारी कानूनों की सटीक व्याख्या की कि दमन की जड़ शोषण है इस  दमन-विरोधी संघर्ष को शोषण-विरोधी संघर्ष से जोड़ने की आवश्यकता है. इसलिए शोषण और लूट के विरुद्ध जहाँ भी संघर्ष हो रहे हैं हमें उनका समर्थन करना चाहिए चाहें वह ग्रीस में होस्पेन में या कलिंग नगरमानेसरनारायण पटनानियामगिरीजगतसिंघपुरदेवरिया, .... जहाँ भी किसान/मजदूर/आदिवासी और दलित अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं हमें उनका समर्थन करना चाहिए. इन्ही वर्गों में क्रांतिकारी संभावनाएं हैं. छात्रों की मुखर उपस्थिति नई पीढ़ियों में क्रांतिकारी संभावनाओं की परिचायक है.  

सम्मलेन को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पीयूसीएल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, रविकिरण जैन ने देश के क़ानून व्यवस्था को औपनिवेशिक शासन की विरासत बताते हुए कहा कि अदालतें आज़ादी और अधिकारों के तर्क बिना सुने ही अर्जियां खारिज कर देती हैं. गौरतलब है कि रविकिरण जैन सीमा आज़ाद और विश्वविजय के मुकदमें में उनके वकील हैं और उनके अथक प्रयासों से ही इन्हें जमानत मिली. प्रथम सत्र का संचालन करते हुए पीयूसीएल के उत्तर प्रदेश प्रदेशाध्यक्ष श्री चितरंजन सिंह ने दमन-विरोधी अभियान को  व्यापक बनाने औत तेज करने पर जोर दिया. जनहस्तक्षेप – फासीवादी मंसूबों के विरुद्ध अभियान – की तरफ से सम्मलेन में हिस्सेदारी करते हुए इन पंक्तियों के लखक ने भूमंडलीकरण के मौजूदा दौर में पूंजी के भूमण्डलीय चरित्र को रेखांकित करते हुए शोषण-दमन के मौजूदा दौर की तुलना यूरोप में पूजनी के तथा कथित आदिम संचय से करते हुए, कहा कारपोरेट के मुनाफे लिए किसानों-आदिवासियों के विस्थापन और दमन; सामन्ती और माफिया गुंडागर्दी; गुन्डाबल के बलबूते बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मजदूरों का शोषण पूंजी के तिजारती युग की याद दिलाता है जब यूरोप में तिजारती पूंजी के मुनाफे के लिए किसानों के गाँव के गाँव उजाड दिए गये थे और सस्ते में जबरन काम कराने के तमाम काले क़ानून बना दिए गये थे. जिस तरह अमेरिका में १७५० के दशक में मैकार्थीवाद के तहत वित्तीय पूंजी के हित में साम्य्वाद का हौव्वा खड़ा करके  किसी भी विरोध को दबाया जा रहा था और जनतांत्रिक अधिकारों के हनन के लिए तमाम काले क़ानून बनाए जा रहे थे, कुछ वैसा ही भारत के मौजूदा शासक साम्राज्यवादी, भूमण्डलीय पूंजी की सेवा में नाक्सालवाद का हौव्वा खड़ा करके कर रहे हैं.

जाने-माने गांधीवादी कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार ने नक्सलवाद के नाम पर छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के दमन का आँखों देखा मार्मिक वर्णन करते हुए एक दीर्घकालीन दमन विरोधी संयुक्त मंच के गठन पर जोर दिया. सीपीआई(माले) – न्यू डेमोक्रेसी के उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव डाक्टर आशीष मित्तल ने कारपोरेट घरानों की अबाधित लूट के पक्ष में सरकारी नीतियों के चर्चा करते हुए देश के संसाधनों एअवं फुटकर बाज़ार समेत अर्थतंत्र  के सभी क्षेत्र को भूमण्डलीय पूंजी के हवाले करने पर चिंता जाहिर किया. डाक्टर मित्तल, जो इलाहाबाद और कौशाम्बी जिलों में किसान-मजदूर संगठन के नेतृत्व में जारी बालू खनन अधिकार के जुझारू संघर्ष के मार्गदर्शक हैं.   यमुना घाटी के बालू संघर्ष की चर्चा करते हुए कन्होने कहा कि जनता के माफिया विरोध से सरकार इतनी भयभीत है कि  पूरे इलाके में जनसभाएं नहीं होने देती और हर विरोध प्रदर्शन पर कार्यकर्त्ताओं पर झूठे मुकदमें दर्ज कर देती है. सम्मलेन को जसम के सचिव, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी साहित्य के प्रोफ़ेसर प्रणय कृष्ण, साहित्यकार शेखर जोशी, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता प्रशांत राही, मेगासेसे परस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डेय एवं ज्यां देरेज एवं अन्य वक्ताओं ने भी दमन विरोधी अन्दोलान को व्यापक बनाने पर जोर दिया. ट्रेड यूनियन नेता डाक्टर कमल उसरी ने सरकारी दमन के विरुद्ध औद्योगिक ट्रेड यूनियनों तथा किसानों और खेत-मजदूरों की एकता और उके बीच समन्वय पर जोर दिया. बुजुर्ग नेता कामरेड ओ.डी. सिंह ने अपने जोशीले भाषण में कारपोरेटी पूंजी की सेवा में सरकार की  की दमनकारी नीतियों के खिलाफ व्यापक जनांदोलन की भविष्यवाणी की.

सम्मलेन का समापन एक अखिल भारतीय दमन विरोधी मंच के गठन के निर्णय के साथ हुआ. सम्मलेन में, सर्वसम्मति से छत्तीसगढ़ की बीजापुर जिले में सीआरपीएफ और कोबरा बलों द्वारा में १७ निर्दोष आदिवासियों की नृशंस हत्या की निंदा और आपरेसन ग्रीन हंट को समाप्त करने के प्रस्ताव पारित हुए. सर्वसम्मति से पारित एक अन्य प्रस्ताव में मारुती उद्योग में हल के पूरे घटनाक्रम की न्यायिक जांच; आंदोलनकारी मजदूरों की अविलम्ब रिहाई, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मजदूरों के ट्रेड यूनिय के अधिकार एवं श्रम कानूनों को लागू करने की मांग के साथ मारुती उद्योग के संघर्षरत मजदूरों के साथ एकजुटता दिखाई गयी.       

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