There are violent student protests in many European countries but instead of using Police repression, governments are addressing the students' demands. In India the students are peacefully protesting and the Indian government is using brutal Police repression and RSS goons.
Thursday, October 22, 2026
Tuesday, October 20, 2026
मार्क्सवाद 359(युगचेतना)
धनपशुओं को बनाना कुछ नहीं आता, बनाते तो हम मजदूर हैं, उत्पादन के साधनों पर धनपशु काबिज हैं, वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी उन्हीं का नियंत्रण होता है, जिनका आर्थिक उत्पादन के साधनों पर। इसलिए इस युग को धनपशुओं का युग या पूंजीवाद कहा जाता है। पूंजीवाद केवल माल का उत्पादन ही नहीं करता, विचारों का उत्पादन भी करता है। शासक वर्गों के विचार शासक विचार भी होते हैं, जिन्हें युग का विचार या विचारधारा कहा जाता है। विचारधारा शोषक (शासक) और शोषित (शासित) दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है।युग की विचारधारा युग की सामाजिक चेतना कोो भी प्रभावित करती है। शासक विचारधारा के प्रभाव न सिर्फ धनपशु और उसके बौद्धिक एजेंट ही यह सोचते हैं कि मजदूर धनपशु का कृपापात्र है बल्कि मजदूर भी यही सोचता है, जबकि हकीकत उल्टी है, मजदूर धनपशु का कृपापात्र नहीं होता, बल्कि धनपशु मजदूर का कृपापात्र होता है जिसका खून चूसकर वह तोंदिल हो जाता है। मर्दवादी सामाजिक चेेतना के प्रभाव में न सिर्फ पुरुष ही लड़की को बेटा कहकर शाबाशी देेतेेे हैं, बल्कि लड़की भी उसे शाबाशी ही समझती है। मर्दवादी सामाजिक चेतना से मुक्त लड़कियां बेटा कहने पर प्रतिरोधस के स्वर में जवाब देती हैं कि ' माफ कीजिए, मैं बेटा नहीं बेटी हूं'। जब मजदूर इस विचारधारात्मक फरेब से वाकिफ हो वर्गचेतनासं लैश संगठित हो उत्पादन के साधनों पर धनपशुओं का कब्जा उखाड़ फेंकेगा और उनपर उत्पादकों (मजदूरों ) का सामाजिक (सामूहिक) नियंत्रण स्थापित करेगा तब धनपशुओं को धरना नहीं देना होगा क्योंंकि उन्हें भी उत्पादक होने का समान गर्व प्रदान कर स्वतंत्र कर दिया जाएगा। जो स्वतंत्र होने से मना करेगा उसे स्वतंत्र होोने को बाध्य किया जाएगा क्योंकि परतंत्रता अमानवीय है और किसी का अधिकार नहीं होो सकता। एक मेरा सहपाठी ऊंची सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानृवृत्ति लेकर, गांव में पैतृक संपत्ति की खेती बंटाई पर देकर रहने लगा। एक बार बातचीत में मैंने उसे बताया कि उसका बंटाईदार उसके टुकड़ों पर नहीं बल्कि वह अपने बंटाईदार के टुकड़ों पर पलता है। मजदूर धनपशुओं केे टुकड़ों पर नहीं बल्कि धनपशु उसके टुकड़ों पर पलता है। मजदूर कौन है? जो भी भौतिक या बौद्धिक श्रमशक्ति बेंचकर रोजी कमाताा है, वह मजदूर होता है। धनपशुओं के कारिंदे मजदूरोंं को लंपट सर्वहारा कहा जाता है और अधिक मजदूरी पाकर खुद को शासकवर्ग (पूंजीपति वर्ग) का हिस्सा होने का भ्रम पालने वाले मजदूर को लंपट बुर्जुआ कहते हैं। फैज अहमद फैज ने लिखा है, 'हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेगे।'
Saturday, October 10, 2026
जंतरमंतर 3
कॉक्रोच जनता पार्टी के नेताओं के अमेरिका से दिल्ली आगमन पर पुलिस प्रोटेस्ट की अग्रिम अनुमति के साथ हवाई अड्डे पर उन्हें लेने गयी और जंतरमंतर पर मंच बनाने की सुविधा दी। जब अपेक्षा से अधिक छात्रों का जमावड़ा हो गया और आंदोलन जनवादी करवट लेने लगा तब पुलिस बर्बरता पर उतारू हो गयी। कॉक्रोच नेता मंत्री नड्डा के घर जब वार्तालाप कर रहे थे, छात्रों पर दमन बढ़ गया। अबकी बार कॉक्रोच नेताओं के मुंबई से दिल्ली आगमन पर पुलिस ने उन्हें हवाई जहाज में ही अपनी हिरासत/हिफाजत में ले लिया और जंतर-मंतर इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। दिल्ली पुलिस के अलावा सीमा की सुरक्षा करने वाली बीएसएफ और सीआरपीएफ समेत तमाम एजेंसियों के 40 हजार से अधिक जवानों को तैनात कर दिया। नेहा बोरा समेत तमाम युवाओं को हिरासत में ले लिया। आपातकाल में भय का माहौल था लेकिन इतना नहीं तब केवल जाने माने नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी लेकिन आज के अघोषित आपातकाल में पुलिसिया दमन की गाज आमजन पर गिर रही है।
