Friday, November 2, 2012

लल्ला पुराण ५४

गज़ल को राजनैतिक हथियार बनाने के विरुद्ध एक पोस्ट पसर कुछ कमेन्ट:

 गाफिल भईए आदाब! जिन्होंने भूख के बारे में सिर्फ पढ़ा है वे भूख के संताप का एहसास कैसे करेंगे? और भूख के एहसास के बिना भूख मिटाने का उपक्रम कैसे होगा? वैसे तो आपने यह सवाल गज़लगो और साहित्यिक समाज से पूंछा है, मैं दोनों में से किसी कोटि में नहीं आता. मैं तो फेसबुक पर कुछ कमेन्ट तुकबंदी में कर देता हूँ. इसलिए  मेरा कमेन्ट एक साधारण पाठक की राय समझें. मैं आप से शत-प्रतिशत सहमत हूँ की गज़ल की शुरुआत दरबारेए मनोरंजन के साधान के रूप में 'कोमल भावनाओं", वर्जनाओं और कुंठाओं  की अभिव्यक्ति के रूप में ह्बुई, और वामपन्थिओं ने उसे राजनैतिक/सामाजिक चेतना का औजार और हथियार बना कर उसके साथ "बलात्कार" किया और करते आ रहे हैं. लेकिन आपकी फेहरिश्त में बहुत से नाम छूट गए हैं. गज़ल के साथ यह "दुष्कर्म" बहुतों ने किया है. "वह तोड़ती पत्थर......" और "चाँद का मुंह टेढा..." लिखने वाले निराला और मुक्तिबोध शायद इस आरोप से बारी माने जाएँ क्योंकि उनकी कवितायें गज़ल नहीं हैं. इस संदेह का लाभ, "बहुत दिनीं तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास..." लखने वाले नागार्जुन और "गुलामिया अब हम नाहीं बजैबे/आज़ादिया हमारा के भावेले..." लिखने वाले गोरख पाण्डेय  को भी शायद मिल जाए. अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार के अलावा बहुत से शायरों ने यह काम किया है. "....... एक महल की आड से निकला है कोई माहताब/जैसे मुल्ले  का अमामा जैसी बनिए का किताब...." लिखने वाले मजाज़, मेहनतकश के लिये "एक गाँव नहीं एक देश नहीं, पूरी दुनिया" माँगने वाले फैज़, दह्कां को रोटी न दे सकने वाले खेत को जलाने की हिमायत करने वाले शाहिर, हक़ के लिये न लड़ने वाले मध्यवर्ग को "हक़ अच्छा पर हक़ के लिये कोई और लड़े तो और अच्छा ..."  का कटाक्ष करने वाले इब्न-ए-इंशां, "...........//की हमने इन्ही की गमखारी/लोगों पर हमने जान वारी/होते हैं तो हो लें हाथ कलम शायर न बनेगा दरबारी...." लिखने वाले हबीब जालिब,  .......... के नाम छूट गए?


1- भूख के एहसास को शे'रो-सुखन तक ले चलो,
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।

2- जो ग़ज़ल माशूक़ के जल्वों से वाक़िफ़ हो चुकी,
अब उसे बेबा के माथे की शिक़न तक ले चलो।

दोनों ही शेर अदम की एक ही गज़ल के हैं. चलिए पहले पर. यानि अदब को मुफलिस की मंजिल तक ले जाने पर आपको आपत्ति नहीं है. वैसे यह भी माशूक की जुल्फों में उलझी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति न होकर  अदब को जनपक्षीय बनाने की बेबाक अपील है. दरबारी रवायत की निरंतरता बरकरार रखते हुए,सामाजिक सरोकारों से विरक्त, माशूक के विरह और मिलन के जल्वों से वाकफियत के वर्णन से तो ग़ज़लों की दुनिया भरी पडी है. शब्द और शिल्प के धनी, एक हमारे गुरू जी हैं, देश के वरिष्ठ नागरिक हैं. उनकी गज़लोएँ अभी तक माशूक की जुल्फों में उलझी हैं., किसी गज़ल को बेवा के माथे की शिकन तक ले जाने से अपशकुन हो जाएगा क्या? वैसे मर्दवादी रीतियों की सबसे अधिक शिकार विधवाएं ही हैं. घर-बार से बेदखल विधुर नहीं होते, विधवाएं होती हैं. इतने विधवा आश्रम हैं, विधुर आश्रम एक भी  नहीं? और इन आश्रमों में विधवाओं को प्रताणना मिलती है और किस घृणित ढंग से उनका याकुन शोषण होता है, उसकी एक जह्लक दीपा मेहता की "वाटर' में मिलती है. तो मित्र, किसी शायर का सरोकार विधवा के माथे की शिकन तक पहुंचता है तो उसे स्वागत योग्य मानना चाहिए, गज़ल के साथ बलात्कार नहीं. किसी की रचना में उसके सरोकार ही झलकते हैं. अदम, एक सामंती, राजपूत  पृष्ठभूमि में पलने-बढ़ने के बावजूद जिस तरह "चमारों की गली" मे "ज़िंदगी के ताप" को महसूस कर पाते हैं उसी तरह, अपशकुन माने जाने वाली विधवा की पीड़ा भी महसूस कर पाते हैं और दिल की बात कलम की जुबां बन जाती है. सादर.

गाफिल भाई, मैं तो गज़लगो हूँ नहीं तो गज़ल को बख्शने का सवाल ही नहीं उठाता. फैज़, शाहिर, जालिब. साहिर, दुष्यंत, इब्ने इंसान इन लोगों ने तो बख्सा नहीं. ये तो गज़ल को० माशूक के जलवो से मुक्त कर खाक्नाशीनों के जज्बात तक पहुंचा दिए और बेवा के माथे की शिकन तक ले जा चुके; सुहाग के सेज की लीज-लिजी भावुकता से उठाकर मेहनतकश की जंग-ए-आज़ादी तक पहुंचा दिए और ये ग़ज़लें देश-विदेश तक लोकप्रिय हो गयीं.इतिहास की गति को पलता नहीं जा सकता. आनेवाली पीढ़ियों आग्रह कीजिये कि वे इसे माशूक की ज़ुल्फ़ से बाहर न आने दें.

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