विद्रोही औपनिवेशिक भारतीय सेना के सैनिकों की पहल पर, आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में 1857 की सशस्त्र किसान क्रांति औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकती यदि ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम जैसे भारतीय रजवाड़ों ने अंग्रेजों की दलाली में भारतीय आवाम की आजादी के संग्राम के साथ गद्दारी न की होती। औपनिवेशिक काल में भारतीय सामंती शासक वर्ग चरित्र अपने किसानों की स्वतंत्रता की कीमत पर औपनिवेशिक गुलामी को तरजीह देने का रहा है। क्रांति के दौरान (1857-58) कार्ल मार्क्स न्यू यॉर्क ट्रिब्युन में अपने डिस्पैचेज में औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध भारतीय आवाम के एकताबद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लगातार लिखते रहे। बाद में उनके लेखों का संकलन, 'प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम (The First Indian War of Independence)' शीर्षक से छपा। 1907 में क्रांति के पचासवें साल के उपलक्ष्य में वीडी सावरकर ने 'भारत का स्वतंत्रता संग्राम' (India's War of Independence)' शीर्षक से पुस्तक लिखी। यह सावरकर के जीवन का विप्लवी काल था। इसी अवधि की गतिविधियों के लिए औपनिवेशिक शाकों ने सावरकर को गिरफ्तार किया लेकिन सावरकर के क्रांतिकारी बुलबुले क्षणिक साबित हुए। औपनिवेशिक जेल की यातना से वे टूट गए और अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति के मुहरे ही नहीं, सक्रिय एजेंट बन गए। 1857 पर1907 की अपनी किताब में सावरर ने भारतीय आवाम की , खासकर हिंदू-मुसलमान की एकताबद्धता की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। बजरंगी इस किताब को नहीं प्रचारित करते।
भारतीय रजवाड़ों और कुछ धनपशुओं की मदद से औपनिवेशिक शासक क्रांते का दमन करने में कामयाब तो रहे लेकिन भारी धन-जन की क्षति हुई। जिसका प्रतिशोध उन्होंने पकड़े गए क्रांतिकारियों के यातनापूर्ण दमन से लिया। औपनिविशक शासकों ने1857 की सशस्त्र क्रांति को कुचल तो दिया लेकिन भविष्य की ऐसी संभावनाओं ने उन्हें आतंकित कर दिया। इन संभावनाओं को नाकाम करने के लिए उन्होंने बांटो-राज करो की नीत् के तहत सांप्रदायिक विचारधारा की अवधारणा गढ़ी तथा उपनिवेश विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए सांप्रदायिक विचारधारा। इसके लिए दोनों ही प्रमुख समुदायों से उन्हें नामी-गिरामी दलाल मिल गए।
जारी.....

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