Thursday, October 8, 2026
जनादेश (रूसो)
एक पोस्ट पर कमेंट
गुलामी बल पूर्वक लादी गयी है इसलिए बलपूर्वक उसे उखाड़ फेंकना न केवल लाजिमी है, बल्कि वांछनीय भी।
रूसो अपनी कालजयी कृति , ' Social Contract (सामाजिक अनुबंध)' की शुरुआत इन पंक्तियों के साथ करता है, 'मनुष्य पैदा स्वतंत्र होता है और हर तरफ बेड़ियों में जकड़ा है'। ये बेड़िया धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी होती हैं। पैदा होते ही उस पर हिंदू-मुसलमान; बाभन-अहिर; गरीब अमीर; अभिजन-आमजन;.......... की तख्तियां चस्पा हो जाती हैं। इसी लिए वह एक ऐसा राज्य बनाना चाहता है जिसमें लोग पहले की तरह ( प्राकृतिक अवस्था जैसे) स्वतंत्र हो सकें।
पहले जैसी स्वतंत्रता के लिए वह एक अनुबंध की अनुशंसा करता है जो सार्वजनिक हित में कानूनों का जनादेश (General Will) निर्मित जिसके अनुसार आचरण सभी नागरिकों का अनिवार्य कर्तव्य होगा। 'किसी को भी जनादेश के उल्लंघन की अवुमति नहीं होगी, दूसरे शब्दों में हर किसी को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जाएगा'। गुलामी अधिकार नहीं हो सकता। 'स्वतंत्र होने की बाध्यता', दर असल सार्वजनिक हित में स्वयं के बनाए नियमों की बाध्यता, बाध्यता नहीं, स्वतंत्रता ही है।
Monday, October 5, 2026
हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं
हम संविधान की धज्जियां भले उड़ाएं लेकिन भारत माता की जय तो बोलते हैं
यह गंगा स्नान जैसा है जिससे कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं
जिस तरह हनुमान चालिसा पढ़ने से भूत का डर खत्म हो जाता है
उसी तरह भारत माता की जय बोलकर किया गया हर अपराध
देश भक्ति हो जाता है और हर पाप पुण्य।
Saturday, September 26, 2026
मजदूरों के दमन की दास्तान
मजदूरों के दमन की दास्तान
ईश मिश्र
आधुनिक राज्य पूंजीपति वर्ग के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी समिति है। – कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स
सुविदित है कि अप्रैल, 2026 में नोएडा, गुड़गांव तथा अन्य औद्योगिक शहरों में मजदूरों ने काम की मानवीय स्थितियों और जिंदा रहने लायक मजदूरी के लिए शांतिपूर्ण हड़ताल की थी। 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट सेनिफेस्टो में लिखे उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि इतिहास के हर मोड़ पर होती रहती है। ताजा उदाहऱण, अप्रैल, 2026 के मजदूर आंदोलन का दमन है। जब भी मजदूर पूंजीपतियों से काम की न्यूनतम मानवीय स्थितियों और जीने की न्यूनतम जरूरतों भर की मजदूरी की मांग करता है तो पूंजीपतियों के हितों की रक्षा और मजदूरों के दमन और प्रताड़ना में राज्य मशीनरी उनसे आगे रहती है। 11 अप्रैल को मनेसर (गुड़गांव) के बाद जब मजदूरी में बढ़ोत्तरी और काम की स्थितियों की बेहतरी की मांग के साथ मजबूरन हड़ताल शुरू किया तो राज्य मशीनरी पूंजीपतियों की सेवा में, आंदोलनकारी मजदूरों और उनके समर्थन में उठी आवाजों के दमन में कर्तव्यपरायणबोध के साथ सक्रिय हो गयी। मजदूरों के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करके दमन की परिस्थितियां तैयार करने के उद्देश्य से पूंजी पतियों के कारिंदों और पुलिसिया घुसपैठियों ने हिसा भड़काने की कोशिश की। (समयांतर, क्रमशः मई और जून, 2026) नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेसन से गिरफ्तार, आंदोलन के पक्ष में आवाज उठाने वाली, युवा कलाकार, श्रृष्टि