Monday, August 20, 2012

चौथी सदी ईशा पूर्व



चौथी सदी  ईशा पूर्व
ईश मिश्र 

बात है यह बहुत पुरानी  
चौथी शताब्दी ईशा-पूर्व की 
अफलातून के आदर्श राज्य में 
सुकरात ने एक नई तक़रीर की
पूरा यूनान हो गया था हक्का-बक्का
सुन उस दार्शनिक के शब्दों का धमाका
भला-बुरा कहा उसने मर्दवादी समाज को
ढक रखा था जिसने सर्जना के आधे आकाश को 
सुकरात ने खुले आम  ऐलान किया
नारी-प्रतिभा का खुलकर गुणगान किया
लड़कों की ही तरह लडकियां भी जायेंगी स्कूल
करेंगी व्यायाम और पाएंगी शिक्षा माकूल
नहीं रहेगी कैद घर में अब नारी
 न कूँटेगी धान न भरेगी पानी
हो सवार घोड़े पर रखायेगी राजधानी
होगी जो सयानी ज्यादा, बनेगी दार्शनिक रानी
इस अनूठी बात से सबको बहुत हुई हैरानी
मर्दों की तरह लंगोट में नारी करे व्यायाम
टूट जायेंगे सभ्यता के कई सारे आयाम
सुकरात ने तर्कों से उन सबको ललकारा 
नारी को कम आंकने के लिए काफी फटकारा
कहा कराने को नीयत-ओ-नज़र का उपचार
देखते ही नारी-देह टपके न मुंह से लार
फिर समझाया प्यार से मानवता का सार
जीवविज्ञान होता नहीं प्रतिभा का आधार
कोइ भी नई बात है असहज लगती ही
अहम् है ऐसे में आदत तन-मन के आँखों की
हिमायत की उन्होंने सामान अवसर की महज   
कहा, आदत से दिखने लगेगा सब सहज
हर औरत दार्शनिक रानी है, यह नहीं कहा
मगर मौक़ा देने से ही चलेगा इसका पता
और भी बहुत कुछ कहता है अफलातून का सुकरात
जरूरी नहीं है सही ही हो उसकी हर नई बात
  
भीड़तंत्र के पीर ने लगाया उनपर नास्तिकता का आरोप
काजियों के भी दिमाग पर छा गए कुतर्क के बादल घटाटोप
कुतर्क के बहुमत ने घोषित कर दिया सुकरात को पागल
सत्य की खोज में उनको पीना पड़ा गरल   

सुकरात अपने वक़्त से ढाई हजार साल आगे थे
उनको न समझने वाले एथेन्सवासी अभागे थे
समझ लिया था उनने तभी नारी प्रतिभा का  प्राकार
ले रही है इक्कीसवीं सदी में जो ठोस आकार
पहनेगी कपड़े जन्चेंगे जैसे उसे जब
नहीं मानेगी तुम्हारे कोई भी निर्देश और तलब
दो जवाब अब उसके तर्कों का
नहीं मानेगी वह अब आदेश परंपरा के कुतर्कों का

२० जुलाई २०१२


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