धनपशुओं को बनाना कुछ नहीं आता, बनाते तो हम मजदूर हैं, उत्पादन के साधनों पर धनपशु काबिज हैं, वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी उन्हीं का नियंत्रण होता है, जिनका आर्थिक उत्पादन के साधनों पर। इसलिए इस युग को धनपशुओं का युग या पूंजीवाद कहा जाता है। पूंजीवाद केवल माल का उत्पादन ही नहीं करता, विचारों का उत्पादन भी करता है। शासक वर्गों के विचार शासक विचार भी होते हैं, जिन्हें युग का विचार या विचारधारा कहा जाता है। विचारधारा शोषक (शासक) और शोषित (शासित) दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है।युग की विचारधारा युग की सामाजिक चेतना कोो भी प्रभावित करती है। शासक विचारधारा के प्रभाव न सिर्फ धनपशु और उसके बौद्धिक एजेंट ही यह सोचते हैं कि मजदूर धनपशु का कृपापात्र है बल्कि मजदूर भी यही सोचता है, जबकि हकीकत उल्टी है, मजदूर धनपशु का कृपापात्र नहीं होता, बल्कि धनपशु मजदूर का कृपापात्र होता है जिसका खून चूसकर वह तोंदिल हो जाता है। मर्दवादी सामाजिक चेेतना के प्रभाव में न सिर्फ पुरुष ही लड़की को बेटा कहकर शाबाशी देेतेेे हैं, बल्कि लड़की भी उसे शाबाशी ही समझती है। मर्दवादी सामाजिक चेतना से मुक्त लड़कियां बेटा कहने पर प्रतिरोधस के स्वर में जवाब देती हैं कि ' माफ कीजिए, मैं बेटा नहीं बेटी हूं'। जब मजदूर इस विचारधारात्मक फरेब से वाकिफ हो वर्गचेतनासं लैश संगठित हो उत्पादन के साधनों पर धनपशुओं का कब्जा उखाड़ फेंकेगा और उनपर उत्पादकों (मजदूरों ) का सामाजिक (सामूहिक) नियंत्रण स्थापित करेगा तब धनपशुओं को धरना नहीं देना होगा क्योंंकि उन्हें भी उत्पादक होने का समान गर्व प्रदान कर स्वतंत्र कर दिया जाएगा। जो स्वतंत्र होने से मना करेगा उसे स्वतंत्र होोने को बाध्य किया जाएगा क्योंकि परतंत्रता अमानवीय है और किसी का अधिकार नहीं होो सकता। एक मेरा सहपाठी ऊंची सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानृवृत्ति लेकर, गांव में पैतृक संपत्ति की खेती बंटाई पर देकर रहने लगा। एक बार बातचीत में मैंने उसे बताया कि उसका बंटाईदार उसके टुकड़ों पर नहीं बल्कि वह अपने बंटाईदार के टुकड़ों पर पलता है। मजदूर धनपशुओं केे टुकड़ों पर नहीं बल्कि धनपशु उसके टुकड़ों पर पलता है। मजदूर कौन है? जो भी भौतिक या बौद्धिक श्रमशक्ति बेंचकर रोजी कमाताा है, वह मजदूर होता है। धनपशुओं के कारिंदे मजदूरोंं को लंपट सर्वहारा कहा जाता है और अधिक मजदूरी पाकर खुद को शासकवर्ग (पूंजीपति वर्ग) का हिस्सा होने का भ्रम पालने वाले मजदूर को लंपट बुर्जुआ कहते हैं। फैज अहमद फैज ने लिखा है, 'हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेगे।'
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