Sunday, January 3, 2021

मार्क्सवाद 233 (किसान आंदोलन)

 इस शताब्दी का यह (किसान आंदोलन) दूसरा व्यापक प्रभाव वाला परिवर्तनकारी आंदोलन है, पहला एंटी सीएए (शाहीनबाग) आंदोलन था जिसे बहुत शातिराना ढंग से, दंगे के प्रायोजन तथा महामारी के बहाने दबा दिया। किसानों के लिए भी सरकार ने बहुत चतुराई से बातचीत का जाल बिछाया है बिजली के बिल की बढ़ोत्तरी और पुआल जलाने पर दंड की माफी कर दिया कहेंगे कि आधी मांगे मान लिया। संघी बहुत शातिर हैं। इस आंदोलन के बारे में बहुत सही सवाल पूछा है तुमने हम सबको इन पर विचार करना चाहिए मुझे तो इस आंदोलन में क्रांतिकारी संभावनाएं दिख रही हैं, देखें यह कहां जाता है। सरकार इसे लंबा खिंचने दे कर थकाना चाहती है। लेकिन लगता नहीं किसान थककर हारेंगे वे लंबी लड़ाई के लिए दृढ़संकल्प दिखते हैं। लड़ाई छोटे किसानों और खेत मजदूरों तक पहुंच गयी है। कानूनों की तपिस देश के हर हिस्से के किसान महसूस कर रहे है इसलिए अब किसान नेताओं और संगठनों के पास आर-पार की लड़ाई के अलावा कोई रास्ता नहीं है। सरकार के पास भी कानूनों को वापस लेने का विकल्प नहीं बचा है क्योंकि वह 2015 में विश्वबैंक के 1995 के गैट्स मसौदे पर अंगूठा लगा चुकी है। जब वायदा किया है तो निभाना पड़ेगा। मोदी सरकार की औकात नहीं है कि साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी के साथ वायदाखिलाफी कर सकें। भूमंडलीकरण के युग में पूंजी भूमंडलीय हो गयी है यह न तो श्रोत को मामले में न ही निवेश के मामले में भू-केंद्रित (राष्ट्रीय) रह गयी है। (It is no more geo-centric either in terms of source or investment)। विश्व बैंक ने 1995 में गैट्स (General Agreement on trades and services) में कृषि और शिक्षा के कॉरपोरेटीकरण शामिल किया है। मनमोहन सरकार भी इस पर अंगूठा लगाना चाहती थी लेकिन लोक-लिहाज में टालमटोल करती रही और चली गयी। गौरतलब है कि साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी के सरगना बराक ओबामा ने 2013-14 में मनमोहन पर मुस्तैदी से आर्थिक सुधार न लागू करने की तोहमत लगाया था। 'नया राजनैतिक अर्थशास्त्र' नाम विश्वबैंक का एक पालतू समूह है जिनका काम है तीसरी दुनिया के देशों में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ( Structural Adjustment Program) लागू करवाना है तथा जिनका मानना है कि यह काम लोगों के लिए बहुत कष्टकारी होगा और लोग विरोध करेंगे तो ऐसी सरकार चाहिए जो विरोध का निर्मम दमन कर सके। दमनकारी सरकार की विश्वसनीयता घटेगी तो सरकार में अपने दूसरे कारिंदे बैठा दो जो सारी गड़बड़ियों की जिम्मेदारी पिछली सरकार पर डालकर कार्यक्रम जारी रखे। मनमोहन को हटाकर मोदी फिर मोदी को हटाकर दूसरा कारिंदा। इस क्रम को क्रांतिकारी आंदोलनों से ही रोका जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह किसान आंदोलन नई क्रांति की शुरुआत साबित हो। समाज के प्रमुख (आर्थिक) अंतरविरोध की धार कुंद करने के लिए शासक वर्ग अपने आंतरिक, बनावटी अंतरविरोध को अतिरंजित कर उछालते हैं। भारत में दुर्भाग्य से भूमंडलीय पूंजी के दो प्रतिस्पर्धी वफादार पार्टियों (भाजपा और कांग्रेस) का अंतरविरोध मुख्य राजनैतिक अंकरविरोध बन गया है। जरूरत सामाजिक चेतना के जनवादीकरण तथा क्रातिकारी ताकतों को मजबूती देने और लामबंद करने की है। किसान आंदोलन को जयभीम लाल सलाम।

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