Thursday, March 12, 2020

मार्क्सवाद 204 (बुर्जुआ जनतंत्र)

हम (मार्क्सवादी) तो शुरू से ही इसे बुर्जुआ जनतंत्र कहते हैं जो सामंतवाद की तुलना में एक प्रगतिशील व्यवस्था है। भारत में चूंकि पूंजीवाद का विकास स्वतंत्र रूप से सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष से नहीं हुआ बल्कि सांतवाद के साथ गठबंधन में उपनिवेशवाद के हस्तक्षेप से हुआ, इसलिए यहां के पूंजीवाद और पूंजीवादी जनतंत्र का चरित्र अर्ध-सामंती और अर्ध-औपनिवेशिक है। ट्रंप और मोदी तो निमित्त मात्र हैं, असली शासक तो वाल-स्ट्रीट तथा अंबानी-अडानी हैं। शासक वर्ग पूंजीपति वर्ग है तथा जैसा कि मार्क्स-एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में लिखा है, राज्य पूंजीपतियों के सामान्य हितों की प्रबंध समिति है। इसीलिए हम सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने की बात करते हैं।

फुटनोट 360 (गोलू देवता)

उत्तराखंड में एक स्थानीय देवता हैं गोलू, गोल देवता। मुख्य मंदिर अल्मोड़ा से बागेश्वर के रास्ते में चेतई है, छोटे तो रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि के रचना स्थल घोड़ाखाल समेत अनेक जगहों पर है। मनौती में बलि चढ़ती है तथा घंटे बांधे जाते हैं। 1996 में एक मित्र के साथ 'Gol Devta -- King, legend and God' डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाने गए थे। भूमिका के विस्तार में न जाकर, जागेश्वर में हमें जागर (स्थानीय नाच जिसमें एक कलाकार के ऊपर गोल देवता की आत्मा सवार हो जाती है) शूट करना था। गाजियाबाद के किसी धनाढ्य ने वहां घर बनाकर घरभोज के आयोजन में सब गेस्टहाउस और होटल बुक कर रखा था। पास में अठखोल में एक सुंदर पहाड़ी कब्जाकरके एक रंगविरंगे परिधान वाले बाबा ने आश्रम बना रखा था। हमें जगह मिल गयी, वह 1920, 10910 की कहानियां बताने लगा यह पूछने पर कि उस समय वह 20 साल का तो रहा होगा, वह 1885 में किसी कमिशनर हंटर के साथ अपने अनुभव बताने लगा, फिर तो हमें समझ आ गया कि फरेबी है। बाकी अनुभव फिर कभी।

लल्ला पुराण 267 (धर्म परिवर्तन)

मुगलों द्वारा बलात धर्म परिवर्तन की एक पोस्ट पर कुछ कमेंट:

सिकुलर्स का मजाक उड़ाने वाले कम्युनल कहलाना पसंद नहीं करेंगे।जिस तरह सांप्रदायिकता धार्मिक नहीं राजनैतिक विचारधारा है, उसी तरह सत्ता का वर्चस्व और अधीनता धार्मिक नहीं राजनैतिक मामला है। शाहजहां के सेनापति ने बुंदेले रजवाड़े को धार्मिक नहीं राजनैतिक कारणो से कत्ल किया। संघियों का इतिहासबोध तथ्यपरक न होकर अफवाहजन्य होता है। यदि तलवार के बल पर धर्मपरिवर्तन होता तो दिल्ली और आगरा के इर्द-गिर्द मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी होती, जबकि मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेक्ष पश्चिमी पंजाब, पूर्वी बंगाल और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत थे। मुसलमानों में बहुसंख्यक कौन हैं? -- लोहार, बढ़ई. दर्जी, धुनिया, जुलाहे, चिक.. आदि -- कारीगर जातियां जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र थी किंतु सामाजिक रूप से नहीं, उन्होंनेसामाजिक बराबरी के लिए धर्म परिवर्तन कर लिया लेकिन फिर भी जाति से मुक्त नहीं हुए। सांप्रदायिक सोच का सवर्ण सांप्रदायिकता के जहर से इतना ओत-प्रोत होता है कि इतिहास को भी तर्कशील दृष्टि से पढ़ने की बजाय हिंदू-मुस्लिम नरेटिव में फिट करने की कोशिस करता है। शाखा के बौद्धिकों में ऐसा ही अफवाहजन्य इतिहासबोध पढ़ाया जाता है।