के घर में फर्जी सबूत गढ़ने के पुलिस के प्रयास सीसीटीवी कैमरा में के फुटेज में आ गया। कैमरा देख पुलिस वालों ने फर्जीबाड़ा बंद कर दिया और कैमरा तोड़ने की कोशिश की। आंदोलन की शुरुआत के दिन, 11 अप्रैल को ही नोएडा की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि आंदोलन के ‘मास्टर माइंड्स’ को दबोचने का उनके पास पर्याप्त मसाला है तथा घरों और कारखानों से मजदूरों तथा मेट्रो स्टेसनों, सार्वजविक स्थलों एवं दफ्तरों से मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने वाले एक्टिविस्टों की गिरफ्तारियां होती रहीं। यह अलग बात है कि वे अभी तक अदालत में कोई सबूत पेश नहीं कर पाईं। वैसे, भारत और उ.प्र. की नशासक पार्टी, भाजपा से इनके करीबी संबंध भी चर्चा में हैं। इनके पति, भाजपा के विधायक हैं और नोएडा की जिलाधीश मेधा रूपम बहुचर्चित केंद्रीय चुनाव आयुक्त, श्री ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं।
सिद्धांतः स्वायत्त और स्वतंत्र समझी जाने वाली न्यायव्यवस्था का भी, व्यवहार में वही चरित्र होता है जो राज्य, यानि सरकार का। अपवाद स्वरूप. कभी कभी कुछ न्यायाधीश सिद्धांत को व्यवहार में भी लागू करते हैं और जगे जमीर की मिसाल पेश करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को 11 अप्रैल को मजदूरों के आंदोलन के सिलसिले में नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार किया और जमानत की संभावनाओं को निरस्त करने के लिए 13 मई को उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं थोप दी हैं। यूएनआई के पूर्व पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक, सत्यम वर्मा को 17 अप्रैल को, जनचेतना के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया। सत्यम वर्मा ‘मजदूर बिगुल’ अखबार में मजदूरों के पक्ष में लिखते रहे हैं। उन पर भी रासुका की धाराएं थोप दी गयी हैं, उनका मामला अभी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। गौर तलब है कि सत्यम दशकों से नोएडा गए ही नहीं हैं। 2 सितंबर, 2026 को इलाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव ने नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में अद्भुत और अभूतपूर्व फैसला सुनाया। इन जजों ने आकृति पर फर्जी, मनगढ़ंत आरोप लगाने और दुर्भावना से मजदूरों को प्रताड़ित करने के लिए उप्र पुलिस तथा नोएडा प्रशासन को तगड़ी फटकार लगाते हुए, रासुका के तहत आकृति की हिरासत को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया तथा उसे अवैध रूप से जेल रखने के 5 लाख मुआवजे का फैसला सुनाया। फैसले में जिलाधीश महोदया को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की पद के सपथ के उल्लंघन दोशी बताया गया और मुआवजे की रकम की वसूली उनके वेतन से करने का अभूतपूर्व निर्देश दिया।
आकृति पर रासुका की संस्तुति करते समय नोएडा की जिलाधीश ने चिंता जताया था कि आंदोलन से औद्योगिक क्षेत्र की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और निवेश बाधित होगा। जिलाधीश महोदया को जिले की जनता और मजदूरों की नहीं पूंजीपतियों के हितों की चिंता है।
जिलाधीश के विरुद्ध न्यायलय इस फैसले पर निजी चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार, मित्र ने कहा कि वह (मेधा रूपम) इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाएंगी और उसके पिता की ही तरह सरकार के हितैषी मुख्य न्यायाधीश, सूर्यकांत उन्हे राहत दिलाने का कुछ जुगाड़ जरूर करेंगे। उनकी बात सही निकली। मुख्य न्याधीश ने शीघ्रता दिखाते हुए उनके मामले को बारी के पहले ही सूचीबद्ध कर लिया और रोस्टर का उल्लंघन करते हुए, चुनाव आयोग के वकील रह चुके, न्यायाधीश महेश चंद्र शर्मा की पीठ में भेज दिया, जिसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतिकूल