Friday, September 11, 2026

बेतरतीब 192 (बचपन)

 हमारे बचपन में हमारे गांव में पहला शहरी खेल वॉलीबॉल ही पहुंचा था, गांव के खेल (कबड्डी, झाबर, शुटुर्र या शुर्र, लखनी, गुल्ली डंडा आदि) तो थे ही। उस समय (1960-67) ब्लॉक में गांव स्तर पर युवक मंगल दल की खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिताएं होती थी। वॉलीबॉल में हमारे गांव की टीम ब्लॉक के अन्य गांवों में खेलने जाती थी और दूसरे गांवों की टीम हमारे गांव में आती थीं। ग्रामीण खेलों में टीमें बन जाने पर दोनों टीमों के कप्तानों (कुछ और कहा जाता था, भूल गया) के बीच गोंटी या पत्ता से लॉटरी से तय होता था कि मैं किस टीम में रहूं। एकाधबार ऐसा हुआ कि छुआ गया कि नहीं पर टीमों में झगड़ा हो जाता और खेल बंद होने की नौबत आ जाती। मुझे लगता कि खेल ही तो है चलता रहनी चाहिए और मेरा मामला होने पर, छूने या छुआ जाने के विरोधी टीम के दावे को मान लेता। इसलिए दोनों टीमों में मुझे बोझ ( Liability) समझा जाता था। 1967 में हाई स्कूल (कक्षा 9-10) की पढ़ाई करने जब शहर चला गया तब भा गांव आने पर अपने से जूनियर लड़कों के साथ खेलता, तब दोनों ही टीमें मुझे अपनी टीम में शामिल करने को तैयार रहतीं। अब तो गांव के काफी खेल खत्म से हो गए हैं, सभी आयु समूह के लड़के क्रिकेट ही खेलते हैं।

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