Saturday, October 30, 2021

लल्ला पुराण 313(पेंसन)

 कस्बे के पत्रकार आमतौर पर मालिक के जनसंपर्क का काम करते हैं तथा स्थानीय अधिकारियों और नेताओं की जी हुजूरी। प्रायः ये लोग प्रांतीय और केंद्रीय लौकरियों की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की असफलता की कुंठा में रहते हैं और रिटायर्ड कर्मचारियों की पेसन पर मुफ्तखोरी का तंज करते रहते हैं। मंहगाई पर मेरी एक पोस्ट पर ऐसे ही एक सरकारी मृदंग ( "पत्रकार") ने कहा की सरकार की खैरात पर मुफ्तखोरी करके भी सरकार की आलोचना करता हूं। उस पर --


पढ़े-लिखे जाहिलों का अनुपात अपढ़ जाहिलों से अधिक है।किसी कस्बे में पत्रकारिता के नाम पर मालिक के लिए जनसंपर्क का काम करने वाले ये जाहिल इतना तक नहीं जानते किसी कर्मचारी की पेंसन उसकी जीवन भर की संचित कमाई है किसी की खैरात नहीं और वह इतना भी नहीं जानता कि पूंजीवाद में हम सभी आजीविका के लिए कुछ समय की श्रम बेचने के लिए अभिशप्त हैं लेकिन श्रमशक्ति बेचते हैं अंतरात्मा नहीं और न ही मालिक के अत्याचार की आलोचना करने का अधिकार। लेकिन इन्हें जनतंत्र की परिभाषा ही नहीं मालुम होती तो जनतांत्रिक अधिकार कहां से समझेंगे।पत्रकारिता के नाम पर मालिक के जनसंपर्क अधिकारी का काम करिए और अधिकारियों की दलाली मजदूर के पेसन के अधिकार को मुफ्तखोरी कहने की जहालत से बचिए। वैसे आपने भी तो सरकारी नौकरी के सारे प्रयासों का इस्तेमाल किया होगा और हर जगह से मिली असफलता की कुंठा रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों को मुफ्तखोर कह कर निकालते हैं। आग्रह है कि थोड़ा पढ़ लें कि कर्मचारियों का पेसन फंड कैसे जुटता है और उनकी संचित कमाई से बने पेंसन फंड की मासिक किश्तों को खैरात या मुफ्तखोरी कहने की मूर्खता से परहेज करें।

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