Thursday, February 28, 2013

The Price of the Bread


मित्रों "रोटी का दाम" शीर्षक की अपनी  तुकबंदी का मैंने अंग्रेजी अनुवाद का प्रयास किया है जो कि अपने ही किसी लेखन के पद्यात्मक अनुवाद का मेरा पहला प्रयास है.भाषागत एवं अन्य  सुधार के सुझावों के लिये कृतग्य महसूस करूँगा.

The Price of a bread
Ish Mishra

Counselled a noble man to a poet in a biblical tone
Helping poor shall invite the curse of stupor in Society.

Giving a bread to this girl dying from hunger
is to make the species of poor a sluggish lump  of mass.

The poet answered non-poetically
Why is your belly so fat sir?

This is the unfounded vanity of the affluent
as hunger is just a theoretical concept to him.

This is cribbing of the species of the gainfully unemployed
who echo the queen, eat the cake if you don't have the bread.

This is the preaching of those in love with the world
in which the producer begs for a bread.

The distraught girl crying for a bread
does not lack the laboring power and creative will.

If  was the labor guarantee of the bread
She would climb the peaks of Everest

She is hungry not because she has parasitic nature
But because the wankers control the means of labour

If the hording of bread by scoundrels stops
there would be no dignified hand stretched to beg a bread.

Let us together wage a war against hunger
and create a new world of human emancipation
a world in which there are no sky scrappers and no slums
a world in which workers are not freed from means of labour
a world in which no one starves and there is no gainfully unemployed

कायरतापूर्ण पलायन है खुदकुशी


कायरतापूर्ण पलायन है खुदकुशी
नकली जहर पीते हैं  नाकाम आशिक
सहानुभूति की की उम्मीद में
कहते हैं जहर था अमृत माफिक
न जी पाते हैं न मरते ऐसे डरपोक
होते नहीं ये अभागे ज़िंदगी के सुख से वाकिफ
[ईमि/२८.०२.२०१३]

Wednesday, February 27, 2013

लल्ला पुराण ७१


  • Most of us do all the immoral acts to make more and more money in the name of children without asking them. Ask any corrupt official, answer would be for children.Around a decade ago,  I was at a place of a promoted IPS in Guwahati, his son, a student of mine,(then a JNU student and IAS aspirant, now an IAS) joined us for a drink on our request. After a drink, he asked the father, "Dad can I ask you one question?", father: "Go ahead' . Why do you need to go on making more and more money by corrupt means, when we do not need any more". The father was stunned and hopefully would stopped making corrupt money after that, do not know.





 वह लड़का ईमानदार है या नहीं कह नहीं सकता.

मसूरी की ट्रेनिंग के बाद से मुलाक़ात नहीं हूँ. लेकिन मैं तो शिष्य-मित्रों को समझाता रहता हूँ कि यदि वे भ्रष्ट और उसूलों की ज़िंदगी मे आत्महित की तर्कसम्मत गणना करें तो पायेंगे कि दूसरी तरफ ज्यादा + हैं. जिसे समझ आ जाए वह भाग्यशाली है क्योंकि मन का बौद्धिक सुख इन्द्रियों के भैतिक सुख से श्रेष्ठतर है. यह आध्यात्मिक नहीं, भौतिकवादी समझ है. हर बैच में ४-६ को भी यह समझ आ जाती है तो अपने को भाग्यशाली समझता हूँ. पूंजी के निजी स्वामित्व और श्रम-दासता पर आधारित आधुनिक व्यवस्था भविष्य की अज्ञात-अमूर्त असुरक्षा के नाम पर सब्जबाग का भ्रम बेचती है. पूंजीवाद में संचय सिर्फ पूंजी पति ही कर सकता है बाकी संचय के भ्रम में आजीवन तनाव और अपराधबोध में स्वामित्व का गुमान पाले दुखी आत्मा की तरह मर जाते हैं. भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों का अगर उदाहरण लें. एक अधिकारी को सुविधासंपन्न जीवन का वेतन मिलता है अगर पति-पत्नी दोनों उस कोटि में हैं तो तनाव होना चाहिए कि इतने पैसों का क्या करें? भ्रष्टाचार और दलाली करने वाले अधिकारी अंतरात्मा बेचकर, खोखले इंसान के रूप में पैसे और ताकत के गुमान की दयनीय ज़िंदगी जीते हैं और बनिए से पैसा लेकर शेयर-ब्रांड-बीमा-फिक्सेद डिपाजिट-बेनामी संपत्ति आदि में वह पैसा उसी बनिए(कृपया इसे जाति के अर्थों में न लें) को वापस कर देता है, या नाल्को के पकडे गए निदेशक की तरह ४० किलो सोने के बिस्कुट ब्बैंक के लाकर में रख कर मर जाता है. खाता-पीता तो अन्न-मांस और शराब ही है. यानि कि मुफ्त में खुद को बेचता है और कहीं संयोग से पकड़ा गया तो.........                                                     

