Thursday, September 13, 2018

शिक्षा और ज्ञान 168 (इतिहास और मिथक)

Shashi Kant Dubey ऊपर इतिहास का पुनर्मिथकीकरण लिंक का लेख पढ़ें उसमें बुद्ध और रामायण के कालों की चर्चा विस्तार से है। रामायण बुद्ध के 500-600 साल बाद की रचना है। बुद्ध शाक्य गणतंत्र (उत्तर वैदिक) के निवासी थे जो वैशाली के नेतृत्व में मगध राजतंत्र की सैनिक चुनौतियों से निपटने के लिए 12 गणतंत्रों के महासंघ का हिस्सा था। बुद्ध की बौद्धिक क्रांति ब्राह्मणवादी कर्मकांड तथा वर्णाश्रमी पाखंडों के विरुद्ध थी। दुर्भाग्य से वर्णाश्रमी वर्चस्व के निहित स्वार्थों के चलते हमारे पूर्वजों ने इतिहास के बदले देश-काल से परे पुराण रचे जिन्हें दैवीय मिथकों से आच्छादित कर दिया। मिथक से इतिहास समझने के लिए दैवीय आवरण को चीरकर उसका अमिथकीकरण करना पड़ता है। हमारा इतिहासबोध भी प्रतिगामी है, शिखर (सतयुग) से शुरू होकर अस्ताचल (कलियुग) तक जाता है, जब कि इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता, कभी कभी यू टर्न जरूर आते हैं, तभी तो हम पाषाण युग से साइबर युग तक पहुंचे हैं। हमारे मिथकीय इतिहासबोध का शिखर (सतयुग) भी ऐसा अमानवीय कि उसमें इंसानों के खरीद-फरोख्त की खुली बाजार थी, तभी तो हरिश्चंद्र गाय-भैंस की तरह अपने बीबी-बच्चे बेच सका। मैं पुरुखों को गाली नहीं दे रहा हूं आत्मालोचना कर रहा हूं, जो बौद्धिक विकास कू पूर्वशर्त है। हम, उनके वंशजों ने उन्हें पढ़े बिना, कही-सुनी के आधार पर अफवाहजन्य इतिहासबोध विकसित कर लिया। तथ्यपरक इतिहासबोध के लिए पढ़ना और चिंतन-मनन करना पड़ता है, पंजीरी खाकर भजन गाना नहीं। कुछ जरूरी काम है, अभी इतना ही। बाकी मेरा ब्लॉग पढ़ें। RADICAL, www.ishmishra.blogspot.com

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