‘The Second Sex' की लेखक स्त्रीवादी दार्शनिक सिमों द बुआ (Simone de Beauvoir) से एक पत्रकार ने पूछा कि जब स्त्रियां पारंपरिक जीवन में खुश हैं तो वे उनपर अपने विचार क्यों थोपना चाहती हैं? उन्होंने कहा कि वे किसी पर कुछ नहीं थोपना चाहतीं। स्त्रियां पारंपरिक जीवन में इस लिए खुश हैं कि वे जीवन के और तरीके नहीं जानती वे उनका जीवन के और तरीकों से परिचय कराना चाहती हैं। मर्दवाद कोई जीववैज्ञानिक प्रवृत्ति नहीं है बल्कि एक विचारधारा है जिसे हम नित्य-प्रति की जीवनचर्या, रीति-रिवाजों, कर्मकांडों और अनुष्ठानों से निर्मित और पुनर्निर्मित करते हैं। विचारधारा शोषित और शोषक दोनों को प्रभावित करती है।
Sunday, August 8, 2021
Saturday, August 7, 2021
मार्क्सवाद 255 (मंडल)
मंडल कमीसन को लागू करने की घोषणा से जातिवाद के संचार की बात स्वार्थबोध से प्ररित सवर्णों का कुंठा विसर्जन है। वर्णाश्रमी जातिवादी भेदभाव अपने वीभत्स रूप में पहले से मौजूद था, 1990 के बाद सवर्ण वर्चस्व को चुनौती मिलना शुरू हुई। इवि में हमारे समय (1970 के दशक का पूर्वार्ध) गैर-सवर्ण छात्रों की संख्या नगण्य थी। 1990 में कैंपसों की संरचना आज जैसी होती तो हिंसक मंडलविरोधी उन्माद एकतरफा न होता। दिवि और जेएनयू में कुछ वामपंथियों समेत तमाम स्वघोषित जातिवादविरोधी सवर्ण बेनकाब हो गए। मिश्र सरनेम के बावजूद मंडलविरोधी उन्माद का मेरा समर्थन न करना कई लोगों को घोर आश्चर्यजनक लगा था। जेएनयू जैसी जगह में भी वहां के छात्रसंघ के अध्यक्ष को इस्तीफा देना पड़ा (वह भी सवर्ण था) वही हाल दिवि के शिक्षक संघ के अध्यक्ष मुरली मनोहर सिंह की हुई थी। 1990 के बाद जातिवाद शुरू नहीं हुआ बल्कि जातिवादी सवर्ण वर्चस्व को चुनौती मिलना शुरू हुई। प्रतिक्रिया में जवाबी जातिवाद शुरू हुआ, जो कि उतना ही अधोगामी है जितना जातिवाद। समाधान जातिवादी प्रतिस्पर्धा नहीं, जातिवाद का विनाश है।
मार्क्सवाद 254 (सीएसपी)
'मार्क्सवाद की विचारधारा से प्रभावित कांग्रेसजन' द्वारा 1934 में कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी का गठन गांधी के आशिर्वाद से नहीं उनकी इच्छा के विरुद्ध हुआ था। 1928 में कॉमिन्टर्न की 6ठी कांग्रेस के प्रतिगामी प्रस्तावों के तहत तब तक कांग्रेस से सहयोग करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय आंदोलन के अलग-थलग हो गयी तथा प्रतिबंधित थी। नवगठित सीएसपी के अध्यक्ष तथा महमंत्री आचार्य नरेंद्रदेव और जेपी के नेतृत्व में कम्युनिस्ट भी सीएसपी में शामिल हुए। नंबूदरीपाद पार्टी के संस्थापर सह लचिव (ज्वाइंट सेक्रेटरी) थे। अशोक मेहता, मीनू मसानी, लोहिया जैसे कुछ कम्युनिस्ट विरोधी जरूर टॉर्च-खुरपी लेकर पार्टी में कम्युनिस्ट कांस्पिरेसी खोजते रहते थे। यूरोप में नवजागरण एवं प्रबोधन क्रांतियों ने जन्मगत भेभाव खत्म कर दिया था लेकिन भारत में ऐसे आंदोलन नहीं हुए तथा जन्मगत (जातीय) भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष भी कम्युनिस्टों की अतिरिक्त जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने अनदेखा किया, परिणाम स्वरूप जातिवादी भेदभाव के खिलाफ जवाबी जातिवाद शुरू हो गया जो वर्गसंघर्ष के रास्ते का उतना ही बड़ा गतिरोधक है, जितना जातिवाद।
Thursday, August 5, 2021
Marxism & Religion
“Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, just as it is the spirit of a spiritless situation. It is the opium of the people.”
