Thursday, January 28, 2021

मार्क्सवाद 240 (किसान आंदोलन)

 कल 63 दिनों के शांतिपूर्ण आंदोलन को अशांत करने वाले तलवार भांजने वाले भी, इस पोस्ट के लेखक की तरह जाने-अनजाने बल-छल से आंदोलन को तोड़ने की सरकारी साजिश के मुहरे बन, खेती के कॉरपोरेटी कानूनों का समर्थन कर, धनपशुओं की दलाली कर रहे हैं। दीप सिंह संधू जैसे भाजपाई अपने हजारों समर्थकों के साथ दिल्ली पुलिस की रेख-देख में लालकिले में कैसे पहुंचे? अभी तक उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? पुलिस पहले ही कह रही थी कि कुछ अराजक-असामाजिक तत्व किसानों में घुसकर उपद्रव मचा सकते हैं तो उसका द्यान क्यों नहीं रखा? कानून व्यवस्था की असफलता के लिए गृहमंत्री इस्तीफा क्यों नहीं देता? 175 शहादतों के बावजूद 63 दिनों से शांतिपूर्ण चल रहे लाखों किसानों के आंदेलन के 1% कैसे उपद्रवी हो गया? तय रूट को तोड़ने वाले आंदोलन के दुश्मनों को पुलिस क्यों न रोक सकी? बहुत सवाल पूछे जाएंगे, जनता धीरे-धीरे साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी के कारिंदों की चालें समझ रही है। यह आंदोलन अब देश व्यापी जनांदोलन बन चुका है, इसमें दरारें डाल कर क्रांतिकारी किसानों को जेल में डालकर, उनकी हत्या करके झूमकर उट्ठे इस दरिया को अपने छल-बल के तिनकों से नहीं रोक सकेगी। जय किसान-जय जवान।


लाल किले पर झंडा फहराते अपना वीडियो वायरल करता दीप सिंह संधू कौन है? सोसल मीडिया पर मोदी के साथ उसकी तस्वीरें दिख रही हैं। कहा जा रहा है कि वह भाजपा उम्मीदवार सनी देवल के लोक सभा चुनाव का प्रमुख प्रचारक था। द्रोण द्वारा सुरक्षा निगरानी के बीच भारतीय सेना के अधिकार वाले लाल किले के अंदर प्रदर्शनकारी कैसे घुसे? कहीं यह दिल्ली पुलिस की मिलीभगत से किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन को बदनाम करने की साजिश तो नहीं?


जिस किसी भी ग्रुप ने समझौते का उल्लंघन कर दिल्ली में प्रवेश किया वे आंदोलन के दुश्मन हैं। आंदोलन जब तक शांतिपूर्ण था, सफल था। पुलिस ने भी आंदोलन तोड़ने के लिए अंधाधुंध लाठीचार्ज किया।


मुंबई के आजाद पार्क में नासिक से मार्च करके लगभग एक लाख किसान आजाद पार्क में कृषि कानूनों को चुनौती देने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। देश के किसानों का अपमान करते हुए महाराष्ट्रके राज्यपाल उनसे मिलने से बचने के लिए अपने कार्यालय से पलायन कर गए। 26 जनवरी को किसान गणतंत्र के उपलक्ष्य में दिल्ली में ट्रैक्टर परेड से एकजुटता दिखाने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में ट्रैक्टर परेड आयोजित करेंगे। राष्ट्रव्यापी जनांदोलन बन चुके किसान आंदोलन के 2 महीने होने वाले हैं, 140 आंदोलनकारी शहादत दे चुके हैं। सरकार कानून वापस न लेने पर अड़ी है क्योंकि वह विश्वबैंक से खेती के कॉरपोरेटीकरण से किसानों को बर्बाद करने का वायदा कर चुकी है। 1995 में विश्वबैंक ने खेती और शिक्षा को कॉरपोरेटों के हवाले करने के मकसद से क्रमशः व्यापारिक सेवा और सामग्री के रूप में गैट्स में शामिल किया। मनमोहन सरकार इस पर अंगूठा लगाने में हिल्ला-हवाला करते करते रहे, मोदी सरकार ने 2015 में इस पर अंगूठा लगा दिया। शिक्षा के कॉरपोरेटीकरण का वायदा पूरा करने के लिए नई शिक्षा नीति लाई गयी और खेती के कॉरपोरेटीकरण के लिए कृषि कानून। यह सरकार इन कानूनों को वापस नहीं ले सकती कितने भी आंदोलनकारी क्यों न शहीद हो जाएं क्योंकि साम्राज्यवादी भूमंडलीय पूंजी की पालतू इस सरकार की विश्वबैंक सो वायदाखिलाफी की औकात नहीं है। किसान भी आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखते हैं। आंदोलन का परिणाम जो भी हो, यह एक ऐतिहासिक आंदोलन है और यह गणतंत्र दिवस भी। क्रांतिकारी किसानों को क्रांतिकारी सलाम। इंकिलाब जिंदाबाद।

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