Saturday, August 19, 2023

शिक्षा और ज्ञान 315 (1942)

 आज के दिन (19 अगस्त) भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चित्तू पांडेय के नेतृत्व में बलिया को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया था। काफी आंदोलनकारियों ने शहादत दी थी। अंग्रेज अधिकारियों के आदेश पर आंदोलनकारियों पर गोली चलाने वाले सिपाही भी हिंदुस्तानी ही थे।( यूरोपीय जवजागरण के राजनैतिक चिंतक मैक्यावली, इसीलिए वेतनभोगी सैनिकों को भाड़े के सैनिक कहते हैं) बलिया के स्वतंत्रता दिवस पर Shyam Krishna की पोस्ट पर संस्करणात्मक कमेंट:


1942 आंदोलन में बलिया के शहीदों को क्रांतिकारी सलाम.1991 में हम लोग केदार जी (कवि केदारनाथ सिंह) पर फिल्म की शूटिंग के सिलसले में उनके गांव चकिया से उनके साथ उनकी कविता माझी का शूट करने घाघरा पर बने माझी के पुल के रास्ते बैरिया थाने पर 1942 के शहीदों को श्रद्धांजलि देने रुके थे. कई आंदोलनकारी थाने पर औपनिवेशिक झंडा उतारकर तिरंगा फहराते हुए औपनिवेशिक पुलिस के हिंदुस्तानी सिपाहियों के हाथ शहीद हुये थे. शहादत को सलाम.

Monday, August 14, 2023

मार्क्सवाद 291 (तमस)

 किसी उपन्यास पर बनी फिल्म में काफी कुछ निर्देशक की भी कल्पना है, लेकिन, मुझे लगता है कि भीष्म साहनी के उपन्यास तमस पर बनी फिल्म में कथानक को बंटवारे से जोड़ने के बावजूद उपन्यास की भावना को बरकरार रखा गया है। मैंने उपन्यास पहले (साहित्य एकेडमी पुरस्कार मिलने के बाद) पढ़ा और फिल्म तो जेएनयू में पढ़ाई करते हुए देखा। इलाहाबाद में एक शाम यूनिवर्सिटी रोड चौराहे पर पीपीएच के दादा ठाकुर की दुकान पर पान खाने आए थे, मैं सिगरेट खरीद रहा था, उन्होंने मेरी सिगरेट को आग दिखाते हुए बताया कि मेरे लिए एक नई किताब आई है। यह उनकी बात-चीत का तरीका था। सब दादा कहते थे तो मैं उन्हें बंगाली संमझता था लेकिन बाद में पता चला कि स्थानीय मुसलमान हैं। मार्क्सवाद के बारे में मेरी समझ के विकास में पीपीएच का काफी योगदान है। एक बार मैंने पेरिस कम्यून ( दाम एक या डेढ़ रूपए) खरीदने के लिए निकाला तोुन्होंने 3 भागों में मार्क्स-एंगेल्स की सेलेक्डेड वर्क्स लेने और पेरिस कम्यून के पहले उसमें संकलित क्लास वार इन फ्रांस और एटींथ ब्रुमेयर पढ़ने की सलाह दी। तमस आपात काल में पढ़ा। एटींथ ब्रुमेयर पढ़ने के बाद प्यासा फिल्म में शाहिर के लिखे गीत की अंतिम लाइन 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' गड़बड़ लगी क्यों कि अगर-मगर से परे हमें यह दुनिया मिली हुई है, हमें इसीमें जीना और इसे बेहतर बनाना है।


एटींथ ब्रुमेयर ऑफ लुई बोनापार्ट की शुरुआती पंक्ति है कि मनुष्य अपना इतिहास खुद बनाता है लेकिन जैसा चाहे वैसा नहीं, न अपनी चुनी परिस्थितियों में बल्ति अतीत से विरासत में मिली परिस्थितियों में। इसी में आगे लिखा है कि परंपराएं हमारे दिमाग पर पूर्वजों की पीढ़ियों की लाशों के दुःस्वप्न की तरह लदी होती हैं।