International Proletariat 26

Please do not take it otherwise, it is not drastically different elsewhere, but Americans are worst in understanding/comprehending the political economy; sociology and human nature and dignity. I had written a poem in Hindi on a post on fb with a picture, of  a beautiful girl in thatchers with grim expressions and stretched hands begging for a bread. The pic was accompanied by a well argued poetry advising people not to make her more fragile by giving her bread but she should work it out for herself. My poetry in response has argued that she is not hungry because she does not want to work but because the means of labour are owned by scoundrels who do not work at all. Capitalism/liberalism is bastard system. it does not do what it says, it does not say what it does. It provides your with freedom to choice of occupation but appropriates all the means of that choice to itself. Rest again. Last sentence: All the human beings wish to live, given a choice, a life of dignity and realization of their creative potentialities but they cant under the system of wage slavery under capitalism. A worker is free in twin ways: He is free to sell his labour and equally free to kill himself.

Monday, February 25, 2013

लल्ला पुराण ७०


Vinay Pratap  मित्र, मैंने आपको नहीं खुद के बारे में कहा कि मैं एक कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मण परिवेश में पैदा हुआ और पला और १३-१४ साल में जनेऊ तोड़ने से नास्तिकता के रास्ते पर बढ़ने के पहले स्नानोपरांत शिव-लिंग की पूजा के बाद ही जलग्रहण करता था. आपने लेनिन से शुरू करके इतने सवाल उठाये हैं कि उनका जवाब यहाँ संभव नहीं है. समाजवाद के संकट पर मैंने १९९२ में एक लंबा लेख लिखा था, खोजकर कभी पोस्ट करूँगा. प्रोफ़ेसर रंधीर सिंह की मोटी पुस्तक, "Crisis of Socialism" इन मुद्दों पर समुचित प्रकाश डालती है. कार्ल मार्क्स कोइ पैगम्बर नहीं थे, हमारी आपकी तरह हांड-मांस के सूक्ष्म और पैनी प्रज्ञा के साधारण इंसान थे जिन्होंने अपने समकालीन समाज की एकल वैज्ञानिक व्याख्या की और मानव-मुक्ति के लिए शोषण-विहीन, वर्ग-विहीन समाज के निर्माण की कामना. भविष्य के इस मानव-मुक्ति के समाज की रूपरेखा उन्होंने भविष्य की पीढ़ियों की प्रज्ञा पर छोड़ दिया. मार्क्स को पैगम्बर मानाने वाले मूर्खों का मजाक बनाने के ही लिए हंसी में कहा था, "शुक्र खुदा का कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ". मार्क्स के बाद के मार्क्सवादी विद्वानों ने मार्क्सवाद को बहुत समृद्ध किया है, इतिहास में परिवर्तन के साथ मार्क्स की कई मान्यताओं में की आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं. ग्राम्सी का वर्चस्व का सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद को काफी आगे ले जाता है. भूमंडलीकरण में उत्पादन के अनौपचारिक्करण और   आउटसोर्सिंग ने मार्क्स की श्रम-समाजीकरण की अवधारणा को ही ध्वस्त कर दिया और श्रम, के समाजीक्लारण और अपने आप में वर्ग से अपने लिए वर्ग के नए सिद्धांत विक्सित कर्मणे में दुनिया भर में तमाम मार्क्सवादी लगे हुए हैं.