टिप्फणियों और जुर्माने पर अंतरिम स्थगन का आदेश दिया। वायर में छपी एक खबर के अनुसार वकीलों के संगठन “लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सीजेआई सूर्यकांत को पत्र लिखकर नोएडा डीएम मेधा रूपम की याचिका को मौजूदा रोस्टर से अलग पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने पर सवाल उठाए हैं. संगठन ने मामले की विशेष तौर पर सूचीबद्ध करने, सुनवाई की ऑडियो-वीडियो फीड सीमित किए जाने को लेकर चिंता जताई है. याचिका छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की रासुका के तहत हिरासत से जुड़े मामले से संबंधित है.” देश में, खासकर देश के युवाओं और मजदूरों में, मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध भी जनमत बन रहा है, जो कभी भी जनअसंतोष और जनाक्रोश में तब्दील हो सकता है। यहां भारत की प्रशासनिक या न्याय व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की न गुंजाइश है, न जरूरत, वे तो अलग-अलग व्यापक विमर्श के विषय हैं। मकसद यह बताना है कि आधुनिक यानि पूंजीवादी राज्य अपने विभिन्न अंगो के माध्यम से में पूंजीपतियों के सामान्य हितों के प्रबंधन की कार्यकारी संस्था है।
गौरतलब बात है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आ पायी है, क्योंकि रासुका की गिरफ्तारी निरस्त हुई है और भी कई मामले हैं, कुछ में जमानत हो गयी है, कुछ में बाकी है। आधुनिक राज्य का दोगलापन है कि वह कभी भी राजनैतिक आरोप नहीं लगाता बल्कि आंदोलन का राजनीति का अपराधीकरण करता है। नोएडा और गुड़गांव में फैक्ट फाइंडिंग के दौरान जनहस्तक्षेप की टीम को मजदूरों की गिरफ्तारियों और एफआईआर में दर्ज आरोपों में अद्भुत समानता देखने को मिली। ज्यादातर आरोपपत्रों में एक आरोप हत्या का प्रयास था। सभी पर कई कई मामले दर्ज हैं। हर मामले की अलग अलग जमानत की कोशिश करनी पड़ती है। 500-600 रु. की दिहाड़ी करने वाले मजदूर के लिए 50 हजार की जमानत का प्रबंध मुश्किल होता है। 25000 की जमानत की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान थी, 50000 की जमानत में सत्यापन की प्रक्रिया में बहुत समय लग जाता है। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता ने बताया कि बहुत से मजदूर जमानत के बावजूद, जमानती के सत्यापन प्रक्रिया की झंझटों के चलते अभी जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं।
आंदोलन से मजदूरों को बहुत ठोस फायदा नहीं मिला, जो भी नाममात्र की वेतन वृद्धि हुई वह मंहगाई में बढ़ोत्तरी की तुलना में बहुत कम है। इस आंदोलन से जो ठोस फायदा हुआ है वह है भविष्य में ज्यादा संगठित संघर्ष की उम्मीद बनी है। मुर्दा माहौल में ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों का आंदोलित होना आशा की एक किरण है कि इन संघर्षों मजदूरों के भविष्य के संघर्षों की प्रेरणा मिलेगी और संघर्षों के दौरान साझे हितों की चेतना विकसित होगी और मजदूर संगठित हो ‘अपने आप में’ वर्ग से ‘अपने लिए’ वर्ग बनेगा। उम्मीद करते हैं कि मजदूरों के संघर्ष के इतिहास की गाड़ी आगे बढ़ेगी।
जंतर मंतर 3
ज्ञानेश तो प्यादा है, लगता है, कॉक्रोचों को प्रतिरोध की राजनीति पर राहुल गांधी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाया गया है।
प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रतीकात्मक थी, वास्तविक मांग तो शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की होनी चाहिए थी, प्रधान की जगह ज्यादा दकियानूस, स्त्रीविरोधी बलात्कार समर्थक प्रहलाद जोशी आ गया है। ज्ञानेश जाएगा कोई इससे भी बड़ा खिलाड़ी आजाएगा। "सिर्फ हगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, ......... हमारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। इंकिलाब जिंदाबाद।
Tuesday, September 22, 2026