Tuesday, August 3, 2021
ईश्वर विमर्श 101 (मनुष्य की उत्पत्ति)
ईश्वर नहीं है तो हम कहां से आए? किस्म के सवाल अनादि काल से लोग पूछते आए हैं, सिलसिला आज भी जारी है।
शिक्षा और ज्ञान 327 (धर्म और राजनीति)
मंदिर-मस्जिद राजनैतिक कारणों से तोड़े बनाए गए। मैं यह पूछता हूं कि हम (हमारे पूर्वज) इतने कमजोर क्यों थे कि कोई नादिर शाह 2000 घुड़सवारों के साथ पेशावर से बंगाल तक रौंद डालता था? इसके लिए ज्ञान व्यवस्था और समाज व्यवस्था में जवाब ढूंढ़ना पड़ेगा। शस्त्र-शास्त्र का अधिकार जिस समाज में चंद लोगों के हाथ में सीमित हो, बड़े कामगर समूह के साथ पशुवत व्यवहार हो, ज्ञान के नाम पर अंधविश्वास और मिथक पढ़ाए जाते हों, उसे कोई भी रौंद सकता था। मैं अपने दलित साथियों से पूछता हूं कि हमारे पूर्वज तुम्हारे पूर्वजों से पशुवत व्यवहार करते थे तो वे सहर्ष उसे स्वीकार क्यों करते थे? (मेरे लड़कपन तक ऐसा ही था) ऐसा चेतना के स्तर और स्वरूप के चलते होता है। आज संवैधानिक जनतंत्र में कुत्तों की तरह झुंड में शेर बनते हुए संख्याबल के बूते किसी की हत्या कर देना या किसी का 400 साल पुराना भवन तोड़ देना बहादुरी नहीं कायरता और अपराध है। सुप्रीम कोर्ट के अन्यायमूर्तियों ने भी अपने उसी फैसले में बाबरी विंध्वंस को जघन्य अपराध कहा है। 10 साल के 10 लड़के मिलकर शहर के सबसे बड़े पहलवान को पीट सकते हैं, इसमें इन लड़कों की बहादुरी नहीं भीड़ की अपराधी प्रवृत्ति है। अतीत की गलतियां नहीं सुधारी जा सकतीं, उनसे सीख ली जा सकती है। 500 साल की गलती सुधारने में अमेरिका की पूरी आबादी को विस्थापित होना पड़ेगा।
04.08.2020
Monday, August 2, 2021
बेतरतीब 110 (भाई साहब)
इस कहानी (प्रेमचंद की बड़े भाई साहब) से मैं कुछ अधिक ही एकात्म स्थापित कर पाया था क्योंकि इस कहानी के बड़े भाई साहब की ही तरह मेरे भाई साहब भी मुझसे 5 साल बड़े थे लेकिन कक्षा में 3 साल ही आगे। लेकिन ऐसा उनके बुनवियाद मजबूत करने के चलते नहीं, बल्कि हड़बड़ी में मेरी उछलकूद के चलते था। गणित ( गिनती-पहाड़ा) में अच्छा होने के चलते गदहिया गोल ( प्रीप्राइमरी [अलिफ])से कक्षा एक में तथा डिप्टी साहब (एसडीआई) के मुआयने के दौरान अंकगणित के ही एक मौखिक सवाल के जवाब में कक्षा 4 से 5 में प्रोन्नति पा गया था। दरअसल कक्षा 4 और 5 के बच्चे एक ही कमरे में बैठते थे, सवाल कक्षा 5 वालों से पूछा गया था, कोई नहीं बता पाया तो मैंने हाथ खड़ा कर दिया। यह 1963-64 की बात है। वैसे अब सोचता हूं कि हर काम समय पर ही करना चाहिए, आगे-पीछे नहीं। लेकिन बचपन से ही समय से आगे रहने की प्रवृत्ति थी। कम उम्र में प्राइमरी पास कर लेने के चलते हाई स्कूल की परीक्षा की न्यूनतम आयुसीमा की पूर्ति के लिए उम्र बढ़ाकर लिखानी पड़ी, परिणास्वरूप जल्दी रिटायर हो गए डेढ़ साल के पढ़ाने के सुख से वंचित।
