आदत है उसकी कसम खाने की
आदत
है उसकी कसम खाने की
और
कसमों के मसविदे बदलने की भी
आदत है उसकी कसम खाने की
आदत
है उसकी कसम खाने की
और
कसमों के मसविदे बदलने की भी
आत्मालोचना का अभाव भारत का या यों कहें कि मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति लगती है। गांधी जी उपनिवेशवाद के कारणों के विश्लेषणों में भारतीयों को आगाह करते हैं कि यदि वे अपनिवेशवाद के कारण अपने अंदर न ढूंढ़कर बाहर ही ढूंढ़ते रहेंगे तो निदान नहीं खोज पाएंगे। आत्मालोचना ही बौद्धिक विकास की कुंजी है। मैं बचपन में सोचा करता था कि मेरे गांव में खेत-मजदूरी एवं अन्य श्रम के काम करने वाली एक अछूत जाति के लोग संख्या में सवर्णों से बहुत अधिक हैं तथा श्रम करने से, कहा जाता है, बल भी अधिक होता है तो 'स्वेच्छा' से इतना दबकर क्यों रहती हैं? तब तक सामाजिक चेतना के निर्माण में शासक वर्गों के विचारों की भूमिका और व्यक्तिगत या विशिष्ट समूह की सामूहिक चेतना पर सामाजिक चेतना के प्रभाव की बातें मालुम नहीं थीं। शिक्षा तथा अन्यान्य कारणों से पैदा दलित प्रज्ञा और दावेदारी के प्रभाव से उत्पन्न दलित चेतना का रुख जाति के विनाश की तरफ न होकर जवाबी जातिवाद की तरफ है। असमानता का निदान जवाबी असमानता नहीं, समानता है। मुझे लगता है कि जातीय अस्मिता की राजनीति अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुकी है, अब उसके जनवादीकरण की जरूरत है। मुझे लगता है कि अब जातीय अस्मिता की राजनीति धार्मिक अस्मिता की राजनीति (सांप्रदायिक फासीवाद) की ईंधन-पानी बन चुकी है। आत्मालोचना की प्रवृत्ति के अभाव में, सवर्ण जातियों का बड़ा हिस्सा भक्तिभाव से ग्रस्त है और प्रसाद की लालच एवं मिख्या चेतना के प्रभाव में शूद्र (ओबीसी-दलित) जातियों का उल्लेखनीय हिस्सा।
किसी ने पूछा, पूरे दिल्ली विश्वविद्यालय में आपकी ही पेंसन क्यों रुकी हुई है? मैंने कहा नतमस्तक मसाज में सिर उठाकर जीना मंहगा शौक है। बचपन से ही इस शौक की आदत पड़ गयी। इस शौककी कीमत लगातार चुकाता़ रहा, यह भी उसी की किश्त है। नतमस्तक समाज में सिर उठा कर जीने के शौक की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है लेकिन अपनी शर्तों पर जीने का सुख भौतिक कष्टों पर भारी पड़ता है। सोचा था कि कम्यूटेसन के पैसों में से गांव में 2 कमरे बनवा लूंगा, कभी-कभार महीने-दो महीने का शहर से अवकाश लेने के लिए, लेकिन हवा को पीठ न देने के चुनाव में हवा के थपेड़ों से दो हाथ करना ही पड़ता है। हर सोचा काम पूरा नहीं होता। बहुत कुछ लिखने की सोचता हूं, लेकिन इसमें इस शौक का नहीं बौद्धिक आवारागर्दी और अनुशासनहीनता की भूमिका है।
मेरे पुराने स्टूडेंट मिलने पर अक्सर मित्रवत व्यवहार के लिए आभार व्यक्त करते हैं, "Sir, we are grateful to you, you treated us so friendly". मैं कहता हूं कि पहली बात तो आपने मेरी कोई फसल नहीं काटी है कि शत्रुवत व्यवहार करूं। दूसरी बात यह कि मैं ऐसा अपने स्व-हित में करता हूं। आनंद या सुख के वीसतविक अर्थ में, किसी भी रिश्ते में तभी सचमुच का आनंद मिलता है यदि वह जनतांत्रिक, पारदर्शी और समतामूलक हो। समता एक गुणात्मक अवधारणा है, मात्रात्मक इकाई नहीं। श्रेणीबद्ध संबंधों में, वर्चस्व की स्थिति में आनंद (खुशी) नहीं, खुशी की खुशफहमी मिलती है। समता के अनमोल सुख की महत्ता से अनभिज्ञ तमाम अभिभावक और शिक्षक टेंसन सिंह बने फिरते हैं, खुद भी टेंसन में रहते हैं और बच्चों को भी टेंसन देते हैं।
एक धर्मभीरु, कर्मकांडी ब्राह्मण बालक की धार्मिकता से नास्तिकता तक की यात्रा की दो साल पहले की एक पोस्ट पर एक मित्र ने पूछा कि नास्तिकता के क्या लक्षण होते हैं? और यह कि एक शादीशुदा ढोंगी बच्चों के साथ नास्तिक रह सकता है क्या? उसका जवाब:
अयोध्या में उमड़ा जनसैलाब धार्मिक नहीं, धर्मोंमादी राजनैतिक जनसैलाब है। अडवाणी की राम रथयात्रा से शुरू होकर बाबरी विध्वंस के रास्ते प्राणप्रतिष्ठा तक रामलला के नाम पर बहुत रक्तपात तथा बुलडोजरीकरण हो चुका है। यही रामराज्य है? यह धार्मिक नहीं धर्मोंमादी राजनैतिक मूर्ति है, वैसे भी किसी उपन्यास या महाकाव्य के पात्र को ऐतिहासिक बनाना भविष्य की पीढ़ियों को अनैतिहासिकता के अंधे कुंए में झोंकना है। बुद्ध के बाद हमारा समाज अभी तक अगली प्रबोधन क्रांति की प्रतीक्षा में है।
वैसे तो जंगलों का भी अपना दस्तूर होता है