जंगलराज
यूपी में अपराधियों की बोलती तूती है
सत्ता में बैठे सबसे बड़े अपराधी हैं
कानून व्यवस्था जिनके पैरों की जूती है
जैसा देखा सबने जंतरमंतर पर
कुछ अपराधी सादे कपड़ों में होते हैं
कुछ खाकी वर्दी में सितारे टांके रहते हैं
कुछ शूट-बूट में रहते हैं
और कुछ गेरुआधारी हैं
बिहार तो नाम का जंगलराज
यूपी में जंगलराज का नाम है रामराज
दिल्ली दोश का राजधानी है
जंगलराज की रानी है
Saturday, September 19, 2026
Friday, September 18, 2026
सब याद रखा जाएगा
सब याद रखा जाएगा
बजरंगी नाज़ियों के गुनाहों पर बहस होगी
और इन बजरंगी नाजियों के हर गुनाह की सजा मुर्रर होगी।
Friday, September 11, 2026
बेतरतीब 192 (बचपन)
हमारे बचपन में हमारे गांव में पहला शहरी खेल वॉलीबॉल ही पहुंचा था, गांव के खेल (कबड्डी, झाबर, शुटुर्र या शुर्र, लखनी, गुल्ली डंडा आदि) तो थे ही। उस समय (1960-67) ब्लॉक में गांव स्तर पर युवक मंगल दल की खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिताएं होती थी। वॉलीबॉल में हमारे गांव की टीम ब्लॉक के अन्य गांवों में खेलने जाती थी और दूसरे गांवों की टीम हमारे गांव में आती थीं। ग्रामीण खेलों में टीमें बन जाने पर दोनों टीमों के कप्तानों (कुछ और कहा जाता था, भूल गया) के बीच गोंटी या पत्ता से लॉटरी से तय होता था कि मैं किस टीम में रहूं। एकाधबार ऐसा हुआ कि छुआ गया कि नहीं पर टीमों में झगड़ा हो जाता और खेल बंद होने की नौबत आ जाती। मुझे लगता कि खेल ही तो है चलता रहनी चाहिए और मेरा मामला होने पर, छूने या छुआ जाने के विरोधी टीम के दावे को मान लेता। इसलिए दोनों टीमों में मुझे बोझ ( Liability) समझा जाता था। 1967 में हाई स्कूल (कक्षा 9-10) की पढ़ाई करने जब शहर चला गया तब भा गांव आने पर अपने से जूनियर लड़कों के साथ खेलता, तब दोनों ही टीमें मुझे अपनी टीम में शामिल करने को तैयार रहतीं। अब तो गांव के काफी खेल खत्म से हो गए हैं, सभी आयु समूह के लड़के क्रिकेट ही खेलते हैं।
Thursday, September 10, 2026
जब भी हम सोचते हैं नए सिरे से शुरू करने को
जब भी हम सोचते हैं शुरू करने को
तब तक जो भी हो चुका हो
नए सिरे से शुरू करना हमेशा नया होता है
पुरानी मंजिलें पुरातन हो चुकी होती हैं
और इंतजार कर रही होती हैं नई मंजिलें
किलकारी मारते बच्चे बड़े हो चुके होते हैं
नए नग्में लिख रहे होते हैं नई पीढ़ी के
और हम कहते हैं
हर अगली पीढ़ी हमेशा तेजतर होती है
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गवाह बनती है
इतिहास की अनवरत यात्रा की
पाषाणयुग से साइबर युग तक।
(ईमि: 09.09.2026)
Tuesday, September 8, 2026
सियासत 5 (1857 के बाद औपनिवेशिक नीति)
एक पोस्ट पर कमेंट
विद्रोही औपनिवेशिक भारतीय सेना के सैनिकों की पहल पर, आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में 1857 की सशस्त्र किसान क्रांति औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकती यदि ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम जैसे भारतीय रजवाड़ों ने अंग्रेजों की दलाली में भारतीय आवाम की आजादी के संग्राम के साथ गद्दारी न की होती। औपनिवेशिक काल में भारतीय सामंती शासक वर्ग चरित्र अपने किसानों की स्वतंत्रता की कीमत पर औपनिवेशिक गुलामी को तरजीह देने का रहा है। आरा के रणबांकुरे कुंवर सिंह, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई और अवध की बेगम हजरत महल जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सारे रजवाड़ों ने 1857 के आंदोलन में भारतीय आवाम के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया था। क्रांति के दौरान (1857-58) कार्ल मार्क्स, लंदन में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर, न्यू यॉर्क ट्रिब्युन में अपने डिस्पैचेज में औपनिवेशिक लूट के विरुद्ध भारतीय आवाम के एकताबद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लगातार लिखते रहे। बाद में उनके लेखों का संकलन, 'प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम (The First Indian War of Independence)' शीर्षक से छपा। 