Friday, November 1, 2013

संघी जहालत 1

संघी ज़ाहिल पढ़ने-लिखने में यकीन नहीं करते निक्कर खिसकने का डर रहता है, ये कमीने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की दलाली करते थे और उत्तरी ध्रुव के बिहार-उड़ीसा में बताने वाला जाहिल गुरु गोलवलकर हिटलर के अनुकरण की सलाह दे रहा था.बारंबार अंग्रेजों को माफीनामा  लिखने वाला सावरकर 1942 में अंग्रेजी सेना में भरती के लिए सभाएं कर रहा था, अटलबिहारी क्रांतिकारियों की मुखबिरी कर रहा था (इन दोनों बातों के दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं). कोई भी बात क्यों न हो रही हो यो ज़ाहिल कम्युनिस्ट-कम्युनिस्ट अभुआने लगते हैं, इन्हें किसी ओझा की शरण में जाना चाहिए. नरसंहार और हत्या के आयोजक अपराधी को ये देशद्रोही देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं. नरसिंह राव मनमोहन की तर्ज पर सत्ता में आने पर राष्ट्रीय संपदा बेचने का अभियान तेज कर देते हैं. 1996 में अटल 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बना एनरॉन को मुनाफे की काउंटर गारंटी देने का  लिए.

यही संघी जहालत है, यदि संघी फिरकापरस्ती की आलोचना कीजिए तो आपर मुसलमान हो गए. संघियों की ही तरह जमाती और लीगी भी जाहिल होते हैं, दोनो दर-असल जुड़वे भाई हैं. ये अपना साहित्य भी नहीं पढ़ते. ऊपर मैंने सावरकर, गोलवलकर औग अटल की गद्दारी की भी बात किया है, उससे लगता है आपकी सहमति है.

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