मैंने न तो आपको न आपके पिताजी को बेवकूफ कहा है न आपको. मेरे पिताजी तो एक साक्षर किसान थे और विरासत में मिले  पारंपरिक ज्ञान से आगे बढे ही नहीं थे. आपके पिताजी ने किस सन्दर्भ में मार्क्सवाद को दल में नमक कहा था मुझे नहीं मालुम, शायद उन्होंने उसी तरह परिहास किया होगा जैसे मार्क्स ने मार्क्सवादी न होने के लिए खुदा का शुक्रिया अदा करने का परिहास किया था, मैंने भी  उस परिहास को अंतिम सत्य मांन लेने की आप की अदा पर परिहास ही किया था. सभी से मेरा एक ही आग्रह रहता है कि सार्वजनिक मंचों पर निर्णायक वक्तव्य कही-सुनी बातों या अफवाहों के आधार पर नहीं देना चाहिये जैसा कि हम हिंदुस्तानियों की आम आदत है. हमारे पूर्वज सर्वज्ञ नहीं थे कहने से उनका अपमान नहीं होता क्योंकि इतिहास की गाड़ी में बैक गेयर नहीं होता. मेरे दादा जी पंचांग के कट्टर अनुयायी और इतने कर्मकांडी थे कि भगवान का भोग लगे बिना बच्चों को भोजन नहीं मिल सकता था इस लिए मरती दादी ने मुख्य रसोई से अलग आँगन के एक बरामदे एक छोटा चूल्हा बनाया था. सुबह ७ बजे ऊबड़-खाबड पैदल के रास्ते घर से २४-२५ किमी दूर आठवीं क्लास के परिक्षा केन्द्र पहुँचने के लिए रात १२ बजे मुहूर्त पर ही निकले थे. यदि मैं इन अंधविश्वासों का खंडन करता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि दादाजी को बेवकूफ समझता हूँ! बल्कि जीवन में जिन लोगों का अतिसम्मान करता हूँ उनमें मेरे स्वर्गीय दादा जे हैं. टेक्स्ट को कांटेक्स्ट में पढ़ने की आवश्यकता होती है. मेरी बातों से यदि आपको लगा हो कि मैंने आपके पिताजी को बेवकूफ खा है तो क्षमा चाहता हूँ, वैचारिक मतभेद के बावजूद सम्मान प्रकट करता हूँ उन्हें मेरा प्रणाम संप्रेषित करें.    

लल्ला पुराण ६९

Ashutosh Srivastava and Shriniwas Rai Shankar  आप लोगों की चीन-युद्ध और इस्लाम के तुलनात्मक अध्ययन कला श्रोत क्या है? बिना भूमिका भी पढ़े पुस्तक की फतावानुमा समीक्षा हमारी मुल्क में स्थापित परम्परा है, आप लोग उसे ही आगे बढ़ा रहे हैं? युद्धोन्मादी देश-भक्ति हर तरह के दुष्टों/हरामखोरों/लुटेरे-कमीनों की शरणस्थली रही है. अपने दिमागों में भरे जहालत के कूड़े को बाहर निकालें तभी उसमे कुछ ट्रक घुस पायेंगे. भारत-चीन युद्ध के दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखागार, जनपथ, नेरे दिल्ली में उपलब्ध हैं थोड़ा कष्ट करें तो हकीकत मालुम हो जायेगी. हम मार्क्सवादी, क्रांतिकारी जन-युद्धों के अलावा सभी युद्धों की मुखालफत करते हैं. चीन का नेतृत्व लगातार आग्रह कर रहा था कि सीमा पर सेना का जमावडा नहीं होना चाहिए वरना वे भी जवाबी कार्रवाई करेंगें. लेकिन कृष्णामेनन के सर पर केनेडी और ब्रज्नेव दोनों का वरदहस्त था, वे नहीं माने. चीनी जनसेना ने अपने ही शासकों की सेना/पुलिस को १२ साल पहले ही धुल चाताक्लर क्रांतिकारी सत्ता की स्थापना की थी, और हमारी सेना अंग्रेजों द्वारा हिंदुस्तानियों पर हुकूमत वके लिए बनाई गयी भाड़े की सेना थी जो १५ साल पहले तक अंग्रेज मालिकों के आदेश पर हिन्दुस्तानी आवाम पर कहर बरपाती थी. अंग्रेजों द्वारा कहदी बादे की सेना जन-सेना के सामने नहीं टिक सकती थी. दुनिया के युद्धों के इतिहास शायद यह एकमात्र उदाहरण होगा जब विजयी सेना एक तरफा युद्ध-विराम घोषित करके भागती विपक्षी सेना को कहे कि भागो मत और छिपे और पड़े घायलों का इलाज़ करे क्योंकि अंग्रेंजों द्वारा बनाई हिन्दुस्तानी सेना के पास स्ववास्थ्य-शिविर लगभग नदारत थे.ये बातें आपको रासह्त्रीय अभिलेखागार्ट के दस्तावेजों में मिल जायेंगी क्योंकि ३० साल से अधिक पुराने गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध होते हैं. इसी अभिलेखागार में १९४२ में सार्वरकर द्वारा "भारत छोडो आंदोलन" केर विरुद्ध अंग्रेजों के लिओये सैनिक भर्ती के और अटल बिहारी वाजपाई द्वारा क्रांतिकारियों की मुखबिरी के भी दस्तावेज उपलब्ध हैं. मैं तो चीन-युद्ध के समय ५ साल का बालक था. आग्रह सिर्फ इतना है कि तथ्यों-तर्कों के आधार पर बात रखें, दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों के आधार पर नहीं.   