मार्क्सवाद 290 (1857)

 एक मित्र ने लिखा कि यदि 1857 की क्रांति सफल होती तो भारत तमाम रजवाड़ों में बंटा होता, उसपर:


इतिहास में क्या होता तो क्या होता कि बहस निरर्थक है। ऐतिहासिकतथ्य है कि भारत के सामंती शासक वर्गों की गद्दारी और लोगों की दास मानसिकता तथा 1857 के आंदोलन में भी आमजन की शिरकत के अभाव में 1857 का आंदोलन असफल रहा। छद्म राष्ट्रवादियों, खासकर ब्राह्मणों की भावनाएं मेरी इस बात से आहत होंगी लेकिन अँग्रेजी बनियों की एक कंपनी, ईस्ट इंडिया कंपनी मंगल पांडेय जैसे सिपाहियों की वफादारी के ही चलते भारत पर राज कर रही थी, कारतूस के मसले पर उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं तथा उन्होंने अपने किसी अधिकारी पर गोली चलाकर शहादत प्राप्त कर ली। 2-4 दिन पहले तक कोई जानता था कि जिसअंग्रेज अधिकारी के आदेश पर वे अपने देशवासियों पर गोली चलाते थे, आवेश में वे उसी पर गोली चला देंगे और कुछ दिनों बाद नियोजित विद्रोह को कुछ दिन पहले शुरू करके तुरत-फुरत में योजना बदलना पड़ेगा? 'अगर ये दुनिया मिल जाए' का सवाल निरर्थक है यह दुनिया पहले से मिली हुई है, इसी में हमें तय करना पड़ेगा कि क्या करना है। 1857 कि किसान क्रांति यदि सफल हो जाती तो हो सकता है सामाजिक चेतना का जनवादीकरण इस स्तर तक पहुंच जाता कि विदेशी शासकों को भगाने के बाद लोग कंपनी के दलाल स्वदेशी शासकों के विरुद्ध संघर्ष करते। हो सकता है कि उस क्रांति की सफलता के बाद भारत में यूरोप के नवजागरण और प्रबोधन (एन्लाइटेनमेंट) जैसी बौद्धिक क्रांतियों के तर्ज पर क्रांतियां होतीं तथा समाज का जन्मजात (जाति आधारित) विभाजन समाप्त हो जाता और लोग भारतीय के रूप में संगठित होकर भारत की भौगोलिक एकता को राजनैतिक-सामाजिक एकता में बदल देते। आज के यूरोपीय देश भी तो आपस में लड़ते-भिड़ते तमाम राजशाहियों के भौगोलिक समुच्चय ही थे , जिनकी सीमाएं बदलती रहती थीं। औपनिवेशिक शासन की शुरुआत तक भारत एक आर्थिक शक्ति थी तथा चीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यपार का अहम किरदार। यूरोपीय व्यापारिक कंपनियां यहां अपने माल बेचने नहीं बल्कि सोने की चिड़िया के अंडे लूटने आयी थीं। औद्योगिक क्रांति के पहले उनके पास बेचने को कुछ था ही नहीं वे भारतीय माल के व्यापार के लिए आई थीं, दास-व्यापार से प्राप्त सोना-चांदी से यहां का माल खरीदकर यूरोप और अमेरिका में बेचती थी, हो सकता था कि औपनिवेशिक दखलअंदाजी न होती तो यूरोप के पहले भारत में औद्योगिक (पूंजीवादी) क्रांति होती और जैसे यूरोप में सामंतवादी राजशाहियों के विरुद्ध संघर्ष से निकले पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य की विचारधारा के रूप में राष्ट्रवाद का उदय यहां पहले ही हो गया होता।