1907 में क्रांति के पचासवें साल के उपलक्ष्य में वीडी सावरकर ने 'भारत का स्वतंत्रता संग्राम' (India's War of Independence)' शीर्षक से पुस्तक लिखी। यह सावरकर के जीवन का विप्लवी काल था। इसी अवधि की गतिविधियों के लिए औपनिवेशिक शाकों ने सावरकर को गिरफ्तार किया लेकिन सावरकर के क्रांतिकारी बुलबुले क्षणिक साबित हुए। औपनिवेशिक जेल की यातना से वे टूट गए और अंग्रेजों की बांटो राज करो नीति के मुहरे ही नहीं, सक्रिय एजेंट बन गए। 1857 पर1907 की अपनी किताब में सावरर ने भारतीय आवाम की , खासकर हिंदू-मुसलमान की एकताबद्धता की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। बजरंगी इस किताब को नहीं प्रचारित करते।
भारतीय रजवाड़ों और कुछ धनपशुओं की मदद से औपनिवेशिक शासक क्रांते का दमन करने में कामयाब तो रहे लेकिन भारी धन-जन की क्षति हुई। जिसका प्रतिशोध उन्होंने पकड़े गए क्रांतिकारियों के यातनापूर्ण दमन से लिया। आवाम में खौफ फैलाने के लिए, अवध के गांवों में सड़कों के किनारे पेड़ों में लटकाई गए विद्रोहियों के सिर की कहानियां हमारे बचपन तक जनश्रुति का हिस्सा थीं। औपनिविशक शासकों ने1857 की सशस्त्र क्रांति को कुचल तो दिया लेकिन भविष्य की ऐसी संभावनाओं ने उन्हें आतंकित कर दिया।
इन संभावनाओं को नाकाम करने के लिए उन्होंने, एक तरफ, बांटो-राज करो की नीति के तहत सांप्रदायिक विचारधारा की अवधारणा गढ़ी। औपनिवेशिक बुद्धिजीवियो/इतिहासकारों ने हिंदुस्तानियों के लिए हिंदू नस्ल और मुस्लिम नस्ल संबोधन इस्तेमाल शुरू किया। जिसका शोधपूर्ण विवरण जिसका शोधपूर्ण विवरण 1990 के दशक की शुरुआत में छपी ,जानेमाने इतिहासकार, ज्ञान पांडे की पुस्तक, Construction of Communalism in Colonial North India में देखा जा सकता है। सांप्रदायिकता की विचारधारा गढ़ने का मुख्य मकसद उपनिवेश विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करना था। इसके लिए दोनों ही प्रमुख समुदायों से उन्हें नामी-गिरामी दलाल मिल गए। सांप्रदायिकता यानि धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अनैतिहासिक अवधारणा ऐतिहासिक रूप से विकसित हो रहे राष्टवाद की अवधारणा के विरुद्ध साजिश के तौर पर गढ़ी गयी और इतिहास की विडंबना है कि उसे राष्ट्रवाद के पर्याय के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। धर्म आधारित राष्ट्रवाद की अवधारणा यदि ऐतिहासिक होती तो पाकिस्तान से टूट कर बांगलादेश क्यों बनता?
दूसरी तरफ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध बढ़ रहे जमअसंतोष को शांत करने के लिए शेफ्टी वॉल्व के तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ जिसे असंतोष को सुविधाओं के मांगपत्र के माध्यम से भटकाया जा सके। इतिहास में कईन बार अनचाहे (Inadvrtent) परिणाम नियोजित उद्देश्य से अलग और ज्यादा अहम हो जाते हैं। कालांतर में कांग्रेस शेफ्टी वॉल्व की बजाय उपनिवेश विरोधी आंदोलन का मुख्य मंच बन गया।
जारी.....
Friday, September 4, 2026
हत्यारों के ग्लोबल सरगना
हत्यारों के ग्लोबल सरगना के स्वागत के
विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम में मैं भी शामिल थाऔर सुना था उसकी प्रशंसा में आपकी यह कविता
और खुश हो रहा था कि
हत्यारा नहीं समझ पाया था प्रशंसा में छिपा व्यंग्य
और बच गया था
आपका नाम उसकी हिटलिस्ट में आने से
और सुन पा रहा हूं आज भी
प्रशंसा में लिप्त व्यंग्य की
आप की कविता
और करता हूं व्यक्त आभार
हत्यारों के ग्लोबल सरगना की नासमझी का
Wednesday, September 2, 2026
सियासत 4 (फासीवाद)
क्या यह फासीवाद नहीं है?