जनेऊ तौलाने की बात संघी अफवाह है। मंदिर तोड़ा भी राजनैतिक कारणों से मठ-मंदिरों को अनुदान भी दिया राजनैतिक कारणों से। शाखा के एक बौद्धिक में वीरेश्वर जी (विहिप का मौजूदा नेसनल सेक्रेटरी वीरेश्वर द्विवेदी) नामक प्रचारक ने औरंगजेब से इतना जनेऊ जलवा दिया जो किउसकी सल्तनत की कुल आबादी के कई गुना लोग पहनते। मैं गणित का छात्र था जब पूछा तो मुख्य शिक्षक ने कहा कि बौद्धिक में सवाल नहीं पूछा जाता।

मंदिर धन के लिए लूटे जाते थे, मुगलों ने नहीं मंदिर लूटा। नालंदा बख्तियार खिलजी ने जलाया। सारे जालिम हुक्मरानों को विश्वविद्यालयोंऔर पुस्तकालयों से भय होता है इसीलिए वे उनपर हमला करते हैं चाहे बख्तियार खिलजी हो, मुसोलिनी या हिटलर हो या मोदी। आप से तो तथ्यपरक इतिहासबोध की अपेक्षा है। शंकराचार्य के नागाओं ने भी बौद्ध विहारों को नष्ट किया था।

जितना आता है उतना ही बताएंगे। पूरी बात तो बता दिया आपने मुगलों को सेकुलर्स का रिश्तेदार तो बता दिया यह नहीं बताया कम्यूनल्स के रिश्तेदार कौन हैं? जब तलवार से राज्य की स्थापना होती थी और जिसकी तलवार में ज्यादा जोर होता था वह विजयी होता था और विजित का मानमर्दन करता था, यह जंगखोरी का तार्किक उपपरिणाम है।

Tuesday, March 10, 2020

फुटनोट 359 (नास्तिकता)

मैं नास्तिक हूं लेकिन आस्तिकों से किसी प्रकार का छुआछूत नहीं रखता। मेरी पत्नी अत्यंत धार्मिक हैं। हम (मार्क्सवादी) धर्म समाप्त नहीं करना चाहते, क्योंकि दुख-दर्द वाले समाज में धर्म सुख या खुशी की खुशफहमी देता है। किसी से धर्म छोड़ने की मांग करने का मतलब है खुशमहमी छोड़ने को कहना जिसका मतलब है उन्हें खुशी देना। जब किसी को वास्तविक खुशी मिलेगी तो उसे खुशफहमी की जरूरत नहीं होगी, धर्म अपने आप अनावश्यक हो जाएगा। इस लिए हम धर्म खत्म करनेकी बजाय उन परिस्थितियों को खत्म करना चाहते हैं जिनसे खुशफहमी की जरूरत होती है। जिसे आत्मबल की अनुभूति हो जाती है उसे खुशफहमी की जरूरत नहीं होती।

Sunday, March 8, 2020

होली

ईश अइलन जब इलाहाबाद
बजरंगी रहलेन नाबाद
होइ गइलन नास्तिक छोड देहलेन धर्म
विज्ञान के छात्र के नाते अवैज्ञानिक कर्म
समझेलन न फिरकापरस्ती क अमानवीय मर्म
करै लगलेन विद्यार्थी परिषदी अपकर्म
पाला पड़ल वैज्ञानिक तेवर की किताबन से
मोहभंग भइल परिषदीे संघी खिताबन से
आत्मसात कइलन तब वैज्ञानिक तेवर
समझ पे चढ़ा जनवादी इंकलाबी कलेवर
समझ गइलन धर्म का फरेबी आन-बान
बनि गइलन बाभन से विवेकशील इंसान


जोगीरा सारारारा .....

Saturday, March 7, 2020

लल्ला पुराण 266 (जनेऊ)