1857 के संगठित सशस्त्र क्रांति से बौखलाए औपनिवेशिक शासकों ने बांटो-राज करो की नीति अपनाया। यूरोप में जहां आधुनिक (पूंजीवादी) राष्ट्रराज्य के रूप में राष्ट्रवाद की विचारधारा पनपी और भारत में कांग्रेस के नेतृत्व में उपनिवेशविरोधी विचारधारा के रूप में राष्ट्रवाद की विचारधारा विकसित हो रही थी। विकासशील भारतीय राष्ट्रवाद को विखंडित करने के लिए देश के धार्मिक अंतर्विरोधों को दोहन करके, बांटो-राजकरो की नीति के औजार के रूप में सांप्रदायिकता की निर्मिति की और अपने हिंदू-मुसलमान एजेंट्स के जरिए इतनी नफरत फैैलाया कि आजादी के लिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के परिणामस्वरूप भारत नहीं विखंडित भारत आजाद हुआ। यदि सांप्रदायित ताकतें देश तोड़ने में सफल न होतीं और अखंड भारत आजाद होता जिसमें 40% मुसलमान होते तो क्या कभी हिंदुत्व सांप्रदायिकता भारत की सत्ता पर काबिज हो पाती? इसलिए क्या हुआ होता तो क्या होता का विमर्श निरर्थक है, जो हुआ वही होता और हमें सोचना है कि जो है उसमें स्थितियां कैसे बेहतर बनाई जा सकती हैं।

Sunday, August 13, 2023

मार्क्सवाद 289 (सांप्रदायिकता)

 सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रद्रोह है जिसका ईजाद औपनिवेशिक शासकों की शह पर उपनिवेश-विरोधी विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को विखंडित करने के लिए किया और उन्हें बांटो और राज-करो की नीति के एजेंट के रूप में दोनों ही प्रमुख धार्मिक समुदायों (हिंदू - मुसलान) से विश्वसनीय एजेंट भी मिल गए।इन औपनिवेशिक एजेंटों की मेहनत रंग लाई तथा अभूतपूर्व सांप्रदायिक नफरत और खूनखराबे के साथ देश विखंडित हो गया हो गया जिसका घाव नासूरबन अब तक रिस रहा है और जाने कब तक रिसता रहेगा। फैज के शब्दों में, खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद। स्वतंत्रता संग्राम में देश का आवाम लड़ा भारत की आजादी के लिए लेकिन आजाद हुए हिंदुस्तान और पाकिस्तान। दोनों विखंडितभागों में इन्होने सांप्रदायिकता को राष्ट्रवाद के रूपमें पेश करना शुरू किया। एक भाग पाकिस्तान में तो बंटवारे के बाद ही सांप्रदायिक ताकतें सत्ता में आ गयीं और इस्लामी सांप्रदायिकता वहां राष्ट्रवाद बन गयी। हिंदुस्तान बहुत समय तक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना रहा और हिंदुत्व सांप्रदायिकता हिंदुस्तान में हिंदुत्व सांप्रदायिक औपनिवेशिक एजेंचों के वारिशों के सत्ता पर काबिज होने के बावजूद अभी भी हिंदुत्व सांप्रदायिकता राष्ट्रवादनहीं बन पाया है, संवैधानिक रूप से अभी भी यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना हुआ है। यद्यपि हिंदुत्व सांप्रदायिकता प्रकारांतर से फासीवादी चरित्र अख्तियार कर चुका है। सरकारी शह पर सांप्रदायिक ताकतें सांप्रदायिक नफरत और हिंसा फैलाकर पर देश में नफरत और हिंसा की आग लगाने में जी-जान से जुटी हैंं लेकिन उम्मीद है कि भारत जैसे बहुलता के देश में वे कामयाब नहीं होंगी, आइए संकल्प लें कि हम भारत को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे। यदि विखंडित भारत के तीनों भागों का आवाम जनतांत्रिक प्रतिबद्धता से कोशिस करे तो हम शायद मिलकर विभाजन रेखाओं को मिटाकर स्वतंत्रता सेनानियों के अखंड भारत के सपने को साकार कर सकें। धर्म यदि राष्ट्रवाद का वैध आधार होता तो पाकिस्तान के दो टुकड़े न होते। आइए स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों और शहीदों के एक आजादभारत के सपने को साकार करने का सपना देखें।