सोचिए आप सुबह की सैर पर निकलें और सादे वेश में, दो उठागीर आप को उठा लें और मीलों दूर एक थाने में लेजाकर बताएं कि उन्हें पूछताछ के लिए लेजाया गया और आपको पता चले कि वे उठाईगीर अमित शाह की दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल हैं, तो 1930-40 के दशक के नाजी जर्मनी या 1920-40 के के दशक के फासीवादी इटली की याद नहीं आएगी? आज तक पता नहीं चला है कि 20 जुलाई को जंतरमंतर पर कील लगी साठियों से बच्चों पर कहर ढाने वाले गुंडे कौन थे? सादी वर्दी में पुलिस वाले या भाड़े के?
कल चाणक्यपुरी में नेहरू पार्क सुबह की सैर करते वक्त जिन आशीष जोशी को बिना कारण बताए या घर वालों को सूचित किए , दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ वाले पुलिसकर्मियों द्वारा उठा लिया गया वे भारत सरकार की सेवा अतिरिक्त सचिव पद से हाल ही में रिटायर हुए विरष्ठ अधिकारी हैं। स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, उन्होंने सोसलमीडिया की अपनी एक्स पोस्ट में बताया कि स्पेसल सेल वाले उन्हें स्पेसल सेल के थाने फ्रेंड्स कॉलेनी ले गए थे और शाम को घर छोड़ गए। बाकी बातें बाद में बताएंगे।
स्क्रोल में छपी खबर के अनुसार, जोशी ने जंतरमंतर आंदोलन के दौरान, एक्स पर बच्चों पर निर्दयता से हमले को लेकर अमितशाह और गृह सचिव के बीच मतभेद को लेकर एक पोस्ट लिख दिया था। गृह सचिव बच्चों पर सख्त कार्रवाई के खिलाफ थे।
जब एक वरिष्ठ रिटायर अधिकारी को सोसल मीडिया पर लिखने के लिए उठा लिया जा सकता है तो आम आदमी का क्या? लोगों में खौफ पैदा करने की ऐसी कार्रवाई फासीवाद का लक्षण नहीं है? भक्त कहेंगे दिन भर थाने में रखने के बाद छोड़ तो दिया गया! अगर उन्हें पूछताछ के लिए ले जाना था या गिरफ्तार करना था तो सरकार को कानूनी प्रक्रिया का पालन तो करना था।
मार्क्सवाद 358 (नोएडा मजदूर आंदोलन )
इस सत्योत्तर (Post truth) युग में भी कभी कभी न्यायालयों में न्याय भी हो जाता है, न्याय करने वाले न्यायाधीशों को सलाम, आकृति को लाल सलाम। सत्यम को अविलंब रिहा किया जाए। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक पीठ ने उप्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए, नोएडा के मजदूर आंदोलन के सिलसिले में एनएसए के तहत बंद एक्टिविस्ट छात्रा आकृति चौधरी को रिहा कर दिया और नोएडा की डीएम के वेतन से 5 लाख रु. मुआवजे का आदेश दिया। नोएडा की डीएम के वेतन से आकृति को मुआवजा का आदेश तुरंत लागू हो इससे ऊपर तक पहुंच रखने वाले नौकरशाहों की मनमानी पर रोक लगेगी। गौरतलब है कि नोएडा की डीएम मेधा रूपम वोट चोरी मुख्य अभियुक्त ज्ञानेश कुमार (मुख्य चुनाव आयुक्त) की बेटी हैं।
Monday, August 31, 2026
हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी
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कई देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी-उर्दू विभाग एक ही हैं क्योंकि दोनों भाषाओं में केवल लिपि का अंतर है, जिसे हिंदुस्तानी कहा जहा जा सकता है। 1919 के कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में प्रस्तावित किया था, जिसे गैरहिंदी भाषी प्रतिनिधियों का समर्थन भी प्राप्त था। हिंदुस्तानी से गांधी का आशय उत्दीतर भारत में बोली जाने वाली भाषा से था जिसे कुछ लोग फारसी लिपि में लिखते थे और कुछ नागरी में।-शुद्धतावादियों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की वकालत की।