जनेऊ तो किसी सोचे-समझे वैचारिक विद्रोह के चलते नहीं तोड़ा था, 13 साल की उम्र तक घुटने तक लटकते जनेऊ के अटपटेपन से ऊब गया था, टट्टी पेशाब के वक्त कान पर चढ़ाना अक्सर भूल जाता था। पहने रहने का औचित्य समझ नहीं आया उतार फेंका। उसके पहले औचित्य न समझ आने के चलते चुटिया (चुर्की) से मुक्ति पा लिया था। मेरे बाबा (दादा जी) सब काम पंचांग की गणना से करते थे, मुंडन पांचवें साल में हुआ (देरी से) और जनेऊ ग्यारहवें साल में (जल्दी)। मैं हर हफ्ते (या दूसरे हफ्ते) हॉस्टल से घर आता तो दादाजी मंत्र पढ़कर नया पहना देते, मैं वापस जाते हुए गांव से बाहर निकलते ही उतारकर किसी पेड़ पर टांग देता। अंततः ऊब कर उन्होंने 'हाथ से निकल गया' समझ छोड़ दिया, पागल नाम वै पहले ही दे चुके थे। बाबा के नियमों का सबसे अधिक उल्लंघन मैं ही करता था, लेकिन (मुझे लगता है) सब पोतों में लबले अधिक मुझे ही मानते थे। मेरा गौना जब आया (फरवरी 1975) तो होली की छुट्टी में इलाहाबाद से घर आया था, किसी 'अच्छे' काम के लिए बाबा कह देते थे कि वो पगला ने किया होगा। मेरी पत्नी को लगा कि कहीं धोखे से तो उनकी शादी नहीं हो गयी? होली के एक दिन पहले उन्होंने मेरी दादी जी (अइया) से पूछ ही लिया। जब भी छुट्टी में घर जाता तो दादा जी के साथ (बाग मे उनकी कुटी पर) काफी समय बिताता। एक बार उनके जनेऊ कातते हुए मैंने उन्हें न्यूटन के गति के नियम समझाया। उन्होंने पूछा 'का रे पगला न्यटनवा भगवानौ से बड़ा रहा?' इस पर मैंने 3-4 साल पहले एक लेख लिखा था, इस ग्रुप में भी शेयर किया था। अभी फिर करूंगा।

शिक्षा और ज्ञान 273 (आर्थिक संकट)

भ्रष्टाचार पूंजीवाद का दोष नहीं अंतर्निहित प्रवृत्ति है,कांग्रेस से अधिक भ्रष्टाचार अभी है, कश्मीर में आतंकवाद कांग्रेस द्वारा कश्मीर की सापेक्ष सावयत्तता से छेड़-छाड़ तथा कठपुतली सरकारें थोपने तथा जगमोहन जैसे संजय गांधी के कारिंदे को कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त कर पंडितों के पलायन तथा उसके सांप्रदायिककरण का परिणाम है। मुस्लिम तुष्टीकरण संघी सांप्रदायिक शगूफा है। चुनावी राजनीति मेंसभी दल बहुसंख्यक समुदाय का तुष्टीकरण करते हैं। 1984 में प्रायोजित सिख नरसंहार के बाद हिंदू बैकलैश से सत्ता में आने के बाद शाहबानो प्रकरण की अपनी बेवकूफी को संतुलित करने के लिए राजीव गांधी द्वारा मस्जिद का ताला खुलवाना, मेरठ-मलियाना-हाशिमपुरा को अंजाम देना हिंदू तुष्टीकरण के कृत्य थे। इससे गांधीवादी समाजवाद के मुखौटे में रक्षात्मक सांप्रदायिक राजनीति पर मजबूर संघ गिरोहों को आक्रामक सांप्रदायिकता की प्रेरणा मिली और गर्व से हिंदू कहने का आक्रामक मंदिर अभियान शुरू हुआ। राहुल गांधी ने जनेऊ दिखाते हुए मंदिर मंदिर घूमना शुरू किया तो केजरीवाल जयबजरंगबली करने लगा। राजीव गांधी दुश्मन के मैदान में दुश्मन के हथियार से लड़ना चाहता था। नरसिंह राव ने मस्जिद विध्वंस में बहुसंख्यक तुष्टीकरण के रूप में ही संघ परिवार से सहयोग किया। कांग्रेस भी विश्वबैंक की वफादार थी लेकिन वह फिर भी आर्थिक निर्माण की नेहरू की विरासत कोआहिस्ता आहिस्ता अलविदा कर रही थी। रक्तपाती सांप्रदायिक अभियान से सत्ता हासिल करने वाली इस सरकार के पास हिंदू-मुसलिम नरेटिव से ध्रुवीकरण मेंध्यान भटकाने के अलावा कोई दृष्टि नहीं है। सारे सार्वजनिक उपरक्रमों को धनपशुओं के हवाले कर चुकी है तथा बचे हुए कर रही है। फिलहाल इस मंदी से निपटने के लिए भारत ही नहीं भूमंडलीय पूंजी के पास कोई विकल्प नहीं है। मंदी के आलम की पराकाष्ठा यह है कि इसने नाई तक के धंधे को प्रभावित कर दिया है। पिछली (1930 की) महामंदी से राज्य के आर्थिक नियंत्रण वाली केंसियन कल्याणकारी (वेल्फेयर) अर्थनीति ने निजात दिलाया था और पूंजीवाद को ध्वस्त होने से बचा लिया था। किसी अन्य कार्यक्रम के अभाव में केंसियन अर्थशास्त्र के तहत कल्याणकारी राज्य तथा राज्य नियंत्रित अर्थशास्त्र की फिर से बहाली ही, फिलहाल संकट मोचन का रास्ता दिख रहा है, वरना प्रलय अवश्यंभावी है, मंदिर कितना भी भव्य बन जाए।