Monday, August 7, 2023

शिक्षा और ज्ञान 314 (अगर ये दुनिया मिल भी जाए तो क्या)

 बहुत ही मशहूर तथा बहुत ही लोकप्रिय, लेकिन बहुत ही वायवी औऱ गलत संदेश देने वाल एक पुराना फिल्मी गाना है, 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है'। यह गाना अकर्मण्यता और बेचारगी का औचित्य और वैधता प्रदान करता है। अरे भाई अगर की बात ही नहीं है, यही दुनिया मिली हुई है, इसी में जीना और इसे बेहतर बनाना है। मनुष्य अपना इतिहास खुद बनाता है लेकिन खुद की चुनी हुई परिस्थितियों में नहीं, इतिहास से विरासत में मिली परिस्थितियों में। निजी जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों में या तो बेचारगी के तर्क से अकर्मण्यता का बहाना खोजा जा सकता है या साहस से उन्हीं प्रतिकूलताओं को यथासंभव अनुकूल बनाया जा सकता है। हवा को पीठ न देने के लिए संघर्ष तो करना पड़ता है। कई लोग अपनी अकर्मण्यता के लिए दूसरों को दोष देते रहते हैं कि किसी ने प्रतिकूल परिस्थियों में उन्हें आगे बढ़ने में सहायता नहीं किया इसलिए वे आगे नहीं बढ़ पाए और यदि कोई सहायता करता और वे दूसरों पर निर्भरता की सुविधा का लुत्फ उठाते हैं तो उनमें आत्मनिर्भरता और कुछ करने का जज्बा ही नहीं आ पाता। अरे भाई कहीं से प्लेट में रखकर काम की आदर्श परिस्थितियां नहीं आएंगी, जो भी परिस्थितियां हैं, उन्हीं में बेहतर करने का प्रयास करना चाहिए। तो ये दुनिया अगर मिल भी जाए का मामला नहीं है, ये दुनिया मिली हुई है , इसी में जीना और इसी को बेहतर बनाने की कोशिश करना है।

शिक्षा और ज्ञान 313 (भजन)

 सारे भक्त रटा-रटाया भजन ही गाते हैं, आजकल सांप्रदायिक चुनावी ध्रुवीकरण के मकसद से समाज को विखंडित करने के लिए हिंदू-मुस्लिम नरेटिव से नफरत फैलाने का भजन गाने वाले अंधभक्तों का बोलबाला है। और यदि कोई शिक्षक जन्म की जीववैज्ञानिक दुर्घटना की अस्मिता से ऊपर उठकर इंसान बनने में खुद असमर्थ हो तो मुल्क की क्या हालत होगी? किसी मुल्क को बर्बाद करना हो तो शिक्षा को कुशिक्षा बना दो। इसीलिए गाली हिटलर को नहीं उस शिक्षा को देना चाहिए जिसके चलते तत्कालीन जर्मनी का शिक्षित बहुमत हिटलर का अंधभक्त था। सादर।

Saturday, August 5, 2023

वह रण अंतिम रण होगा

 वह रण अंतिम रण होगा

वह रण अंतिम रण होगा
स्त्री को नंगा करने वाले सब मारे जाएंगे
जाति-धर्म-नस्ल के झंझट मिटाए जाएंगे
वह रण अंतिम रण होगा
इंसान-इंसान में सब फर्क मिटाए जाएंगे
फैलेगा समता का सुख चारों ओर
जंग चाहता जंगखोर ताकि राज कऱे हरामखोर
हरामखोरी का सत्यानाश होगा
वह रण अंतिम रण होगा
उसके बाद धरती पर केवल अमन होगा
वह रण अंतिम रण होगा
जंगखोरी के खिलाफ वह जंग होगा
वह रण अंतिम रण होगा

(ईमि:04.08.2023)