1949 में राष्ट्रीय संपर्क भाषा के प्रश्न पर सविधान सभा हिंदी-हिंदुस्तानी पर तीखी बहस के बाद मतदान हुआ और दोनों पक्षों में समान मत पड़े, अंततः राजेंद्र प्रसाद के कास्टिंग वोट से हिंदी को स्वीकृति मिली।
फारसी लिपि में छपी हिंदी रचनाएं पाकिस्तानी उर्दू भाषियों के लिए उसी तरह सुगम हैं जैसे नागरी में छपी मंटो की कहानियां या हबीब जालिब के नज्में हिंदी भाषी हिंदुस्तानियों के लिए। प्रेमचंद पहले उर्दू में ही लिखते थे। उर्दू के कुछ बड़े उपन्यासकार- कहानी कार हैं, कृष्ण चंदर, 'शिकस्त' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है;राजेंद्र सिंह बेदी: विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर लिखने वाले महान कहानीकार; 'एक चादर मैली सी' उनका मास्टरपीस है।रतन नाथ धर 'सरशार': उर्दू के शुरुआती उपन्यासकारों में से एक। उनका उपन्यास 'फ़साना-ए-आज़ाद' मील का पत्थर माना जाता है। हमारे मित्र हैं, प्रोफेसर आसिफ नक्वी, म्युजिऑलॉजी के प्रोफेसर थे, उर्दू में अफसाने लिखते हैं और शायरी करते हैं, नागरी पढ़ लेते हैं , लेकिन मंद गति से। मैं उनकी कविताएं उसी तरह अच्छी करह समझ लेता हूं जिस तरह हबीब जालिब, इब्ने इंशां या फैज की।
Saturday, August 29, 2026
सियासत 3 (भौगोलिक सीमाएं)
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दुनिया की सभी भौगोलिक सीमाएं ऐतिहासिक रूप से खींची गयी नकली सीमाएं हैं। हिंद-पाक की सीमा तो अनैतिहासिक है जो उपनिवेश-विरोधी आंदोलन की विचारधारा के रूप में उभर रहे भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के कृत्रिम शगूफे छोड़े, फैलाए और हिंदू-मुस्लिम नाम पर खून खराबे करवाए और पूर्व (बंगाल) और पश्चिम ( पंजाब) में मनमानी लकीरें खींच दी। औपनिवेशिक शासक अपने हिंदू-मुस्लिम दलालों की मदद से भारत राष्ट्र के टुकड़े करने में सफल रहे और बंटवारे का घाव अभी तक नासूर बन टपक रहे हैं। फैज़ के शब्दों में, "खून के धब्बे धुलेंगे, कितनी बरसातों के बाद"। यदि धर्म राष्ट्रवाद का ऐतिहासिक आधार हो सकता तो भाषा के नाम पर पाकिस्तान के दो टुकड़े क्यों होते? मुझे एक बार (बहुत पहले) कहीं एक सिंधी, पाकिस्तानी स्त्री से परिचय हुआ। उसने सवाल किया कि मैं उससे उर्दू की बजाय अंग्रेजी में क्यों बात कर रहा था, मेरे कहने पर कि मुझे उर्दू नहीं आती तो हंसने लगी, बोली कि इतनी अच्छी उर्दू तो बोलता हूं, मेरे यह कहने पर कि यह तो हिंदी है, वह बोली एक ही बात हुई। उसने शिकायत की हिंदुस्तानी मुजाहिरों ने उर्दू थोपकर उनकी भाषा (सिंधी) को दोयम बना दिया।
Thursday, August 27, 2026
नास्तिकता
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मैं वृद्धावस्था में नहीं, किशोरावस्था (17 साल) में ही नास्तिक हो गया था औग 18-19 साल में भगत सिंह का नास्तिकता पर लेख ने नैतिक समर्थन प्रदान किया तथा उसके एकाध साल बाद भगवान के अस्तित्व पर वोल्नटेयर द्वारा लगाए प्रशनचिन्ह ने बौद्धिक औचित्य। मैं कर्मकांडी पुरोहित नहीं था, न ही पुरोहिती परिवार में पैदा हुआ था, कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ पला। मेरा कहने का आशय केवल इतना है कि एक कर्मकांडी परिवेश के बालक की प्रामाणिक नास्तिकता की यात्रा कठिन, आत्मान्वेषी आत्म संघर्ष की यात्रा थी। भगवान के भय का आतंक भीषण था। नास्तिकता की मंजिल पर पहुंच कर भगवान के भय से मुक्ति के आत्मसुख की अनुभूति अद्भुत थी। लोग कहते थे बुढ़ापे में भगवान ही याद आते हैं, अब तो लगभग 72 का हो गया अभी तक तो नहीं बाद आए। यदि व्यक्ति भूत और भगवान के भय से मुक्त हो जाए तो वह निर्भय हो जाता है।