लल्ला पुराण ६८

एक प्रथक बटोही नामक सज्जन ने मुझे संबोधित करके मार्क्सवाद का मर्शिया का एल थ्रेड पोस्ट लिया उनका वक्तव्य और अपना कमेन्ट कापी-पेस्ट कर रहा हूँ:

Prathak Batohi सर जो बात मैं लिखने जा रहा हूँ उसे आप व्यक्तिगत मत लीजिएगा ये पूरी पीढ़ी के लिए मेरा मत है बुरा मत मानियेगा आप लोगो की खेप आखरी है इसके बाद मार्क्सवाद निपट जाएगा, पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर भगवान् के अतिरिक्त किसी की भक्ति में विश्वास नहीं है. ना ही इस बात का डर की इस बात से ये हाइकमांड नाराज़ होगा उस बात से ये पोलित ब्यूरो
7 hours ago · Like

Ish Mishra हमारे गाँव में एक कहावत है कि गिद्ध के मनाने से डांगर नहीं मरते, मार्क्सवाद को निपटाते-निपटाते कितने ही पातकी इतिहास के कूड़ेदान में सड गए. आप जैसे भगवान-भक्तों के कीर्तन से मार्क्सवाद खत्म होता तो दुनियाँ भर के पूंजी और फिरकापरस्ती के दल्लों के सिर पर मार्क्सवाद और नक्सलवाद का भूत न सवार रहता. किसी ओझा की मदद लीजिए. भगवान आपको सद्बुद्धि दे अगर उसके पास खुद हो तो!! मार्क्सवाद के नाम से आप जैसे लोगों की बौखलाहट देख काफी सकून मिलता है. मार्क्स के जीवनकाल से ही लोग मार्क्सवाद का मर्शिया पढ़ रहे हैं, लेकिन आजतक दुनिया भर के भूमण्डलीय पूंजी के दलालों को मार्क्सवाद लगातार परेशान कर रहा है. मोदी का चरणामृत ग्रहण कर चैन की नींद सोंये क्यों बेचैन हो रहे हैं. ज्यादा दर लगे तो हनुमानचालीसा पढ़ लें.
about an hour ago · Edited ·


इस पोस्ट पर आये कुछ कमेंट्स पर मेरे दो कमेन्ट:

Vinay Pratap मेरा बचपन कट्टर ब्राह्मणीय कर्मकांडी माहौल में बीता है जिसमें यह बताया जता था कि हनुमान चालीसा पढ़ने से भूत का भजे क्ल्हतं हो जाता है, इसी लिए मैंने मार्क्सवाद के भूत से भयभीत बटोही साहब को सलाह दी हनुमान चालीसा पढ़ने के लिए, टीआरपी के कारण नहीं. हाँ आपने अपने पिता  से जो सुना मार्क्सवाद के बारे में उससे आगे जानने का प्रयास नहीं किया. बाकी आप हनुमान चालीसा पढ़ें, संतोषी चालीसा पढ़े या लालू/मोदी चालीसा पढ़ें मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? संस्कारों में मिले ज्ञान/अज्ञान पर अडिग रहने के लिए आपको साधुवाद.मैंने तो अपने संस्कारों को १३ साल ममे जनेऊ तोड़ने के साथ ही छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया था. मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि आपके पिता(अपने ही पिता के तरह उन्हें नमन, लेकिन पते में कौन ठकुरई, बचपन में मेरी 'बहुत अच्छे बालक की छवि को पहला धक्का तब लगा जब लोगों को पता चला कि मैं तो अपने पिता/दादा से भी तर्क-वितक करता हूँ) ने मार्क्सवाद कसा 'म्' भी नहीं पढ़ा होगा और आपने भी उन्ही की परम्पसरा को आगे बढ़ाया अन्यथा मार्क्सवाद के बारे में दाल-नमक के ज्ञान से थोड़ा आगे बढते. आप सही कह रहे हैं कि मार्क्सवाद की नैतिकता उसकी एक प्रमुख अवधारणा "THEORY OF PRAXIS" यानी कथनी और करनी की द्वंद्वात्मक एकता में निहित है. मैं तो संस्कारों में मिली नैतिकता को इतना छिन्न-भिन्न कर चुका हूँ कि मेरे दादा जी, एक "उच्चकुलीन"कट्टर ब्राह्मण जो अपने पोते/पोती की शादी किसी "निम्नकुलीन" ब्राह्मण में भी नहीं करते, उनके पोते को मालुम भी नहीं कि उनकी परपोती जिस विजातीय/कुजातीय बालक  से शादी करने जा रही है, उसकी जाति/धर्म  क्या है? वैसे बचपन में ही न कर दिया होता तो यह "कुकर्म" उनके जीवनकाल में ही शायद उनका पोता ही कर देता. मित्र बिना भूमिका भी पढ़े किसी पुस्तक की फत्वानुमा समीक्षा से थोड़ा परहेज करें, शिक्षकों के लिए यह नसीहत ज्यादा जरूरी है. अन्यथा Praveen Hrb जाप का मशविरा आपके लिए उचित होगा.

Shashank Tiwari  शुक्रिया कि आपने मार्क्सवादियों को ईमानदार तार्किक और विचारवान बताया वैसे उन्हें आपकी सनद की जरूरत नहीं है, साथ यह भी कहा वे तर्कसम्मत नहीं हैं. logical and rationality में अंतर स्पष्ट करेंगे? मैं खुर्शीद का सवाल दुहराता हूँ कि आपने मार्क्स (या गांधी) की कौन सी पुस्तक/लेख पढ़ा है कि दोनों के तुलनात्मक अध्ययन की नसीहत दे रहे हैं? आपकी बात उन पोंगापंथी जाहिलों जैसी लगती है जो वेद के किसी भी मन्त्र को पढ़े बिना वेदों को सभी ज्ञान-विज्ञान का श्रोत घोषित कर देते हैं. ऐसे इतिहास-च्युत मूर्खों को यह नहीं मालुम कि इतिहास की गाड़ी में बैक गीयार्ट नहीं होता. अपने सन्दर्भ में ज्ञानी, हजारों साल पहले के हमारे अर्ध-खानाबदोश रिग-वैदिक चरवाहे पूर्वज आगे के ज्ञान-विज्ञान का आधार तो तैयार कर सकते थे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों से ज्यादा बुद्धिमान कैसे हो सकते थे? किस बिना पर आपने मार्क्सवाद को धर्म घोषित कर दिया आपने मैं नहीं जानता लेकिन दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो या मार्क्स के किसी लेखन की भूमिका का पहला पैरा भी नहीं पढ़ा. जहालत से सार्वजनिक स्पेस का दुरुपयोग एक बौद्धिक अपराध है. विनय प्रताप जी को जो सलाह दिया वही आपको भी दे रझा हूँ कि किस्दी पुस्तक की फटावानुन्मा समीक्षा करने के पहले कम-से-कम उसकी भूमिका पढ़ लें. वैसे हमारे मुल्क में बिना जाने-समझे कही-सुनी और अफवाहों के आधार पर किसी विषय पर निर्णायक राय देने की जहालत की गौरवशाली परम्परा है और आप जैसे लोग उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं.